दक्षिण भारतीय इतिहास…(१३)

वातापि के चालुक्य नरेश कीर्ति वर्मन को दन्ति दुर्ग ने परास्त कर राष्ट्र कूट वंश की स्थापना की ।

राष्ट्र कूट चन्द्र वंशी क्षत्रिय माने जाते हैं जिनकी राजधानी मान्यखेट थी , दन्ति दुर्ग प्रारम्भ में चालुक्यवंश के विक्रमादित्य द्वितीय का सामन्त था ।दन्ति दुर्ग ने चालुक्य राज्य की सुरक्षा के लिये अरब आक्रमण कारियों को पराजित किया था जिससे प्रसन्न होकर चालुक्य नरेश विक्रमादित्य ने उसे पृथ्वी वल्लभ की उपाधि से विभूषित किया था ।विक्रमादित्य की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र कीर्ति वरमन राजा बना तो दन्ति दुर्ग ने उसके ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया फलत: दोनों के बीच युद्ध छिड़ गया जिसमें कीर्ति वर्मन पराजित हुआ । दन्ति दुर्ग ने उत्तरी महाराष्ट्र ,गुजरात और पास के अन्य प्रदेशों पर अधिकार कर लिया ।

दन्ति दुर्ग का युद्ध पल्लवों के साथ भी हुआ , परन्तु दन्ति दुर्ग ने पल्लवों के नन्दिवरमन से अपनी पुत्री का विवाह कर उनके साथ मैत्री सम्बंध स्थापित कर लिये ।

दन्ति दुर्ग की मृत्यु के बाद उसका चाचा कृष्ण प्रथम राजा बना , माना जाता है कि दन्ति दुर्ग निसंतान था । कृष्ण प्रथम पराक्रमी तथा कुशल शासक था । उसने मैसूर के गंगवाडी राज्य को जीतकर अथाह संपत्ति प्राप्त की ।

वेंगी के चालुक्यों पर भी उसने विजय प्राप्त की संधि स्वरूप वेंगी शासक ने अपनी पुत्री का विवाह कृष्ण प्रथम के छोटे पुत्र ध्रुव के साथ कर दिया ।

कृष्ण राष्ट्र कूट वंश का महान शासक था अपने साहस के बल पर उसने उत्तराधिकार में प्राप्त राज्य को विस्तार दिया । उसने काँची के पल्लवों को पराजित किया तथा चालुक्य वंश को समाप्त कर संपूर्ण कर्नाटक को अपने अधीन किया ।

कृष्ण प्रथम एक विजेता होने के साथ कला और साहित्य का भी संरक्षक था । एलोरा का प्रसिद्ध कैलास मंदिर का निर्माण कृष्ण प्रथम ने ही करवाया था ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(१२)

चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय ने सम्पूर्ण दक्षिण पर अपनी विजयपताका फहराई और विशाल चालुक्य साम्राज्य को स्थापित किया ।उसके छोटे भाई विष्णु वर्धन ने लगातार उसका सहयोग किया अत: सम्राट ने उसे पूर्वी दक्षिण प्रदेश का शासन सौंप दिया ।

विष्णु वर्धन ने वेंगी को अपनी राजधानी बनाकर स्वतन्त्र चालुक्य वंश की स्थापना की ,वह पराक्रमी तथा कुशल सेनापति था उसने कई कठिन दुर्गो को भी विजित किया था । बह एक योग्य शासक था ।

उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र जयसिंह राजा बना ।पुलकेशिन द्वितीय तथा विष्णु वर्धन के पश्चात जयसिंह ने वातापि के चालुक्यों से सम्बन्ध बनाये रखने का प्रयत्न नहीं किया ।

उसके उपरान्त इन्द्र वर्मन वेंगी का राजा बना उसका शासनकाल बहुत छोटा रहा ।

उसके बाद विष्णु वर्धन द्वितीय का शासन काल भी अधिक नहीं रहा ,तत्पश्चात विजय सिद्धि ,जयसिंह द्वितीय ,विष्णु वर्धन तृतीय ,विजयादित्य प्रथम तथा विष्णु वर्धन चतुर्थ ने शासन किया ।

तत्पश्चात विजयादित्य द्वितीय ने शासन संभाला परन्तु उसके भाई भीमसालुकि ने विद्रोह कर सिंहासन पर अधिकार कर लिया ।परन्तु विजयादित्य ने अपने भाई को पराजित कर सिंहासन पर पुन:अधिकार कर लिया और अपने राज्य को सुदृढ़ बनाया ।

विजयादित्य के बाद उसका पुत्र विष्णु वर्धन पंचम राजा बना ,वह सिंहासन पर बहुत कम समय तक रहा तत्पश्चात उसका पुत्र विजयादित्य तृतीय ने शासन संभाला ,वो महत्वाकांक्षी और रणकौशल में पारंगत था उसने पल्लवों और पाण्डयों के विरुद्ध युद्ध किये, उसने पाण्डयों को पराजित किया तथा पल्लवों को भी परास्त किया और उनसे अनेक बहुमूल्य रत्न औरधन की प्राप्ति की । उसने चेदि और राष्ट्र कूटों को भी पराजित किया वेंगी के चालुक्य शासकों में विजयादित्य तृतीय महान शासक था ।

तत्पश्चात भीम प्रथम ने ‘जो विजयादित्य तृतीय के भाई का पुत्र था ‘ राजगद्दी प्राप्त की उसे सिंहासन पर बैठे कुछ ही समय हुआ था कि राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय ने उस पर आक्रमण करउसेपराजित किया तथा उसे बन्दी बना लिया । परन्तु कुछ समय बाद उसे मुक्त कर दिया ।भीम ने मुक्त होकर अपनी सैनिक क्षमता बढ़ाई और कृष्ण द्वितीय आक्रमण कर उसे परास्त करअपनी हार का बदला लिया ।

इसके बाद विजयादित्य चतुर्थ, विजयादित्य पंचम ,विक्रमादित्य द्वितीय ,भीम द्वितीय ने भी शासन संभाला परन्तु उनके शासनकाल में कुछ उल्लेखनीय नहीं रहा ।

जब कुलोतुंग चोल वेंगी का शासक बना उसके कुछ समय पश्चात ही वेगी का चालुक्य वंश चोल साम्राज्य में समाहित हो गया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(११)

विक्रमादित्य प्रथम ने पल्लव राज्य पर आक्रमण किया और पल्लव नरेश को पराजित कर युद्ध क्षेत्र मे पल्लव नरेश से अपनी अभ्यर्थना भी करवायी ।

विक्रमादित्य के छोटे भाई जयसिंह वरमन ने लगातार अपने भाई का साथ दिया था फलत: प्रसन्न होकर विक्रमादित्य ने उसे लाट (गुजरात) का शासक नियुक्त कर दिया जहाँ जयसिंह वरमन नेअपनी पृथकचालुक्य वंश की स्थापना की ।विक्रमादित्य प्रथम ने मैसूर के गंग तथा पाण्डय नरेशों के मैत्री सम्बंध भी स्थापित किये उसका शासनकाल शान्तिपूर्ण रहा ।

विक्रमादित्य का पुत्र विनयादित्य का शासन काल भी शान्तिपूर्वक रहा ।

विनयादित्य का पुत्र विजयादित्य ने अपने पिता के उपरान्त राजा बना वह भी अपने पिता की भाँति वीर और साहसी था ।उसके राज्य की सीमा गुजरात के लाट से लेकर दक्षिण में पल्लव राज्य की सीमा तक फैली थी ,वह अपने प्रजा का ध्यान रखने वाला था ।

विजयादित्य के पश्चात विक्रमादित्य द्वितीय ने शासन संभाला , उसने पल्लव राज्य पर आक्रमण किया परन्तु काँची नगर को बिना क्षति पहुँचाये वहाँ के राजसिंहेश्वर मन्दिर को बहुमूल्य रत्न भेंट किये ।

विक्रमादित्य द्वितीय का पुत्र कीर्ति वरमन द्वितीय चालुक्य वंश का अन्तिम शासक सिद्ध हुआ ।उसके सामन्त राष्ट्र कूट के दन्ति दुर्ग की गतिविधियों के कारण उसकी शक्ति लगातार घटती गयी और अन्ततः दन्ति दुर्ग के उत्तराधिकारी कृष्ण प्रथम ने चालुक्यो पर आक्रमण करके चालुक्य वंश को समाप्त कर दिया और राष्ट्र कूट वंश की स्थापना की ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(१०)

पुलकेशिन द्वितीय भारत के महानतम सम्राटों में से था जिसने चालुक्य राज्य को अपने बाहुबल और पराक्रम से विन्ध्य क्षेत्र से दक्षिण भारत में कावेरी नदी के तट तक फैलाकर अपने दक्षिणापथेश्वर की उपाधि को सार्थक किया । ३२ वर्ष के अपने शासनकाल में पुलकेशिन द्वितीय ने शासन संगठन के साथ साथ सफलता पूर्वक अन्य राज्यों से मैत्री पूर्ण राजनयिक और व्यापारिक संम्बध भी स्थापित किये ।

पुलकेशिन द्वितीय की मृत्यु के बाद चालुक्य राज कुछ समय तक संकट से घिरा रहा ,साम्राज्य के अधीनस्थ राजाओं ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी यहाँ तक कि पुलकेशिन द्वितीय के दो पुत्रों ने भी जो राजप्रतिनिधि के रूप में शासन कर रहे थे उन्होंने भी अपनी स्वतंत्र राज्य की घोषणा कर दी ।

पुलकेशिन द्वितीय के अन्य पुत्र विक्रमादित्य ने अपने नाना गंग नरेश दुरविनीत की सहायता से राजसिंहासन प्राप्त किया और अपने पिता के साम्राज्य की एकता को पुन: स्थापित करने का प्रयास किया पल्लव नरेश नरसिंह वर्मन को पराजित कर अपनी राजधानी बादामी को मुक्त करा लिया ।

चोल ,पाण्डयऔर केरल प्रदेशों के राजाओं ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी ,विक्रमादित्य ने उन्हें बल पूर्वक दबाकर पुन: अपने अधीन कर लिया । विक्रमादित्य ने अपने पिता द्वारा विजित सभी राज्यों को फिर से जीत कर अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली ।

अब उसने अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिये पल्लवों के विरुद्ध अभियान शुरू किया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(९)

पुलकेशिन द्वितीय की बढ़ती प्रसिद्धि और उत्तर में हर्ष वर्धन की शक्ति से भयभीत गुर्जर राज्य के दद्द द्वितीय ने भी पुलकेशिन द्वितीय का आधिपत्य स्वीकार कर लिया

जब हर्ष ने अपनी विशाल सेना के साथ दक्षिण पर हमला किया तो पुलकेशिन द्वितीय ने आगे बढ़कर उसका सामना किया और नर्मदा के तट पर हर्ष को बुरी तरह पराजित किया । हर्ष को पराजित करने के उपरान्त उसने परमेश्वर की उपाधि धारण की ।

पुलकेशिन द्वितीय ने अपने अनुज विष्णु वर्धन को

युवराज बनाया और राज्य की रक्षा का भार उसे सौंपकर

स्वयं विजयअभियान के लिये निकल पड़ा ।कोसल और कलिंग ने उसका आधिपत्य स्वीकार कर लिया ।तत्पश्चात गंग राज्य को भी उसने पराजित किया ।

पुलकेशिन द्वितीय की विजयी सेना ने आन्ध्र की राजधानी पिष्ठापुर (वर्तमान में पीठापुरम )पर भी अधिकार कर लिया ।

पुलकेशिन ने शक्तिशाली आन्ध्रों पर अधिकार करने के बाद अपने अनुज विष्णु वर्धन को आन्ध्र राज्य का शासक बना दिया ।

साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा से पूर्ण पुलकेशिन द्वितीय ने पल्लव राज्य पर आक्रमण कर दिया जिसमें उसे पूर्ण सफलता तो न मिली परन्तु पल्लव राज्य के उत्तरी क्षेत्रों पर अपना अधिकार कर लिया

पल्लवों और चालुक्य वंश का लम्बे समय तक चलने वाला संघर्ष यही से प्रारंभ हुआ ।

चोल ,पांडय तथा केरल के साथ उसके मैत्री संबंध रहे ।

पुलकेशिन द्वितीय ने एक बार फिर पल्लव राज्य पर आक्रमण किया ,परन्तु इस बार सिंहासन पर महेन्द्र वरमन का पुत्र नरसिंह वरमन विराजमान था ।अपना अभियान पुलकेशिन द्वितीय ने पल्लवों के सामन्त रायलसीमा पर शासन करने वाले बाण लोगों से शुरू किया और एक बार फिर पल्लवों की राजधानी के लिये ख़तरा उत्पन्न हो गया ।

श्रीलंका का राजकुमार मान वर्मा पल्लव राजा नरसिंह वरमन का मित्र था ,उसने योग्यता पूर्वक पल्लव राजा की सहायता की ।

पुलकेशिन द्वितीय को इसबार असफलता का मुँह देखना पड़ा ,अपनी सफलता से ख़ुश होकर पल्लव राज नरसिंह वरमन ने चालुक्य राज्य पर आक्रमण किया और राजधानी वातापि (बादामी ) पर तथा दुर्ग पर अधिकार कर लिया ।

इस युद्ध मे पुलकेशिन द्वितीय लड़ता हुआ मारा गया ।

इस बात की जानकारी वातापि (बादामी ) मे मल्लिका अर्जुन देव मंदिर के पीछे एक चट्टान पर खुदे अभिलेख से भी होती है ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(८)

ऐहोल अभिलेखों के अनुसार मंगलेश अपने पुत्र को राजगद्दी सौंपना चाहता था जिससे क्रुद्ध होकर कीर्ति वरमन के पुत्र पुलकेशिन द्वितीय ने अपने विश्वस्त मित्रों और शुभचिन्तकों की सहायता से राजगद्दी पर अधिकार कर लिया और चाचा मंगलेश की हत्या कर दी

६०९-१०ई० में पुलकेशिन द्वितीय ने चालुक्य राजगद्दी सँभाली । गृह युद्ध के कारण चालुक्य राजवंश के अधीन सामन्त अपनी स्वतन्त्रता के लिये प्रयत्न शील हो गये ।परन्तु पुलकेशिन द्वितीय ने अपने शत्रुओं का दमन किया और चालुक्य राज्य को स्थिरता प्रदान की ।उसने विद्रोही अप्पायिका को युद्ध में पराजित किया और अपना आधिपत्य स्वीकार करवाया उसके सहयोगी गोविन्द को भी अपने अधीन किया ।

उसने कदम्ब राज्य पर चढ़ाई कर दी और कदम्ब राज्य की राजधानी बनवासी को नष्ट कर दिया ।

कदम्ब राज्य की पराजय के बाद आलुपों ने भी चालुक्यों की अधीनता स्वीकार कर ली तथा मैसूर के गंगवंशी राजा भी चालुक्यों की अधीनता स्वीकार करने को विवश हो गये ।गंग राजा दुरविनीत ने अपनी पुत्री का विवाह पुलकेशिन द्वितीय के साथ कर दिया जो विक्रमादित्य प्रथम की माता बनी ।

पुलकेशिन द्वितीय ने उत्तरी कोंकण के मौर्यो की राजधानी पुरी (जो पश्चिमी महासागर की लक्ष्मी भी कहलाती थी ) पर आक्रमण किया और उन्हें भी अपना आधिपत्य मानने पर विवश किया ।पुरी की गणना भारत के उन्नतिशील बन्दरगाहों में की गयी है ।

पुलकेशिन द्वितीय ने आगे बढ़ कर लाट मालव तथा गुर्जर राज्यों पर भी आक्रमण किया । लाट राज्य की राजधानी नवसारिका अथवा नवसारी नगर था ।ऐहोल प्रशस्ति के अनुसार लाट राज्य के कलचुरित राजवंश के शासक ने भी पुलकेशिन द्वितीय के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया और मालव राज्य ने भी पुलकेशिन द्वितीय की प्रभु सत्ता स्वीकार कर ली ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(७)

पृथ्वीराज रासो में चालुक्यों की उत्पत्ति महर्षि वशिष्ठ द्वारा किये गये यज्ञ की अग्निकुंड से मानी गयी है ।चालुक्य वंश के अभिलेखों में उन्हें चन्द्र वंशीय क्षत्रिय बताया गया है ।

चालुक्य वंश की कई शाखाओं में वातापि(बादामी) ,वेंगी ,लाट और कल्याणी आदि शाखाएँ है परन्तु चालुक्यो के गोत्र मे भिन्नता होने के कारण उन्हें एक ही वंश का नहीं माना जा सकता ।

कैरा ताम्र पत्र के अनुसार वातापि का प्रथम नरेश जयसिंह था अपनी प्रतिभा और साहसिक अभियानों के कारण वह आन्ध्र प्रदेश के बीजापुर और आस पास के क्षेत्रों का सामन्त बना ।

जयसिंह के पश्चात उसके पुत्र रणराज ने शासन संभाला उसे पराक्रमी शासक कहा गया है ।

रणराज के बाद उसका पुत्र पुलकेशिन प्रथम राजा बना उसने वातापि (बादामी)के निकट पहाड़ पर क़िलेबन्दी करके एक सुदृढ़ दुर्ग बनवाया और स्वतंत्र राज्यवंश की स्थापना की ।

पुलकेशिन प्रथम रामायण ,महाभारत तथा पुराणों का ज्ञाता होने के साथ सुयोग्य राजनीतिज्ञ भी था ।

पुलकेशिन प्रथम के बाद उसका पुत्र कीर्ति वरमन चालुक्य वंश का शासक बना वह योग्य पिता की योग्य सन्तान था ।उसने बनवासी के कदम्ब कोंकण के मौर्य तथा नल राजाओं के विरूद्ध लड़ाइयों मे अपने राज्य का विस्तार किया ।कोंकण विजय के फलस्वरूप गोवा का प्रमुख बन्दरगाह जो उस समय रेवती द्वीप के नाम से प्रसिद्ध था अपने साम्राज्य में सम्मिलित किया ,अपने विजयी अभियानों से प्राप्त होने वाले धन से कीर्ति वरमन ने अनेक कलात्मक निर्माण करवाये ।

५९८ई० में कीर्ति वरमन की मृत्यु के समय उसके पुत्र शासन करने की दृष्टि से काफ़ी छोटे थे ।अत: राजसिंहासन पर कीर्ति वरमन का अनुज मंगलेश आसीन हुआ ,वह अपने पिता और अग्रज की भाँति महा पराक्रमी शासक था ,उसने कलचुरित राजा बुद्धि राज को पराजित कर खानदेश जीत लिया और आसपास के अन्य प्रदेश जीत कर अपने राज्य में मिला लिये ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(६)

काकुस्थवरमन के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र शान्तिवरमन राजा बना उसे कदम्ब कुल का द्वितीय सूर्य कहा गया है ।शान्तिवरमन पराक्रमी होने के साथ साथ महादानी उदार और साहित्य एवं कला का संरक्षक था ।४७५ ई० में उसकी मृत्यु के पश्चात उसका बड़ा पुत्र मृगेशवरमन अथवा विजयशिवमृगेशवरमन शासक बना ।उसने अपने राज्य कदम्ब साम्राज्य का दक्षिणी भाग अपने अनुज कृष्णवरमन को दे दिया ,कृष्ण वर्मन ने त्रि पर्वत को अपनी राजधानी बना कर स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली ।

मृगेशवरमन पराक्रमी तथा उदार शासक था ।उसकी न्यायप्रियता के कारण उसकी तुलना युधिष्ठिर से गयी है उसका शासन ४९० ई० तक रहा ।

उसके पुत्र रविवरमन को अपने पराक्रम पौरुष के बल पर राजसिंहासन हासिल करना पड़ा उसे कई प्रतिद्वंद्वियों के साथ युद्ध करना पड़ा ,उसके शत्रुओं में पल्लवों के साथ त्रिपरवत के कदम्ब भी जुड़ गये ।

कदम्ब के अभिलेखों से पता चलता है ,उसने काँची शासक चण्ड दणडेश को युद्ध में मार दिया और कदम्ब शासक विष्णु वर्मन को भी पराजित किया ।

रविवरमन पराक्रमी शासक था ।उसके राज्य की सीमा उत्तर में नर्मदा नदी तक फैली थी वह एक सफल शासक प्रजा पालक ,महादानी ,साहित्य कला एवं धर्म का संरक्षक था ।

रविवरमन के बाद उसका पुत्र हरिवरमन बनवासी कदम्ब का राजा बना परन्तु वह एक निर्बल राजा सिद्ध हुआ ।तथा कदम्ब राजवंश का अंतिम राजा हुआ ,उसकी मृत्यु के पश्चात त्रि पर्वत के कदम्ब शासकों ने बनवासी के राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(५)

३५० ई० के लगभग कुन्तल प्रदेश (कर्नाटक प्रान्त ) में कदम्ब राजवंश का उदय हुआ कदम्ब राजवंश मूलत: ब्राह्मण थे पर जब वे राजा बन गये तो अपनेको क्षत्रिय मानने लगे

तालगुंड प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि मयूरशरमन ने जो ब्राह्मणोचित करमों का निष्ठापूर्वक पालन करता था वेदाध्ययन के लिये पल्लवों की राजधानी काँची के वैदिक विद्या केन्द्र मे प्रवेश लिया संयोगवश एक दिन एक पल्लव घुड़सवार सैनिक ने उसे अपमानित किया न्याय के लिये जब वो पल्लव नरेश के पास गया तो उन्होंने अपने सैनिक का पक्ष लेते हुये उसे भगा दिया

क्रोधित मयूरशरमन काँची से कुन्तल लौट आया और ख़ुद का राज्य स्थापित करने के लिये तलवार धारण कर ली उसने अपना अभियान पल्लव सीमारक्षको के विरूद्ध चलाया और श्री पर्वत (करनूल जनपद आन्ध्र प्रदेश काश्री शैलम) के पठारी जंगली क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया

चौथी शती के मध्य मे उसने कुन्तल के बनवासी को राजधानी बनाया और शासन शुरू किया श्री पर्वत क्षेत्र में रहकर धीरे धीरे शक्तिशाली सेना तैयार कर ली और अनेक पड़ोसी सामन्त शासकों को जीतकर धन संग्रह कर लिया उसके शक्ति विस्तार को देखते हुये पल्लव नरेश ने उसे राजमुकुट भेंट किया मयूरशरमन ने पल्लव नरेश के विश्वासपात्र सामन्त के रूप शासन करना स्वीकार करलिया वो एक शक्तिशाली राजा के रूप मे प्रतिष्ठित हो गया

मयूरशरमन के बाद उसका पुत्र कंगवरमन कदम्ब शासक हुआ उसने अपने नाम के आगे शरमन हटा कर वरमन लिखवाना शुरू किया मयूरशरमन के बाद कदम्ब शासक अपने को क्षत्रिय कहलाना पसंद करते थे

कंगवरमन के पश्चात उसका पुत्र भगीरथ ने राज्य सिंहासन प्राप्त किया उसके साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने के लिये गुप्त सम्राट चन्द्र गुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने महाकवि कालिदास को अपना राजदूत बना कर कर्नाटक भेजा अपने लक्ष्य मे कालिदास ने पूर्ण सफलता प्राप्त की और कदम्ब नरेश ने अपनी पुत्री का विवाह कुमारगु्प्त से करके मैत्री संम्बध को वैवाहिक संम्बंध मे परिणत कर दिया

भगीरथ के पश्चात जब उसका ज्येष्ठ पुत्र रघु गद्दी पर बैठा तो अपने अनुज काकुस्थवरमन को युवराज बनाया वह प्रजा पालक शत्रुओं का दमन करने वाला कहा गया उसका शासन ४३० ई० तक रहा

रघु के बाद काकुस्थवरमन ने राजगद्दी प्राप्त की तालगुंड अभिलेख में उसे राजाओं मे सूर्य कदम्ब कुल का अलंकार महान विजेता यशस्वी प्रजा पालक कहा गया है

काकुस्थवरमन का तत्कालीन भारतीय राजवंशों में बड़ा सम्मान था उसकी बहन का विवाह कुमारगुप्त से पहले ही हो चुका था उसकी चार पुत्रियों का विवाह भी एक पुत्री का विवाह वाकाटक के शासक नरेन्द्र सेन से दूसरी का विवाह आलुप नरेश पशुपति के साथ तीसरी पुत्री काविवाह गंग शासक माधव द्वितीय के साथ और चौथी पुत्री काविवाह गुप्त वंश के राजकुमार के साथ हुआ था

इन सम्बन्धों के चलते काकुस्थवरमन की स्थिति काफ़ी मज़बूत थी उसने ४५०ई० तक शासन किया ।