दक्षिण भारतीय इतिहास…(४९)

भिल्लम तृतीय के बाद यादुगि और भिल्लम चतुर्थ सिंहासनारूढ़ हुये,परन्तु उनके शासनकाल में कुछ उल्लेखनीय नहीं मिलता।
परन्तु भिल्लम चतुर्थ का पुत्र सेउणचन्द्र जब राजगद्दी पर बैठा तो उसने अपने वंश की प्रतिष्ठा में वृद्धि की,उसने अपनी वीरता के बल पर कलचुरियों और अन्य विरोधी शक्तियों को पराजित कर अपने वंश का गौरव बढ़ाया।उसने महामंडलेश्वर की उपाधि धारण की,अपनी वीरता और सूझबूझ के कारण वह कल्याणी शासक विक्रमादित्य षष्ठ का प्रिय सामन्त बन गया।
उसका पुत्र एरम्मदेव जब राजा बना तो महाराज विक्रमादित्य ने उसे महामंडलेश्वर बना दिया,उसका विवाह एक राजकुमारी के साथ हुआ,उसका शासनकाल 1085-1105 तक रहा।
एरम्मदेव के पश्चात उसके कनिष्ठ भ्राता सिंहराज ने 1120 तक शासन किया। कुछ वर्षों तक यादव वंश के बारे में जानकारी नहीं मिलती परन्तु जब भिल्लम पंचम ने राजगद्दी संभाली तो उसने यादव वंश को नया गौरव प्रदान किया।सबसे पहले उसने अपनी सेना को संगठित किया और फिर यादव राज्य का विस्तार शुरू किया।
महाकवि हेमाद्रि के अनुसार भिल्लम पंचम ने कोंकण नरेश से श्री वद्धर्न बंदरगाह ले लिया और राजा प्रत्यंडकको परास्त किया।शोलापुर के शासक विल्लण को समरभूमि में वीरगति प्रदान की और कल्याण के शक्तिशाली किले पर कब्जा कर लिया।होयसल नरेश को हरा कर मार डाला।अपने राज्य सेउणदेश के राजसिंहासन पर आसीन हुआ तत्पश्चात गुजरात और मालवा के विरुद्ध अभियान शुरू किया।
1189 ई०में मुतुगि अभिलेख के अनुसार भिल्लम पंचम अपनी वीरता के कारण”मालवों के सिर का प्रचंड दर्द, तथा गुर्जर रुपी हंसों के समूह के लिए घनगर्जन बन गया था।
भिल्लम पंचम की सेना में दो लाख पैदल और बारह हजार अश्वारोही सैनिक थे ।उसने मालवा,गुजरात के साथ ही मारवाड़ के क्षेत्र तक को आतंकित कर दिया था।
1189 ई० में भिल्लम पंचम ने कर्नाटक पर भी अधिकार कर लिया और होयसल नरेश बल्लाल को पराजित कर कल्याणी का दुर्ग भी जीत लिया।
कुछ समय बाद बल्लाल के साथ उसे फिर युद्ध करना पड़ा, जो धारवाड़ के निकट सोरतुर के मैदान में हुआ,इस युद्ध में बल्लाल ने भिल्लम पंचम को कृष्णा नदी और मालप्रभा नदी के पार ही रोक दिया, ये नदियां कुछ समय तक दोनों देशों की सीमा बनी रहीं ।
भिल्लम पंचम ने अपने साहस और तलवार के बल पर दक्षिणी महाराष्ट्र तथा उत्तरी कोंकण में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की,उसके राज्य का विस्तार नर्मदा क्षेत्र से लेकर कृष्णा घाटी तक था।उसने परमभट्टारक तथा महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।

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दक्षिण भारतीय इतिहास…(४८)

यादव वंश

चालुक्य साम्राज्य के विघटन के बाद देवगिरि के यादव,द्वारसमुद्र के होयसल, वारंगल के काकतीय, कुन्तल के कदम्ब तथा मैसूर के गंग और विजयनगर राजवंशों ने अपने को स्वतंत्र शासक मान लिया।
यादव वंश की उत्पत्ति के विषय में कुछ धारणाएं हैं, जिनके अनुसार यादववंश को महाभारत में महाराज ययाति के पुत्र यदु के वंशज माना जाता है ,मराठी कवि ज्ञानेश्वर कृत भगवद्गीता में यादव शासकों को चन्द्र वंशी क्षत्रिय बताया गया है।
यादव वंश का संस्थापक दृढ़प्रहार माना जाता है वह एक वीर पुरुष था उसका पुत्र सेउणचन्द्र प्रथम उसका उत्तराधिकारी हुआ ,उसने प्रतिहारों के विरुद्ध राष्ट्र कूटों की सहायता कर उनका सामन्त बना ।
सेउणचन्द्र के उत्तराधिकारी क्रमशः दाढ़ियप्प,भिल्लम प्रथम, तथा राजिरा हुये । राजिरा के बाद बदुगि या बड्डिग ने राज्य किया उसके बाद धाड़ियस तत्पश्चात उसका पुत्र भिल्लम द्वितीय हुआ उसने राष्ट्र कूटों को छोड़कर शक्तिशाली चालुक्यों के साथ अपनी निष्ठा स्थापित कर ली। भिल्लम ने नासिक के सिंदिनगर को अपनी नई राजधानी बनाया।
भिल्लम के बाद उसका पुत्र वेसुगि उत्तराधिकारी हुआ ।भिल्लम तृतीय वेसुगि का उत्तराधिकारी बना ,वह चालुक्य नरेश जयसिंहप्रथम का प्रिय सामंत था जयसिंह प्रथम ने अपनी पुत्री का विवाह भिल्लम तृतीय से करके उसे महासामंत बना दिया।
भिल्लम तृतीय ने जयसिंह प्रथम के साथ परमार नरेश भोज के विरुद्ध अभियानों में सहयोग किया जिसके फलस्वरूप उसका राजकुल और प्रतिष्ठित हो गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४७)

1199 ई० में यादव नरेश जैतुगी ने गणपति को मुक्त कर दिया और वह काकतीय वंश काशासक बना, प्रारंभ में वह यादव वंश के प्रति निष्ठावान रहा।
अपनी वीरता के बल पर उसने बेलनाडु के शासक पृथ्वी सेन को परास्त कर तटीय आंध्रप्रदेश पर काकतीय राजवंश स्थापित किया।
गणपतेश्वर अभिलेख के अनुसार गणपति ने कलिंग, चोलों,यादवों और लाटों को परास्त कर सम्पूर्ण बेलनाडु क्षेत्र को अपने अधिकार में कर लिया था।गणपति का यादवों के साथ का युद्ध अनिर्णयाक रहा ।
गणपति के दो पुत्रियाँ थीं,बड़ी पुत्री रुद्राम्बा को गणपति ने अपना उत्तराधिकारी बनाया।अपने पिता के बाद काकतीय राजवंश की बागडोर रुद्राम्बा ने संभाली, वह पुरुष वेश में सिंहासन पर बैठती थी,युद्धों में भी भाग लेती थी वह रुद्रदेव के नाम से विख्यात थी ।
रुद्राम्बा के सिहांसन पर आसीन होने के बाद उसके सौतेले भाईयों हरिहर और मुरारिदेव ने विद्रोह करके वारंगल पर अधिकार कर लिया।
परन्तु वीर रुद्राम्बा ने अपने भाइयों को परास्त कर पुनः वारंगल पर अधिकार कर लिया।
रुद्राम्बा ने यादव नरेश महादेव के साथ भी युद्ध किया और उसे पराजित किया।
रुद्राम्बा के पश्चात रुद्राम्बा का नाती प्रतापरुद्र ने काकतीय राजसिंहासन पर आसीन हुआ, रुद्राम्बा के शासनकाल में ही प्रतापरुद्र ने कायस्थ प्रमुख अम्बदेव को पराजित किया था। वह वीर राजा था।
1310 में अलाउद्दीन खिलजी ने तेलंगाना पर मलिक काफूर के नेतृत्व में आक्रमण किया, मुस्लिम सेना और काकतीय सेना के बीच लगातार युद्ध चलता रहा प्रताप रुद्र ने जब अपने किले को चारों ओर से घिरा हुआ पाया तो उसने काफी धनराशि देकर दिल्ली के सुल्तान से संधि कर ली।
अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद जब गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली का सुल्तान बना तो अपने पुत्र उलूग खां को तेलंगाना पर आक्रमण करने भेजा, एकबार प्रताप रुद्र ने उसे पीछे हटा दिया ,परन्तु शीघ्र ही उलूग खां ने पुनः आक्रमण किया और प्रतापरुद्र को बंदी बना लिया।
दिल्ली ले जाते समय प्रतापरुद्र की मृत्यु हो गयी,प्रतापरुद्र निसंतान था ।उसकी मृत्यु के पश्चात काकतीय वंश का अंत हो गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४६)

काकतीय राजवंश का प्रथम शासक बेत प्रथम था जो कल्याणी के पश्चिमी चालुक्यों का सामन्त था,उसके बाद प्रोल प्रथम हुआ जिसने चालुक्यों के विरोधी अनेक राजाओं को पराजित किया। प्रसन्न होकर चालुक्य नरेश सोमेश्वर प्रथम ने उसे अनुमकोंड राज्य का शासक बना दिया।
तत्पश्चात बेत द्वितीय, दुर्गनृपति हुये जिन्होंने अपने राजा के प्रति निष्ठा बनाये रखी
प्रोल द्वितीय ने जब शासन संभाला तो उसने तैलप तृतीय जो सोमेश्वर तृतीय का पुत्र था उसे पराजित किया और अपना विजयी ध्वज गोदावरी तथा कृष्णा नदियों के मध्य के भूक्षेत्र पर फहरा दिया।
प्रोल द्वितीय के बाद उसका पुत्र रूद्रदेव सिहांसन पर बैठा।रुद्रदेव ने वेंगी राज्य पर आक्रमण कर उस राज्य के काफी क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया।1773 तक चोलों की शक्ति का लगभग समाप्त हो चली थी जिसका लाभ उठाकर रुद्रदेव ने उन्हें पराजित कर अपना सामन्त बना लिया। रुद्रदेव ने कृष्णा नदी के उत्तरी एवं दक्षिणी तटों के सामन्त शासकों को भी परास्त कर दिया और अपने राज्य का विस्तार किया।
यादव नरेश जैतुगी के साथ युद्ध में रुद्रदेव मारा गया।
रुद्रदेव के पश्चात महादेव काकतीय राजवंश का उत्तराधिकारी हुआ,परन्तु उसका शासन भी ज्यादा दिनों तक नहीं रहा ,वह भी यादवों के साथ युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ।
महादेव का उत्तराधिकारी गणपति देव युद्ध में बंदी बना लिया गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४५)

राजराज द्वितीय के बाद चोल सिहांसन पर राजाधिराज द्वितीय आसीन हुआ, उसके समय तक कलचुरि नरेश अत्यधिक शक्तिशाली हो गया था।उसने चोलों को पराजित कर चोल अधिकृत आन्ध्रप्रदेश के ज्यादातर भू भाग अपने राज्य में मिला लिया।
1179 में जबकुलोत्तुंग तृतीय सिहांसन पर बैठा तो उसने कोंगू प्रदेश में हुए विद्रोह को खत्म किया ।कुलोतुंग तृतीय ने होयसल ,बाण,चेर गंग आदि राज्यों को जीतकर अपनी अधीनता स्वीकार करवाई, पांड्य देश काराजा विक्रम पांड्य कुलोतुंग की अवज्ञा कर उसका कोपभाजन बना ।कुलोतुंग ने पांड्य राज्य पर आक्रमण कर राजधानी को लूट लिया और राजाओं के राज्याभिषेक भवन को तहसनहस कर दिया।
कुलोतुंग तृतीय चोल राजवंश का अन्तिम महान शासक माना जा सकता है,अपने शासन काल तक उसने चोल राजवंश की गरिमा को सुरक्षित रखा।
कुलोतुंग का उत्तराधिकारी राजराज तृतीय हुआ ।शासक के रूप में वो असफल रहा ,उसके शासन काल में विशाल चोल साम्राज्य एक छोटा सा राज्य मात्र रह गया।पांड्य राजाओं से युद्ध के परिणाम स्वरूप राजराज तृतीय की प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुंची।
राजराज तृतीय के बाद राजेंद्र तृतीय चोल सिहांसन पर बैठा ,युवराज रहते हुए उसने होयसल,पांड्य और काकतीय राजाओं को पराजित किया था ।उसके राजा बनने के बाद होयसल और पांडय राजाओं ने राजेंद्र तृतीय को पराजित किया,फलतः राजेंद्र तृतीय को पांडयों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।
इस प्रकार विशाल चोल साम्राज्य के स्थान पर बचा छोटा सा चोल शासित प्रदेश तमिलनाडु पर भी पांड्य राजाओं का अधिकार हो गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४४)

कुलोत्तुंग प्रथम ने अब चोल साम्राज्य को सुदृढ़ करना शुरु किया। कुलोत्तुंग ने विक्रमादित्य षष्ठ के विरुद्ध दक्षिणी चालुक्य राज्य पर आक्रमण कर दिया और उसे पराजित कर गंगवाड़ी क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।
उसने श्रीलंका के साथ मैत्री संबंध बनाने के लिये अपनी पुत्री का विवाह श्रीलंका के राजकुमार के साथ कर दिया।
कुलोत्तुंग ने अपने पुत्र को वेंगी का शासक बना दिया था ,उसे युवराज बनाने के लिये चोल राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम् बुलाया ।उसके जाते ही वेंगी में गड़बड़ शुरू हो गई, चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ ने आक्रमण कर वेंगी राज्य के अधिकांश हिस्सों पर कब्जा कर लिया।उधर होयसल नरेश विष्णु वरधन ने चोल राज्य पर आक्रमण कर चोल शासित गंगवाड़ी और नोलम्बबाड़ी पर अधिकार कर लिया।काकतीय शासक प्रोल ने भी चोल सत्ता से अपने को मुक्त कर कल्याणी के चालुक्यों की अधीनता स्वीकार कर ली।
1120 में विक्रम चोल चोल सिहासन पर बैठा ,उसने सबसे पहले कल्याणी के शासक सोमेश्वर तृतीय को हटाकर वेंगी राज्य पर पुनः चोल सत्ता के अधीन कर लिया।होयसलों को पराजित कर गंगवाड़ी के कोलार क्षेत्र को चोल साम्राज्य में मिला लिया।
1135 में विक्रम चोल की मृत्यु के बाद कुलोत्तुंग द्वितीय ने राजगद्दी संभाली ,उसका शासन काल शांतिपूर्ण रहा ।
1150 में कुलोतुंग का पुत्र राजराज द्वितीय राजा बना, राजराज के शासनकाल मेंपांडय राजगद्दी के लियेपांड्य राजकुमारों में संघर्ष चल रहा था।
राजकुमार कुलशेखर पांड्य ने अपने प्रतिद्वंद्वी राजकुमार पराक्रम पांड्य की हत्या कर दी। श्रीलंका द्वारा पांड्य राज्य में किए जा रहे हस्तक्षेप के विरुद्ध कुलशेखर पांड्य ने चोलराज राजराज द्वितीय की सहायता मांगी, राजराज द्वितीय ने कुलशेखर की सहायता कीऔर श्री लंका की सेना को हराकर कुलशेखर को मदुरा के पांड्य राजसिंहासन पर आसीन कराया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४३)

चोल राजगद्दी पर आसीन होने के बाद वीरराजेन्द्र ने अपने परम्परागत शत्रु चालुक्यों को तुंगभद्रा नदी के तट पर पराजित कर दिया और तुंगभद्रा के तट पर विजय स्तम्भ स्थापित कराया ।वीरराजेन्द्र नेचालुक्य राजा सोमेश्वर द्बितीय को वेंगी से दूर कर दिया और वेंगी को चोल साम्राज्य में मिला लिया । वीर राजेंद्र ने केरल ,सिंहल और पाण्ड्य राजाओं को भी पराजित कर दिया।
वीर राजेंद्र ने सोमेश्वर द्बितीय के छोटे भाई विक्रमादित्य से अपनी पुत्री का विवाह कर दिया, क्योंकि विक्रमादित्य ने अपने भाई सोमेश्वर के विरुद्ध चोल नरेश वीरराजेन्द्र का साथ दिया था।वीरराजेन्द्र ने विक्रमादित्य को दक्षिणी चालुक्य राज का शासक बना दिया और वेंगी में वीरराजेन्द्र ने वास्तविक उत्तराधिकारी राजेन्द्र द्बितीय के स्थान पर विजयादित्य सप्तम को शासक बना दिया, इससे राजेंद्र द्वितीय क्रोधित हो गया।
1070 में वीरराजेन्द्र की मृत्यु हो गई, वीर राजेन्द्र की मृत्यु के पश्चात वेंगी राजकुमार राजेंद्र द्वितीय ने विद्रोह कर दिया।चोल सिहांसन पर आसीन वीरराजेन्द्र का पुत्र अधिराजेन्द्र अव्यस्क था।विक्रमादित्य ने कांची जाकर प्रारंभ में विद्रोह कुचल दिया और अपने साले अधिराजेन्द्र को चोल राजगद्दी पर प्रतिष्ठित कर वापस तुंगभद्रा तट पर लौट आया।
परन्तु कुछ दिन के पश्चात चोल साम्राज्य में हुये एक जनविद्रोह में अधिराजेन्द्र को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
इस अशांत वातावरण का लाभ उठा कर राजेंद्र द्वितीय ने चोल साम्राज्य और वेंगी पर अधिकार कर लिया और राजेंद्र द्वितीय कुलोत्तुंग प्रथम नाम धारण कर चोल राजगद्दी पर आसीन हो गया।

हम भारत के लोग…(६)

मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री

1- श्री मोरारजी देसाई बम्बई राज्य के 1952-56 तक मुख्यमंत्री थे ।बाद में वे मार्च 1977 में देश के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने ।

2- चौधरी चरण सिंह अविभाजित उत्तर प्रदेश के 1967-68 तक तथा दुबारा 1970 में मुख्यमंत्री रहे ।वे मोरारजी देसाई के बाद प्रधानमंत्री बने ।

3- श्री विश्व नाथ प्रताप सिंह भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वो दिसंबर 1989 से नवम्बर 1990 तक प्रधानमंत्री रहे ।

4- श्री पी.वी नरसिम्हा राव,दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश के 1971-73 तक मुख्यमंत्री रहे। वे दक्षिण भारत से प्रधानमंत्री बनने वाले पहले प्रधानमंत्री थे ।वे 1991-96 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे।।

5- श्री एच. डी. देवगौड़ा कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे,जो जून 1996 में प्रधानमंत्री बने।

6- श्री नरेन्द्र मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री 2001-2014 तक रहे और अब 2014 से भारत के प्रधानमंत्री हैं।