जुर्रत-ए-इल्तजा…

दर-हक़ीक़त मैं तेरे क़रीब रहना चाहता हूँ

मेरी सादगी देख मैं क्या चाहता हूँ

रात की सर्द फ़िज़ाओं में

तेरे ख़यालों का उजाला चाहता हूँ

शिकस्तें -मुहब्बत है मेरे हमदमफिर भी

तुझसे अहद-ए-वफ़ा चाहता हूँ

क्या जाने मेरे शब की सहर है कि नहीं

तेरी ख़ातिर ख़ुशनुमा सुबह चाहता हूँ

मुझको रंज नहीं आपकी अज़मत की क़सम

इक बार जुर्रत-ए-इल्तजा चाहता हूँ ।

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