दक्षिण भारतीय इतिहास…(३४)

श्री मारश्रीवल्लभ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र वरगुण द्वितीय राजसिंहासन पर आसीन हुआ ! वरगुण द्वितीय ने पल्लवों के बढते हुए राजनीतिक प्रभाव को रोकने के लिये चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया उसकी सेना तँजोर में कावेरी नदी के तट पर इडवै नाम के गांव तक पहुंच गयी परन्तु उसे वहां एक भयानक गुटबंदी का सामना करना पड़ा।
इस गुट में पल्लव युवराज अपराजित के नेतृत्व में चोल शासक आदित्य प्रथम तथा गंग राजा पृथ्वीपति की सेनाऐं भी पांड्य राजा के विरुद्ध युद्ध में शामिल हुई थी ।
वरगुण द्वितीय ने चोल राज्य के अलवै नाम के दुर्ग को जीतने के बाद पल्लव राज्य की सीमा में प्रवेश किया।यहां अपराजित के नेतृत्व में
गंग और चोल सेनाओं ने कुंभकोणम के निकट पुड्मवियम के मैदान में वरगुण द्वितीय को बुरी तरह पराजित किया।पांड्य शक्ति को इससे बहुत नुकसान हुआ और गंगराज पृथ्वीपति युद्ध में मारा गया।
वरगुण द्वितीय की राज्य की सीमा कावेरी नदी के तट तक ही रह गई ,पाण्ड्य राज्य का वो भाग जो कावेरी नदी के पार था उस पर चोल शासक आदित्य प्रथम का आधिपत्य हो गया ।
वरगुण द्वितीय के भाई परान्तक वीर नारायण पाण्ड्य ने उससे सिहांसन छीन कर अपना अधिकार कर लिया।
कोंगू प्रदेश और कावेरी के दक्षिणी क्षेत्र पर उसनेविजय प्राप्त की और पाण्ड्य राज्य में मिला लिया ।परन्तु चोल शासक आदित्य प्रथम ने कुछही दिनों में आक्रमण करके उससे कोंगू प्रदेश जीत लिया।
परान्तक वीरनारायण के बाद उसका पुत्र मार वर्मन राजसिंह द्वितीय राजा बना ।उसने अपने राज्य को पुनः संगठित किया औरश्रीलंका के शासक कस्सप पंचम से मैत्री संबंध स्थापित किए।
परन्तु चोल राजा परान्तक प्रथम ने 901ई 0में पाण्ड्य राज्य पर आक्रमण कर मदुरै को जीत लिया ।पाण्ड्य राजा ने श्रीलंका नरेश से सहायता की मांग की ,श्रीलंका नरेश ने अपनी सेना मदुरै भेज दी। परन्तु पाण्ड्य औरश्रीलंका की सम्मिलित सेनाओं को भी चोलों ने हरा दिया ।
राजसिंह श्रीलंका भाग गया ,सम्पूर्ण पाण्ड्य राज्य पर चोलों का अधिकार हो गया।

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दक्षिण भारतीय इतिहास…(३३)

जटिल परान्तक नेडुंजडैयन (वरगुण प्रथम ) की मृत्यु के बाद उसका पुत्र श्रीमारश्रीवल्लभ राजसिंहासन पर बैठा ।वह अपने पिता की तरह महा पराक्रमी था उसे दक्षिण भारत का प्रजा पालक शासक कहा जाता है श्रीमारवल्लभ ने विलिनन्,कुन्नूर तथा सिंगलम् पर विजय प्राप्त की ।

सिहंली बौद्ध महाकाव्य महावंश के अनुसार श्रीलंका के शासक सेन प्रथम को पांड्य सेना ने पराजित किया और काफ़ी धन प्राप्त किया परन्तु दोनों के बीच सन्धि हो जाने के बाद पांड्य राजा ने सेन प्रथम को उसका राज्य वापस कर दिया ।

पल्लव राज दन्ति वरमन का पुत्र नन्दि वरमन तृतीय शक्तिशाली होने के साथ कूटनीतिज्ञ भी था ।उसने गंग,चोल और राष्ट्र कूट को मिलाकर पांड्य राजा श्रीमारवल्लभ पर आक्रमण कर दिया इस युद्ध में पांड्य पराजित हुये ,पल्लवों ने पांड्य राज्य के वेंगई नदी के तट तक का क्षेत्र जीत लिया ।

परन्तु पांड्य राजा ने पुन: अपनी शक्ति एकत्र की और पल्लव तथा उनके सहयोगी राजाओं को पराजित करअपनी हार का हिसाब बराबर किया ।

श्रीलंका नरेश सेन द्वितीय ने पल्लवों के साथ मिलकर श्रीमारवल्लभ की राजधानी मदुरै को घेर लिया और उनका साथ दिया पांड्य राजकुमार माया पांड्य ने जो स्वयं को राजगद्दी का हक़दार मानता था ।

इस युद्ध में भयंकर विनाश हुआ ,इस आक्रमण के परिणाम स्वरूप पांड्य नरेश श्रीमारवल्लभ युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ और उसकी मृत्यु हो गयी ।

तब सिंहली सेनानायक ने उसके पुत्र वरगुण द्वितीय को राजसिंहासन पर बैठाया ।

हम भारत के लोग…(१)

राष्ट्रपति

संविधान के भाग पाँच के अनुच्छेद ५२ से ७८ तक संघ की कार्य पालिका के बारे में बताया गया है ,इसमें राष्ट्रपति ,उप राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री ,मंत्री मंडल तथा महान्यायवादी होते हैं ।

राष्ट्र पति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के चुने सदस्य ,राज्य विधानसभा के चुने सदस्य और केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली , पुडुचेरी के विधानसभा के चुने सदस्य करते हैं ।

संसद के दोनों सदनों के मनोनीत सदस्य, राज्य विधानसभाओं के मनोनीत सदस्य राज्य विधान परिषदों के’ द्विसदनीय विधायिका के मामलों में ‘सदस्य निर्वाचित तथा मनोनीत और दिल्ली तथा पुडुचेरी के मनोनीत सदस्य राष्ट्र पति के चुनाव में भाग नहीं लेते ।

राष्ट्रपति के पद हेतु योग्यता – कोई भी व्यक्ति भारत का नागरिक हो वह ३५ वर्ष का हो वह लोकसभा का सदस्य चुने जाने के योग्य हो वह संघ सरकार में ,राज्य सरकार में किसी स्थानीय या किसी सार्वजनिक स्थान में लाभ के पद पर होना नहीं चाहिये ।

राष्ट्र पति के चुनाव के लिये उम्मीदवार को ५० प्रस्ताव करने वाले और पचास अनुमोदन करने वाले होने चाहिये ।

उम्मीदवार को भारतीय रिज़र्व बैंक में पन्द्रह हज़ार रूपये ज़मानत राशि जमा करनी होगी ।

राष्ट्र पति पद ग्रहण से पूर्व शपथ लेता है । शपथ उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ,उनकी अनुपस्थिति में वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा शपथ दिलाई जाती है ।

राष्ट्र पति को संसद के किसी भी सदन का या राज्य विधायिका का सदस्य नहीं होना चाहिये यदि कोई व्यक्ति ऐसा है तो उसे सदन से पद ग्रहण करने से पूर्व त्यागपत्र देना होगा ।

वह कोई अन्य लाभ का पद नहीं लेगा ।

उसे बिना कोई किराया चुकाये आधिकारिक निवास राष्ट्र पति भवन दिया जायेगा ।

उसे संसद द्वारा निर्धारित उपलब्धियों और भत्ते प्राप्त होंगे ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३२)

मार वरमन राजसिंह के उपरान्त उसका पुत्र जटिल परान्तक नेडुंजडैयन (वरगुण प्रथम ) पांड्य राजसिंहासन पर आसीन हुआ ।

वह पांड्य राज्य का शक्तिशाली और महान राजा हुआ ।वेलाविक्कुडि अभिलेखानुसार उसने पेण्णागडम्(तंजौर के क़रीब) के युद्ध में पल्लवराज नन्दिवरमन द्वितीय उनका साथ देने वाले नाट्टक्कुरूम्ब के राजा आयवेल की सेनाओं को पराजित किया । तगदूर(धर्मपुरी )के राजा अडिगैमान को युद्ध में पराजित किया तथा उसे बंदी बना कर रखा ।अंतत: तगदूर शासक ने उसकी अधीनता स्वीकार की ।वरगुण का विजयी अभियान जारी रहा ,उसने बेड़ाद राज्य परअधिकार कर लिया और कावेरी नदी के दक्षिण तट पर स्थित पेन्नागडम के युद्ध में उसने पल्लव नरेश नन्दि वरमन को हरा दिया ।उसकी शक्ति को रोकने के लिये पल्लव नरेश ने कोंगू केरल तथा अडिगैमान के साथ मिलकर वरगुण प्रथम पर आक्रमण किया ,पांड्य नृपति वरगुण प्रथम ने इन्हें पराजित किया औरपललव राज्य की सीमा में प्रवेश किया पल्लव शासित तोन्दईनाडु में पेन्नार नदी के अरशूर मैदान में अपना सैन्य शिविर स्थापित किया ।वरगुण प्रथम का शासन तिरुचिरापल्ली के आगे तंजोर ,सलेम, कोयम्बटूर प्रदेशों परऔर इसके संपूर्ण दक्षिणी भाग परहो गया ।

वरगुण प्रथम ने दक्षिण ट्रावणकोर स्थित वेणाड राज्य के सुदृढ़ क़िला बंद बंदरगाह विलिनम पर आक्रमण करके उस राज्य पर अपना शासन स्थापित किया ।

वरगुण प्रथम अपने समय का तमिल देश का प्रभावशाली और पराक्रमी राजा बन गया ।अपने शत्रुओं को पराजित करने के कारण उसने परान्तक उपाधि धारण की । वह विद्वानों कासंरक्षक और विद्यानुरागी था । वह पांड्य वंश का महान शासक था।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३१)

कोच्चाडैयन के बाद उसका पुत्र मारवरमन राजसिंह प्रथम राजा बना ,वो काफ़ी महत्तवाकांक्षी नरेश था ।उसने पल्लव राजगद्दी के लिये हो रहे संघर्ष में नन्दि वरमन के विरूद्ध उसके चचेरे भाई चित्रमाय का साथ दिया और नन्दि वरमन द्वितीय को नेडुवयल ,कुरूमडै ,कोडम्बलूर ,मण्णिकुरूच्चि तथा तिरूमंगई के युद्ध में हराया तथा नन्दि वरमन को बन्दी बना लिया ।

पल्लव नरेश के अति विश्वासपात्र सेनापति उदयचन्द्र की सेना ने मारवरमन राजसिंह प्रथम तथा पल्लव राजकुमार चित्रमाय की सेना को घेर लिया तथा राजकुमार चित्रमाय की हत्या कर के पल्लव नरेश के सिंहासन को सुरक्षित कर दिया और नन्दिवरमनको मुक्त करा कर राजसिंहासन पर आसीन कराया ।

परन्तु मारवरमन राजसिंह ने अपनी शक्ति एकत्र कर कावेरी नदी पार करके मलकोंगम’( तिरूचरापल्ली और तंजौर ‘ )क्षेत्र को जीत लिया, वहाँ के शासक मालवाराज ने पराजित हो जाने के बाद अपनी पुत्री का विवाह मारवरमन राजसिंह से करके मित्रता का सम्बन्ध स्थापित कर लिया ।

मारवरमनराजसिह ने गंग नरेश और चालुक्य नरेश पर भी विजय प्राप्त की ।

इस प्रकार उसने पांड्य राज्य की सीमा कावेरी नदी के दक्षिण में स्थित पांडिक्कौडमुडि क्षेत्र तक पहुँचा दी ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३०)

दक्षिण भारत के पांड्य राजवंश का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है ,सम्राट अशोक के अभिलेखों में पांड्य राजवंश का नाम है ।ईसा की छठी शती में पांड्यो को काफ़ी क्षति हुई थी परन्तु ५९० ई० में पांड्यों का नेतृत्व कुडुगौन नामक राजा ने किया था उसने पांड्य राजवंश को पुन: एक शक्तिशाली राज्य के रूप में स्थापित किया उसकी राजधानी मदुरै थी ।

कुंडुगौन को पांड्य राजवंश का महान राजा माना जाता है उसने पांड्यशक्ति को एकत्र कर अपने शत्रुओं को पराजित किया और तमिल देश में अपने राज्य की नींव रखी वह एक महान विजेता था ।

उसके बाद मार वरमन अवनिशूलमणि तथा शेन्दन (जयन्त वरमन ) राजा हुये ।उनके बारे अधिक जानकारी नहीं मिलती ।

६७० ई० में अरिकेशरि मार वरमन पांड्य राजाओं में महान योद्धा तथा सामर्थ्यवान शासक सिद्ध हुआ ।उसका विवाह एक चोल राजकुमारी से हुआ जो शिवभक्त थी ।राजकुमारी के आग्रह पर शैव सन्त सम्बन्दर मदुरै आये ,उनके प्रभाव से अरिकेशरि मारवरमन जो पहले जैन धर्म को मानने वाला था उसने प्रभावित होकर शैव धर्म को अपना लिया ।

अरिकेशरि मारवरमन ने केरल और अन्य पड़ोसी राज्यों को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया और अपने पड़ोसी राज्य पल्लवों के शत्रु वातापि के चालुक्यों के साथ मित्रता कर ली ।

अरिकेशरि के उपरान्त उसका पुत्र कौच्चाडैयन(रणधीर) ने राजसिंहासन प्राप्त किया वह भी अपने पिता की भाँति महान और शूरवीर था .उसने कोंगू प्रदेश जीतकर अपने राज्य में मिला लिया और चेरों और चोलो पर भी आधिपत्य जमा लिया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२९)

विक्रमादित्य षष्ठ के बाद उसका पुत्र सोमेश्वर तृतीय राजगद्दी पर बैठा ,वह कोमल स्वभाव का शान्तिप्रिय शासक था ।

सोमेश्वर तृतीय के शासन काल में होयसल नरेश विष्णु वर्धन ने बल पूर्वक चालुक्य राज्य के नोलम्बवाडी ,वनवासी तथा हंगल क्षेत्रों में अपनी सत्ता का विस्तार शुरू कर दिया ।

सोमेश्वर से चोल नरेश कुलोतुंग ने आन्ध्र प्रदेश को जीत लिया परन्तु चालुक्यो ने उसे पुन:प्राप्त कर लिया ।

सोमेश्वर विद्वान था तथाउसे शिल्प शास्रज्ञ भी कहा जाता है।

सोमेश्वर तृतीय के बाद उसका पुत्र जगदेवमल्ल राजा बना ,उसके शासन काल में भी कुछ सामन्तों ने विद्रोह किया और अपने को स्वतन्त्र मानने लगे परन्तु जगदेव मल्ल ने उनके विद्रोह का दमन किया । होयसल राजा विष्णु वर्धन ने राज्य विस्तार का कार्य जगदेव मल्ल के शासन में भी जारी रखा ।

जगदेव मल्ल का शासन काल ११३८ से११५१ ई० तक रहा ।

जगदेव मल्ल के बाद उसका छोटा भाई तैलप तृतीय राजा बना उसके समय में होयसल ,काकतीय ,कलचुरि तथा यादव वंशीय सामन्त काफ़ी शक्ति शाली हो गये थे ,उन्हें क़ाबू में रखना तैलप के लिये बहुत कठिन था । कलचुरि के सामन्त ने ११५७ ई० में चालुक्य राज्य पर अधिकार कर लिया । उसने और उसके वंशजों ने ११८१ तक राज्य किया । परन्तु तैलप तृतीय के पुत्र सोमेश्वर चतुर्थ ने तत्कालीन कलचुरि शासक आहवमल्ल को परास्त कर कल्याणी पर अधिकार कर लिया ।

उसने कुछ दिनों तक ही शासन किया तभी ११८९ ई० में यादव वंशी भिल्लम ने सोमेश्वर से उत्तरी चालुक्य प्रदेशों को जीत लिया ।उधर होयसल नरेश बल्लाल द्वितीय ने तथा काकतीय राजा रुद्र ने भी विद्रोहों और आक्रमण के फलस्वरूप ११८९ ई० में चालुक्य प्रदेशों को अपने अपने राज्य में मिला लिया ।

सोमेश्वर तथा उसके सेनापति ब्रह्म को बल्लाल द्वितीय ने कई लड़ाइयों में हराया ,अन्तिम लड़ाई ११९० ई० में हुई सोमेश्वर की हार के साथ चालुक्य राजवंश का अंत हो गया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२८)

जिस समय विक्रमादित्य षष्ठ चालुक्य राजगद्दी पर विराजमान हुआ उस समय उसका साला अधि राजेन्द्र चोल सिंहासन पर आसीन था ।

परन्तु चोलों ने विद्रोह करके अधि राजेन्द्र को राजगद्दी से उतार दिया और उसकी हत्या भी कर दी ।इस विद्रोह का मुख्य सरदार कुलोत्तुंग प्रथम था ,उसने राजगद्दी पर अधिकार कर लिया ।

कुलोत्तुंग ने अपने शासन काल के अंतिम वर्षों में विक्रम चोल को युवराज घोषित करने के लिये वेंगी राज्य से चोल राज्य बुलाया ,जिसका लाभ उठा कर विक्रमादित्य षष्ठ ने वेंगी राज्य पर क़ब्ज़ा कर लिया और अपने सेनानायक अनंतपाल को वहाँ का शासक नियुक्त किया उसने गंगवाडी और कोलार क्षेत्र को भी जीतकर अपने राज्य में मिला लिया ।

गंगवाडी पर उस समय होयसल नरेश विष्णु वर्धन का अधिकार था ,विक्रमादित्य षष्ठ ने विष्णु वर्धन को हराया और कदम्बों तथा पाण्ड्यों को भी पराजित किया । विक्रमादित्य ने लंका में भी अपने दूत भेजकर मैत्री सम्बन्ध स्थापित किये ।

उसका शासन लंबी अवधि तक रहा ।उसने अपने राज्य में विद्या और धर्म के प्रसार के लिये पाँच सौ तमिल ब्राह्मणों को बसाया और उनके भरण पोषण की भी व्यवस्था की ।

विल्हण कृत ‘विक्रमांक देव चरितम’ विक्रमादित्य के चरित्र पर लिखी गयी है ,इसमें १८ सर्ग हैं।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२७)

सोमेश्वर प्रथम की मृत्यु के उपरान्त उसका बड़ा पुत्र सोमेश्वर द्वितीय राजगद्दी पर बैठा ,उसने अपने छोटे भाई विक्रमादित्य षष्ठ को गंगवाडी प्रदेश का शासक बना दिया ।परन्तु विक्रमादित्य स्वयं राजगद्दी पाना चाहता था अत:उसने राजगद्दी पाने के लिये चोल नरेश वीर राजेन्द्र की पुत्री से विवाह किया ,वीर राजेन्द्र ने अपनी पुत्री के पति विक्रमादित्य षष्ठ को राजगद्दी दिलाने हेतु सोमेश्वर द्वितीय पर आक्रमण कर दिया और चालुक्य राज्य की गुटटी को घेरकर कम्पिलनगर को नष्ट कर दिया ।

परन्तु कुछ समय पश्चात सोमेश्वर द्वितीय ने वीर राजेन्द्र को दक्षिणी कर्नाटक के बाहर निकाल दिया ।

पर थोड़े समय बाद वीर राजेन्द्र की मृत्यु हो गयी जिससे विक्रमादित्य संकटों से घिर गया ,एक तरफ़ उस पर अपने भाई सोमेश्वर द्वितीय का दवाब और दूसरी ओर अपने साले अधि राजेन्द्र की राजगद्दी को सुरक्षित रखने का दवाब ।

वेंगी नरेश कुलोतुंग की सहायता लेकर सोमेश्वर द्वितीय ने विक्रमादित्य और उसके समर्थकों पर आक्रमण कर दिया दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ ।इस युद्ध में विक्रमादित्य की सेना ने सोमेश्वर द्वितीय को बंदी बना लिया । इस तरह विक्रमादित्य षष्ठ ने कल्याणी का राजसिंहासन प्राप्त किया अपने राज्याभिषेक के समय उसने चालुक्य विक्रम संवत नाम का नया संवत चलाया ।अपने भाई सोमेश्वर को उसने आजीवन बंदीगृह में ही रखा ।