पाश्चात्य दार्शनिक

जिस प्रकार भारतीय दर्शन में वेदों का महत्व है, उसी प्रकार पाश्चात्य दर्शन में ग्रीक दर्शन का महत्व है ग्रीक दर्शन पाश्चात्य दर्शन का जनक माना गया है ।
           ग्रीक दर्शन का प्राचीन तम मत माइलेशियन मत(milesian school) कहलाता है। इस मत की स्थापना ६२४ ई.पू. ग्रीस उपनिवेश
माइलेटश में हुई थी, इसका अन्य नाम ionic school भी है ।
          इस मत में तीन दार्शनिक हुये, थेलीज(Thles), एनेक्जिमेण्डर
Anaximander, एनेक्जिमेनीज (Anaximanies)।
   थेलीज- इनका जन्म ग्रीस उपनिवेश माइलेटश में ६२४ ई.पू. हुआ था।
  वे दार्शनिक, गणितज्ञ, राजनीतिज्ञ और ज्योतिषी भी थे। उनकी गणना
ग्रीस के सात बुद्धि मान व्यक्तियों में की जाती है। कहा जाता है कि थेलीज ने २८ may ५८५ ई.पू. में होने वाले सूर्य ग्रहण की भविष्यवाणी की थी।
     थेलीज के अनुसार विश्व का परम द्रव्य जल है जिससे सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होता है, जल ही वाष्प तथा बूंद रूप होकर सबको जीवन रुप प्रदान करता है। जल ही विश्व का उपादान कारण है।

      एनेक्जिमेण्डर- एनेक्जिमेण्डर का जन्म६११ ई.पू. माइलेटश में हुआ था।वे थेलीज के मित्र तथा शिष्य भी थे।वे दार्शनिक, ज्योतिषी और 
भूगोल वेत्ता भी थे,इनका प्रकृति पर निबंध (on nature) यूरोपीय
दार्शनिक साहित्य की प्रथम कृति मानी जाती है।
         एनेक्जिमेण्डर किसी भौतिक तत्व को परम तत्व नहीं मानते, उनके अनुसार परम तत्व अनन्त या असीम  होना चाहिए, असीम या अनन्त के भीतर असंख्य संसार हैं, पृथ्वी पहले तरल थी,धीरे धीरे भाप द्वारा तरलता सूख गई और नमी उत्पन्न  हुई ।इसके बाद निम्न तथा बाद में उच्च प्राणियों की उत्पत्ति हुई, उनके अनुसार प्रारंभ में मनुष्य मछली के समान था और जल में रहता था ।
      एनेक्जिमेनीज- एनेक्जिमेनीज का जन्म माइलेटश में ५८८ ई.पू. हुआ था। ये एनेक्जिमेण्डर के सहयोगी तथा शिष्य थे। इन्होंने वायु को
विश्व का मूल द्रव्य स्वीकार किया है,वायु शरीरधारी मनुष्य का प्राण है,
वायु अग्नि का रूप ले लेता है, तरल होकर जल बन जाता है और जम कर पृथ्वी का रूप ले लेता है।सभी लोक वायु के आधार पर टिके हैं।



















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