आवारा…

घर से निकला तो कोई घर न रहा

मैं इधर का रहा न, उधर का रहा ।

यों तो कोई ग़म नही है जि़न्दगी में 

सीने में जो दिल है दुखता है,बेइन्तहा कभी कभी ।

खूँ में आग का लपलपाता हुआ जंगल है ,

आँखों का पानी भी कम है, इसे बुझाने में ।

वो जो राह भूला फिर न पलट के आया कभी 

मेरे तमाम ख़त बेपता खो गये। 

स्याह साया दरख्तों पर उतर आया है ,

रोशनी का कतरा भी कहीं नहीं ।

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