दक्षिण भारतीय इतिहास…(२०)

इन्द्र तृतीय के पश्चात उसका पुत्र अमोघ वर्ष द्वितीय ने राजसिंहासन प्राप्त किया ,परन्तु अपने अनुज की महत्वाकांक्षा ने उसे अधिक समय तक राज्य नहीं करने दिया ।कम उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गयी तत्पश्चात गोविन्द चतुर्थ ने राजगद्दी सँभाली ।

परन्तु गोविन्द निरंकुश और विलास प्रिय था अत:वह भी अधिक समय तक सिंहासन पर बना नहीं रह सका शासन पर उसकी पकड़ ढीली पड़ने लगी जिसका लाभ प्रतिहार राजा महीपाल ने उठाया और कान्यकुब्ज (कन्नौज ) परअधिकार कर लिया तथा वेंगी के शासक को जिसे इन्द्र तृतीय ने गद्दी पर बैठाया था को हटा कर भीम तृतीय ने राजगद्दी छीन ली ।

गोविंद चतुर्थ केसमय में शासन व्यवस्था बिगड़ने लगी उसके अधीन कई राजा स्वतंत्र हो गये । उसके अधीनस्थ राजाओं ने मिल कर उसे राजगद्दी से उतारकर उसके चाचा इन्द्र तृतीय के सौतेले भाई अमोघ वर्ष तृतीय को राजगद्दी पर बैठा दिया ।

अमोघ वर्ष तृतीय उदार तथा सुशील राजा था उसने अपने पुत्र कृष्ण तृतीय को युवराज बना कर शासन का अधिकांश भार उसे सौंप दिया ।

अमोघ वर्ष ने अपनी पुत्री का विवाह गंगनरेश बूतुग द्वितीय से कर दिया ।बूतुग को गंगवाडी का सिंहासन युवराज कृष्ण तृतीय की सहायता से प्राप्त हुआ .युवराज ने गंगो पर आक्रमण कर वहाँ के राजा राज मल्ल तृतीय को मार कर अपने बहनोई को सिहासन दिलाया ।

अपने पिता की मृत्यु के बाद कृष्ण तृतीय राजा बना

प्रारंभिक वर्षों में उसने अपने राज्य की आन्तरिक स्थिति को सुदृढ़ किया तत्पश्चात अपने बहनोई बूतुग द्वितीय के साथ मिलकर उसने चोल राज्य पर आक्रमण किया ,तक्कोलम में उनका निर्णायक युद्ध हुआ बूतुग ने हाथी पर बैठे चोल युवराज राजादित्य की तीर चला कर जान ले ली , चोंलों से काँची और तंजौर ले लिया ,चोल इस युद्ध में बुरी तरह पराजित हुये ।

दक्षिणी समुद्र तट पर उसने विजय स्तम्भ का निर्माण कराया तथा काल प्रिय गंड मारत्तण्ड तथा कृष्णेश्वर के मन्दिरों का भी निर्माण करवाया जिनके व्यय हेतु कई ग्रामों का दान भी किया ।

कृष्ण तृतीय ने वेंगी के वैध उत्तराधिकारी अम्म द्वितीय को हटाकर वाडप को सिंहासन पर बैठाया ।

९६०ई० के आसपास वह दक्षिण भारतीय विजय अभियान के बाद अपने राज्य वापस लौट आया , परन्तु इसी बीच दुर्भाग्य वश उसके बहनोई बूतुग द्वितीय की मृत्यु हो गई , अब बूतुग के पुत्र मारसिंह सिंहासन पर बैठा वह अपने मामा कृष्ण तृतीय के प्रति पूर्ण समर्पित था । उसने अपने पिता की भाँति कृष्ण तृतीय को उत्तर भारत के विजयी अभियान में भाग लिया ।

कृष्ण तृतीय ने अपने शासन काल में राष्ट्र कूटों संगठित किया ।उसे कई अभिलेखों में संपूर्ण भारत काविजेता कहा गया है ।

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