पाश्चात्य दार्शनिक 3

इलियाई सम्प्रदाय-( eleatie school) – दक्षिणी इटली के इलिया नामक नगर के दार्शनिक इलियाई सम्प्रदाय के नाम से जाने जाते हैं।
ज़ेनोफेनीज(zenophanes) – ये इलियाई सम्प्रदाय के संस्थापक माने जाते हैं, ज़ेनोफेनीज एकेश्वरवादी थे,वे ईश्वर को निराकार और अंर्तयामी मानते थे।
वे मानव कल्पित ईश्वर के विरोधी थे।
मानव कल्पित देवताओं के सम्बंध में उनकी उक्ति प्रसिद्ध है-(मनुष्य सोचते हैं ईश्वर उनकी तरह उत्पन्न होता है,उसका स्वरूप मनुष्य के समान ही है यदि बैलों ,घोड़ों और शेरों के हाथ मनुष्य के समान होते और उन हाथों से वे चित्र बना सकते तो वे ईश्वर को क्रमशः
बैल ,घोड़े और शेर के रुप में चित्रित करते।)
ज़ेनोफेनीज के अनुसार ईश्वर नित्य, निराकार और अपरिणामी है। पार्मेनाइडीज-(parmenides)- पार्मेनाइडीज दक्षिणी इटली के इलिया नगर के निवासी थे,वे पाइथागोरस के अनुयायी थे परन्तु बाद में

जेनोफेनीज के विचारों से प्रभावित हो गये। पार्मेनाइडीज ने अपने दार्शनिक सिद्धांतों की व्याख्या छन्दों में की है।
पार्मेनाइडीज हेरेक्लाइटस के विरोधी थे,हेरेक्लाइटस ने क्षणिकवाद की
स्थापना की है और पार्मेनाइडीज ने शाश्वतवाद की।पार्मेनाइडीज के अनुसार तत्व शुद्ध सत् है,यह सत् मूलभूत, नित्य, शाश्वत, अविभाज्य तथा अपरिणामी है। इन्होंने तर्क दिया-सत् की उत्पत्ति या तो सत् से हुई है या असत् से।सत् की सत् से उत्पत्ति संभव नहीं, क्योंकि सत् पूर्व में ही
विद्दमान था,सत् की उत्पत्ति असत् से भी नहीं हो सकती क्योंकि शून्य से
किसी वस्तु का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता।
ज़ेनो (zeno)-इलियाई परम्परा के ज़ेनो अन्तिम दार्शनिक थे। ये
पार्मेनाइडीज के अनुयायी थे और निषेधात्मक तर्क के लिये विख्यात थे।
इन्हें द्वंद्वात्मक तर्क का जन्मदाता भी मानते हैं। ज़ेनो की कृतियों में
एम्पेडोक्लीज की व्याख्या, विवाद ,तथा प्रकृति पर निबंध आदि प्रसिद्ध हैं।

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