पैरहन…

हल्की सी उनकी हँसी दिल में

उतर गयी

वो गुज़र गये इधर से

लम्हा मगर ठहर गया

यादों के पैरहन थे

महक थी कहीं भीनी सी

झोंका था हवा का

कि तू छूके मुझे किधर गया

हकीकत है कि ख़्वाब है

है किसको ये ख़बर

बेख्याली में शायद

मुझे छूकर तू गुज़र गया

ख़्यालों ने करवट बदली

तू साथ भी है पास भी

मर जाऊँगा क़सम तेरी

जो दिल लेकर मेरा मुकर गया

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इन्तज़ार…

मालूम न था गुज़रोगे दिल की रहगुज़र से

वरना दहलीज़ पे हमने चिराग़ जलाये होते

हवाओं से हमने पैग़ाम दिया होता

आँखों में हज़ारों ख़्वाब सजाये होते

किस तरह से तसल्ली दी दिल को अपने

इन्तज़ार ने तेरे वरना कितने सितम ढाये होते

मुकम्मल हुये तुझसे मिलने के बाद हम

गर्दिशों में कितना बरबाद हुये होते

नाम लेकर जो पुकारा तुमने मेरा

दिल को संभाला किस तरह हमने

वरना आँसू ही छलक आये होते ।

जज़्बात…

जज़्बात बदल जाते हैं

हालात बदल जाते हैं

ज़िन्दगी जीने के

अन्दाज़ बदल जाते हैं

जिसे चाहा किये जान से ज़्यादा

देखिये किस तरह उनके मिज़ाज बदल जाते हैं

रूह बन के जो दिलोजान में रहते आये

वक़्त के साथ जिनके परवाज़ बदल जाते है

मजनूँ का इश्क लैला का इश्क

हीर की उल्फत रांझे की मुहब्बत

वो दौर ही कुछ और था

अब तो पल भर में इन्सान बदल जाते हैं

एक रहनुमा…

वो मेरा दोस्त भी है

मेरा हमनजर भी है

मेरे लिये है वो

दुआ भी है

मेरी ज़िन्दगी में शामिल

खुदा का एक

रहनुमा भी है

वो दूर है पर दूर नहीं

है पास भी पर पास नहीं

ये भी कुछ ऐसा रिश्ता है

वो ख़ास नहीं पर ख़ास भी है

मिल जाता है वो कभी मुझे

जब मिलने की कोई आस नहीं

वो हर रिश्ते में जुड़ा हुआ

वो हर मुश्किल में खड़ा रहा

ईश्वर के वरदान सा है

है साथ सदा पर पास नहीं

वो कोई नहीं है रिश्ते में

है सबसे ज़्यादा ख़ास वही

इज़हार ए मुहब्बत …

किस क़दर कशिश है इस तन्हाई में

शायद मुझे तुमसे मुहब्बत हो गई है

इज़हार ए मुहब्बत की कोशिश में

बात आई गई हो गयी है

मैं कहाँ हूँ किधर हूँ कुछ अपनी ख़बर नहीं

तन्हाईयों में रहने की आदत हो गयी है

ख़लिश है किस क़दर दिल में क्या कहूँ

सबर की फिर भी आदत हो गयी है

समझाने से दिल कहाँ संभलता है

बहलाने की फिर भी आदत हो गयी है

तुमको देखे बिना क़रार नहीं

बेक़रारी की मेरी फ़ितरत हो गयी है

तेरे दिल का हाल मैं जानता नहीं

ज़िन्दगी में कितनी मुसीबत हो गयी है ।

ख़्वाहिशें…

अहसास जागते गये

पलकें नम होती रहीं

बोझ दिल का

और आँखें बरसती रहीं

मुद्दतों राह देखा किये हम

ज़िन्दगी ख़्वाबों को राख करती रही

ख़्वाहिशों का बोझ दिल पर लिये हुये

तमन्नायें आँसुओं में ढलती रहीं

हाथों की लकीरों में बसा कर मुझको

क़िस्मत रोज़ नये दाँव चलती रही

वो मिला था मुझको नसीब से

बदनसीबी मगर साथ साथ चलती रही

अंजामे मुहब्बत…

मैं अगर इक ग़ज़ल भेजूँ तुम्हें

तो तोहमत है मुझ पर इश्क की

जो किताब दूँ ग़ज़लों की

तो बुरा मानते नहीं लोग

गुज़रूँ तेरी गली से

तो तोहमत है मुझ पर बदकारी की

और गुज़रे मेरा जनाजा

तो फूल फेंकते है लोग

तेरे दीदार की हसरत रखूँ

तो बेअदब मानते है लोग

नज़रें झुका के निकलूँ

तो सही मानते हैं लोग

मुश्किल है तेरी गलियाँ

है इश्क कहाँ आसान

पैग़ाम ए मुहब्बत को

कहाँ मानते हैं लोग

बाज आये मेरे दिल की हसरतें

तो इश्क भी क्या है

अंजामे मुहब्बत को

कहाँ जानते है लोग ।

पहला अहसास…

मैं तो नाम हूँ तेरे इश्क़ का

जुनूँ हूँ तेरे ख्याल सा

मुकम्मल हो वो इश्क, क्या

भूल जाऊँ वो ख्याल ,क्या

तू सुकून है मैं बेताब हूँ

मेरे सामने है सवाल सा

बेचैनियों में शामिल रहा

किसी भूले हुये जवाब सा

मैं शाम सा तू रात सा

निकली है सहर कहीं

कहाँ से मेरी ज़िन्दगी में

चमका कोई आफ़ताब सा

तन्हाइयों की रात में

वस्ल का पैग़ाम है

अंधेरी रात में

तू मेरा माहताब सा

मुहब्बत के सफ़र में

मेरा पहला अहसास सा ।

एक दिन…

ख़ामोशियों में कभी यूँ ही

साथ साथ चले

न तुम कुछ कहो न हम कहें

पतझड़ हो या बहार हो

दिल में हमारे

सारे मौसम बसते हो

एक पूरा दिन

साथ गुज़ारूँ

तुम हो मैं हूँ

तन्हाई हो

फिर ज़िन्दगी

चाहे एक दिन की हो