दक्षिण भारतीय इतिहास…(४९)

भिल्लम तृतीय के बाद यादुगि और भिल्लम चतुर्थ सिंहासनारूढ़ हुये,परन्तु उनके शासनकाल में कुछ उल्लेखनीय नहीं मिलता।
परन्तु भिल्लम चतुर्थ का पुत्र सेउणचन्द्र जब राजगद्दी पर बैठा तो उसने अपने वंश की प्रतिष्ठा में वृद्धि की,उसने अपनी वीरता के बल पर कलचुरियों और अन्य विरोधी शक्तियों को पराजित कर अपने वंश का गौरव बढ़ाया।उसने महामंडलेश्वर की उपाधि धारण की,अपनी वीरता और सूझबूझ के कारण वह कल्याणी शासक विक्रमादित्य षष्ठ का प्रिय सामन्त बन गया।
उसका पुत्र एरम्मदेव जब राजा बना तो महाराज विक्रमादित्य ने उसे महामंडलेश्वर बना दिया,उसका विवाह एक राजकुमारी के साथ हुआ,उसका शासनकाल 1085-1105 तक रहा।
एरम्मदेव के पश्चात उसके कनिष्ठ भ्राता सिंहराज ने 1120 तक शासन किया। कुछ वर्षों तक यादव वंश के बारे में जानकारी नहीं मिलती परन्तु जब भिल्लम पंचम ने राजगद्दी संभाली तो उसने यादव वंश को नया गौरव प्रदान किया।सबसे पहले उसने अपनी सेना को संगठित किया और फिर यादव राज्य का विस्तार शुरू किया।
महाकवि हेमाद्रि के अनुसार भिल्लम पंचम ने कोंकण नरेश से श्री वद्धर्न बंदरगाह ले लिया और राजा प्रत्यंडकको परास्त किया।शोलापुर के शासक विल्लण को समरभूमि में वीरगति प्रदान की और कल्याण के शक्तिशाली किले पर कब्जा कर लिया।होयसल नरेश को हरा कर मार डाला।अपने राज्य सेउणदेश के राजसिंहासन पर आसीन हुआ तत्पश्चात गुजरात और मालवा के विरुद्ध अभियान शुरू किया।
1189 ई०में मुतुगि अभिलेख के अनुसार भिल्लम पंचम अपनी वीरता के कारण”मालवों के सिर का प्रचंड दर्द, तथा गुर्जर रुपी हंसों के समूह के लिए घनगर्जन बन गया था।
भिल्लम पंचम की सेना में दो लाख पैदल और बारह हजार अश्वारोही सैनिक थे ।उसने मालवा,गुजरात के साथ ही मारवाड़ के क्षेत्र तक को आतंकित कर दिया था।
1189 ई० में भिल्लम पंचम ने कर्नाटक पर भी अधिकार कर लिया और होयसल नरेश बल्लाल को पराजित कर कल्याणी का दुर्ग भी जीत लिया।
कुछ समय बाद बल्लाल के साथ उसे फिर युद्ध करना पड़ा, जो धारवाड़ के निकट सोरतुर के मैदान में हुआ,इस युद्ध में बल्लाल ने भिल्लम पंचम को कृष्णा नदी और मालप्रभा नदी के पार ही रोक दिया, ये नदियां कुछ समय तक दोनों देशों की सीमा बनी रहीं ।
भिल्लम पंचम ने अपने साहस और तलवार के बल पर दक्षिणी महाराष्ट्र तथा उत्तरी कोंकण में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की,उसके राज्य का विस्तार नर्मदा क्षेत्र से लेकर कृष्णा घाटी तक था।उसने परमभट्टारक तथा महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४८)

यादव वंश

चालुक्य साम्राज्य के विघटन के बाद देवगिरि के यादव,द्वारसमुद्र के होयसल, वारंगल के काकतीय, कुन्तल के कदम्ब तथा मैसूर के गंग और विजयनगर राजवंशों ने अपने को स्वतंत्र शासक मान लिया।
यादव वंश की उत्पत्ति के विषय में कुछ धारणाएं हैं, जिनके अनुसार यादववंश को महाभारत में महाराज ययाति के पुत्र यदु के वंशज माना जाता है ,मराठी कवि ज्ञानेश्वर कृत भगवद्गीता में यादव शासकों को चन्द्र वंशी क्षत्रिय बताया गया है।
यादव वंश का संस्थापक दृढ़प्रहार माना जाता है वह एक वीर पुरुष था उसका पुत्र सेउणचन्द्र प्रथम उसका उत्तराधिकारी हुआ ,उसने प्रतिहारों के विरुद्ध राष्ट्र कूटों की सहायता कर उनका सामन्त बना ।
सेउणचन्द्र के उत्तराधिकारी क्रमशः दाढ़ियप्प,भिल्लम प्रथम, तथा राजिरा हुये । राजिरा के बाद बदुगि या बड्डिग ने राज्य किया उसके बाद धाड़ियस तत्पश्चात उसका पुत्र भिल्लम द्वितीय हुआ उसने राष्ट्र कूटों को छोड़कर शक्तिशाली चालुक्यों के साथ अपनी निष्ठा स्थापित कर ली। भिल्लम ने नासिक के सिंदिनगर को अपनी नई राजधानी बनाया।
भिल्लम के बाद उसका पुत्र वेसुगि उत्तराधिकारी हुआ ।भिल्लम तृतीय वेसुगि का उत्तराधिकारी बना ,वह चालुक्य नरेश जयसिंहप्रथम का प्रिय सामंत था जयसिंह प्रथम ने अपनी पुत्री का विवाह भिल्लम तृतीय से करके उसे महासामंत बना दिया।
भिल्लम तृतीय ने जयसिंह प्रथम के साथ परमार नरेश भोज के विरुद्ध अभियानों में सहयोग किया जिसके फलस्वरूप उसका राजकुल और प्रतिष्ठित हो गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४७)

1199 ई० में यादव नरेश जैतुगी ने गणपति को मुक्त कर दिया और वह काकतीय वंश काशासक बना, प्रारंभ में वह यादव वंश के प्रति निष्ठावान रहा।
अपनी वीरता के बल पर उसने बेलनाडु के शासक पृथ्वी सेन को परास्त कर तटीय आंध्रप्रदेश पर काकतीय राजवंश स्थापित किया।
गणपतेश्वर अभिलेख के अनुसार गणपति ने कलिंग, चोलों,यादवों और लाटों को परास्त कर सम्पूर्ण बेलनाडु क्षेत्र को अपने अधिकार में कर लिया था।गणपति का यादवों के साथ का युद्ध अनिर्णयाक रहा ।
गणपति के दो पुत्रियाँ थीं,बड़ी पुत्री रुद्राम्बा को गणपति ने अपना उत्तराधिकारी बनाया।अपने पिता के बाद काकतीय राजवंश की बागडोर रुद्राम्बा ने संभाली, वह पुरुष वेश में सिंहासन पर बैठती थी,युद्धों में भी भाग लेती थी वह रुद्रदेव के नाम से विख्यात थी ।
रुद्राम्बा के सिहांसन पर आसीन होने के बाद उसके सौतेले भाईयों हरिहर और मुरारिदेव ने विद्रोह करके वारंगल पर अधिकार कर लिया।
परन्तु वीर रुद्राम्बा ने अपने भाइयों को परास्त कर पुनः वारंगल पर अधिकार कर लिया।
रुद्राम्बा ने यादव नरेश महादेव के साथ भी युद्ध किया और उसे पराजित किया।
रुद्राम्बा के पश्चात रुद्राम्बा का नाती प्रतापरुद्र ने काकतीय राजसिंहासन पर आसीन हुआ, रुद्राम्बा के शासनकाल में ही प्रतापरुद्र ने कायस्थ प्रमुख अम्बदेव को पराजित किया था। वह वीर राजा था।
1310 में अलाउद्दीन खिलजी ने तेलंगाना पर मलिक काफूर के नेतृत्व में आक्रमण किया, मुस्लिम सेना और काकतीय सेना के बीच लगातार युद्ध चलता रहा प्रताप रुद्र ने जब अपने किले को चारों ओर से घिरा हुआ पाया तो उसने काफी धनराशि देकर दिल्ली के सुल्तान से संधि कर ली।
अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद जब गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली का सुल्तान बना तो अपने पुत्र उलूग खां को तेलंगाना पर आक्रमण करने भेजा, एकबार प्रताप रुद्र ने उसे पीछे हटा दिया ,परन्तु शीघ्र ही उलूग खां ने पुनः आक्रमण किया और प्रतापरुद्र को बंदी बना लिया।
दिल्ली ले जाते समय प्रतापरुद्र की मृत्यु हो गयी,प्रतापरुद्र निसंतान था ।उसकी मृत्यु के पश्चात काकतीय वंश का अंत हो गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४६)

काकतीय राजवंश का प्रथम शासक बेत प्रथम था जो कल्याणी के पश्चिमी चालुक्यों का सामन्त था,उसके बाद प्रोल प्रथम हुआ जिसने चालुक्यों के विरोधी अनेक राजाओं को पराजित किया। प्रसन्न होकर चालुक्य नरेश सोमेश्वर प्रथम ने उसे अनुमकोंड राज्य का शासक बना दिया।
तत्पश्चात बेत द्वितीय, दुर्गनृपति हुये जिन्होंने अपने राजा के प्रति निष्ठा बनाये रखी
प्रोल द्वितीय ने जब शासन संभाला तो उसने तैलप तृतीय जो सोमेश्वर तृतीय का पुत्र था उसे पराजित किया और अपना विजयी ध्वज गोदावरी तथा कृष्णा नदियों के मध्य के भूक्षेत्र पर फहरा दिया।
प्रोल द्वितीय के बाद उसका पुत्र रूद्रदेव सिहांसन पर बैठा।रुद्रदेव ने वेंगी राज्य पर आक्रमण कर उस राज्य के काफी क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया।1773 तक चोलों की शक्ति का लगभग समाप्त हो चली थी जिसका लाभ उठाकर रुद्रदेव ने उन्हें पराजित कर अपना सामन्त बना लिया। रुद्रदेव ने कृष्णा नदी के उत्तरी एवं दक्षिणी तटों के सामन्त शासकों को भी परास्त कर दिया और अपने राज्य का विस्तार किया।
यादव नरेश जैतुगी के साथ युद्ध में रुद्रदेव मारा गया।
रुद्रदेव के पश्चात महादेव काकतीय राजवंश का उत्तराधिकारी हुआ,परन्तु उसका शासन भी ज्यादा दिनों तक नहीं रहा ,वह भी यादवों के साथ युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ।
महादेव का उत्तराधिकारी गणपति देव युद्ध में बंदी बना लिया गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४५)

राजराज द्वितीय के बाद चोल सिहांसन पर राजाधिराज द्वितीय आसीन हुआ, उसके समय तक कलचुरि नरेश अत्यधिक शक्तिशाली हो गया था।उसने चोलों को पराजित कर चोल अधिकृत आन्ध्रप्रदेश के ज्यादातर भू भाग अपने राज्य में मिला लिया।
1179 में जबकुलोत्तुंग तृतीय सिहांसन पर बैठा तो उसने कोंगू प्रदेश में हुए विद्रोह को खत्म किया ।कुलोतुंग तृतीय ने होयसल ,बाण,चेर गंग आदि राज्यों को जीतकर अपनी अधीनता स्वीकार करवाई, पांड्य देश काराजा विक्रम पांड्य कुलोतुंग की अवज्ञा कर उसका कोपभाजन बना ।कुलोतुंग ने पांड्य राज्य पर आक्रमण कर राजधानी को लूट लिया और राजाओं के राज्याभिषेक भवन को तहसनहस कर दिया।
कुलोतुंग तृतीय चोल राजवंश का अन्तिम महान शासक माना जा सकता है,अपने शासन काल तक उसने चोल राजवंश की गरिमा को सुरक्षित रखा।
कुलोतुंग का उत्तराधिकारी राजराज तृतीय हुआ ।शासक के रूप में वो असफल रहा ,उसके शासन काल में विशाल चोल साम्राज्य एक छोटा सा राज्य मात्र रह गया।पांड्य राजाओं से युद्ध के परिणाम स्वरूप राजराज तृतीय की प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुंची।
राजराज तृतीय के बाद राजेंद्र तृतीय चोल सिहांसन पर बैठा ,युवराज रहते हुए उसने होयसल,पांड्य और काकतीय राजाओं को पराजित किया था ।उसके राजा बनने के बाद होयसल और पांडय राजाओं ने राजेंद्र तृतीय को पराजित किया,फलतः राजेंद्र तृतीय को पांडयों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।
इस प्रकार विशाल चोल साम्राज्य के स्थान पर बचा छोटा सा चोल शासित प्रदेश तमिलनाडु पर भी पांड्य राजाओं का अधिकार हो गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४४)

कुलोत्तुंग प्रथम ने अब चोल साम्राज्य को सुदृढ़ करना शुरु किया। कुलोत्तुंग ने विक्रमादित्य षष्ठ के विरुद्ध दक्षिणी चालुक्य राज्य पर आक्रमण कर दिया और उसे पराजित कर गंगवाड़ी क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।
उसने श्रीलंका के साथ मैत्री संबंध बनाने के लिये अपनी पुत्री का विवाह श्रीलंका के राजकुमार के साथ कर दिया।
कुलोत्तुंग ने अपने पुत्र को वेंगी का शासक बना दिया था ,उसे युवराज बनाने के लिये चोल राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम् बुलाया ।उसके जाते ही वेंगी में गड़बड़ शुरू हो गई, चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ ने आक्रमण कर वेंगी राज्य के अधिकांश हिस्सों पर कब्जा कर लिया।उधर होयसल नरेश विष्णु वरधन ने चोल राज्य पर आक्रमण कर चोल शासित गंगवाड़ी और नोलम्बबाड़ी पर अधिकार कर लिया।काकतीय शासक प्रोल ने भी चोल सत्ता से अपने को मुक्त कर कल्याणी के चालुक्यों की अधीनता स्वीकार कर ली।
1120 में विक्रम चोल चोल सिहासन पर बैठा ,उसने सबसे पहले कल्याणी के शासक सोमेश्वर तृतीय को हटाकर वेंगी राज्य पर पुनः चोल सत्ता के अधीन कर लिया।होयसलों को पराजित कर गंगवाड़ी के कोलार क्षेत्र को चोल साम्राज्य में मिला लिया।
1135 में विक्रम चोल की मृत्यु के बाद कुलोत्तुंग द्वितीय ने राजगद्दी संभाली ,उसका शासन काल शांतिपूर्ण रहा ।
1150 में कुलोतुंग का पुत्र राजराज द्वितीय राजा बना, राजराज के शासनकाल मेंपांडय राजगद्दी के लियेपांड्य राजकुमारों में संघर्ष चल रहा था।
राजकुमार कुलशेखर पांड्य ने अपने प्रतिद्वंद्वी राजकुमार पराक्रम पांड्य की हत्या कर दी। श्रीलंका द्वारा पांड्य राज्य में किए जा रहे हस्तक्षेप के विरुद्ध कुलशेखर पांड्य ने चोलराज राजराज द्वितीय की सहायता मांगी, राजराज द्वितीय ने कुलशेखर की सहायता कीऔर श्री लंका की सेना को हराकर कुलशेखर को मदुरा के पांड्य राजसिंहासन पर आसीन कराया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४३)

चोल राजगद्दी पर आसीन होने के बाद वीरराजेन्द्र ने अपने परम्परागत शत्रु चालुक्यों को तुंगभद्रा नदी के तट पर पराजित कर दिया और तुंगभद्रा के तट पर विजय स्तम्भ स्थापित कराया ।वीरराजेन्द्र नेचालुक्य राजा सोमेश्वर द्बितीय को वेंगी से दूर कर दिया और वेंगी को चोल साम्राज्य में मिला लिया । वीर राजेंद्र ने केरल ,सिंहल और पाण्ड्य राजाओं को भी पराजित कर दिया।
वीर राजेंद्र ने सोमेश्वर द्बितीय के छोटे भाई विक्रमादित्य से अपनी पुत्री का विवाह कर दिया, क्योंकि विक्रमादित्य ने अपने भाई सोमेश्वर के विरुद्ध चोल नरेश वीरराजेन्द्र का साथ दिया था।वीरराजेन्द्र ने विक्रमादित्य को दक्षिणी चालुक्य राज का शासक बना दिया और वेंगी में वीरराजेन्द्र ने वास्तविक उत्तराधिकारी राजेन्द्र द्बितीय के स्थान पर विजयादित्य सप्तम को शासक बना दिया, इससे राजेंद्र द्वितीय क्रोधित हो गया।
1070 में वीरराजेन्द्र की मृत्यु हो गई, वीर राजेन्द्र की मृत्यु के पश्चात वेंगी राजकुमार राजेंद्र द्वितीय ने विद्रोह कर दिया।चोल सिहांसन पर आसीन वीरराजेन्द्र का पुत्र अधिराजेन्द्र अव्यस्क था।विक्रमादित्य ने कांची जाकर प्रारंभ में विद्रोह कुचल दिया और अपने साले अधिराजेन्द्र को चोल राजगद्दी पर प्रतिष्ठित कर वापस तुंगभद्रा तट पर लौट आया।
परन्तु कुछ दिन के पश्चात चोल साम्राज्य में हुये एक जनविद्रोह में अधिराजेन्द्र को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
इस अशांत वातावरण का लाभ उठा कर राजेंद्र द्वितीय ने चोल साम्राज्य और वेंगी पर अधिकार कर लिया और राजेंद्र द्वितीय कुलोत्तुंग प्रथम नाम धारण कर चोल राजगद्दी पर आसीन हो गया।

हम भारत के लोग…(६)

मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री

1- श्री मोरारजी देसाई बम्बई राज्य के 1952-56 तक मुख्यमंत्री थे ।बाद में वे मार्च 1977 में देश के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने ।

2- चौधरी चरण सिंह अविभाजित उत्तर प्रदेश के 1967-68 तक तथा दुबारा 1970 में मुख्यमंत्री रहे ।वे मोरारजी देसाई के बाद प्रधानमंत्री बने ।

3- श्री विश्व नाथ प्रताप सिंह भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वो दिसंबर 1989 से नवम्बर 1990 तक प्रधानमंत्री रहे ।

4- श्री पी.वी नरसिम्हा राव,दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश के 1971-73 तक मुख्यमंत्री रहे। वे दक्षिण भारत से प्रधानमंत्री बनने वाले पहले प्रधानमंत्री थे ।वे 1991-96 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे।।

5- श्री एच. डी. देवगौड़ा कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे,जो जून 1996 में प्रधानमंत्री बने।

6- श्री नरेन्द्र मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री 2001-2014 तक रहे और अब 2014 से भारत के प्रधानमंत्री हैं।

हम भारत के लोग…(५)

मुख्यमंत्री

अनुच्छेद 164 में कहा गया है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा, संसदीय व्यवस्था में राज्यपाल राज्य विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही मुख्यमंत्री नियुक्त करता है।

लेकिन यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत न प्राप्त हो तो राज्यपाल सबसे बड़े दल या दलों के समूह के नेता को मुख्यमंत्री बनाता है ,परंतु उसे एक माह के अन्दर सदन में विश्वास मत हासिल करना होता है।

संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री को विधानमंडल के दो सदनों में से किसी एक का सदस्य होना चाहिए।
एक ऐसे व्यक्ति को जो राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं भी हो,छह महीने के लिये मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है,परन्तु इस समय में उसेविधानमंडल के लिए र्निवाचित होना होगा। ऐसा न होने पर उसका मुख्यमंत्री पद समाप्त हो जायेगा।
पद ग्रहण करने के पूर्व राज्यपाल उसे पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाता है।
वेतन:

मुख्यमंत्री के वेतन एवं भत्तों का र्निधारण राज्य विधानमंडल द्वारा किया जाता है,तथा निशुल्क आवास, यात्रा भत्ता और चिकित्सा सुविधाएं मिलती हैं।

शक्तियां :

° राज्यपाल उन्हीं को मंत्री नियुक्त करता है जिनकी सिफारिश मुख्यमंत्री द्वारा की जाती है ।
° वह मंत्रियों को विभाग वितरण करता है उनके विभागों मेंफेरबदल कर सकता है।
° वह मंत्रिपरिषद की बैठक की अध्यक्षता कर उसके फैसलों को प्रभावित कर सकता है।
° वह सभी मंत्रियों को सहयोग,नियत्रंण और निर्देश दे सकता है।
° वह अपने पद से त्यागपत्र देकर पूरी मंत्रिपरिषद को समाप्त कर सकता है,उसकी मृत्यु अथवा त्याग पत्र से भी मंत्रिपरिषद स्वतः विघटित हो जाती है।
° वह राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच की कड़ी है।
° राज्य के कार्यों के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को सूचित करता है।
° वह महाधिवक्ता, राज्यलोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, सदस्यों और राज्य र्निवाचन आयुक्त आदि की नियुक्ति के संबंध में राज्यपाल को परामर्श देता है।
° वह राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने ,स्थगित करने और विघटित करने की सलाह देता है।
° वह अन्तर्राज्यीय परिषद और राष्ट्रीय विकास परिषद का सदस्य होता है,दोनों परिषदों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करता है ।
° वह राज्य सरकार का प्रमुख वक्ता होता है।

अनुच्छेद 167 के अनुसार मुख्यमंत्री राज्य के कार्यों के प्रशासन सम्बन्धी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को सूचित करे ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४२)

राजेंद्र द्वितीय ने अपने भाई राजाधिराज की मृत्यु का बदला लेने के लिए चालुक्य राज्य पर हमला कर वहां के शासक सोमेश्वर को पराजित कर समर भूमि में ही अपना वीराभिषेक कराया।
परन्तु सोमेश्वर प्रथम ने चोल शासित गंगवाड़ी राज्य पर तथा वेंगी पर अपना आधिपत्य बनाने के लिये सेनापति चामुण्डराज के नेतृत्व में चालुक्य सेना को भेजा, चोलों ने वेंगी राज्य को जीतकर चालुक्य सेनापति चामुण्डराज और वेंगी नरेश शक्तिवर्मन का वध कर दिया।
राजेंद्र द्वितीय ने सिंहल राज्य के चोलों के विरुद्ध विद्रोह का दमन कर सिंहल राज्य के अधिकांश भागों को चोल साम्राज्य में मिला लिया।
गंगवाड़ी से चालुक्य आक्रमणकारियों को खदेड़ दिया गया।
कुछ समय पश्चात संभवतः1063में चोल युवराज महेन्द्र की मृत्यु हो गई ,और कुछ दिन बाद राजेंद्र द्वितीय की भी मृत्यु हो गई।
अब चोल राजगद्दी पर वीर राजेंद्र आसीन हुआ।

दक्षिण भारत का इतिहास…(४१)

राजेंद्र प्रथम के उपरांत युवराज राजाधिराज चोल 1044 में चोल सिहांसन पर विराजमान हुआ।उसने सिहांसन पर बैठने केबाद चालुक्यों के विरुद्ध अभियान शुरु किया और कृष्णा नदी के किनारे धान्यकटक में चालुक्यों को पराजित किया।
1046 में राजाधिराज ने कल्याणी राज्य पर आक्रमण कर कल्याणी पर अधिकार कर लिया, चोल सेनाओं ने चालुक्यों के सेनापतियों और सरदारों क़ो पकड़ लिया तथा कम्पिलनगर में चालुक्यों के राजमहल को नष्ट कर दिया।राजाधिराज ने शत्रु की राजधानी में अपना वीराभिषेक कराया और विजयराजेन्द्र की उपाधि ग्रहण की।
1050 में चालुक्य नरेश सोमेश्वर अपने राज्य से चोल सेना को हटाने में सफल हुआ ,अब उसने वेंगी राज्य पर आक्रमण कर वेंगी नरेश को विवश किया कि वह सोमेश्वर की अधीनता स्वीकार करे।
राजाधिराज ने अपने छोटे भाई राजेन्द्र द्बितीय को युवराज बना दिया था ।राजाधिराज ने राजेंद्र द्बितीय को सोमेश्वर पर आक्रमण करने भेजा,युवराज राजेंद्र द्बितीय ने चालुक्य शासित रटठमंडलम् प्रदेश को जीतकर अनेक चालुक्य सेनापतियों को मौत के घाट उतारा और उन्हें भागने पर विवश कर दिया।
सोमेश्वर एक बार फिर चोल सेना का सामना करने आगे बढ़ा, कोल्हापुर के पास कोप्पम में दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ,राजाधिराज युद्ध स्थल पर शत्रु सेनाओं से घिर गया और बुरी तरह घायल हुआ तथा मृत्यु को प्राप्त हुआ ,परन्तु इसी बीच राजेंद्र द्वितीय अपनी सेना के साथ युद्ध स्थल पर पहुंच गया और अपने पराक्रम से युद्ध में विजयी हुआ,पराजित चालुक्य सेना समर भूमि से भाग खड़ी हुई।
चोलों के हाथ बहुत सा लूट का माल ,हाथी ,घोड़े, ऊंट तथा कुछ स्त्रियां जो राजपरिवार की थी,लगा ।
राजेंद्र द्बितीय ने युद्ध स्थल में ही अपना राज्याभिषेक करायाऔर विपुल सम्पत्ति के साथ अपनी राजधानी वापस लौट आया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४०)

राजेंद्र चोल को 1014 में चोल राज्य का सिहांसन प्राप्त हुआ ,वह अपने पिता की तरह वीर ,महत्वाकांक्षी, कूटनीतिज्ञ था ।सिहांसन पर आरूढ़ होने के पश्चात राजेंद्र चोल ने केरल के विद्रोह को कुचल दिया और उन्हें परास्त कर अपने आधीन कर लिया।
चोल अभिलेख के अनुसार राजेंद्र चोल ने सिंहल राज्य पर आक्रमण कर सिंहल राज्य को अपने चोल साम्राज्य में मिला लिया औरसिंहल के शासक को बंदी बनाकर बारह वर्ष तक बंदीगृह में रखा बंदीगृह मेंही उसकी मृत्यु हो गई ।राजेंद्र चोल ने अपने पुत्र विक्रम चोल को उत्तरी पूर्व राज्यों की विजय अभियान के लिए, उसके नेतृत्व में विशाल सेना को भेजा ,विक्रम चोल ने कलिंग(उड़ीसा)बस्तर इन्द्ररथ तथा दक्षिणी कोसल आदि राज्यों को विजित किया और दंडभुक्ति केशासक धर्म पाल,दक्षिणी राठ के राजा रणसूर,पूर्व बंगाल के राजा गोविंद चन्द्र तथा पाल राज्य के शासक महीपाल के विरुद्ध युद्ध में सफलता प्राप्त की।विजय प्राप्ति के उपरांत विक्रम चोल ने गंगा में स्नान किया।
अपने शासनकाल के प्रारंभ में ही राजेंद्र प्रथम ने अपने पुत्र राजाधिराज को युवराज बना दिया था।
तिरुवालंगाडु ताम्रपत्र के अनुसार राजेंद्र नेअपनी विशाल जल सेना की सहायता से समुद्र पार कर कटाह राज्य को जीत लिया और वहां के राजा को बंदी बनाया, परन्तु कटाह राजा ने अपनी मुक्ति की याचना करते हुयेचोल नरेश की अधीनता स्वीकार कर ली,राजेंद्र चोलप्रथम ने उसकी याचना स्वीकार कर उसे मुक्त कर दियाऔर अपना सामन्त शासक बना दिया।
अपनी विशाल जलसेना के साथ राजेंद्र चोल ने अंडमान निकोबार, वर्मा देश के अराकान तथा पेगूआदि प्रदेशों को भी जीत लिया।
जब राजेंद्र चोल हिन्द सागर के पार युद्धों में व्यस्त था,तभी केरल, पाण्ड्य और सिंहल राज्य के शासकों ने संयुक्त रुप चोल सत्ता के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया,इस युद्ध में सुन्दरपाण्डय नेतृत्व कर रहा था।
राजेन्द्र ने अपने युवराज पुत्र राजाधिराज को इस विद्रोह को दबाने भेजा, राजाधिराज ने इस विद्रोह को कुचल दिया,इस युद्ध में सिंहल राजा मृत्यु को प्राप्त हुआ।
अपने राज्य की सीमाओं पर चोल शासक की पैनी नजर रहतीं थी
सीमांत राजाओं पर चोल शक्ति का दवाब हमेशा ही बना रहता था।उसने शक्तिशाली राज्यों के विद्रोह बलपूर्वक दबा दिया और उन्हें सदा अपने अधीन रहने पर विवश कर दिया था।
उसके शासन काल में चोल राज्य वैभवशाली था।

हम भारत के लोग…(४)

प्रधानमंत्री

अनुच्छेद 75 के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को राष्ट्रपति प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।
यदि लोकसभा में कोई भी दल स्पष्ट बहुमत में न हो तो राष्ट्रपति स्वविवेक से सबसे बड़े दल अथवा गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री बनाता है,परन्तु उस नेता को एक माह के अंदर अपना बहुमत सिद्ध करना होता है।
संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री संसद के दोनों सदनों में से किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है।
प्रधानमंत्री का कार्य काल निश्चित नहीं है,प्रधानमंत्री को जब तक लोकसभा का बहुमत प्राप्त रहता है तब तक उसे हटाया नहीं जा सकता,लोकसभा में अपना विश्वास मत खो देने पर उसे अपने पद से त्यागपत्र देना होगा अथवा त्यागपत्र न देने पर वह राष्ट्रपति द्वारा बर्खास्त किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री के वेतन और भत्तों का निर्धारण संसद द्वारा समय समय पर किया जाता है ।

कार्य और शक्तियां:

० प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से अपने दल के व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त करने की सिफारिश करता है और राष्ट्रपति उन्हीं व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त करता है जिनकी प्रधानमंत्री द्वारा सिफारिश की गई होती है ।
० प्रधानमंत्री मंत्रियों को मंत्रालय आवंटित करता है, और उनमें फेरबदल भी कर सकता है।
० वह किसी भी मंत्री को त्यागपत्र देने के लिये कह सकता है या राष्ट्रपति से उसे बर्खास्त करने की सिफारिश भी कर सकता है।
० वह मंत्री परिषद की बैठक की अध्यक्षता करता है और उनके निर्णयों को भी प्रभावित कर सकता है।
० मंत्रियों की गतिविधियों को नियंत्रित और निर्देशित कर सकता है।
० वह पद से त्यागपत्र देकर मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर सकता है।
० प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच की मुख्य कड़ी होता है।
० प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति को भारत का महान्यायवादी, भारत का महानियंत्रक, महालेखा परीक्षक, संघ लोकसेवा आयोग का अध्यक्ष एवं उसके सदस्यों का,चुनाव आयुक्त, वित्त आयोग का अध्यक्ष एवं उसके सदस्यों एवं उनकी नियुक्ति के सम्बंध में परामर्श देता है।
० प्रधानमंत्री संसद के सत्र का आरंभ और सत्रावसान सम्बन्धी परामर्श राष्ट्रपति को देता है।
० वह लोकसभा को विघटित करने की राष्ट्रपति से सिफारिश कर सकता है।
० वह सरकार की नीतियों की घोषणा करता है।
० प्रधानमंत्री नीति आयोग , राष्ट्रीय एकता परिषद,अंतर्राज्यीय परिषद और राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद का अध्यक्ष होता है।
० वह केन्द्र सरकार का प्रमुख प्रवक्ता होता है।
० वह सत्ता धारी दल का नेता होता है व सेनाओं का राजनैतिक प्रमुख होता है।
० वह देश का नेता होने के कारण राज्यों के विभिन्न वर्गों के लोगों से उनकी समस्याओं के सम्बंध में ज्ञापन प्राप्त करता है।
० आपातकाल में राजनीतिक स्तर पर आपदा प्रबंधन का प्रमुख होता है।

राष्ट्रपति को सहायता एवं सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगा।

अनुच्छेद 78 के अनुसार प्रधानमंत्री संघ के कार्य में प्रशासन सम्बन्धी विधान विषयक मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राष्ट्रपति को सूचित करे।
संघ के कार्य, प्रशासन सम्बन्धी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं सम्बन्धी जो भी जानकारी राष्ट्रपति मांगे वो उन्हें दे।

प्रधानमंत्री की मृत्यु अथवा त्यागपत्र देने पर मंत्रिपरिषद स्वयं ही विघटित हो जाती है।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३९)

राजराज प्रथम के शासनकाल के एक अभिलेख के अनुसार नोलम्बों और गंगों के विरुद्ध भी उसने विजय प्राप्त की थी ।
चालुक्य शासक सत्याश्रय जो राजराज का समकालीन था,चोलों का प्रबल शत्रु था ।उसकी शह पर वेंगी शासक दार्नाणव की हत्या तेलुगु जटाचोडभीम ,जो दार्नाणव का संबंधी भी था ,ने कर दी और सिहांसन हथिया लिया ।
दार्नाणव के पुत्रों ने राजराज प्रथमसे सहायता की याचना की ,राजराज ने सहायता कावचन दिया और अपनी पुत्री का विवाह छोटे राजकुमार से कर दिया तथा बड़े राजकुमार शक्ति वरमन को सिहांसन पर बैठाने का वचन दिया ।
चोल राजा नेजटाचोडभीम को पराजित किया और वेंगी के सिहांसन पर शक्ति वर्मन को शासक बना दिया ,चोल राज्य के प्रभुत्व में शक्ति वर्मन शासन करने लगा ।चालुक्य नरेश सत्याश्रय को चोलराज्य का विस्तार पसन्द नहीं था ,उसने 1006 में वेंगी पर आक्रमण कर दिया और धान्यकटक तथा वनमंडल के किलों को धूल धूसरित किया ।
तब राजराज प्रथम ने अपने पुत्र राजेन्द्र को एक शक्तिशाली सेना का प्रधान बना कर चालुक्यों पर आक्रमण करने भेजा ।
राजेन्द्र चोल ने सान्तलिगे,वनवासी, कादम्बलिगे,कोगली प्रदेशों को जीतकर बीजापुर जिले के दोनूर में अपना सैन्य शिविर स्थापित किया।
चालुक्य अभिलेख के अनुसार राजेन्द्र चोल ने पूरे देश को बुरी तरह लूटा और स्त्रियों और बच्चों तक को मौत के घाट उतारा, और मान्यखेट में भी लूटपाट की ।
सत्याश्रय को इस कारण अपनी सेना वेंगी से हटानी पड़ी, वह बड़ी कठिनाई से अपने देश को चोल सेना से मुक्त करवा सका और चोल सेना बहुत सारे लूट के माल के साथ तुंगभद्रा नदी के पीछे रह गई।
इसके बाद राजराज प्रथम ने कलिंग राज्य पर आक्रमण उसे भी अपने राज्य में मिला लिया।
राजराज प्रथम ने श्रीलंका पर तो अपना आधिपत्य पहले ही कर लिया था ,अब उसने अपनी शक्तिशाली जहाजी सेना के साथ बंगाल की खाड़ी को पार करके दक्षिणी पूर्व एशिया में श्रीविजय, कटाह तथा मलाया द्बीपों पर भी अपना अधिकार कर लिया और अपने विशाल चोल साम्राज्य में मिला लिया।
इस प्रकार भारत का पूर्व एशिया के अन्य देशों के साथ व्यापार और वाणिज्य सम्पर्क पूरी तरह से विकसित हो गया।
चोल साम्राज्य को राजराज प्रथम ने विस्तृत, वैभवशाली और शक्तिशाली बना दिया ।
राजराज ने तंजौर का वृहदीश्वर मंदिर का निर्माण कराया था ,जो कि विश्व प्रसिद्ध है ।

हम भारत के लोग…(३)

उपराष्ट्रपति

उपराष्ट्रपति का पद देश का दूसरा सर्वोच्च पद होता है ।वह संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के निर्वाचन मंडल द्वारा चुना जाता है ।

इसमें संसद के निर्वाचित और मनोनीत दोनों सदस्य होते हैं । परन्तु राज्य विधानसभाओं के सदस्य सम्मिलित नहीं होते हैं ।

योग्यता

वह भारत का नागरिक हो ।

वह पैंतीस वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो ।

वह राज्यसभा का सदस्य बनने के योग्य हो ।

वह केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार या किसी स्थानीय या सार्वजनिक प्राधिकरण के अन्तर्गत किसी लाभ के पद पर न हो ।

उपराष्ट्रपति पद ग्रहण से पहले शपथ लेनी होगी और हस्ताक्षर करने होगें ।

उपराष्ट्रपति पद की अवधि पद ग्रहण करने से लेकर पाँच वर्ष तक होती है ।

वह अपनी पदावधि में किसी भी समय राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र दे सकता है ।

वह अपने पद की अवधि पूर्ण होने से पहले भी हटाया जा सकता है ।

उसे राज्य सभा द्वारा पूर्ण बहुमत द्वारा हटाया जा सकता है ,परन्तु लोकसभा की सहमति आवश्यक है ।

वह उप राष्ट्र पति पद पर कितनी ही बार निर्वाचित हो सकता है।

उपराष्ट्रपति का पद उसकी पाँच वर्ष की अवधि पूर्ण होने पर समाप्त हो सकता है ।

उसके त्यागपत्र देने पर

उसकी मृत्यु पर,

उसके बर्खास्त होने पर

या निर्वाचन अवैध घोषित होने पर भी

पद से हटाया जा सकता है ।

शक्तियाँ और कार्य –

उपराष्ट्रपति की शक्तियाँ और कार्य लोकसभा अध्यक्ष की भाँति होते हैं ,वह उच्च सदन का सभापति होता है ।

जब राष्ट्रपति का पद रिक्त हो तो वह कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में भी कार्य करता है ।

राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते समय वह राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं करता है ।

उपराष्ट्रपति का वेतन १.२५ लाख रू प्रति माह होता है उसे दैनिक भत्ता ,निःशुल्क पूर्ण सज्जित आवास ,फ़ोन ,कार ,चिकित्सा सुविधा ,यात्रा सुविधा तथा अन्य सुविधायें प्राप्त होती हैं ।

यदि वह राष्ट्रपति के पद पर कार्य कर रहा है तो उसे राष्ट्रपति को प्राप्त होने वाले वेतन और भत्ते प्राप्त होते हैं।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३८)

उत्तराधिकार में अरिमोलवर्मन को छोटा और कमजोर राज्य प्राप्त हुआ, युवराज के रूप में उसने युद्ध अनुभव प्राप्त किये थे और वह एक अच्छा प्रशासक भी था साथ ही कूटनीतिज्ञ भी था ।
उसने उत्तम चोल से आदित्य प्रथम की हत्या का प्रतिशोध लेने के स्थान पर उत्तम चोल से अपने लिये सिहांसन सुरक्षित करवा लिया ,इस प्रकार उत्तम चोल की मृत्यु के बाद उत्तम चोल के पुत्रों के स्थान पर अरिमोलवर्मन राजा बना ।
अब उसने राजराज की उपाधि धारण की ।985में सिहांसन पर आसीन होने के बाद उसने छोटे छोटे राज्यों को जीत कर चोल राज्य में मिला लिया ।उसने अपने राज्य में अनेक प्रशासनिक सुधार किए और अपने शासन काल के प्रारंभिक वषों में उसने चोल राज्य की स्थिति को मजबूत किया।
केरल ,पांड्य और श्रीलंका के शासकों ने सेना एकत्रित कर सम्मिलित रूप से चोल राज्य के विरुद्ध तैयारी की ,परन्तु राजराज प्रथम ने केरल राज्य पर आक्रमण किया और केरल नरेश रविवर्मन को परास्त किया, तत्पश्चात पांड्य राज्य पर आक्रमण कर वहां के राजा को बंदी बनाया ।
अपने अन्य अभियान में राजराज ने कोल्लम तथा कोंडुगोलूर के शासकों को भी पराजित किया ।
राजराज ने अपना तीसरा अभियान जहाजी बेड़ो के साथ किया जिसमें उसने श्री लंका का उत्तरी भाग अधिकृत किया औरवहां की राजधानी अनुराधापुर को रौंद डाला इस युद्ध में श्री लंका नरेश को किसी अज्ञात स्थान में छुपकर अपनी प्राणरक्षा करनी पड़ी।
तिरुवालंगाडु अभिलेख के अनुसार राजराज प्रथम का श्रीलंका पर अधिकार हुआ और उसने राज्य का नाम मामुण्डीचोलमण्डलम रखा और पोलो न्नुरुवा नगर को चोल राज्य की राजधानी बनाया ।

श्री गणेश🏵️🏵️🏵️

भाद्रपक्ष महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी गणपति भगवान का प्रिय दिवस है ,इस दिन गणपति भगवान की मूर्तियां सजाई जाती हैं ।गणपति सभी कार्यों प्रथम पूज्य हैं ,शुभ कामों में प्रथम निमंत्रण गणपति को दिया जाता है।
इनके जन्म से जुड़ी कई कथाएं हैं,ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार पार्वती के पुत्र जन्म के अवसर पर देवताओं के साथ शनि देव भी आये,उनकी दृष्टि जब पार्वती पुत्र पर पड़ी तो पुत्र का मस्तक कट कर धड़ से अलग हो गया ।शनिदेव को शाप था कि उनकी दृष्टि जिस पर भी पड़ेगी उसका मस्तक कट जाये गा ।यह देख कर पार्वती अत्यन्त दुखी हो गई तब भगवान विष्णु ने एक शिशु हाथी का सिर जोड़कर पार्वती पुत्र को जीवित कर दिया ।
मत्स्य पुराण के अनुसार पार्वती ने अपने अंगलेप से एक पुतले का निर्माण किया जिसका सिर गज का जैसा था ,गंगाजल से अभिषेक करते ही वह प्राणवान हो गया । पार्वती और गंगा दोनों ने ही उसे अपना पुत्र माना ।
शिव पुराण के अनुसार पार्वती ने स्नान करते समय उबटन से एक मानवाकृति बनाई और उसे किसी को भी अंदर न आने देने को कहा ,तभी शिव वहाँ आये बालक ने उन्हें न पहचानते हुये अंदर जाने से रोक दिया ।परिणाम स्वरूप दोनों में युद्ध हुआ और शिव ने बालक का सिर काट दिया जब पार्वती जी आयीं तो यह देखकर दुख से भर गयीं। शिव जी को जब पूरी बात का पता चला तो उन्होंने एक हाथी का सिर जोड़कर बालक को जीवन प्रदान किया।
गणपति संभव के अनुसार शिवजी के डमरू की ध्वनि से गणपति ने सम्पूर्ण वेदों को अपनाया, पार्वती के नूपुरों की झंकार से संगीत सीखा और शिव के तांडव दर्शन से नृत्य सीखा ।
माना जाता है जब व्यास ने महाभारत की रचना की तो महाभारत कोगणपति भगवान ने लिखा है,उन्होंने कहा कि लिखना शुरू करने के बाद रुकेगें नहीं ,इसपर व्यासजी ने कहा ,मैं जो भी कहूँगा आप उसका अर्थ समझ कर ही लिखें ।इस प्रकार महाभारत पूरी हुई।
गणपति जी गजबदन,सिन्दूर के समान रक्तवर्ण, त्रिनेत्र ,स्थूलकाय तथा चर्तुभुज हैं चारों हाथों में दंत ,अकुंश, पाश और वरमुद्रा हैं। मूषक उनका वाहन है,वे समस्त कार्यों मे प्रथम पूज्य हैं,विघ्न बाधाओं के विनाशक और मोदक प्रिय हैं ।
इनकी पत्नियों के नाम ऋद्धि और सिद्धि हैं ।ऋद्धि के पुत्र का नाम क्षेम तथा सिद्धि के पुत्र का नाम लाभ है ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३७)

परान्तक प्रथम की मृत्यु के बाद (955-85 )तक चोल राज्य में अस्तव्यस्तता रही।परान्तक प्रथम के बाद उसका पुत्र गंडरादित्य राजसिंहासन पर आसीन हुआ ,जब उसकी मृत्यु हुई चोल राज्य एक छोटा सा प्रदेश मात्र रह गया था ।
कुछ दुर्बल शासकों के पश्चात 956 में सुन्दर चोल परान्तक द्वितीय राजसिंहासन पर बैठा,वह पराक्रमी सिद्ध हुआ ।उसने पांड्य राज्य पर आक्रमण किया ।पांड्य राजा की सहायता श्री लंका नरेश महिन्द्र चतुर्थ ने की परन्तु सुन्दर चोल ने पांड्य राजा को दो युद्धों में पराजित किया।
इस युद्ध में उसके युवराज पुत्र आदित्य द्वितीय ने भी सहयोग किया था ।
सुन्दर चोल के अंतिम वर्षों में गंडरादित्य के पुत्र उत्तम चोल ने षडयंत्र करके युवराज आदित्य द्वितीय की हत्या कर दी और व्यथित सुन्दर चोल को विवश किया कि वह अपना उत्तराधिकारी अपने पुत्र अरिमोलवर्मन के स्थान पर उसे घोषित करे ।
इस प्रकार उत्तम चोल ,चोल सिहांसन पर आसीन हुआ ।
परन्तु चोल राज्य का अच्छा समय तब शुरु हुआ जब चोल सिहांसन पर सुन्दर चोल का छोटा पुत्र अरिमोलवर्मन आसीन हुआ ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३६)

दक्षिण भारत के चोल वंश का नाम मौर्य काल में मिलता है,महाभारत तथा मेगस्थनीज़ की इन्डिकामें भी चोलों का उल्लेख है माना जाता हैकि महाभारत काल मे सहदेव ने चोलों पर विजय प्राप्त की थी।सिंहली महाकाव्य महावंश में भी चोलों का नाम आता है।
प्रारंभ में चोल शासक पल्लवों के अधीन सामन्त थे जो कावेरी के तटवर्ती क्षेत्रों पर शासन कर रहे थे ।
(850-871ई०) चोल शासक विजयालय ने पांड्यों के तंजौर क्षेत्र पर आधिपत्य कर लिया और उरैयुर के स्थान पर तंजौर को अपनी राजधानी बना लिया ।
नवीं शताब्दी में विजयालय के उत्तराधिकारी आदित्य प्रथम ने अपनी शक्ति बढ़ानी शुरू की और छोटे छोटे राज्यों को जीत कर अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली ।तिरूवालंगाडु ताम्रपत्रों के अनुसार आदित्य प्रथम ने पल्लव शासक अपराजित के विरूद्ध विद्रोह करकेउसे हरा कर उसकी हत्या करदी और पल्लव राज्य पर अधिकार कर लिया।
इस विजय के बाद चोल राज्य की सीमा राष्ट्र कूट राज्य की सीमा से मिल गयी ।आदित्य प्रथम ने राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय की पुत्री से विवाह कर उसे प्रधान रानी बना दिया ।
907ई० में आदित्य प्रथम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र परान्तक प्रथम सिहांसन पर बैठा ।राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय इस बात पर क्रोधित हो गया वह चाहता था उसकी पुत्री का पुत्र कन्नरदेव चोल सिहांसन पर आसीन हो,अत:उसने चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया।परन्तु परान्तक प्रथम ने गंगनरेश पृथ्वी पति की सहायता से राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय को पराजित कर दिया औरवीर चोल की उपाधि धारण की ।
परान्तक प्रथम को अपनी शक्ति को पूरी तौर पर पांड्य राजा राजसिंह द्वितीय के विरुद्ध लगाना पड़ा, उसने पांड्य राजा राजसिंह द्वितीय को पराजित कर उसकी राजधानी मदुरा पर अधिकार कर लिया
इसके पश्चात चोल राजाने पांड्य नरेश राजसिंह द्वितीय को दूसरे युद्धों में भी पराजित किया और धीरे धीरे पांड्य राज्य के क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया।परान्तक प्रथम की इन विजयी अभियानों से उसके राज्य की सीमा उत्तर में पेण्णारक्षेत्र से दक्षिण में कन्याकुमारी तक विशाल हो गई।
राष्ट्र कूट राजा कृष्ण तृतीय ने चोलों के शत्रुओं को एकत्र कर एक सम्मिलित सेना के साथ चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया और चोलों को जीत कर उनके तोंडमंडलम क्षेत्र को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया ।
इसके बाद भी राष्ट्र कूट राजा ने गंग राजा की सहायता से परान्तक प्रथम को दुबारा पराजित किया और चोल राज्य के कुछ क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३५)

राजसिंह द्वितीय कुछ समय तक अपने ननिहाल में रहने के बाद अपने राज्य की पुन: प्राप्ति के लिये प्रयासरत हो गया और अपनी शक्ति को एकत्र कर चोलो से मुक़ाबलाकरने को तैयार हो गया ।परन्तु चोल नरेश ने पांड्य शक्ति को पुन: पराजित कर दिया ।

पराजित होने के बाद भी मार वरमन राजसिंह द्वितीय बार -बार अपने राज्य को स्वतन्त्र कराने का प्रयास करता रहा ,उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र वीरपांडय ने भी राज्य की स्वतन्त्रता के लिये प्रयास जारी रखा ,उसके शासनकाल में चोल राज्य का शासन एक दुर्बल शासक गंडरादित्य चोल के पास था जिसे वीरपांडय ने पराजित कर अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली ।

गंडरादित्य की मृत्यु के बाद उसका भतीजा सुंदर चोल परान्तक द्वितीय राजा बना ।उसने वीरपांडय की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिये पांड्य राज्य पर आक्रमण किया ।वीरपांडय की सहायताश्रीलंका नरेश महेन्द्र चतुर्थ ने भी की परन्तु चोल नरेश ने उन्हें दो बार पराजित किया ।

वीरपांडय की मृत्यु ९६६ ई० में हो गयी और लगभग तीन शताब्दी तक पांड्य राज्य चोलो के आधिपत्य में रहा।

१०७०-११२० ई० में कुलोत्तुंग प्रथम के समय में पांड्य राजा जटावरमनश्रीवल्लभ ने पांड्य राज्य को स्वतंत्र रखने में कुछ वर्षों तक सफल रहा परन्तु कुलोत्तुंग ने उसे मार कर पांड्य राज्य पर अधिकार कर लिया ।

उसके पश्चात कुछ समय तक पांड्य राज्य उत्तराधिकार के कारण गृहयुद्ध में फँसा रहा ,कुलोत्तुंग तृतीय ने पांड्य राज्य के दो उत्तराधिकारियों वीरपांडय और विक्रम पांड्य के बीच के झगड़े को ख़त्म कर विक्रम पांड्य को मदुरा का शासक बनाया ।

विक्रम पांड्य के उत्तराधिकारी जटा वरमन कुलशेखर ने चोल सत्ता की अवज्ञा कर ,चोलों के विरूद्ध कुछ सफलतायें प्राप्त की ,उसके पुत्र मारवरमन सुन्दर पांड्य ने उदयपुर और तंजौर पर क़ब्ज़ा कर लिया और चोलो को भी अपने आधीन कर लिया । परन्तु चोलों ने

होयसलों की सहायता से पुन: अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली ।

हम भारत के लोग…(२)

राष्ट्रपति

राष्ट्र पति के पद की अवधि पाँच वर्ष होती है परन्तु जब तक उसका उत्तराधिकारी पद धारण न कर ले वह तब तक अपने कार्य काल के उपरांत भी अपने पद पर बना रहता है ।

राष्ट्र पति अपने पद से

॰अपना कार्य काल समाप्त होने पर

॰त्यागपत्र देने पर

॰महाअभियोग द्वारा

॰मृत्यु होने पर

॰निर्वाचन अवैध होने पर

पदमुक्त हो सकता है ।

राष्ट्र पति की शक्तियाँ –

(१) कार्य कारी शक्तियाँ –

• भारत सरकार के सभी शासन संबंधी कार्य उसके नाम से किये जाते हैं ।

• वह नियम बना सकता है

• वह प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है ।

• वह महान्यायवादी ,महालेखा परीक्षक ,चुनाव आयुक्त ,संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष ,राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति करता है ।

• वह स्वयं द्वारा नियुक्त प्रशासकों के द्वारा केन्द्र शासित राज्यों का प्रशासन सीधे संभालता है ।

(२) विधायी शक्तियाँ –

• वह संसद की बैठक बुला सकता है अथवा कुछ समय के लिये स्थगित कर सकता है और लोकसभा को विघटित कर सकता है ।

• जब एक विधेयक संसद द्वारा पारित होकर राष्ट्र पति के पास भेजा जाता है तो वहविधेयक को स्वीकृति देता है ,या स्वीकृति सुरक्षित रखता है ,विधेयक को यदि वह धन विधेयक नहीं है तो संसद के पु न:विचार के लिये लौटा देता है ।

• वह अंडमान व निकोबार द्वीप समूह ,लक्ष द्वीप ,दादर एवं नागर हवेली ,दमन व दीव में शांति ,विकास व सुशासन के लिये नियम बना सकता है ।

(३) वित्तीय शक्तियाँ –

• वह राज्य व केन्द्र के मध्य राजस्व के बँटवारे के लिये हर पाँच वर्ष में वित्त आयोग का गठन करता है ।

• धन विधेयक राष्ट्र पति की पूर्व अनुमति से ही संसद मे प्रस्तुत किया जा सकता है ।

(४) न्यायिक शक्तियाँ –

• वह उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है ।

• वह किसी अपराधी के दण्डादेश को निलंबित क्षमा या बदल सकता है ।

(५) कूटनीतिक शक्तियाँ –

• राष्ट्र पति भारत के सैन्य बलों का सर्वोच्च सेनापति होता है ,वह थल सेना ,वायु सेना और जलसेना के प्रमुखों की नियुक्ति करता है ।

• वह अंतराष्ट्रीय मामलों में भारत का प्रतिनिधित्व करता है ।

(६) आपातकालीन शक्तियाँ –

• राष्ट्र पति को तीन परिस्थितियों में आपातकालीन शक्तियाँ प्राप्त हैं

॰ राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद ३५२ )

॰ राष्ट्र पति शासन (अनुच्छेद ३५६व ३६५ )

॰ वित्तीय आपात काल (अनुच्छेद ३६० )