राब्ता-ए-मुहब्बत…

अपने जाने की वजह न बताया करो

राब्ता-ए-मुहब्बत हमें न समझाया करो

दिल तो नादान है ,समझेगा कैसे

मेरी वफाओं को न आजमाया करो ।

एक हम हैं और खा़ना-ए-वीरानी है

तन्हाइयों में इस तरह न आके सताया करो

इश्क के मराहिल में वो साथ थे

इस एक वहम के दरमियाँ तुम न आया करो ।

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