दक्षिण भारतीय इतिहास…(२२)

कर्क द्वितीय अपने क्रूर स्वभाव और अक्षमता के कारण स्वयं अपने विनाश का कारण बना ।तैलप द्वितीय ने कर्क को पराजित कर संपूर्ण राज्य पर अधिकार कर लिया ,वह एक दक्ष सेनापति और राजकाज में अत्यन्त कुशल था ।उसने कल्याणी में एक नये चालुक्य वंश की नींव डाली ।

चालुक्य शासकों के अभिलेख मे वातापि के विक्रमादित्य द्वितीय के भाई भीम को कल्याणी के चालुक्य वंश का संस्थापक कहा गया है ।कल्याणी के विक्रमादित्य चतुर्थ (जो भीम का वंशज था ) के पुत्र तैलप द्वितीय को मान्यखेट के राष्ट्र कूट राजवंश को पराजित कर कल्याणी में चालुक्य राजवंश को स्थापित करने वाला माना जाता है ।

सिंहासन प्राप्त करने के बाद तैलप द्वितीय ने साम्राज्य विस्तार शुरू किया ,उसका मुख्य विरोधी गंगनरेश पाँचाल देव था जिसने अपनेराज्य की सीमा कृष्णा नदी तक फैला रखी थी ।तैलप ने उस पर कई बार आक्रमण किया परन्तु सफल न हो सका ।तब वेल्लारी के शासक गंग भूतिदेव ने तैलप की सहायता की ,गंगनरेश युद्ध मे मारा गया और तैलप विजयी हुआ ।गंगराज्य पर विजय के बाद तैलप द्वितीय के राज्य की सीमा कर्नाटक तर विस्तृत हो गयी ।

९७७ई० में तैलप द्वितीय ने कर्क द्वितीय के सहायता करने वाले रणस्तम्भ पर विजय प्राप्त की और ९८० में उत्तम चोल को पराजित किया ।लाट राज्य को जीतकर अपने सेनापति को वहाँ का सामन्त बनाया ।

मालवा के परमार शासक मुंज पर तैलप द्वितीय ने कई आक्रमण किये पर सफल न हो सका ।परन्तु मुंज नेअपने महामंत्री की सलाह न मान कर गोदावरी नदी पार कर तैलप द्वितीय पर आक्रमण किया और पराजित होकर तैलप द्वितीय का बन्दी बना ।

तैलप ने उसे तरह-तरह से अपमानित कर अन्त में मृत्यु के घाट उतार दिया ।

तैलप द्वितीय ने चालुक्य वंश को पुन: प्रतिष्ठित किया ।उसने लगभग पच्चीस वर्षों तक शासन किया , दक्षिण की कुछ कहानियों मे उसे भगवान कृष्ण का अवतार भी माना जाता है ।

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