सौगात…

मैं जानता हूँ वस्ल की रात लम्बी न होगी

तुम चल दोगे मुझे हिज्र की सौगात देकर

चश्मे-पुर आब हो तो क्या,

होश में न हम हो तो क्या

मेरा अहद है तेरी राहों को

अपने दिल के लहू से सजाऊंगा मैं

बहुत फख्र था अपनी मुहब्बत पे हमें

ये न जाना था, जिसे दिलोजान से चाहा

उसे ही न पाऊँगा ,मैं।

 

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2 thoughts on “सौगात…

  1. बहुत फख्र था अपनी मुहब्बत पे हमें

    ये न जाना था, जिसे दिलोजान से चाहा

    उसे ही न पाऊँगा ,मैं—क्या बात बहुत उम्दा।👌👌👌

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