ग़ुस्ताख़ नज़र …

ग़ुस्ताख़ नज़र तेरी दिल में उतर गई

कुछ कह न सके कहीं खो से गये हम

जबां खोली थी ज़रा हमने

कुछ कहने की आरज़ू थी

वो तेरी शोख़ -निगाहें

मुज्तरिब से होके रह गये

अल्ताफ़ हुआ उनका,होंठों पे तबस्सुम था

नज़रों से मिली नज़रें

दिल मेरा उनका घर हो गया

ये खाम-ख्याली भी दिल से निकल गयी

देंगे न किसी को दिल अपना कभी हम

वो इरादा जाने किधर गया।

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4 thoughts on “ग़ुस्ताख़ नज़र …

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