दक्षिण भारतीय इतिहास…(३०)

दक्षिण भारत के पांड्य राजवंश का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है ,सम्राट अशोक के अभिलेखों में पांड्य राजवंश का नाम है ।ईसा की छठी शती में पांड्यो को काफ़ी क्षति हुई थी परन्तु ५९० ई० में पांड्यों का नेतृत्व कुडुगौन नामक राजा ने किया था उसने पांड्य राजवंश को पुन: एक शक्तिशाली राज्य के रूप में स्थापित किया उसकी राजधानी मदुरै थी ।

कुंडुगौन को पांड्य राजवंश का महान राजा माना जाता है उसने पांड्यशक्ति को एकत्र कर अपने शत्रुओं को पराजित किया और तमिल देश में अपने राज्य की नींव रखी वह एक महान विजेता था ।

उसके बाद मार वरमन अवनिशूलमणि तथा शेन्दन (जयन्त वरमन ) राजा हुये ।उनके बारे अधिक जानकारी नहीं मिलती ।

६७० ई० में अरिकेशरि मार वरमन पांड्य राजाओं में महान योद्धा तथा सामर्थ्यवान शासक सिद्ध हुआ ।उसका विवाह एक चोल राजकुमारी से हुआ जो शिवभक्त थी ।राजकुमारी के आग्रह पर शैव सन्त सम्बन्दर मदुरै आये ,उनके प्रभाव से अरिकेशरि मारवरमन जो पहले जैन धर्म को मानने वाला था उसने प्रभावित होकर शैव धर्म को अपना लिया ।

अरिकेशरि मारवरमन ने केरल और अन्य पड़ोसी राज्यों को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया और अपने पड़ोसी राज्य पल्लवों के शत्रु वातापि के चालुक्यों के साथ मित्रता कर ली ।

अरिकेशरि के उपरान्त उसका पुत्र कौच्चाडैयन(रणधीर) ने राजसिंहासन प्राप्त किया वह भी अपने पिता की भाँति महान और शूरवीर था .उसने कोंगू प्रदेश जीतकर अपने राज्य में मिला लिया और चेरों और चोलो पर भी आधिपत्य जमा लिया ।

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