रस्में उल्फत…

अपनी कहानी भी कुछ अलग है यारब

मुहब्बत की भी तो रस्में उल्फत निभाई न गई

जो अज़ीज़ थे हमें जान से भी ज़्यादा

उन्होंने की दुश्मनी इस तरह ,दोस्ती हमसे निभाई न गई

जिनके लिये हम मज़हब औ ईमान थे

उसी ने किया दर ब दर इस तरह , कोई बस्ती हमसे बसाई न गई

दरमियाँ थे फ़ासले बहुत मगर

जो आग लगाई ग़ैरों ने हमसे वोबुझाई न गई

कोई रियायत न की आपने और ज़माने ने

इश्क़ ने जो क़ीमत माँगी हमसे चुकाई न गई ।

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2 thoughts on “रस्में उल्फत…

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