दक्षिण भारतीय इतिहास…(४०)

राजेंद्र चोल को 1014 में चोल राज्य का सिहांसन प्राप्त हुआ ,वह अपने पिता की तरह वीर ,महत्वाकांक्षी, कूटनीतिज्ञ था ।सिहांसन पर आरूढ़ होने के पश्चात राजेंद्र चोल ने केरल के विद्रोह को कुचल दिया और उन्हें परास्त कर अपने आधीन कर लिया।
चोल अभिलेख के अनुसार राजेंद्र चोल ने सिंहल राज्य पर आक्रमण कर सिंहल राज्य को अपने चोल साम्राज्य में मिला लिया औरसिंहल के शासक को बंदी बनाकर बारह वर्ष तक बंदीगृह में रखा बंदीगृह मेंही उसकी मृत्यु हो गई ।राजेंद्र चोल ने अपने पुत्र विक्रम चोल को उत्तरी पूर्व राज्यों की विजय अभियान के लिए, उसके नेतृत्व में विशाल सेना को भेजा ,विक्रम चोल ने कलिंग(उड़ीसा)बस्तर इन्द्ररथ तथा दक्षिणी कोसल आदि राज्यों को विजित किया और दंडभुक्ति केशासक धर्म पाल,दक्षिणी राठ के राजा रणसूर,पूर्व बंगाल के राजा गोविंद चन्द्र तथा पाल राज्य के शासक महीपाल के विरुद्ध युद्ध में सफलता प्राप्त की।विजय प्राप्ति के उपरांत विक्रम चोल ने गंगा में स्नान किया।
अपने शासनकाल के प्रारंभ में ही राजेंद्र प्रथम ने अपने पुत्र राजाधिराज को युवराज बना दिया था।
तिरुवालंगाडु ताम्रपत्र के अनुसार राजेंद्र नेअपनी विशाल जल सेना की सहायता से समुद्र पार कर कटाह राज्य को जीत लिया और वहां के राजा को बंदी बनाया, परन्तु कटाह राजा ने अपनी मुक्ति की याचना करते हुयेचोल नरेश की अधीनता स्वीकार कर ली,राजेंद्र चोलप्रथम ने उसकी याचना स्वीकार कर उसे मुक्त कर दियाऔर अपना सामन्त शासक बना दिया।
अपनी विशाल जलसेना के साथ राजेंद्र चोल ने अंडमान निकोबार, वर्मा देश के अराकान तथा पेगूआदि प्रदेशों को भी जीत लिया।
जब राजेंद्र चोल हिन्द सागर के पार युद्धों में व्यस्त था,तभी केरल, पाण्ड्य और सिंहल राज्य के शासकों ने संयुक्त रुप चोल सत्ता के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया,इस युद्ध में सुन्दरपाण्डय नेतृत्व कर रहा था।
राजेन्द्र ने अपने युवराज पुत्र राजाधिराज को इस विद्रोह को दबाने भेजा, राजाधिराज ने इस विद्रोह को कुचल दिया,इस युद्ध में सिंहल राजा मृत्यु को प्राप्त हुआ।
अपने राज्य की सीमाओं पर चोल शासक की पैनी नजर रहतीं थी
सीमांत राजाओं पर चोल शक्ति का दवाब हमेशा ही बना रहता था।उसने शक्तिशाली राज्यों के विद्रोह बलपूर्वक दबा दिया और उन्हें सदा अपने अधीन रहने पर विवश कर दिया था।
उसके शासन काल में चोल राज्य वैभवशाली था।

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