दक्षिण भारतीय इतिहास…(५)

३५० ई० के लगभग कुन्तल प्रदेश (कर्नाटक प्रान्त ) में कदम्ब राजवंश का उदय हुआ कदम्ब राजवंश मूलत: ब्राह्मण थे पर जब वे राजा बन गये तो अपनेको क्षत्रिय मानने लगे

तालगुंड प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि मयूरशरमन ने जो ब्राह्मणोचित करमों का निष्ठापूर्वक पालन करता था वेदाध्ययन के लिये पल्लवों की राजधानी काँची के वैदिक विद्या केन्द्र मे प्रवेश लिया संयोगवश एक दिन एक पल्लव घुड़सवार सैनिक ने उसे अपमानित किया न्याय के लिये जब वो पल्लव नरेश के पास गया तो उन्होंने अपने सैनिक का पक्ष लेते हुये उसे भगा दिया

क्रोधित मयूरशरमन काँची से कुन्तल लौट आया और ख़ुद का राज्य स्थापित करने के लिये तलवार धारण कर ली उसने अपना अभियान पल्लव सीमारक्षको के विरूद्ध चलाया और श्री पर्वत (करनूल जनपद आन्ध्र प्रदेश काश्री शैलम) के पठारी जंगली क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया

चौथी शती के मध्य मे उसने कुन्तल के बनवासी को राजधानी बनाया और शासन शुरू किया श्री पर्वत क्षेत्र में रहकर धीरे धीरे शक्तिशाली सेना तैयार कर ली और अनेक पड़ोसी सामन्त शासकों को जीतकर धन संग्रह कर लिया उसके शक्ति विस्तार को देखते हुये पल्लव नरेश ने उसे राजमुकुट भेंट किया मयूरशरमन ने पल्लव नरेश के विश्वासपात्र सामन्त के रूप शासन करना स्वीकार करलिया वो एक शक्तिशाली राजा के रूप मे प्रतिष्ठित हो गया

मयूरशरमन के बाद उसका पुत्र कंगवरमन कदम्ब शासक हुआ उसने अपने नाम के आगे शरमन हटा कर वरमन लिखवाना शुरू किया मयूरशरमन के बाद कदम्ब शासक अपने को क्षत्रिय कहलाना पसंद करते थे

कंगवरमन के पश्चात उसका पुत्र भगीरथ ने राज्य सिंहासन प्राप्त किया उसके साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने के लिये गुप्त सम्राट चन्द्र गुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने महाकवि कालिदास को अपना राजदूत बना कर कर्नाटक भेजा अपने लक्ष्य मे कालिदास ने पूर्ण सफलता प्राप्त की और कदम्ब नरेश ने अपनी पुत्री का विवाह कुमारगु्प्त से करके मैत्री संम्बध को वैवाहिक संम्बंध मे परिणत कर दिया

भगीरथ के पश्चात जब उसका ज्येष्ठ पुत्र रघु गद्दी पर बैठा तो अपने अनुज काकुस्थवरमन को युवराज बनाया वह प्रजा पालक शत्रुओं का दमन करने वाला कहा गया उसका शासन ४३० ई० तक रहा

रघु के बाद काकुस्थवरमन ने राजगद्दी प्राप्त की तालगुंड अभिलेख में उसे राजाओं मे सूर्य कदम्ब कुल का अलंकार महान विजेता यशस्वी प्रजा पालक कहा गया है

काकुस्थवरमन का तत्कालीन भारतीय राजवंशों में बड़ा सम्मान था उसकी बहन का विवाह कुमारगुप्त से पहले ही हो चुका था उसकी चार पुत्रियों का विवाह भी एक पुत्री का विवाह वाकाटक के शासक नरेन्द्र सेन से दूसरी का विवाह आलुप नरेश पशुपति के साथ तीसरी पुत्री काविवाह गंग शासक माधव द्वितीय के साथ और चौथी पुत्री काविवाह गुप्त वंश के राजकुमार के साथ हुआ था

इन सम्बन्धों के चलते काकुस्थवरमन की स्थिति काफ़ी मज़बूत थी उसने ४५०ई० तक शासन किया ।

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8 thoughts on “दक्षिण भारतीय इतिहास…(५)

  1. दक्षिण भारत का इतिहास से अवगत कराने के लिए बहुत बहुत आभार। कितना गौरवशाली है इतिहास हमारा।

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  2. आपने पढ़ा और शोध किया है। अतः कृपया एक लेख में सारे राजवंशों का निचोड़ संक्षेप में लिखने का प्रयास करेंगे। जैसे चोल,चालुक्य—-इत्यादि।

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  3. हमे भी अपनी “भारत गाथा” में दक्षिण के राजवंशों को शामिल कर अपने लेखनी को सजाने की अभिलाषा है। सभी के लेखों को पढ़ रहा हूँ।

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