दक्षिण भारतीय इतिहास…(१४)

कृष्ण प्रथम की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र युवराज गोविंद द्वितीय ७७३ई० में राजगद्दी पर आसीन हुआ ।युवराज रहते हुये गोविंद ने चालुक्यों के विरुद्ध युद्ध मे विजय प्राप्त करके अपनी योग्यता का परिचय दिया था गोविंद ने अपने भाई ध्रुव को खानदेश का शासक बनाया

ध्रुव अत्यन्त योग्य और महत्वाकांक्षी था , गोविंद ने उसकी योग्यता देख कर शासन का समस्त भार उसे सौंप दिया ।धीरे-धीरे राजकाज पर उसका सम्पूर्ण नियंत्रण हो गया ,वह राजा की भाँति व्यवहार करने लगा ।

ध्रुव का यह व्यवहार गोविन्द को अच्छा नहीं लगा फलत:उसने राज्य की बागडोर पुन: अपने हाथ में ले ली

क्रोधित ध्रुव ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया ।

विद्रोह को दबाने के लिये गोविन्द द्वितीय ने गंगवाडी ,

वेंगी ,मालवा तथा काँची की सहायता ली ।

परन्तु ध्रुव ने सबको परास्त कर राजगद्दी पर अधिकार कर लिया ।अब उसने उन राज्यों को सबक़ सिखाने के लिये ‘जिन्होंने उसके विरुद्ध गोविंद द्वितीय का साथ दिया था ‘युदध अभियान शुरु किया ।

पहला आक्रमण उसने गंगवाडी पर किया ,गंगवाडी नरेश के युवराज पुत्र शिवकुमार द्वितीय ने ध्रुव का सामना बड़ी वीरता के साथ किया परन्तु ध्रुव ने उसे पराजित कर बंदी बना लिया और गंगवाडी राज्य को अपने राज्य मे मिला लिया ।

इसके पश्चात पल्लव राज्य पर आक्रमण किया पल्लव भी ध्रुव के समक्ष टिक न सके ,उन्होंने ध्रुव को उपहार आदि भेंट किये और ध्रुव से संधि कर ली ।

तत्पश्चात वेंगी राज्य ने भी ध्रुव की अधीनता स्वीकार कर ली ।

अपने पराक्रम के और योग्यता के बल पर वह दक्षिण भारत का शक्तिशाली और प्रभाव शाली शासक बन गया ।

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