इक आग…

मेरी ख़्वाहिशों को मेरी आरजुओं को

लफ़्ज़ों में समेटने की कोशिश न करो

मैं कोई ग़ज़ल नहीं हूँ तुम्हारी

जो वर्को में लपेटोगे मुझे

इक धधकती हुई आग है

जो सुलगती जाती है जितना

बुझाना चाहूँ इसको

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सौग़ात है मेरी ज़िन्दगी की…

कुछ लम्हे जो मैंने तुम्हारे साथ गुज़ारे हैं

ख़ूबसूरत सौग़ात है मेरी ज़िन्दगी की

मेरे सीने में सुलगती हैं वो यादें

धड़कती हैं साथ साथ मेरे दिल के

मेरे जीने की वजह हैं

रातों को धुआँ धुआँ होता है मेरा मन

उन्हीं यादों के गलियारे में भटकता हूँ मैं

ढूँढता हूँ वहीं सुकून के पल

जो कहीं खो गये हैं

पर अब भी बहते हैं लहू बनकर

मेरी नस नस में ।

क़िस्मत…

कभी कभी कुछ रिश्ते दिल से शुरू होते हैं

और दिल में ही दफ़्न हो जाते हैं

उनकी क़िस्मत में ज़िन्दगी नहीं होती

कॉंच की किरचों से दिल में चुभे रहते हैं

बूँद -बूँद लहू से रिसते हैं

तक़दीर में उनकी कोई ख़ुशी नहीं होतीउनसे हमारा रिश्ता भी कुछ ऐसा है

राहें जुदा हैं फिर भी,बग़ैर उनके

हमारी कोई सहर नहीं होती ।

ज़िन्दगी बन जाना चाहता हूँ …

मैं तुम्हारे दिल में रहना चाहता हूँ

तुम्हारी यादों में तुम्हारी बातों में

तुम्हारी नींदों में तुम्हारे ख़्वाबों में

तुम्हारी धड़कनों में तुम्हारी साँसों में

तुम्हारे दिन में तुम्हारी रातों में

तुम्हारे जिस्म में बहते लहू में

हरारत बनकरअपनी हस्ती मिलाकर

तुम्हारी ज़िन्दगी बन जाना चाहता हूँ

परिभाषा …

तुम्हारी आँखें कुछ भी कहने से रोक देती हैं ,मुझे

तुम्हारा अन्दाज़ भुला देता है,मुझे

मेरे शब्द बग़ावत करने लगते हैं

तुम्हारे सामने बेबस हो जाता हूँ ,मैं

ख़ामोशियों की भी ज़ुबान होती है

कभी तुम सुन सको शायद

उन शब्दों को , जो मैं कह न सकूँ तुमसे

परतुम सुन लो वो अहसास मेरे

जिन्हें मैं शब्दों का लिबास न पहना सकूँ

क्योंकि प्यार की कोई परिभाषा नहीं होती ।

ख़लिश है तेरे इन्तज़ार की…

बारिशों के मौसम में ख़्वाहिशों की रिमझिम में

आरज़ू है तेरे दीदार की

ये सरसराहट है तेरे पैरहन की या

हवा है तेरे दयार की

वस्ल की ख़्वाहिशों में ठहरी है चाँदनी

या ख़लिश है तेरे इन्तज़ार की

यादों के पन्ने से निकल के आ ज़रा

हालत बुरी है दिले बेक़रार की