श्री गणेश🏵️🏵️🏵️

भाद्रपक्ष महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी गणपति भगवान का प्रिय दिवस है ,इस दिन गणपति भगवान की मूर्तियां सजाई जाती हैं ।गणपति सभी कार्यों प्रथम पूज्य हैं ,शुभ कामों में प्रथम निमंत्रण गणपति को दिया जाता है।
इनके जन्म से जुड़ी कई कथाएं हैं,ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार पार्वती के पुत्र जन्म के अवसर पर देवताओं के साथ शनि देव भी आये,उनकी दृष्टि जब पार्वती पुत्र पर पड़ी तो पुत्र का मस्तक कट कर धड़ से अलग हो गया ।शनिदेव को शाप था कि उनकी दृष्टि जिस पर भी पड़ेगी उसका मस्तक कट जाये गा ।यह देख कर पार्वती अत्यन्त दुखी हो गई तब भगवान विष्णु ने एक शिशु हाथी का सिर जोड़कर पार्वती पुत्र को जीवित कर दिया ।
मत्स्य पुराण के अनुसार पार्वती ने अपने अंगलेप से एक पुतले का निर्माण किया जिसका सिर गज का जैसा था ,गंगाजल से अभिषेक करते ही वह प्राणवान हो गया । पार्वती और गंगा दोनों ने ही उसे अपना पुत्र माना ।
शिव पुराण के अनुसार पार्वती ने स्नान करते समय उबटन से एक मानवाकृति बनाई और उसे किसी को भी अंदर न आने देने को कहा ,तभी शिव वहाँ आये बालक ने उन्हें न पहचानते हुये अंदर जाने से रोक दिया ।परिणाम स्वरूप दोनों में युद्ध हुआ और शिव ने बालक का सिर काट दिया जब पार्वती जी आयीं तो यह देखकर दुख से भर गयीं। शिव जी को जब पूरी बात का पता चला तो उन्होंने एक हाथी का सिर जोड़कर बालक को जीवन प्रदान किया।
गणपति संभव के अनुसार शिवजी के डमरू की ध्वनि से गणपति ने सम्पूर्ण वेदों को अपनाया, पार्वती के नूपुरों की झंकार से संगीत सीखा और शिव के तांडव दर्शन से नृत्य सीखा ।
माना जाता है जब व्यास ने महाभारत की रचना की तो महाभारत कोगणपति भगवान ने लिखा है,उन्होंने कहा कि लिखना शुरू करने के बाद रुकेगें नहीं ,इसपर व्यासजी ने कहा ,मैं जो भी कहूँगा आप उसका अर्थ समझ कर ही लिखें ।इस प्रकार महाभारत पूरी हुई।
गणपति जी गजबदन,सिन्दूर के समान रक्तवर्ण, त्रिनेत्र ,स्थूलकाय तथा चर्तुभुज हैं चारों हाथों में दंत ,अकुंश, पाश और वरमुद्रा हैं। मूषक उनका वाहन है,वे समस्त कार्यों मे प्रथम पूज्य हैं,विघ्न बाधाओं के विनाशक और मोदक प्रिय हैं ।
इनकी पत्नियों के नाम ऋद्धि और सिद्धि हैं ।ऋद्धि के पुत्र का नाम क्षेम तथा सिद्धि के पुत्र का नाम लाभ है ।

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