दक्षिण भारतीय इतिहास…(२४)

सत्याश्रय के बाद उसके अनुज दश वरमन का पुत्र विक्रमादित्य पंचम १००८ में राजगद्दी पर बैठा ,परन्तु वह सिर्फ़ १०१५ तक ही सिंहासन पर रहा ।

१०१५ में जयसिंह द्वितीय राजगद्दी पर आसीन हुआ उसे कई युद्ध करने पड़े ।मालवा के परमार शासक भोज ने मुंज का बदला लेने के लिये चालुक्य राज्य पर आक्रमण किया और कोंकण के कुछ हिस्सों को अपने अधिकार मे कर लिया ,परन्तु जयसिंह द्वितीय ने अपने आधीन राजाओं की सहायता से भोज द्वारा अधिकृत क्षेत्रों को मुक्त करा लिया ।

राजेन्द्र चोल ने चालुक्य शासित मुशंग क्षेत्र के युद्ध में जयसिंह को परास्त कर रट्टपाडि प्रदेश पर अधिकार कर लिया ।

परन्तु चालुक्य अभिलेखों के अनुसार जयसिंह द्वितीय ने राजेन्द्र चोल को तुंगभदरा के आगे गंगवाडी तक पीछे हटा दिया ।

राजेन्द्र चोल ने अपने दूसरे अभियान में जयसिंह को मस्की के युद्ध में पराजित किया परन्तु उसने अपना आक्रमण आगे न बढ़ा कर तुंग भद्रा नदी को ही दोनों राज्यों की सीमारेखा मान लिया गया ।

जयसिंह द्वितीय के पश्चात उसका पुत्र सोमेश्वर प्रथम राजगद्दी पर आसीन हुआ ,उसने अपनी राजधानी मान्यखेट से हटाकर कल्याणी नगर को बनाया ।कल्याणी को हर तरह से सुविधा सम्पन्न बना कर भव्य भवनों और मंदिरों से सजाया ।

अपने पिता की तरह उसने भी मालवा के भोज के विरुद्ध युद्ध जारी रखा और उसकी राजधानी धारा नगरी पर अधिकार कर लिया ।

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