दक्षिण भारतीय इतिहास…(६)

काकुस्थवरमन के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र शान्तिवरमन राजा बना उसे कदम्ब कुल का द्वितीय सूर्य कहा गया है ।शान्तिवरमन पराक्रमी होने के साथ साथ महादानी उदार और साहित्य एवं कला का संरक्षक था ।४७५ ई० में उसकी मृत्यु के पश्चात उसका बड़ा पुत्र मृगेशवरमन अथवा विजयशिवमृगेशवरमन शासक बना ।उसने अपने राज्य कदम्ब साम्राज्य का दक्षिणी भाग अपने अनुज कृष्णवरमन को दे दिया ,कृष्ण वर्मन ने त्रि पर्वत को अपनी राजधानी बना कर स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली ।

मृगेशवरमन पराक्रमी तथा उदार शासक था ।उसकी न्यायप्रियता के कारण उसकी तुलना युधिष्ठिर से गयी है उसका शासन ४९० ई० तक रहा ।

उसके पुत्र रविवरमन को अपने पराक्रम पौरुष के बल पर राजसिंहासन हासिल करना पड़ा उसे कई प्रतिद्वंद्वियों के साथ युद्ध करना पड़ा ,उसके शत्रुओं में पल्लवों के साथ त्रिपरवत के कदम्ब भी जुड़ गये ।

कदम्ब के अभिलेखों से पता चलता है ,उसने काँची शासक चण्ड दणडेश को युद्ध में मार दिया और कदम्ब शासक विष्णु वर्मन को भी पराजित किया ।

रविवरमन पराक्रमी शासक था ।उसके राज्य की सीमा उत्तर में नर्मदा नदी तक फैली थी वह एक सफल शासक प्रजा पालक ,महादानी ,साहित्य कला एवं धर्म का संरक्षक था ।

रविवरमन के बाद उसका पुत्र हरिवरमन बनवासी कदम्ब का राजा बना परन्तु वह एक निर्बल राजा सिद्ध हुआ ।तथा कदम्ब राजवंश का अंतिम राजा हुआ ,उसकी मृत्यु के पश्चात त्रि पर्वत के कदम्ब शासकों ने बनवासी के राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया ।

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