इतिहास के दस्तावेज़…(1)

पिछले दिनों ख़बर आई थी कि इंग्लैंड की प्रधानमंत्री ने जलियाँवाला वाले हादसे पर अफ़सोस जताया है पर उस दर्दनाक घटना की माफ़ी नहीं माँगी ।ये घटना अंग्रेज़ों के लिये बदनुमा दाग है जो माफ़ी माँगने से भी धुलने वाला नहीं है ।

जिस तरह से उन्होंने भारत को न सिर्फ़ बुरी तरह लूटा बल्कि यहाँ के लोगों पर तरह तरह से ज़ुल्म भी किये |

पर आरम्भ में ऐसा करने की उनकी हिम्मत नहीं थी जब मुग़ल राज था और काफ़ी ताक़तवर था फिरभी ये लोग अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आते थे ,समुद्र डकैती करते थे ,और मुग़ल सरकार के हाथों दंड के भागी बनते थे शाहजहाँ के समय में भारतीय समुद्र में डकैती के कारण सूरत के सारे अंग्रेज़ गिरफ़्तार कर लिये गये थे और उन्हें काफ़ी हर्ज़ाना देने पर मुक्त किया गया था ।

इसी प्रकार १६८६ में जाब चारनाक के नेतृत्व में इन अंग्रेज़ों ने हुगली बंदरगाह पर लूट की थी तब औरंगज़ेब ने इन सब को गिरफ़्तार कर लिया था और भारी जुर्माना लेकर छोड़ा ।

१६९५ में मक्का से वापस आने वाले गंजेसवाई नामक जहाज़ को अंग्रेज़ों ने लूटा और स्त्रियों से दुर्व्यवहार किया ।इस पर औरंगज़ेब बेहद नाराज़ हुआ उसने सारे अंग्रेज़ों को गिरफ़्तार कर लिया ।उनका व्यापार बंद कर दिया ,और उनके सब हथियार छीन लिये गये ,उनकी तोपों के चबूतरे तोड दिये गये ,गिरजाघरों में घण्टों का बजना बंद करवा दिया गया ।

अगले साल जब अंग्रेज़ों ने हज के लिये जाने वाले जहाज़ों की रक्षा का क़रार किया ,वो भी लिखित में तभी उन्हें मुक्त किया गया ।

उस समय तक अंग्रेज़ों की इतनी सामर्थ्य नहीं थी कि वे भारत के माल के बराबर की क़ीमत का माल दे सकें इसलिये उन्हें अपने पास से सोना चाँदी देना पड़ता था,पर उन्हें इस तरह व्यापार पसन्द नहीं आता था पर उस वक़्त तक लूटमार करने की हिम्मत नहीं कर सकते थे |

पलासी के युद्ध (१७५७)की विजय के बाद अंग्रेज़ों के लिये लूट का रास्ता खुल गया ,इन लोगों ने

यहाँ के राजाओं और नवाबों की आपसी फूट का फ़ायदा

उठाया ,उन्हें आपस में लड़ाया और अपना मतलब निकाला ।

इस तरह यहाँ इन अंग्रेज़ों ने यहाँ अपने पैर ज़माने शुरू कर दिये और यहां के शासक बन बैठे ।

इसका परिणाम ये हुआ कि विदेश में भारतीय माल का निर्यात कम होने लगा। १८०१ में भारत से अमेरिका

१३,६३३ गाँठ कपड़ा जाता था ।१८२९ में कम होकर २५८ गाँठ रह गया ।१८०० तक भारत से प्रति वर्ष लगभग १४५०गांठ कपड़ा डेनमार्क जाता था ।१८२० में १२० गाँठ रह गया ।पुर्तगाल अरब फ़ारस और खाड़ी के आसपास के देशों में भी भारतीय कपड़ा जाता था ।पर धीरे धीरे ये कम बहुत कम हो गया और १८२५ के बाद २००० गाँठ से ज़्यादा कपड़ा नहीं भेजा गया ।

इस तरह इनकी लूट का सिलसिला बढ़ता ही गया और अंग्रेज़ सौदागर हिन्दुस्तान का माल ख़रीदने के बजाय हिन्दुस्तान से ही रूपया लूटने लगे ।

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