मीरा-15

     इरा और ज्यादा बेचैन हो गयी थी। क्या हुआ है ये तो धनंजय के आने पर ही पता चलेगा। इरा के लिए दिन बहुत लंबा हो गया था एक एक मिनट घंटों जैसा लग रहा था।

  बार बार सोचती धनंजय को फोन करे फिर खुद को समझाती अब तो धनंजय आने ही वाला होगा।

      अंधेरा होने के बाद भी अभी तक धनंजय आया नहीं था, हार कर उसने समय गुजारने के लिए कोई किताब पढ़नी शुरू की, एक दो पेज ही पढ़े थे कि धनंजय की किसी से बात करने की आवाज सुनाई दी इरा ने किताब बंद की और बाहर आ गई, धनंजय के साथ कोई महिला थी उसी के साथ बात करता वो अदंर आया, सामने ही इरा खड़ी थी, धनंजय ने बताया ये इरा है और इरा को बताया कि ये एस आई मैडम हैं।

इरा नमस्कार कर अदंर चली गई और  चाय बनवा कर वापस आई , सबने चाय पी और बातें करते रहे ।
धनंजय ने इरा को बताया कल ग्यारह बजे मैडम बालिका सदन जायेगी तुम भी वहां समय से पहुंच जाना और वनवारी को साथ ले जाना।
    
     एस आई के जाने के बाद धनंजय ने इरा को बताया, कोर्ट के बाद मैं सीधा कमिश्नर साहब के पास चला गया था सारी परिस्थिति से उन्हें अवगत कराने के बाद उन्होंने भी यही कहा कि ऐसे मामलों में ज्यादा देर नहीं करनी चाहिए। फिर सारा प्लान कमिश्नर साहब ने तैयार किया और मैडम को बुलाकर अच्छे से समझा दिया।

इरा को थोड़ी राहत मिली, “चलो कल मीरा मुक्त हो जायेगी” उसने सोचा।

     “तुम मीरा को घर लेकर आ जाना,” धनंजय ने कहा, “कमिश्नर साहब ने कहा है कि मामले को ज्यादा बढ़ाने की जरुरत नहीं है, बच्ची घर आ जाये यही बहुत है क्योंकि ज्यादा बात बढ़ाने से गुप्ता जी का नाम और परिवार का नाम आयेगा जो सही नहीं होगा, विमलादेवी का और सुरेंद्र का तो कुछ नहीं पर वकील साहब का नाम बीच आये ये अच्छा नहीं होगा।”

इस बात से इरा भी सहमत थी।

मीरा-14

धनंजय जब घर आया तो काफी रात हो चुकी थी, इरा सब कुछ जानने के लिए बेचैन थी उसने एक साथ धनंजय से सवाल करने शुरू कर दिये।

बिना कोई जवाब दिये धनंजय सोफे पर लेट गया वो बहुत थका लग रहा था। धनंजय की हालत देख कर इरा उसके लिए कॉफी बना लायी,
कुछ देर चुपचाप लेटे रहने के बाद धनंजय उठ कर
कॉफी पीने लगा।

   धनंजय अब थोड़ा ठीक लग रहा था, धनंजय ने कहा, “कल एक लेडी एस आई और दो कांस्टेबल बालिका सदन जायेंगे और मीरा को ले आयेंगे, मैने कमिश्नर साहब को सब अच्छे से बता दिया है, वो गुप्ता जी के अच्छे दोस्तों में से थे।”

“मैं भी अगर जाऊँ तो?” इरा ने हिचकिचाते हुए कहा।

“हम्म, ठीक है मैं कमिश्नर साहब से बात कर लूंगा, वो लेडी इन्सपेक्टर को कह देंगे कि जब वो निकले तो तुम्हें फोन कर दें,” धनंजय ने कहा, “मैं बहुत थक गया हूँ सोने जा रहा हूँ।”

“और खाना?”  इरा ने कहा

“तुम खा लो मेरा मन नहीं है,” कहकर धनंजय चला गया।

इरा भी बिना खाये सोने चली गयी।

इरा रात को मुश्किल से कुछ घंटे ही सो पाई, सुबह जल्दी ही उसकी नींद खुल गई। जल्दी-जल्दी उसने अपने काम निबटाये और तैयार हो गई।

धनंजय जब उठा तो इरा तैयार थी, उसके कुछ कहने से पहले ही इरा ने कहा, “मैंने सोचा मैं तैयार हो जाऊं, जाने कब इन्सपेक्टर का फोन आ जाये।”

धनंजय हंसा और बोला, “मैं कमिश्नर साहब को फोन तो कर दूं कि तुम भी जाना चाहती हो।”

“हां प्लीज़,” इरा बोली।

धनंजय ने फोन करके इरा को बताया कि जब इन्सपेक्टर निकलेंगी तो उसे फोन कर देगीं।

जैसे जैसे दिन बीत रहा था इरा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी, उसे लग रहा था अब फोन आया तब फोन आया।

  दिन के दो बज गये थे और अभी तक इन्सपेक्टर का फोन नहीं आया था।

   इरा बाहर आ गयी तभी अंदर फोन बजने लगा, वो दौड़ती हुई अंदर गयी और रिसीवर उठा कर बोली, “हां मैं इरा बोल रही हूँ।”

“हां मैं जानता हूँ,” उधर से धनंजय ने हंसते हुये कहा।

“मैं क्या करूँ, मेरा किसी काम में मन ही नहीं लग रहा है, बार बार मीरा का ही ख्याल आ रहा है।”

“अच्छा सुनो आज का प्रोग्राम कैंसिल है,” धनंजय ने कहा, “अब शायद कल हो पायेगा।”
“क्या लेकिन…वो लड़की परेशानी में है,” इरा ने चिंता से कहा।
“हां ठीक है लेकिन हमें सावधानी से सब करना होगा, हड़बड़ी में काम बिगड़ सकता है,” धनंजय ने कहा, “तुम चिंता मत करो शाम को आकर बात करता हूँ।”

मीरा-13

इरा जब घर पहुंची तो धनंजय घर पर ही था। इरा ने धनंजय को घर पर ही देखकर कहा, “अरे तुम कोर्ट नहीं गये”
धनंजय ने उसकी बात पर ध्यान न देते हुये पूछा, “क्या हुआ तुम मीरा से मिली”
इरा ने उसे सारी बातें विस्तार पूर्वक बताई और कहा, “मुझे समझ नहीं आ रहा, कि मिसेज गुप्ता ने ऐसा क्यों किया”

“वो नहीं चाहती होगीं कि मीरा उनके साथ रहे और हो सकता है सच में कोई मीरा की कोई रिश्तेदार ही उसे वहां छोड़ गई हो।”

“लेकिन अगर कोई रिश्तेदार है तो वो मीरा को ले जायेगी तो अपने साथ ले जाती अगर उसे मीरा को वहां छोड़ना था तो ले क्यों गई वो तो गुप्ता जी के यहां रह रही थी और फिर इतने सालों से कभी कोई उससे न तो मिलने आया न ही किसी ने कोई संपर्क किया,” इरा ने सोचते हुये कहा।

“बात तो तुम्हारी ठीक है, लेकिन सच तो मीरा ही बता सकती है,” धनंजय ने कहा।

“हां, पर मुझे बताओ कि मीरा को वहां से कैसे निकालना है, क्योंकि ऑन रिकॉर्ड तो मीरा वहां नही है”

“हमें पुलिस की मदद लेनी होगी,” धनंजय ने कहा।

“लेकिन क्या पुलिस को इन सब में शामिल करना सही ह़ोगा?”

“तुम ही बताओ, जब तुम वहां गयीं तो किसी ने मीरा के बारे में नहीं बताया तुम्हें भी मीरा के बारे में इत्तफाक से पता चल गया,” धनंजय ने समझाया, “और वहाँ के स्टाफ को भी मीरा के बारे में बात करने से मना किया हुआ है तो क्या हमारे कहने या पूछने से वो मानेंगे कि मीरा वहां है और ज्यादा पूछताछ करने पर उन्होंने मीरा को कहीं और छुपा दिया तो मीरा का पता नहीं चलेगा सिर्फ पुलिस ही ये काम कर सकती है।”

“लेकिन हम पुलिस वालों को क्या कहेंगे,” इरा ने शंका जाहिर की

“मेरा एक दोस्त है जो पुलिस कमिश्नर है हमें उसे सब बताना होगा।”

“ठीक है,हमें जल्दी ही कुछ करना होगा पता नहीं मीरा किस हाल में होगी” इरा ने चिंता जताई।

“मैं आज शाम ही उसे मिलता हूँ,” धनंजय ने कहा।

इरा पूरे दिन बेचैन रही कभी उसे लगता कहीं पुलिस के कारण कुछ गड़बड़ तो नहीं होगी, कभी सोचती पुलिस के कारण कोई ठोस कदम उठा सकते हैं।

इरा अंदर बाहर चक्कर काट रही थी रात के नौ बज गये थे अभी तक धनंजय घर नहीं आया था।

मीरा-12

“ठीक है, मैं अभी सबको बुलाती हूँ” ऊषा देवी ने कहा, फिर सरिता को सब लड़कियों को बुलाने भेज दिया ।
   थोडी़ देर में लड़कियां आ गयीं, ऊषादेवी एक एक करके उनके नाम बता कर उनकी उम्र बताती गयीं।
   लगभग पन्द्रह लड़कियां आयीं उसके बाद ऊषादेवी ने इरा से पूछा, “कोई लड़की पसंद आई आपको?”

“बस यही लड़कियां है या और भी है?”

“इतनी ही है हमारे यहाँ, हमारा सदन छोटा है, कुल सात कमरे है जिसमें एक में ये ऑफिस है, चार कमरों में लड़कियां रहती है एक मेरे लिए और एक में दो महिला कर्मचारी रहती है।”

“मुझे रेखा पसंद है, एक दो दिन में मैं और मेरे पति आकर सारी जरूरी फार्म वगैरा और जो भी आप बतायेगी सब करके बच्ची को ले जायेंगे।”
ऊषादेवी ने सिर हिलाया।

इरा उठ कर खड़ी हो गयी, लड़कियां वापस चली गयीं थीं इरा भी बाहर आ गयी।

     पीछे से सरिता भागती हुई आयी, “मैडम जी ये आपका बैग, अदंर ही भूल आयीं आप”
“थैंक्स”, इरा ने बैग लेकर कहा ।
“मेंशन नॉट” सरिता मुस्कुरा कर बोली ।

“अरे वाह, तुम तो अच्छी खासी अंग्रेज़ी बोल लेती हो,” इरा ने हंसकर कहा।
“मीरा ने थोडी़ थोड़ी सिखाती थी मुझे,” सरिता शरमा कर बोली।
“मीरा वो कौन है, इन लड़कियों मे तो कोई मीरा नाम की लड़की नहीं थी।”
“वो तो…” सरिता थोड़ा घबरा गयी।
“हां?कौन है मीरा…?” इरा ने प्यार से पूछा
“पता नहीं मैडम जी मैं ज्यादा नहीं जानती उसके बारे में ,पर बहुत अच्छी लड़की है मुझे उस पर बड़ी दया आती है।”

“क्यों ऐसा क्या है?” इरा ने पूछा
“किसी अच्छे घर की लगती है, उसकी कोई रिश्तेदार यहां छोड़ गयी थी, मैडम को भी जाने क्या समझा गयी थी, वो उसे हमेशा स्टोर रूम में बंद करके रखती हैं,” सरिता ने दुख से कहा।
  तभी ऊषादेवी ने सरिता को आवाज लगायी,”क्या कर रही है वहां?”

सरिता ने इरा से धीरे से कहा, “मैडम को कुछ मत बताइएगा वरना वो बहुत नाराज होंगी।”

  इरा ने सरिता के कंधे पर हाथ रख कर कहा, “चिंता मत करो मैं कुछ नहीं कहूंगी।”

मीरा-11

धनंजय इरा की तरफ ध्यान से देख रहा था जैसे ही इरा ने फोन रखा उसने पूछा “क्या बात है…”

इरा ने धनंजय को लतिका का बताया एक एक शब्द बता दिया, धनंजय सोचते हुए बोला, “शायद गुप्ता सर को इसका आभास हो गया था तभी हम लोगों को बच्चियों के बारे में सब कुछ बता दिया था और इसीलिए उन्होंने उन्हें हॉस्टल भेज दिया था”

“सबसे पहले तो मैं बालिका सदन के बारे में पता करता हूँ, फिर सोचते हैं क्या करें।”

“जो भी करना है हमें जल्दी करना होगा पता नहीं मीरा किस हालत में है” इरा ने बेचैन होकर कहा।

“चिंता मत करो, मीरा एक दो दिन में हमारे साथ होगी” धनंजय ने इरा को आश्वासन दिया।

धनंजय पूरे दिन न जाने किस किस को फोन करता रहा और फिर देर रात को उसने इरा को बताया कि बालिका सदन का पता चल गया है।
       मंगलवार को सुबह लगभग साढ़े बारह बजे बालिका सदन के सामने एक सफेद रंग की गाड़ी आकर रुकी, गाड़ी रुकते ही सहायक ने उतर कर गाड़ी का दरवाजा खोला जिसमें से इरा उतरी, उसने देखा सामने पुरानी सी एक मंजिला बिल्डिंग थी जगह जगह से मकान का प्लास्टर उखड़ा हुआ था, एक क्षण रुककर इरा ने प्रवेश किया। अंदर एक मध्य आयु की एक महिला कुछ काम कर रही थी, इरा को देख कर वो पास आ गई, “कहिये क्या काम है”

इरा ने उसे गौर से देखा और बोली “मुझे एक बच्ची गोद लेनी है किसी ने बताया था कि यहाँ से बच्ची ले सकती हूँ।”

“आप अंदर चले जाओ सामने ही मैडम जी का ऑफिस है वो आपको सब बता देगीं”
   इरा अंदर चली गयी  मध्यम आकार का कमरा था जिसमें एक बड़ी मेज थी, चार पाँच कुर्सियां रखी थी, एक तरफ टेलीफोन रखा था, पीछे की साइड एक अलमारी थी जिसमें बेतरतीब ढंग से फाइलें भरी पड़ी थी, सामने कुर्सी पर बैठी हुई महिला उठ खड़ी हो गयीं।
  इरा ने कहा “मैं एक बच्ची एडाप्ट करना चाहती हूँ, मेरे एक परिचित ने यहां का पता बताया था।”
“मेरा नाम ऊषा है मैं यहां का काम देखती हूँ, आप मुझे बतायें क्या आप शादीशुदा हैं?”
“जी हाँ मैं अभी सिर्फ बच्चियों को देखने आयी हूँ, पसंद आने पर मैं और मेरे पति यहाँ आकर सारी फार्मेलिटी पूरी कर बच्ची को एडाप्ट कर लेगें।”

मीरा-10

लतिका सोच रही थी जल्दी ही उसे कुछ करना पड़ेगा क्योंकि घर पहुंच कर वो कुछ नहीं कर सकेगी क्योंकि मां और सुरेंद्र नहीं चाहेंगे कि मीरा के लिये कुछ किया जाये। लतिका ने धनंजय को फोन करने का निर्णय लिया, वैसे भी आज रविवार था और संभावना थी कि वो घर पर मिल जायें ।
   लतिका ने टेलीफोन डायरेक्टरी से धनंजय का नंबर ढूंढ कर फोन किया, घंटी जा रही थी, लतिका सोच रही थी कि वह उन्हें क्या बतायेगी
तभी उधर से किसी ने फोन उठा लिया।

“हैलो …।”

“क्या मैं इरा मैडम से बात कर सकती हूँ?”

“हां, एक मिनट..मैं बुलाता हूं”

    कुछ ही सेकेंड में उधर से इरा की आवाज आई “हां कहिये मैं इरा त्रिवेदी बोल रही हूँ।”

“हैलो…इरा मैडम मैं लतिका गुप्ता” लतिका ने जल्दी से कहा, “श्री बलराम गुप्ता जी की बेटी, आपको याद है पिताजी ने मुझे और मीरा दी को आपसे मिलवाया था, उन्होंने हमसे कहा था, आप हमारी मदद जरूर करेंगी।”

  “हां बिलकुल, क्या बात है?” इरा ने गर्मजोशी से कहा “गुप्ता जी तो मेरे और धनंजय के गुरु थे, उनसे ही हमने सब सीखा है खैर बताओ तुम और मीरा कैसे हो?”

“मैडम, मुझे आपकी मदद की सख्त जरूरत है,” लतिका की आवाज रुआंसी हो रही थी।

“घबराओ मत, मुझसे जो हो सकेगा मैं करुँगी, आराम से बताओ पहले हुआ क्या है”

“पिताजी के जाने के बाद मां ने मीरा दीदी को हॉस्टल नही आने दिया मैं अकेली ही आई थी। मुझे सुरेंद्र भाई छोड़ गये थे, लेकिन जब मैं छुट्टियों में घर गयी तो घर पर मीरा दीदी नहीं थीं, मैंने मां से पूछा तो उन्होंने कुछ नहीं बताया” लतिका ने पिछले दिनों जो कुछ भी हुआ था सब इरा को बता दिया और मीरा के फोन के बारे में भी बता दिया।

   इरा ने धैर्यपूर्वक लतिका की सारी बातें सुनी और  उससे कहा, “तुम चिंता मत करो, मैं मीरा का पता जल्दी लगा लूंगी तुम जब आओगी तो मीरा से मिलोगी…जरा भी चिंता मत करो,” कहकर इरा ने फोन रख दिया।

मीरा-9

लतिका की छुट्टियाँ खत्म हो रही थी, वो बेहद परेशान थी उसे लग रहा था मीरा ठीक नहीं है पर कैसे पता चले। लतिका वापस हॉस्टल चली गयी, उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था।
    लतिका को याद आया जब पिताजी उसे और मीरा को हॉस्टल छोड़कर गये थे तो उन्होंने उससे कहा था, “लतिका मीरा का ध्यान अपनी सगी बहन की तरह रखना, दोनों अच्छी तरह रहना और एक दूसरे का ख्याल रखना”

उस वक्त लतिका अपने पिताजी की बात को नहीं समझी थी पर अब लग रहा था कि पिताजी के शब्दों का गहरा अर्थ था।

  परीक्षाएं शुरू हो गयीं थी, पर लतिका का मन ठीक नहीं था,उसके पेपर अच्छे नहीं हुए थे बड़े बेमन से उसने परीक्षा दी थी।
   जब लतिका घर जाने की तैयारी कर रही थी तभी लतिका के पास संदेश आया कि उसका फोन है, लतिका को लगा कहीं मीरा का फोन तो नही है वो दौड़ती हुईऑफिस पहुंची और रिसीवर उठाकर बेसब्री से बोली “हैलो!”

“लतिका …” दूसरी तरफ एक कमजोर और सहमी सी आवाज ने कहा।

लतिका मीरा की आवाज फौरन पहचान गई।

“दीदी तुम कहाँ  हो?” लतिका ने मीरा से पूछा

“लतिका मुझे बचा लो वरना मैं मर जाऊंगी।”

“तुम हो कहाँ!?”

“मैं नहीं जानती बस इतना जानती हूँ जहाँ मैं हूँ उस जगह का नाम बालिका सदन है ये एक पुराना सा घर है…”

“दीदी मैं कुछ करती हूँ… तुम चिंता न करना”

उधर से फोन कट गया था।

       लतिका ने सोचा क्यों न मां से बात करूं, लेकिन नहीं अगर मां ने ही मीरा दीदी को वहां छोड़ा हो तो, नहीं माँ से नहीं तो फिर किसे कहूं
काश पिताजी होते तो ये सब कुछ होता ही नहीं। हां पिताजी ने कहा था कि मैं उनकी सहायिका से बात कर सकती हूं उनका नाम क्या बताया था पिताजी ने ….धनंजय और इरा त्रिवेदी

मीरा-8

धीरे धीरे वक्त गुजरता रहा, लतिका मीरा को लेकर बेहद फिक्रमन्द थी। दीपावली की छुट्टियों में जब लतिका घर आई तो वो मीरा से नाराज़ थी, कि मीरा दी खुद भी तो मुझसे बात कर सकती थीं अब मैं भी मीरा दी से बात नहीं करूंगी ।
    परन्तु घर पहुंचते ही वो मीरा के कमरे की तरफ भागी मीरा के कमरे के पास पहुंच कर लतिका ठिठक गयीं मीरा का कमरा बंद था, मीरा का कुछ भी सामान वहां नहीं था और कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे पता चले कि मीरा यहां रहती थी ऐसा लग रहा था जैसे मीरा कभी यहां थी ही नहीं।
    लतिका हैरान थी कि मीरा थी कहाँ, उसने विमलादेवी से मीरा के बारे में पूछा तो विमलादेवी ने उससे कहा कि मीरा की कोई रिश्तेदार आई थीं जिनके साथ मीरा चली गयी।
कहाँ चली गयी, किस जगह ले गयीं वो मीरा दी को, लतिका ने जानने की कोशिश की।

“मुझे नहीं पता, न ही मैंने पूछा, बेहतर है तुम भी अपने काम से काम रखो” विमलादेवी ने रूखी आवाज़ में जवाब दिया।

    मीरा के बारे में कुछ भी पता नहीं चल रहा था लतिका परेशान थी किस तरह वो मीरा के बारे में पता करे। जैसे जैसे दिन बीत रहे थे लतिका की बेचैनी बढ़ती जा रही थी, अगर मीरा अपनी मर्जी से अपने किसी रिश्तेदार के साथ गयी थी तो उसने लतिका को एक बार भी फोन क्यों नहीं किया पिछले तीन महीनों में मीरा का न तो कोई समाचार था न कोई खत मिला था, उसका दिल ये मानने को तैयार नहीं था कि मीरा ठीक थी और उसे भूल गई थी।

  कुछ तो गड़बड़ थी लेकिन क्या यही लतिका नहीं समझ पा रही थी।

मीरा-7

अगले दिन सुरेंद्र लतिका को हॉस्टल छोड़ने चला गया। बहुत दिनों बाद मीरा को एक बार फिर से भय की अनुभूति होने लगी, उसके पास उसका ध्यान रखने वाले न तो उसके मामा थे और न ही प्यारी बहन लतिका।


     मीरा लतिका को फोन करना चाहती थी पर कोई मौका नहीं मिल रहा था।
     लतिका का दिल इस बार हॉस्टल में नहीं लग रहा था, ये पहली बार था जब लतिका अकेली थी। दो तीन दिन बाद जब लतिका ने घर फोन किया तो उसे लगा कि मीरा उसे कुछ बताना चाहती है पर बात नहीं कर पा रही थी शायद मां या सुरेंद्र आसपास होगें। लतिका ने सोचा एक दो दिन बाद बात पूछूँगी मीरा दी से।
  हफ्ते भर बाद जब लतिका ने घर फोन किया तो सुरेंद्र ने उठाया मीरा से बात करने की बात पर बोला, वो घर पर नहीं है और फोन बंद कर दिया।
      उसके बाद से जब भी लतिका घर फोन करती उसे यही बताया जाता मीरा घर पर नहीं है कहीं गयी हुई है लतिका ने कई बार जानने की कोशिश की कि मीरा कहाँ है पर उसे कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था।

    धीरे धीरे दो महीने बीत गये मीरा कहाँ थी लतिका को कुछ पता नहीं था, मां और सुरेंद्र से पता लगाना मुश्किल था घर के नौकर भी कुछ बता नहीं पा रहे थे।


    लतिका का मन किसी काम में नहीं लग रहा था, न तो वो पढ़ पा रही थी न मीरा का ख्याल अपने दिमाग से हटा पा रही थी, इतनी व्याकुलता उसके अंदर क्यों है आखिर मीरा दी है कहाँ? कहीं उनके साथ कुछ हुआ तो नहीं है मैं किस तरह पता करूँ।

मीरा-6

देखते देखते हफ्ता कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। छुट्टियाँ बिता कर सब घर लौट आये, मीरा और लतिका की अभी बीस दिन की छुट्टियां बची थी परन्तु गुप्ता जी काम में व्यस्त हो गये थे। विमलादेवी सुरेंद्र को लेकर चिंतित थी, गुप्ता जी सुरेंद्र को लेकर अभी भी नाराज़ थे।

   गुप्ता जी ने सुरेंद्र को बाहर भेजने का फैसला कर लिया था, विमलादेवी भी पति से सहमत थी वे सोचती थीं कि बाहर जाकर सुरेंद्र में जरूर सुधार होगा उसका संगसाथ भी बदल जायेगा तो वो भी सुधर जायेगा।
      सारी तैयारियां हो चुकी थीं, गुप्ता जी ने विमलादेवी को बताया कि लड़कियों की भी छुट्टियां खत्म हो रहीं हैं, तो सुरेंद्र को पहुंचा कर दोनों बेटियों को भी हॉस्टल छोड़ आयेंगे।

      जाने से दो दिन पहले अचानक रात को गुप्ता जी के सीने में तेज दर्द
हुआ और जब तक डॉक्टर आता गुप्ता जी सबको छोड़कर जा चुके थे।

मीरा और लतिका का रो रोकर बुरा हाल था, विमलादेवी पहले ही कम
बोलती थीं अब तो बिल्कुल ही खामोशी अख्तियार कर ली थी।

      सुरेंद्र पहले की तरह हर बात से बेखबर रहता था जब कोई जरूरत होती तो माँ के पास आता, वरना अपने में ही खुश रहता।
   सारे रिश्तेदार और नातेदार जा चुके थे घर में सन्नाटा फैल गया था
दुख का माहौल इस कदर था कि मीरा और लतिका घंटों चुपचाप बैठी रहतीं थीं किसी को किसी की सुध नहीं थी।

      एक दिन विमलादेवी ने दोनों लड़कियों को अपने कमरे में बुलाया और लतिका से कहा, “तुम अब हॉस्टल चली जाओ, मीरा अब यहीं रहेगी”

“लेकिन…माँ मीरा दीदी को तो अभी …” लतिका ने कुछ बताना चाहा
परन्तु विमलादेवी ने हाथ उठाकर रोक दिया, “तुम तैयारी कर लो, सुरेंद्र तुम्हें छोड़ आयेगा”

मीरा-5

मीरा सत्रह साल की हो गई थी अब वो खुश रहने लगी थी स्कूल से अब कॉलेज जाने का समय आ गया था। मीरा अपने मामा की तरह एक लॉयर बनना चाहती थी…एक अच्छा लॉयर। लतिका भी ऐसा ही सोचती थी, दोनों सगी बहनों से भी ज्यादा घुलमिल गई थीं, हमेशा साथ ही रहतीं।
      दोनों बहनों की छुट्टियाँ थीं, गुप्ता जी के पास भी व्यस्तता कम थी तो परिवार के साथ शिमला जाने का कार्यक्रम बना लिया गया। मीरा और लतिका बेहद खुश थीं दोनों न जाने क्या क्या सोच रही थीं वहां जाकर क्या करेंगी, रात काफी हो गयी थी, अगली सुबह निकलना भी था, फिर भी दोनों की आँखों से नींद गायब थी।
  
फोन की लगातार घंटी ने गुप्ता जी को जगा दिया, रात के दो बज रहे थे, मेहरा जी फोन पर थे।

“हैलो” गुप्ता जी ने कहा ।
उधर से मेहरा जी ने गुप्ता जी को पता नहीं क्या कहा, कि गुप्ता जी का चेहरा क्रोध और क्षोभ से भर उठा।
विमलादेवी भी जग गयी थीं, उन्होंने प्रश्नवाचक निगाहों से गुप्ता जी को देखा

“तुम्हारा लाड़ला कहाँ है”

“सो रहा होगा”

“तुमने उसे बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी”
“ऐसा क्या हो गया”

गुप्ता जी बिना कोई जवाब दिये चले गये।

गुप्ता जी के जाने के बाद विमलादेवी सुरेंद्र के कमरे में गयीं कमरा खाली था, चिन्तित विमलादेवी के दिमाग में सैकड़ों ऊलजलूल ख्याल आते रहे।
करीब साढ़े तीन बजे गुप्ता जी सुरेंद्र के साथ आये, सुरेंद्र की आँखें लाल हो रहीं थीं पैर लड़खड़ा रहे थे, उसे कुछ होश नहीं था। सुरेंद्र को उसके कमरे में पहुंचाने के बाद विमलादेवी जब कमरे में वापस आयीं तो गुप्ता जी ने कहा, अभी भी इसे सम्हाल लो वरना इसका क्या होगा, तुम खुद ही सोचो।
       अगले दिन सब शिमला के लिए रवाना हो गये, सुरेंद्र अलग थलग सा रहा और गुप्ता जी से नज़रें चुराता रहा, विमलादेवी भी चुप चुप थीं और सुरेंद्र से नाराज़ भी थीं ।
     होटल पहुंचते पहुंचते सब थक गये थे, थोड़ी देर आराम करने के बाद
घूमने का प्रोग्राम तय हुआ।
  शिमला के सुहावने मौसम ने सबके तनाव को दूर कर दिया था, सुबह से शाम तक घूमते घूमते जब सब थक जाते तो कहीं खाना खाते, थोड़ा आराम करते और फिर नया प्रोग्राम शुरू हो जाता ।

मीरा – 4

एक शाम को गुप्ता जी और विमलादेवी चाय पी रहे थे, विमलादेवी ने अपने पति की ओर देखते हुये बोली, “तुम नाराज न हो तो एक बात कहूं..”

“हां.. कहो” ,गुप्ता जी कुछ सोचते हुये कहा ।

“मीरा की और लतिका की तो शादी हो जायेगी और वे दोनों अपने घर में व्यस्त हो जायेंगी”

“हम्म…”, गुप्ता जी ने विमलादेवी की ओर देखते हुये हुंकारा भरा।

“शादी के बाद कहाँ समय होगा दोनों के पास, दोनों ही अपनी जिंदगी में व्यस्त हो जायेगीं।”

“वो तो है …।”

“तुम इतने बड़े वकील हो, कैसे कैसे केस साल्व करते हो, सब तरह के जोड़तोड़ कर लेते हो बड़े बड़े मामले सम्हाल लेते हो।”

“कहना क्या चाहती हो?” गुप्ता जी ने उन्हें टोकते हुये कहा।

“क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मीरा की कम्पनी अपने सुरेंद्र के नाम हो जाये?” विमलादेवी ने अपने मन की बात बताई।
“क्या? कह रही हो?” वकील साहब अविश्वास से बोले।

“ठीक ही तो कह रही हूं, वैसे भी मीरा का हमारे सिवा है ही कौन?” विमलादेवी ने बात पूरी की ।

वकील साहब कुछ देर विमलादेवी को देखते रहे, फिर गहरी सांस भर कर बोले, “अच्छा किया जो तुमने ये बातें मुझे बता दी, देखता हूँ मैं क्या कर सकता हूँ..”

विमलादेवी खुश होकर बोली “मुझे पता था, तुम मेरी बात जरूर समझोगे”

“ठीक है, मैं चलता हूँ, देखता हूँ ये मामला जल्दी ही निबटा लूं, क्यों ?”

“हां हां मुझे पता था तुम मेरी बात जरूर मानोगे,” उत्साहित होकर विमलादेवी बोली ।

       उस दिन कोर्ट में गुप्ता जी का केस था, जिसमें एक पिता ने अपने बेटे के विरूद्ध याचिका दायर की थी। गुप्ता जी पिता की तरफ से पैरवी कर रहे थे, फैसला पिता के पक्ष में हुआ था पिता को बेदखल कर बेटे ने मकान पर कब्जा कर लिया था वकील साहब ने पिता को पुनः कब्जा दिला दिया था।

     आफिस में आकर गुप्ता जी ने अपने सहायक धनंजय को बुलाया साथ में धनंजय की पत्नी इरा भी थी। काफी देर तक तीनों बातें करते रहे,गुप्ताजी ने धनंजय को कुछ कागजात दिये और निर्देश दिया कि जो काम उन्होंने उसे दिया है वो जल्द से जल्द हो जाना चाहिए।

     तीन दिन बाद धनंजय ने वकील साहब को एक  फाइल लाकर दी और कहा सबकुछ फाइल में है आपने जैसे कहा था वो सारा काम उसी तरह कर दिया है।

       गुप्ता जी ने फाइल चेक की और सन्तुष्ट  होकर बोले, “तुमने बहुत अच्छे से सब कुछ किया है अब इस फाइल को लॉकर में रख दो अगर मुझे कुछ हो जाये तो जैसा मैंने कहा है वैसा ही करना है तुम्हें।”

“जी सर ,ऐसा ही होगा” धनंजय ने जवाब दिया।

मीरा – 3

दो हफ्ते बाद जब गुप्ता जी घर वापस आये तो विमलादेवी उनके पीछे पीछे कमरे में आ गयी।
“लड़कियां कौन से हॉस्टल गयी हैं… कब तक वहां रहेंगी?” विमलादेवी ने गुप्ता जी से सवाल किया।
“जब तक उनकी पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती”
“कहना तो नहीं चाहती मैं, पर मीरा पर इतना खर्च करने की क्या आवश्यकता है,” तीखे स्वर में विमलादेवी बोली।

“तुम खर्चा उठाओगी मीरा का” कड़वे अन्दाज़ में गुप्ता जी बोले “तुम्हारा बेपनाह प्यार उस नन्हीं बच्ची के लिए मैंने देख लिया है, तुम्हें तो उस बिन मां बाप की बच्ची पर तरस भी नहीं आया, अपने बेटे के साथ ऐसा कर सकती हो तुम?”

“मैं….” विमलादेवी ने कुछ कहने की कोशिश की

  गुप्ता जी ने उनकी बात पर ध्यान न देते हुये कहा,”जानती हो मीरा के
पास कितनी प्रापर्टी है, उसके पिता उसके लिये करोड़ों रूपये छोड़ गये हैं। उनकी कम्पनी का सालाना टर्न ओवर दो सौ करोड़ है, तुम खर्च उठाओगी मीरा का!? वो जिस घर में रहती थी वो इस घर से सौगुना ज्यादा शानदार है, समझ गई, अब जाओ। मैं थोड़ा आराम करना चाहता हूँ।”
        सारी बातें सुनकर विमलादेवी अवाक् रह गयीं, उनके तो ख्याल में भी नहीं था कि मीरा इतनी अमीर होगी, वह कुछ सोचती हुई बाहर आ गयीं।
     बलराम गुप्ता शहर की जानीमानी हस्ती थे, पेशे से वकील थे,जो भी केस उनके पास आता था उनकी जीत पक्की होती थी, दूर दूर तक उनका बड़ा सम्मान था, उनकी प्रसिद्धि दूर तक थी।

       देखते देखते चार साल बीत गये लड़कियां छुट्टियों में घर आतीं और छुट्टियाँ गुजार कर वापस चली जाती। घर पर सुरेंद्र अकेला था और मां के लाड़ प्यार में जिद्दी और लापरवाह हो गया था, गुप्ता जी कभी कभी उसे समझाते तो कभी नाराज़ भी हो जाते पर सुरेंद्र चुपचाप सब सुनता था और बेअसर रहता।

मीरा – 2

“लेकिन मालकिन…”, गिरधारी ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन विमलादेवी सुरेंद्र का हाथ पकड़ कर कमरे में चली गयीं।

    शाम को जब बलराम गुप्ता घर आये तो लतिका ने सुबह की सारी घटना विस्तार से बता दी,जिसे सुनकर बलराम गुप्ता क्रोधित हो उठे, गरजते हुये उन्होंने गिरधारी को आवाज लगाई, गिरधारी सहमा
सामने आकर खड़ा हो गया ।
 
“कहाँ है ,मीरा?” गुस्से में भरे हुये उन्होंने पूछा

“जी, वो स्टोररूम में, मालकिन ने कहा ….।”

तेजी से लपकते हुये गुप्ता जी स्टोररूम में पहुंचे अन्दर जाकर देखा बच्ची दीवार के पास लेटी हुई थी आंखों से आंसू बहकर गालों पर सूख गये थे, हाथों और चेहरे पर खून की लकीरें बनी थी, बच्ची की हालत देखकर उनकी आंखें भर आयीं, झुक कर उन्होंने बच्ची को उठाया और अपने कमरे में ले आये डाक्टर को फोन कर उन्होंने सोमी को बुलाकर मीरा के कपड़ें बदलने को कहा, बच्ची का शरीर बुखार से तप रहा था।
  डाक्टर के आने की खबर सुनकर विमलादेवी आईं तो पीछे पीछे सुरेंद्र भी चला आया और शिकायती लहज़े में पिता से बोला “पिताजी ये लड़की..”, परन्तु पिता की कड़ी नज़र देख कर चुप हो गया।

विमलादेवी ने कुछ कहना चाहा परन्तु पति का रुख़ देखकर बाहर चली गयीं।
           सप्ताह भर बाद दोनों बच्चियाँ सुबह सुबह ही तैयार हो गयीँ, विमलादेवी ने कहा, “आज बड़ी जल्दी तैयार हो गयीं तुम दोनों, क्या बात है?”

   लतिका खुश होकर बोली, “अब मैं और मीरा दीदी  होस्टल में रहेंगे, पिताजी ने कहा है”
    विमलादेवी ने प्रश्नवाचक नजरों से पति की तरफ देखा, लेकिन गुप्ता जी बिना कुछ कहे लड़कियों के पीछे चले गये।

  भौचक्की विमलादेवी वहीं खड़ी रह गयीं।

मीरा -1

एक नौ साल की लड़की सिर झुकाये खड़ी थी, उसके हाथों और चेहरे पर खरोंचों के निशान थे, जिनसे खून छलक आया था कपड़ों पर मिट्टी लगी हुई थी और बाल बिखरे हुये थे।
      पास ही एक ग्यारह साल का लड़का खड़ा था, उसके मुख पर दुष्टता पूर्ण हंसी थी।
वह सामने बैठी अपनी मां से शिकायती लहजे में बोला, “मां ये लड़की गाली भी देती है।”
लड़के की मां ने लड़की को घूर कर देखा और बोली, “तुम और कितनी बुरी आदतों की शिकार हो?”
   “मैं गाली नहीं देती,” लड़की धीमी आवाज में बोली।
    तभी पीछे से एक छह-सात साल की बच्ची दौड़ती हुई आयी और बोली, “मां भैय्या झूठ बोल रहा है, भैय्या ने मीरा दीदी को धक्का दिया था, जब दीदी गुलाब का फूल तोड़ रही थी, देखो न दीदी के हाथ और चेहरे पर खून भी निकल आया है”
    मां ने कठोरतापूर्वक बच्ची को देखा और कहा “तुम्हें बीच में बोलने की जरूरत नहीं है, तुम अंदर जाओ”

“पर मां…”, बच्ची कुछ कहना चाहती थी किन्तु मां की भंगिमा देखकर चुपचाप चली गयी।

     लड़के की मां विमला देवी, जो मीरा की मामी थीं। कुछ महीने पहले
मीरा के माता पिता की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी। मीरा को उसके
मामा बलराम गुप्ता अपने साथ ले आये थे, कि बच्चों के साथ मीरा शीघ्र
ही सहज हो जायेगी और अपने माता पिता का दुःख भूल जायेगी। परन्तु
मीरा की मामी और ममेरा भाई सुरेंद्र हर पल उसे मां बाप की याद दिलाते रहते थे। मीरा को बहुत रोना आता था बहुत ज्यादा पर उसका स्वाभिमान उसकी आंखों से आंसू बाहर नहीं आने देता था।

   आज भी जब वो चुपचाप बगीचे में खड़ी गुलाब को निहार रही थी तभी सुरेंद्र ने उसे पीछे से आकर धक्का दे दिया था और वो गिर गयी थी
उसका सारा चेहरा कांटों ने खरोंच दिया था फिर भी वो अपराधी बनी
अपनी मामी के सामने खड़ी थी, चेहरे और हाथों पर जलन हो रही थी
आंसुओं से धुंधली आंखों में मां का चेहरा घूम रहा था।
     तभी मामी की आवाज उसके कानों में पड़ी, “गिरधारी  इस लड़की को ले जाकर स्टोररूम में बंद कर दो, इसे कुछ भी खाने पीने को मत देना तभी इसका दिमाग ठीक होगा”




सांभर लेक

राजस्थान का सांभर लेक जिसे लोग नमक की नगरी के रूप में जानते  हैं, एक नये पर्यटन स्थल के रुप में चर्चित हो रहा है।यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों का अपना अलग ही आर्कषण है।पर्यटकों के लिए यहाँ पर कई किलोमीटर का साइकिल ट्रेक, एसयूवी और एटीवी आदि साधनों के द्वारा सफारी, ग्राम भ्रमण, गाइडेड स्टार गेंजिग,इंडोर और आउटडोर गेम्स शामिल हैं।
       यहाँ पर पौराणिक मंदिर, मस्जिद दादूधाम, चर्च व गुरुद्वारा है,इस
गुरुद्वारे में सिखों के दसवें गुरु श्री गोविंद सिंह जी ने प्रवास किया था।
यहाँ पर स्थित नमक उत्पादन और सभी सुविधाओं से सुसज्जित शाही ट्रेन द्वारा पर्यटक झील तक यात्रा कर सकते हैं और स्वादिष्ट व्यंजनों का
स्वाद भी ले सकते हैं।पर्यटकों के ठहरने के लिए सांभर हैरिटेज है।
     यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य आपका मन मोह लेगा साथ ही उत्तरी एशिया और साइबेरिया से आने वाले प्रवासी पक्षियों की उपस्थिति भी आपको मोहक लगेगी।
      यहाँ का इतिहास भी काफी दिलचस्प है,महाभारत के अनुसार इस स्थान पर दैत्यराज वृषपर्वा के साम्राज्य का भाग था,दैत्यराज के कुलगुरु श्री शुक्राचार्य यहाँ पर निवास करते थे।यहीं पर कुलगुरु की पुत्री देवयानी और महाराज ययाति का विवाह हुआ था,देवयानी को समर्पित
एक पौराणिक मंदिर भी यहाँ पर है जो झील के पास ही है। यहीं पर
अकबर और रानी जोधा का भी विवाह हुआ था।
         हिन्दू मान्यता के अनुसार चौहान राजपूत राजाओं की रक्षकदेवी
शाकम्भरी देवी ने यहां के वन को बहुमूल्य धातुओं के मैदान में बदल दिया,परन्तु इस संपदा के कारण होने वाले झगड़ों से चिन्तित लोगों ने देवी से अपना वरदान वापस लेने को कहा, तब देवी ने सारी संपदा को नमक में परिवर्तित कर दिया। शाकम्भरी देवी का मंदिर अभी भी यहाँ स्थित है।
       यहीं पर ख्व़ाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के पोते ख्व़ाजा हिस्मुद्दीन की
दरगाह है,मान्यता है कि अगर दादा के साथ पोता भी जि़यारत करे तो
उनकी दुआ कुबूल होती है, जायरीन बड़ी संख्या में यहाँ पर आते हैं।

पाश्चात्य दर्शन 8 (अरस्तू)…

अरस्तू(Aristotle)-384ई. पू.-322 ई.पू.- अरस्तू का जन्म  Thres के
स्टेगिरा नगर  में हुआ था।उनके पिता मेसीडोन नरेश के राजवैद्य थे।सत्रह वर्ष की आयु में अरस्तू विद्याध्ययन के लिये प्लेटो के एकेडमी में गए और बीस वर्ष की आयु तक प्लेटो के साक्षात सम्पर्क में रहे।
     अरस्तू मेसीडोन नरेश फिलिप के राजकुमार एलेक्जेंडर (सिकंदर, जो बाद में सिकंदर महान कहलाये) के तीन वर्ष तक अध्यापक रहे। एथेंस में वापस आकर अरस्तू ने लाइसियम (Lyceum) नामक शिक्षा संस्था की
स्थापना की।एलेक्जेंडर की मृत्यु के पश्चात उन पर अधार्मिकता का अभियोग लगाया गया,वे एथेंस छोड़ कर चालसिस नामक स्थान पर चले गये।वहीं एक वर्ष बाद उनका देहांत हो गया।
    जनश्रुति के अनुसार अरस्तू हकलाते थे,परन्तु उन्हें अपने ग्रीक होने पर अभिमान था।वे बुद्धि और इन्द्रियानुभव दोनों का सामंजस्य करके
मध्यम मार्ग के समर्थक थे।
     अरस्तू ने दर्शन, तर्कशास्त्र, मनोविज्ञान, भौतिकविज्ञान, प्राणीविज्ञान,
आचारशास्त्र, राजनीति और साहित्य पर महत्त्वपूर्ण विचार प्रकट किए हैं।पाश्चात्य निगमन के तो वे जनक हैं और उसको उन्होंने जो रुप दिया वह शताब्दियों तक मान्य रहा,और आज भी महत्वपूर्ण है।
        उनके महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं- भौतिक विज्ञान, तत्वविज्ञान,आचार शास्त्र
और तर्कशास्त्र।

प्लेटो – 2

प्लेटो ने अपने गुरु सुकरात के सब विचारों का समन्वय अपने मौलिक विचारों के साथ किया।अपने पूर्व वर्ती सारे ग्रीक दार्शनिकों का प्रभाव प्लेटो पर और प्लेटो का प्रभाव अपने परवर्ती सारे पाश्चात्य दार्शनिकों पर पड़ा।प्लेटो प्रधान रूप से रहस्यवादी हैं।
दर्शन का लक्ष्य असत् से सत् की ओर,अंधकार से प्रकाश की ओर,मृत्यु से अमरत्व की ओर जाना है।यह साधना द्वारा हो सकता है,तर्क तत्व की ओर संकेत मात्र करता है,तत्व का साक्षात्कार साधना का विषय है।प्लेटो का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत उनका विज्ञानवाद है।
प्लेटो के विज्ञानों के पांच दृष्टिकोण-
1 ज्ञान की दृष्टि
2-स्वरूप की दृष्टि
3-उद्देश्य की दृष्टि
4-सत्ता की दृष्टि
5-रहस्य की दृष्टि
ज्ञान की दृष्टि-(Epistemologically)-ज्ञान की दृष्टि से विज्ञान,ज्ञान के वास्तविक विषय हैं।प्लेटो के अनुसार ज्ञान और ज्ञान का विषय दोनों नित्य और अपरिणामी होने चाहिए, अनित्य और क्षणिक का वास्तविक ज्ञान नहीं हो सकता।फीडो में कहा है कि इन्द्रियों से सत्य की प्राप्ति नहीं हो सकती, सत्य की प्राप्ति ज्ञान से ही हो सकती है।फीडो में कहा है इन्द्रियानुभव के बिना हमें विज्ञान का संस्मरण नहीं हो सकता।प्लेटो इन्द्रिय जगत को असत् नहीं कहते,वे इसे प्रतीति का विषय मानते हैं उनके अनुसार विज्ञान के बिना हमें जगत का इन्द्रियानुभव भी नहीं हो सकता क्योंकि ज्ञान का विषय विज्ञान ही है।
स्वरूप की दृष्टि(Universal class concepts)- सामान्य उत्पत्ति
विनाशरहित अपरिणामी और नित्य है, ये हमारी बुद्धि की कल्पना नहीं है इनकी वास्तविक सत्ता है।प्लेटो ने इन्द्रिय जगत को विज्ञान जगत में
भाग लेने वाला अंश और उनका प्रतिबिंब कहा है, अंश और प्रतिबिंब से
प्लेटो का तात्पर्य अभिव्यक्ति का है।विज्ञानों को प्लेटो ने दिक्कालातीत
माना है।प्लेटो ने विज्ञानों को इन्द्रिय जगत के विशेषों में अनुस्यूत बताया है।
उद्देश्य की दृष्टि- विज्ञान के नित्य सांचे हैं जिनके द्वारा ईश्वर इन्द्रिय जगत के पदार्थों का निर्माण करते हैं।विश्व की सृष्टि इसलिए हुई है कि इसके अपूर्ण और अनित्य पदार्थ पूर्ण आदर्शों को प्राप्त करने के लिए
उत्तरोत्तर विकसित हों।विज्ञान विश्व के पदार्थों में अनुस्यूत है।प्लेटो ने
ईश्वर और शिवतत्व में भेद माना है, ईश्वर सगुण है शिवतत्व निर्गुण, ईश्वर अपर है शिवतत्व पर।ईश्वर सृष्टि के निमित्त कारण और नियन्ता हैं, शिवत्व ईश्वर का भी पिता है।विशुद्ध विज्ञानस्वरूप शिवत्व का निर्विकल्प साक्षात्कार ही मानव जीवन की चरम सार्थकता है।
सत्ता की दृष्टि- जो पदार्थ विज्ञान की ओर जितना अभिमुख है, उसकी
उतनी ही अधिक सत्ता है ।विज्ञान नित्य, अधिकारी, अविनाशी, शाश्वत, सामान्य और सत् है।प्लेटो विज्ञान को इन्द्रिय जगत केअणु अणु में अन्तर्यामी मानते थे।प्लेटो ने असत्, भ्रांति और स्वप्न को भी कुछ न कुछ
सत्ता दी है।सोफिस्ट में कहा गया है-पूर्ण असत् की कल्पना असंभव है।

रहस्य की दृष्टि-विज्ञान शिवतत्व की अभिव्यक्ति के स्तर हैं।प्लेटो ने ईश्वर
को सृष्टि का निमित्त कारण और नियन्ता माना है, यह शिवतत्व निर्गुण
और अनिवर्चनीय है केवल निर्विकल्प स्वानुभूति द्वारा ही साक्षात्कार किया जा सकता है।उनके अनुसार ज्ञान ही धर्म है और अज्ञान अधर्म।
प्लेटो के अनुसार स्वतंत्रता का अर्थ उच्छृंखलता या परतंत्रता नहीं है, उसका अर्थ ज्ञानतन्त्रता है।

Plato – 1

प्लेटो(plato)(428.  ई.पू. )-(347ई.पू.) – प्लेटो ग्रीस और विश्व के महान दार्शनिक  हैं, वे सर्वतोमुखी प्रतिभा के धनी थे।प्लेटो का जन्म
एथेंस के समीप एजिना( Aegina) नामक स्थान पर हुआ था,वे उच्च कुलीन सामंत परिवार के थे। वे सुकरात के प्रमुख शिष्य थे,सुकरात की मृत्यु से उन्हें ग्रीक प्रजातंत्र से घृणा हो गई।
         इन्होंने कई देशों की यात्राएं की ,फिर एथेंस लौट कर अपनी प्रसिद्ध संस्था एकेडमी(Academy) की स्थापना की।
           प्लेटो का गुरु शिष्य के साक्षात सम्पर्क में विश्वास था,एकेडमी के सदस्य एक साथ रहते थे,एक साथ खाते और एक साथ पढ़ते थे।उनका जीवन धार्मिक और दार्शनिक था।
         प्लेटो की कृतियाँ सम्वादों (Dialogues)के रूप में हैं।प्लेटो के रचनाकाल को तीन भागों में बांटा जा सकता है।प्रथम काल एकेडमी की स्थापना के पूर्व का काल है, इस काल में एपॉलॉजी(Apology),क्राइटो
प्रोटेगोरस, जार्जियस, मेनो,फीडो,और सिम्पोजियम नामक सम्वादों की रचना हुई।
           द्वितीय काल  एकेडमी की स्थापना के तुरंत बाद का काल है, इस काल में रिपब्लिक और फीडरस(Phaedrus) नामक सम्वादों की रचना हुई।
        तृतीय काल प्लेटो के प्रौढ़ काल का है,इस काल में पार्मेनाइडीज
थीटीटस(Theaetetus),सोफिस्ट, फाईलेवस,(Philebus),टाइमियस
(Timaeus),और लॉज(Laws) नामक सम्वादों की रचना हुई।
         प्लेटो ने अपने असली सिद्धांत अपने शिष्यों को उपदेश रूप में दिये जिनका उन्होंने प्रकाशन नहीं किया।
      प्लेटो के समय में ग्रीक दर्शन अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंचा, इसलिए उनको पूर्ण ग्रीक की उपाधि दी गयी।

पाश्चात्य दर्शन 7 (सुकरात)…

सुकरात(socrates)-470-399ई.पू.- सुकरात का जन्म एथेंस में हुआ था,इनकी माता दाई का काम करती थींऔर इनके पिता शिल्प कार थे।
सुकरात देखने में आर्कषक नहीं थे,उनका जीवन एक ऋषि की भाँति था
वे इन्द्रियजित थे।उनके बारे में धर्मवाणी की गयी थी कि सुकरात सभी
मनुष्यों में सबसे अधिक बुद्धिमान हैं।सुकरात समझते थे कि वे सचमुच
अन्य लोगों से अधिक बुद्धिमान हैं, क्योंकि उन्हें अपनी अज्ञानता का ज्ञान था जबकि लोग अज्ञानी होते हुये भी अपने को ज्ञानी मानते हैं।
       उनपर युवाओं को बहकाने का अभियोग लगाया गया और उन्हें
विषपान द्वारा मृत्युदंड की सजा दी गयी।उनका वास्तविक अपराध
तत्कालीन प्रजातंत्र और नेताओं की पोल खोलकर उनके अज्ञान, दंभ और आडम्बर का प्रखर खंडन करना था।वे एक मास तक जेल में रहे,उनके मित्र और शिष्य उन्हें वहां से भगा ले जाने के लिये तैयार थे
परन्तु सुकरात ने अस्वीकार कर दिया और हंसते-हंसते विषपान कर लिया।
          सुकरात के दर्शन का ज्ञान उनके प्रधान शिष्य प्लेटो की कृतियों में उपलब्ध है। सामान्यों या विज्ञानों का सिद्धांत, इन्द्रियानुभूति और विज्ञान का भेद,विशुद्ध विज्ञान स्वरूप शिवतत्व और आत्मा की अमरता
आदि सिद्धांत मूल रूप में सुकरात के सिद्धांत कहे जा सकते हैं, जिनका प्लेटो ने विकास किया।
        सुकरात ने स्पष्ट रूप से तत्व के विज्ञान स्वरुप का प्रतिपादन किया और उसे दर्शन का केंद्र बना दिया। सुकरात ने प्रथम बार इस विज्ञान को नैतिक जीवन का भी आधार बनाया। प्लेटो ने सुकरात के विज्ञानवाद या साम्यवाद के बारे में ‘फीडो’ नामक अपनी कृति में भी कहा है।
         ज्ञान के विषय सामान्य हैं और इन्द्रियानुभव के विषय विशेष या व्यक्ति हैं। सत्य ज्ञान इन सामान्यों का ही ज्ञान है।विशेषों का ज्ञान केवल
व्यवहार है।विशेषों की सत्ता सामान्य में भाग लेने के कारण है।
        हमारा सांसारिक ज्ञान इन्द्रियानुभूति पर र्निभर है और इन्द्रियानुभूति दिव्य विज्ञानों पर आवरण डाल देती है।इन्द्रियों पर विजय
प्राप्त करके हम शरीर में रहते हुये उससे र्निलिप्त अशरीर बन सकते हैं
और आत्मज्ञान द्वारा दिव्य विज्ञानों का साक्षात्कार कर सकते हैं।
           सुकरात के दिव्य विज्ञान एक सूत्र में बद्ध हैं, यह सूत्र इन विज्ञानों का भी विज्ञान हैं, यह परम विज्ञान हैं इस परम विज्ञान को सिम्पोजियम में विशुद्ध सौन्दर्य और रिपब्लिक में विज्ञान स्वरूप शिवतत्व कहा गया है।यह शिवतत्व समस्त दिव्य विज्ञानों में और उसके द्वारा समस्त जगत में अनुस्यूत है यह परम तत्व है और इसका साक्षात्कार मानव जीवन का लक्ष्य है।
        सुकरात के दर्शन की पद्धति द्बंदात्मक तर्क की है,प्रश्नोत्तर की पद्धति है उनकी दार्शनिक पद्धति का लक्ष्य लोगों को अपने अज्ञान का
ज्ञान कराकर उनकी स्वानुभूति की ओर अग्रसर करने का था।सुकरात ने
दर्शन को विज्ञानों का विज्ञान माना है,दर्शन का लक्ष्य विशुद्ध विज्ञानस्वरूप तत्व का साक्षात्कार है।ज्ञान ही धर्म है शिवतत्त्व का ज्ञान
सबसे उत्तम धर्म है, अज्ञान अधर्म है।वास्तविक धर्म तो ज्ञान है जिसकी प्राप्ति होने पर अधर्म हो ही नहीं सकता।

पाश्चात्य दर्शन 6

सोफिस्ट सम्प्रदाय- जिन्होंने विचार स्वातंत्र्य को लाने में कार्य किया वे सोफिस्ट कहलाए। वे अपने समय के राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के दौर में आये।
      ग्रीक प्रजातंत्र में जो व्यक्ति राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में
उच्च पदों को प्राप्त करना चाहते थे, न्यायालय में वकील बनना चाहते थे
उन्हें तर्कपटु औरकुशल वक्ता होना आवश्यक था।उस समय आधुनिक विद्यालय नहीं थे अतः सोफिस्ट नगर नगर घूम कर सम्पन्न परिवारों के
युवाओं को शुल्क लेकर वक्तृत्व कला,साहित्य,दर्शन, राजनीति,तर्कशास्त्र आदि की शिक्षा देते थे । परन्तु बाद में  सोफिस्ट धन के लोभी हो गये, पर्याप्त धन मिलने पर वो कुछ भी कार्य करते थे, अतः वे हीन नजरों से देखे जाने लगे और सोफिस्ट शब्द व्यर्थ का तर्क करने वाले के संदर्भ में रह गया।


प्रोटेगोरस- प्रोटेगोरस का सिध्दांत है कि’मानव सब पदार्थों का मानदंड है(Homomensura). प्रोटेगोरस प्रथम सोफिस्ट थे, ये दर्शन,राजनीति, गणित, शिक्षाशास्त्र आदि विषयों के ज्ञाता थे। प्रोटेगोरस को उपयोगिता वाद का जन्मदाता कहा जा सकता है। उपयोगितावादी शिलर भी अपने को प्रोटेगोरस का शिष्य कहते हैं।
      प्लेटो ने अपनी एक कृति इनके नाम पर लिखी है।

  जार्जियसक् (Gorgias) – द्वितीय सोफिस्ट जार्जियस थे, इनके अनुसार
सत्य सापेक्ष है। निरपेक्ष सत्य असंभव है। उनका मत है, प्रथम तो कोई सत्य ही नहीं है, दूसरे यदि हो भी तो उसे हम नहीं जान सकते तीसरे यदि जान भी लें तो किसी को समझा नही सकते।

     प्रारंभ के सोफिस्ट दर्शन और ज्ञान में सच्चा प्रेम रखते थे परन्तु बाद के सोफिस्ट वृत्ति प्रेमी और धन के लोभी बन गये।









पाश्चात्य दर्शन 5

एम्पेडोक्लीज  (  Empedocles)-495ई.पू.-435ई.पू.

        एम्पेडोक्लीज दार्शनिक होने के साथ राजनीतिज्ञ भी थेऔर समाज में बहुत प्रतिष्ठित थे।एक बार इन्हें राजसिंहासन भी भेंट में दिया गया था
परन्तु इन्होंने अस्वीकार कर दिया।
      एम्पेडोक्लीज के अनुसार पृथ्वी, जल,वायु और अग्नि सभी मौलिक तत्व हैं अपने मौलिक रुप में ये अविकारी हैं।इनकी न उत्पत्ति होती है न ही विनाश होता है, इनका केवल संयोग और वियोग होता है। प्रेम संयोग
का जनक है और विरोध का जनक वियोग है।
         सृष्टि के आरंभ में सभी तत्व प्रेम के कारण इकाई की अवस्था में थे,कालान्तर में विरोध की अधिकता के कारण भेद उत्पन्न हुआ और परस्पर इनका वियोग हो गया तब से ही सृष्टि की प्रक्रिया आरंभ हुई।
सबसे पहले वायु पृथक  हुआ, फिर अग्नि, फिर जल औरफिर पृथ्वी।
जब प्रेम पुनः प्राधान्य  होगा तब ये महाभूत फिर दिव्यलोक में संयुक्त हो जायेंगे, यह प्रलय की अवस्था होगी।
          इसी प्रकार सृष्टि और प्रलय का क्रम चलता रहेगा। 

एनेक्जेगोरस(Enaxagoras) (500ई.पू.-428ई.पू.)

        एनेक्जेगोरस के अनुसार मौलिक परम तत्व अनेक हैं, इन तत्वों को वे बीज कहते हैं येबीज अनन्त हैं तथा इनके गुण भी अनन्त हैं।इन बीजों में गति उत्पन्न हुई और इस गति के कारण समान बीज आपस में  आर्कषित होकर मिल गये और सृष्टि का निर्माण  हुआ।
      प्रथम अवस्था को प्राकृत अवस्था कहते हैं, जिसमें सभी बीज मिश्रित हुये ये बीज भौतिक हैं अतः गति का कारण चेतन तत्व ही हो सकता है जो शक्ति मान है।इस चित् शक्ति युक्त तत्व को एनेक्जेगोरस
ने परम विज्ञान का नाम दिया। यह परम विज्ञान समस्त विश्व का
अधिष्ठाता है और बीजों में गति उत्पन्न करने का कारण है।


ल्यूसिपस व डिमाक्रिटस- (Leusipus-Democritus)-440ई.पू.-370ई.पू.

     ये दोनों परमाणु वादी दार्शनिक हैं।ल्यूसिपस का जन्म माइलेटस नगर में 440ई.पू. हुआ था,डिमाक्रिटस इनके शिष्य थे।
       
     ल्यूसिपस और डिमाक्रिटस के परमाणु मौलिक अविभाज्य, अतीन्द्रिय ,नित्य उत्पत्ति विनाश रहित जड़ तत्व हैं।गति उनका धर्म है।
उनमें केवल संख्या, परिमाण और आकार का भेद है, अन्य गुणों का भेद
उनमें नहीं है। वे आकाश में स्थित हैं और एक दूसरे से अलग हैं।
         सृष्टि की उत्पत्ति का अर्थ है उनका परस्पर संयोग और विनाश का
अर्थ है उनका परस्पर वियोग।
      ग्रीक परमाणुवादियों के अनुसार गति परमाणुओं का अपना धर्म है।


पाश्चात्य दर्शन 4

हेरेक्लाइटस( Hereclitus)-ये ई.पू.छठी शताब्दी के अंत और पांचवीं शताब्दी के आरंभ में हुए थे,इनका जन्म राजपरिवार में हुआ था।इन्होंने अपने छोटेभाई को उतराधिकारी घोषित कर दिया।रहस्यवाद की ओर इनकी स्वाभाविक रुचि थी,इनकी सूक्तियां अत्यन्त प्रसिद्ध हैं इन्होंने कहा है कि मेरा दर्शन सुयोग्य और विशिष्ट व्यक्तियों के लिए है,क्योंकि गधों को घास चाहिए स्वर्ण नहीं।
हेरेक्लाइटस ने संघर्ष, विरोध, निषेध और अभाव को महत्व दिया है।विरोध या निषेध के बिना विकास संभव नहीं है, विरोध का अर्थ है परिवर्तन। पक्ष का विपक्ष में परिवर्तन होता है और फिर समन्वय की आवश्यकता होती है, विरोध साधन मात्र है, साध्य समन्वय है।पक्ष और विपक्ष का विरोध समन्वय को उत्पन्न करता है।
वीणा के तार भिन्न भिन्न रीति से खींचे जाते है और तब भी विभिन्न स्वर एक ही राग को उत्पन्न करते हैं अतः विरोध समन्वय का जनक है। इनके विचारों में सापेक्षवाद(Relativism) और बुद्धि वाद( Rationalism) दोनों मिलते हैं।प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है, अतः प्रत्येक वस्तु सापेक्ष है। जो क्षणिक है उसका सापेक्ष होना अनिवार्य

है। समुद्र का पानी मछली के लिए मीठा और मनुष्य के लिये खारा होता है।
प्लेटो ने इन्द्रिय जगत के लिए हेरेक्लाइटस का क्षणिकवाद और
सापेक्षवाद स्वीकार किया है।उनके संघर्ष के सिद्धांत की छाप नीत्शे पर भी पड़ी। ह्यूम, विलियम जेम्स और वर्गसां पर क्षणिकवाद का प्रभाव पड़ा।विरोध या निषेध और समन्वय संबंधी विचार हीगल ने भी स्वीकार किए हैं। मेलिसस ( Melissus)- इन्होंने सत्ता शून्य आकाश का खण्डन करके सत् को अनन्त विज्ञान के रुप में प्रतिष्ठित किया। शून्य प्रतीत होने वाला आकाश भी अनन्त सत् से पूर्ण है और ये तभी हो सकता है जब

सत् भौतिक न होकर विज्ञान रुप हो।