गमे मुहब्बत…

सदियों से मुन्तज़िर हैं,लम्हें हैं इन्तज़ार के

फ़िज़ाओं में घुली है तेरी यादों की महक

आये हैं मौसम बहार के,तेरे दीदार के


चश्मे-तर था मगर मेरा दामन दाग़दार न था

तू मेरी मुहब्बत तो क्या मेरी इक नज़र का भी रवादार न था


तू मेरी मुहब्बत में गिरफ़्तार हो,मैं बेवफ़ाई करूँ

जानता हूँ ये गुनाह है मगर इक बार तो करूँ


न वो मैं हूँ न वो तुम हो न वो क़ाफ़िले बहार के

मरे हुए ख़्वाब हैं सूखे हुये कुछ फूल है मज़ार के


तुमसे निभाने की कोई सूरत न हुई

हमसे तिजारत न हुई,तुमसे मुहब्बत न हुई।।

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