दक्षिण भारतीय इतिहास…(४८)

यादव वंश

चालुक्य साम्राज्य के विघटन के बाद देवगिरि के यादव,द्वारसमुद्र के होयसल, वारंगल के काकतीय, कुन्तल के कदम्ब तथा मैसूर के गंग और विजयनगर राजवंशों ने अपने को स्वतंत्र शासक मान लिया।
यादव वंश की उत्पत्ति के विषय में कुछ धारणाएं हैं, जिनके अनुसार यादववंश को महाभारत में महाराज ययाति के पुत्र यदु के वंशज माना जाता है ,मराठी कवि ज्ञानेश्वर कृत भगवद्गीता में यादव शासकों को चन्द्र वंशी क्षत्रिय बताया गया है।
यादव वंश का संस्थापक दृढ़प्रहार माना जाता है वह एक वीर पुरुष था उसका पुत्र सेउणचन्द्र प्रथम उसका उत्तराधिकारी हुआ ,उसने प्रतिहारों के विरुद्ध राष्ट्र कूटों की सहायता कर उनका सामन्त बना ।
सेउणचन्द्र के उत्तराधिकारी क्रमशः दाढ़ियप्प,भिल्लम प्रथम, तथा राजिरा हुये । राजिरा के बाद बदुगि या बड्डिग ने राज्य किया उसके बाद धाड़ियस तत्पश्चात उसका पुत्र भिल्लम द्वितीय हुआ उसने राष्ट्र कूटों को छोड़कर शक्तिशाली चालुक्यों के साथ अपनी निष्ठा स्थापित कर ली। भिल्लम ने नासिक के सिंदिनगर को अपनी नई राजधानी बनाया।
भिल्लम के बाद उसका पुत्र वेसुगि उत्तराधिकारी हुआ ।भिल्लम तृतीय वेसुगि का उत्तराधिकारी बना ,वह चालुक्य नरेश जयसिंहप्रथम का प्रिय सामंत था जयसिंह प्रथम ने अपनी पुत्री का विवाह भिल्लम तृतीय से करके उसे महासामंत बना दिया।
भिल्लम तृतीय ने जयसिंह प्रथम के साथ परमार नरेश भोज के विरुद्ध अभियानों में सहयोग किया जिसके फलस्वरूप उसका राजकुल और प्रतिष्ठित हो गया।

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