इक शाम…

तेरे नाम से जो लगावट सी लगती है

तू न समझे तो क्या

मुझे तो मुहब्बत ही लगती है

चले आओ एक अहसान ही कर दो

मेरे नाम अपनी इक शाम ही कर दो ।

अहसास -ए-ग़म से मैं किनारा कर लूँ

जो तुम मुहब्बत का एहतराम कर लो

मर जाऊँगा यक़ीनन ख़ुशी से मैं

मिलने का वादा जो एक शाम कर दो

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