पाश्चात्य दार्शनिक …२

माइलेशियन मत के बाद पाइथेगोरियन मत का उद्भव हुआ , इसके संस्थापक पाइथागोरस थे। पाइथागोरस का जन्म सेमास(samos) में हुआ था।वे ५२५ई.पू.दक्षिणी इटली के उपनिवेश क्रटोना में जाकर बस गये। पाइथागोरस गणितज्ञ दार्शनिक थे,वे रेखागणित के संस्थापक माने जाते हैं।

उन्होंने पाइथागोरस समाज की स्थापना की ये समाज अपने समय का सबसे महत्वपूर्ण नैतिक तथा धार्मिक समाज माना जाता था। यह समाज आर्फिक धर्म से प्रभावित था ,इस धर्म की मान्यता के अनुसार, आत्मा समाधि के द्वारा मुक्त हो जाता है तथा आवागमन के चक्र से छूट जाता है।दर्शन बौद्धिक विलास नहीं, जीवन यापन की पद्धति है।

पाइथागोरस के अनुसार परम द्रव्य संख्या है,सभी संख्याओं की उत्पत्ति इकाई (unit) से होती है।अन्य सभी संख्याएँ इकाई के योग से बनती हैं।संख्या सम और विषम दो प्रकार की होती हैं। इसी प्रकार संसार भी पक्ष विपक्ष के द्बंदों से भरा हुआ है। सम संख्यायें सीमित होती हैं, क्योंकि इनका विभाजन हो सकता है परन्तु विषम संख्याएँ असीमित होती हैं क्योंकि ये अविभाज्य हैं।

सृष्टि उत्पत्ति के बाद संसार की सभी वस्तुओं को पाइथागोरस ने दस भागों में विभक्त किया है –

1- सीमित और असीमित(limited and unlimited)

2- विषम और सम( odd and even)

3- एक और अनेक ( one and many)

4- दक्षिण और वाम (right and left)

5- पुल्लिंग और स्त्रीलिंग(masculine and Feminine)

6- स्थिरता और गति ( rest and motion)

7- ऋजु और वक्र (straight and crooked)

8- प्रकाश और अंधकार (light and darkness )

9- शुभ और अशुभ (good and evil)

10- वर्ग और आयत (square and oblong)

माइलेशियन दार्शनिकों ने द्रव्य का विवेचन किया पाइथागोरस ने स्वरूप की प्रतिष्ठा की,स्वरूप अतीन्द्रिय, सामान्य और विज्ञान रुप है। इन्द्रियों द्वारा अनुभूत जगत में जितने भी विभिन्न पदार्थ हैं,वे सब विज्ञान की क्षीण प्रतिकृति हैं।

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