तुम्हारी यादों से…

मौन होकर जब कोई प्रार्थना करती हूँ मैं

बंद आँखों में तुम्हारा चेहरा झाँकता है

और मेरी प्रार्थना, छिन्न भिन्न हो जाती है

निकल जाती हूँ ,उन सूनी पगडंडियों पर

फिरभी .तुम्हारी यादों से ,तन्हा नहीं होती

इन घने पेड़ों की छांव में लिख जाती हैं

हवायें ,मस्ती में धूप छांव से लम्हे मेरे दिल पर

सूनी राहों पर सूनी निगाहें

दर्द मुक़द्दर हो तो ,कोई क्या करे

गुज़र गये लम्हे ,जो ढूँढता है मन उन्हीं को

नज़र लौटती है उदास ,हैरान, परेशान सी

वो क्यूँ नहीं लौटता,

जिसका दिल को सदियों से इन्तज़ार है।

चन्द लम्हे…

कभी मिलना हो तो

एेसे न मिलना

कि इक अजनबी से मुलाक़ात हुई

चन्द लम्हे जिन्दगी से लेआना

फिर वक़्त मिले न मिले

जो भी शिकवे हो,शिकायत हो

मुहब्बत हो या अदावत हो

तन्हाई में गर लफ़्ज़ घायल भी हो तो

ग़ैरों की महफ़िल में चर्चा नहीं होगा

वो प्यार जो तुम भूल गये हो

सरेआम रुसवा नहीं होगा

अजनबी बन के न मिलना मुझको!

यादें…

याद आने की कोई वजह नहीं होती

अकसर यों ही चली आती हैं यादें

न खिड़की न दरवाज़ा

रूकती नहीं हैं

किसी के रोके

कभी मुस्कुराहट कभी छलकी हुई आँखें

बता देती हैं

कैसे हैं यादों के मौसम

भीगे हुए हैं या ख़ुशियों से भरे पल है

ये यादें बड़ी बेरहम भी होती हैं

दिल के ज़ख़्मों को

कुरेदती है

जब तक दिल ख़ून ख़ून न हो जाये

ख़ुशियों से भरी हों

दिल ग़म से भरा हो

यादें है बेसाख़्ता चली आती हैं

बिना वजह