इश्क…

इश्क वो शै है जहाँ हौसले कम नहीं होते और भड़कते है शोले गर मुख़ालफ़त कम नहीं होते मुस्कुराते जाते हैं फिर भी ग़म के सिलसिले कम नहीं होते परेशां है कब से ये सोच के हम , क्यूँ उनकी यादों में हम नहीं होते

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नासूर…

मुहब्बत के ज़ख़्म टीस बन के

दिल में रहते है

ज़रूरी तो नहीं हर ज़ख़्म आँसुओं का मोहताज हो

कुछ नासूर बन के भी

बहते है

बेक़रारी…

तुमसे बात करने को चाहता हूँ बहुत

बहाने ढूँढता हूँ मिलने के

पर कभी कभी मन करता है

कुछ बेचैनी तुम में भी होती

तुम भी चाहते उसी शिद्दत से मुझे

तुम्हें भी सुकून न मिलता वगैर बात किये मुझसे

तुम भी बहाने ढूँढो

बात करने के और मिलने को मुझसे

इश्क नहीं है और अगर है

तो वही बेक़रारी उधर क्यों नहीं है

क्यों नहीं तुम आते हो

तुम्हारी यादों से…

मौन होकर जब कोई प्रार्थना करती हूँ मैं

बंद आँखों में तुम्हारा चेहरा झाँकता है

और मेरी प्रार्थना, छिन्न भिन्न हो जाती है

निकल जाती हूँ ,उन सूनी पगडंडियों पर

फिरभी .तुम्हारी यादों से ,तन्हा नहीं होती

इन घने पेड़ों की छांव में लिख जाती हैं

हवायें ,मस्ती में धूप छांव से लम्हे मेरे दिल पर

सूनी राहों पर सूनी निगाहें

दर्द मुक़द्दर हो तो ,कोई क्या करे

गुज़र गये लम्हे ,जो ढूँढता है मन उन्हीं को

नज़र लौटती है उदास ,हैरान, परेशान सी

वो क्यूँ नहीं लौटता,

जिसका दिल को सदियों से इन्तज़ार है।

चन्द लम्हे…

कभी मिलना हो तो

एेसे न मिलना

कि इक अजनबी से मुलाक़ात हुई

चन्द लम्हे जिन्दगी से लेआना

फिर वक़्त मिले न मिले

जो भी शिकवे हो,शिकायत हो

मुहब्बत हो या अदावत हो

तन्हाई में गर लफ़्ज़ घायल भी हो तो

ग़ैरों की महफ़िल में चर्चा नहीं होगा

वो प्यार जो तुम भूल गये हो

सरेआम रुसवा नहीं होगा

अजनबी बन के न मिलना मुझको!