दक्षिण भारतीय इतिहास…(९)

पुलकेशिन द्वितीय की बढ़ती प्रसिद्धि और उत्तर में हर्ष वर्धन की शक्ति से भयभीत गुर्जर राज्य के दद्द द्वितीय ने भी पुलकेशिन द्वितीय का आधिपत्य स्वीकार कर लिया

जब हर्ष ने अपनी विशाल सेना के साथ दक्षिण पर हमला किया तो पुलकेशिन द्वितीय ने आगे बढ़कर उसका सामना किया और नर्मदा के तट पर हर्ष को बुरी तरह पराजित किया । हर्ष को पराजित करने के उपरान्त उसने परमेश्वर की उपाधि धारण की ।

पुलकेशिन द्वितीय ने अपने अनुज विष्णु वर्धन को

युवराज बनाया और राज्य की रक्षा का भार उसे सौंपकर

स्वयं विजयअभियान के लिये निकल पड़ा ।कोसल और कलिंग ने उसका आधिपत्य स्वीकार कर लिया ।तत्पश्चात गंग राज्य को भी उसने पराजित किया ।

पुलकेशिन द्वितीय की विजयी सेना ने आन्ध्र की राजधानी पिष्ठापुर (वर्तमान में पीठापुरम )पर भी अधिकार कर लिया ।

पुलकेशिन ने शक्तिशाली आन्ध्रों पर अधिकार करने के बाद अपने अनुज विष्णु वर्धन को आन्ध्र राज्य का शासक बना दिया ।

साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा से पूर्ण पुलकेशिन द्वितीय ने पल्लव राज्य पर आक्रमण कर दिया जिसमें उसे पूर्ण सफलता तो न मिली परन्तु पल्लव राज्य के उत्तरी क्षेत्रों पर अपना अधिकार कर लिया

पल्लवों और चालुक्य वंश का लम्बे समय तक चलने वाला संघर्ष यही से प्रारंभ हुआ ।

चोल ,पांडय तथा केरल के साथ उसके मैत्री संबंध रहे ।

पुलकेशिन द्वितीय ने एक बार फिर पल्लव राज्य पर आक्रमण किया ,परन्तु इस बार सिंहासन पर महेन्द्र वरमन का पुत्र नरसिंह वरमन विराजमान था ।अपना अभियान पुलकेशिन द्वितीय ने पल्लवों के सामन्त रायलसीमा पर शासन करने वाले बाण लोगों से शुरू किया और एक बार फिर पल्लवों की राजधानी के लिये ख़तरा उत्पन्न हो गया ।

श्रीलंका का राजकुमार मान वर्मा पल्लव राजा नरसिंह वरमन का मित्र था ,उसने योग्यता पूर्वक पल्लव राजा की सहायता की ।

पुलकेशिन द्वितीय को इसबार असफलता का मुँह देखना पड़ा ,अपनी सफलता से ख़ुश होकर पल्लव राज नरसिंह वरमन ने चालुक्य राज्य पर आक्रमण किया और राजधानी वातापि (बादामी ) पर तथा दुर्ग पर अधिकार कर लिया ।

इस युद्ध मे पुलकेशिन द्वितीय लड़ता हुआ मारा गया ।

इस बात की जानकारी वातापि (बादामी ) मे मल्लिका अर्जुन देव मंदिर के पीछे एक चट्टान पर खुदे अभिलेख से भी होती है ।

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