दक्षिण भारतीय इतिहास…(१)

भारत का दक्षिणी भाग तमिलकम प्रदेश कहलाता था ये कृष्णा और तुंगभदरा नदियों के बीच स्थित है ,लगभग ५००ई० पूर्व चेर ,चोल और पाण्डय राज्य विशेष रूप से जाने जाते थे ।हाथीगुम्फा अभिलेख के अनुसार कलिंग नरेश खारवेल ने अपने शासन के ग्यारवें वर्ष में (१६५ई०पू ०) में तमिल राज्यों के प्राचीन संघ (त्रमिरदेश संघातकम) को नष्ट किया था ।

तमिल देश के इतिहास की जानकारी संगम साहित्य से मिलती है ,संगम या संघम प्राचीन तमिल शब्द है। संगम तमिल कवियों तथा विद्वानों की व्यवस्थित परिषद थीं इन परिषद यासंगम का गठन पाण्डय राजाओं के राज्यकाल में किया गया था।

संगम से संबंधित कवियों और विद्वानों का सम्मान समय -समय पर पाण्डय राजा किया करतेथे ,जिसमें बड़ी मात्रा में उपहार प्रदान किया जाता था ।

चोल शासक करिकाल ने एक कवि को

१६,००,००० स्वर्ण मुद्रायें प्रदान की थी ,रत्न और स्वर्ण मुद्राओं के अलावा शासकगण विद्वानों को भूखण्ड, अश्व, हाथी और रथ भी उपहार स्वरूप दिया करते थे ।

संगम साहित्य मुख्य रूप से नौ संग्रह ग्रंथों में मिलता है ।

संगम साहित्य का प्रारंभिक विकास ईसा की प्रथम शती से तृतीय शती तक माना जा सकता है ।

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