सांभर लेक

राजस्थान का सांभर लेक जिसे लोग नमक की नगरी के रूप में जानते  हैं, एक नये पर्यटन स्थल के रुप में चर्चित हो रहा है।यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों का अपना अलग ही आर्कषण है।पर्यटकों के लिए यहाँ पर कई किलोमीटर का साइकिल ट्रेक, एसयूवी और एटीवी आदि साधनों के द्वारा सफारी, ग्राम भ्रमण, गाइडेड स्टार गेंजिग,इंडोर और आउटडोर गेम्स शामिल हैं।
       यहाँ पर पौराणिक मंदिर, मस्जिद दादूधाम, चर्च व गुरुद्वारा है,इस
गुरुद्वारे में सिखों के दसवें गुरु श्री गोविंद सिंह जी ने प्रवास किया था।
यहाँ पर स्थित नमक उत्पादन और सभी सुविधाओं से सुसज्जित शाही ट्रेन द्वारा पर्यटक झील तक यात्रा कर सकते हैं और स्वादिष्ट व्यंजनों का
स्वाद भी ले सकते हैं।पर्यटकों के ठहरने के लिए सांभर हैरिटेज है।
     यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य आपका मन मोह लेगा साथ ही उत्तरी एशिया और साइबेरिया से आने वाले प्रवासी पक्षियों की उपस्थिति भी आपको मोहक लगेगी।
      यहाँ का इतिहास भी काफी दिलचस्प है,महाभारत के अनुसार इस स्थान पर दैत्यराज वृषपर्वा के साम्राज्य का भाग था,दैत्यराज के कुलगुरु श्री शुक्राचार्य यहाँ पर निवास करते थे।यहीं पर कुलगुरु की पुत्री देवयानी और महाराज ययाति का विवाह हुआ था,देवयानी को समर्पित
एक पौराणिक मंदिर भी यहाँ पर है जो झील के पास ही है। यहीं पर
अकबर और रानी जोधा का भी विवाह हुआ था।
         हिन्दू मान्यता के अनुसार चौहान राजपूत राजाओं की रक्षकदेवी
शाकम्भरी देवी ने यहां के वन को बहुमूल्य धातुओं के मैदान में बदल दिया,परन्तु इस संपदा के कारण होने वाले झगड़ों से चिन्तित लोगों ने देवी से अपना वरदान वापस लेने को कहा, तब देवी ने सारी संपदा को नमक में परिवर्तित कर दिया। शाकम्भरी देवी का मंदिर अभी भी यहाँ स्थित है।
       यहीं पर ख्व़ाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के पोते ख्व़ाजा हिस्मुद्दीन की
दरगाह है,मान्यता है कि अगर दादा के साथ पोता भी जि़यारत करे तो
उनकी दुआ कुबूल होती है, जायरीन बड़ी संख्या में यहाँ पर आते हैं।

पाश्चात्य दर्शन 8 (अरस्तू)…

अरस्तू(Aristotle)-384ई. पू.-322 ई.पू.- अरस्तू का जन्म  Thres के
स्टेगिरा नगर  में हुआ था।उनके पिता मेसीडोन नरेश के राजवैद्य थे।सत्रह वर्ष की आयु में अरस्तू विद्याध्ययन के लिये प्लेटो के एकेडमी में गए और बीस वर्ष की आयु तक प्लेटो के साक्षात सम्पर्क में रहे।
     अरस्तू मेसीडोन नरेश फिलिप के राजकुमार एलेक्जेंडर (सिकंदर, जो बाद में सिकंदर महान कहलाये) के तीन वर्ष तक अध्यापक रहे। एथेंस में वापस आकर अरस्तू ने लाइसियम (Lyceum) नामक शिक्षा संस्था की
स्थापना की।एलेक्जेंडर की मृत्यु के पश्चात उन पर अधार्मिकता का अभियोग लगाया गया,वे एथेंस छोड़ कर चालसिस नामक स्थान पर चले गये।वहीं एक वर्ष बाद उनका देहांत हो गया।
    जनश्रुति के अनुसार अरस्तू हकलाते थे,परन्तु उन्हें अपने ग्रीक होने पर अभिमान था।वे बुद्धि और इन्द्रियानुभव दोनों का सामंजस्य करके
मध्यम मार्ग के समर्थक थे।
     अरस्तू ने दर्शन, तर्कशास्त्र, मनोविज्ञान, भौतिकविज्ञान, प्राणीविज्ञान,
आचारशास्त्र, राजनीति और साहित्य पर महत्त्वपूर्ण विचार प्रकट किए हैं।पाश्चात्य निगमन के तो वे जनक हैं और उसको उन्होंने जो रुप दिया वह शताब्दियों तक मान्य रहा,और आज भी महत्वपूर्ण है।
        उनके महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं- भौतिक विज्ञान, तत्वविज्ञान,आचार शास्त्र
और तर्कशास्त्र।

प्लेटो – 2

प्लेटो ने अपने गुरु सुकरात के सब विचारों का समन्वय अपने मौलिक विचारों के साथ किया।अपने पूर्व वर्ती सारे ग्रीक दार्शनिकों का प्रभाव प्लेटो पर और प्लेटो का प्रभाव अपने परवर्ती सारे पाश्चात्य दार्शनिकों पर पड़ा।प्लेटो प्रधान रूप से रहस्यवादी हैं।
दर्शन का लक्ष्य असत् से सत् की ओर,अंधकार से प्रकाश की ओर,मृत्यु से अमरत्व की ओर जाना है।यह साधना द्वारा हो सकता है,तर्क तत्व की ओर संकेत मात्र करता है,तत्व का साक्षात्कार साधना का विषय है।प्लेटो का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत उनका विज्ञानवाद है।
प्लेटो के विज्ञानों के पांच दृष्टिकोण-
1 ज्ञान की दृष्टि
2-स्वरूप की दृष्टि
3-उद्देश्य की दृष्टि
4-सत्ता की दृष्टि
5-रहस्य की दृष्टि
ज्ञान की दृष्टि-(Epistemologically)-ज्ञान की दृष्टि से विज्ञान,ज्ञान के वास्तविक विषय हैं।प्लेटो के अनुसार ज्ञान और ज्ञान का विषय दोनों नित्य और अपरिणामी होने चाहिए, अनित्य और क्षणिक का वास्तविक ज्ञान नहीं हो सकता।फीडो में कहा है कि इन्द्रियों से सत्य की प्राप्ति नहीं हो सकती, सत्य की प्राप्ति ज्ञान से ही हो सकती है।फीडो में कहा है इन्द्रियानुभव के बिना हमें विज्ञान का संस्मरण नहीं हो सकता।प्लेटो इन्द्रिय जगत को असत् नहीं कहते,वे इसे प्रतीति का विषय मानते हैं उनके अनुसार विज्ञान के बिना हमें जगत का इन्द्रियानुभव भी नहीं हो सकता क्योंकि ज्ञान का विषय विज्ञान ही है।
स्वरूप की दृष्टि(Universal class concepts)- सामान्य उत्पत्ति
विनाशरहित अपरिणामी और नित्य है, ये हमारी बुद्धि की कल्पना नहीं है इनकी वास्तविक सत्ता है।प्लेटो ने इन्द्रिय जगत को विज्ञान जगत में
भाग लेने वाला अंश और उनका प्रतिबिंब कहा है, अंश और प्रतिबिंब से
प्लेटो का तात्पर्य अभिव्यक्ति का है।विज्ञानों को प्लेटो ने दिक्कालातीत
माना है।प्लेटो ने विज्ञानों को इन्द्रिय जगत के विशेषों में अनुस्यूत बताया है।
उद्देश्य की दृष्टि- विज्ञान के नित्य सांचे हैं जिनके द्वारा ईश्वर इन्द्रिय जगत के पदार्थों का निर्माण करते हैं।विश्व की सृष्टि इसलिए हुई है कि इसके अपूर्ण और अनित्य पदार्थ पूर्ण आदर्शों को प्राप्त करने के लिए
उत्तरोत्तर विकसित हों।विज्ञान विश्व के पदार्थों में अनुस्यूत है।प्लेटो ने
ईश्वर और शिवतत्व में भेद माना है, ईश्वर सगुण है शिवतत्व निर्गुण, ईश्वर अपर है शिवतत्व पर।ईश्वर सृष्टि के निमित्त कारण और नियन्ता हैं, शिवत्व ईश्वर का भी पिता है।विशुद्ध विज्ञानस्वरूप शिवत्व का निर्विकल्प साक्षात्कार ही मानव जीवन की चरम सार्थकता है।
सत्ता की दृष्टि- जो पदार्थ विज्ञान की ओर जितना अभिमुख है, उसकी
उतनी ही अधिक सत्ता है ।विज्ञान नित्य, अधिकारी, अविनाशी, शाश्वत, सामान्य और सत् है।प्लेटो विज्ञान को इन्द्रिय जगत केअणु अणु में अन्तर्यामी मानते थे।प्लेटो ने असत्, भ्रांति और स्वप्न को भी कुछ न कुछ
सत्ता दी है।सोफिस्ट में कहा गया है-पूर्ण असत् की कल्पना असंभव है।

रहस्य की दृष्टि-विज्ञान शिवतत्व की अभिव्यक्ति के स्तर हैं।प्लेटो ने ईश्वर
को सृष्टि का निमित्त कारण और नियन्ता माना है, यह शिवतत्व निर्गुण
और अनिवर्चनीय है केवल निर्विकल्प स्वानुभूति द्वारा ही साक्षात्कार किया जा सकता है।उनके अनुसार ज्ञान ही धर्म है और अज्ञान अधर्म।
प्लेटो के अनुसार स्वतंत्रता का अर्थ उच्छृंखलता या परतंत्रता नहीं है, उसका अर्थ ज्ञानतन्त्रता है।

Plato – 1

प्लेटो(plato)(428.  ई.पू. )-(347ई.पू.) – प्लेटो ग्रीस और विश्व के महान दार्शनिक  हैं, वे सर्वतोमुखी प्रतिभा के धनी थे।प्लेटो का जन्म
एथेंस के समीप एजिना( Aegina) नामक स्थान पर हुआ था,वे उच्च कुलीन सामंत परिवार के थे। वे सुकरात के प्रमुख शिष्य थे,सुकरात की मृत्यु से उन्हें ग्रीक प्रजातंत्र से घृणा हो गई।
         इन्होंने कई देशों की यात्राएं की ,फिर एथेंस लौट कर अपनी प्रसिद्ध संस्था एकेडमी(Academy) की स्थापना की।
           प्लेटो का गुरु शिष्य के साक्षात सम्पर्क में विश्वास था,एकेडमी के सदस्य एक साथ रहते थे,एक साथ खाते और एक साथ पढ़ते थे।उनका जीवन धार्मिक और दार्शनिक था।
         प्लेटो की कृतियाँ सम्वादों (Dialogues)के रूप में हैं।प्लेटो के रचनाकाल को तीन भागों में बांटा जा सकता है।प्रथम काल एकेडमी की स्थापना के पूर्व का काल है, इस काल में एपॉलॉजी(Apology),क्राइटो
प्रोटेगोरस, जार्जियस, मेनो,फीडो,और सिम्पोजियम नामक सम्वादों की रचना हुई।
           द्वितीय काल  एकेडमी की स्थापना के तुरंत बाद का काल है, इस काल में रिपब्लिक और फीडरस(Phaedrus) नामक सम्वादों की रचना हुई।
        तृतीय काल प्लेटो के प्रौढ़ काल का है,इस काल में पार्मेनाइडीज
थीटीटस(Theaetetus),सोफिस्ट, फाईलेवस,(Philebus),टाइमियस
(Timaeus),और लॉज(Laws) नामक सम्वादों की रचना हुई।
         प्लेटो ने अपने असली सिद्धांत अपने शिष्यों को उपदेश रूप में दिये जिनका उन्होंने प्रकाशन नहीं किया।
      प्लेटो के समय में ग्रीक दर्शन अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंचा, इसलिए उनको पूर्ण ग्रीक की उपाधि दी गयी।

पाश्चात्य दर्शन 7 (सुकरात)…

सुकरात(socrates)-470-399ई.पू.- सुकरात का जन्म एथेंस में हुआ था,इनकी माता दाई का काम करती थींऔर इनके पिता शिल्प कार थे।
सुकरात देखने में आर्कषक नहीं थे,उनका जीवन एक ऋषि की भाँति था
वे इन्द्रियजित थे।उनके बारे में धर्मवाणी की गयी थी कि सुकरात सभी
मनुष्यों में सबसे अधिक बुद्धिमान हैं।सुकरात समझते थे कि वे सचमुच
अन्य लोगों से अधिक बुद्धिमान हैं, क्योंकि उन्हें अपनी अज्ञानता का ज्ञान था जबकि लोग अज्ञानी होते हुये भी अपने को ज्ञानी मानते हैं।
       उनपर युवाओं को बहकाने का अभियोग लगाया गया और उन्हें
विषपान द्वारा मृत्युदंड की सजा दी गयी।उनका वास्तविक अपराध
तत्कालीन प्रजातंत्र और नेताओं की पोल खोलकर उनके अज्ञान, दंभ और आडम्बर का प्रखर खंडन करना था।वे एक मास तक जेल में रहे,उनके मित्र और शिष्य उन्हें वहां से भगा ले जाने के लिये तैयार थे
परन्तु सुकरात ने अस्वीकार कर दिया और हंसते-हंसते विषपान कर लिया।
          सुकरात के दर्शन का ज्ञान उनके प्रधान शिष्य प्लेटो की कृतियों में उपलब्ध है। सामान्यों या विज्ञानों का सिद्धांत, इन्द्रियानुभूति और विज्ञान का भेद,विशुद्ध विज्ञान स्वरूप शिवतत्व और आत्मा की अमरता
आदि सिद्धांत मूल रूप में सुकरात के सिद्धांत कहे जा सकते हैं, जिनका प्लेटो ने विकास किया।
        सुकरात ने स्पष्ट रूप से तत्व के विज्ञान स्वरुप का प्रतिपादन किया और उसे दर्शन का केंद्र बना दिया। सुकरात ने प्रथम बार इस विज्ञान को नैतिक जीवन का भी आधार बनाया। प्लेटो ने सुकरात के विज्ञानवाद या साम्यवाद के बारे में ‘फीडो’ नामक अपनी कृति में भी कहा है।
         ज्ञान के विषय सामान्य हैं और इन्द्रियानुभव के विषय विशेष या व्यक्ति हैं। सत्य ज्ञान इन सामान्यों का ही ज्ञान है।विशेषों का ज्ञान केवल
व्यवहार है।विशेषों की सत्ता सामान्य में भाग लेने के कारण है।
        हमारा सांसारिक ज्ञान इन्द्रियानुभूति पर र्निभर है और इन्द्रियानुभूति दिव्य विज्ञानों पर आवरण डाल देती है।इन्द्रियों पर विजय
प्राप्त करके हम शरीर में रहते हुये उससे र्निलिप्त अशरीर बन सकते हैं
और आत्मज्ञान द्वारा दिव्य विज्ञानों का साक्षात्कार कर सकते हैं।
           सुकरात के दिव्य विज्ञान एक सूत्र में बद्ध हैं, यह सूत्र इन विज्ञानों का भी विज्ञान हैं, यह परम विज्ञान हैं इस परम विज्ञान को सिम्पोजियम में विशुद्ध सौन्दर्य और रिपब्लिक में विज्ञान स्वरूप शिवतत्व कहा गया है।यह शिवतत्व समस्त दिव्य विज्ञानों में और उसके द्वारा समस्त जगत में अनुस्यूत है यह परम तत्व है और इसका साक्षात्कार मानव जीवन का लक्ष्य है।
        सुकरात के दर्शन की पद्धति द्बंदात्मक तर्क की है,प्रश्नोत्तर की पद्धति है उनकी दार्शनिक पद्धति का लक्ष्य लोगों को अपने अज्ञान का
ज्ञान कराकर उनकी स्वानुभूति की ओर अग्रसर करने का था।सुकरात ने
दर्शन को विज्ञानों का विज्ञान माना है,दर्शन का लक्ष्य विशुद्ध विज्ञानस्वरूप तत्व का साक्षात्कार है।ज्ञान ही धर्म है शिवतत्त्व का ज्ञान
सबसे उत्तम धर्म है, अज्ञान अधर्म है।वास्तविक धर्म तो ज्ञान है जिसकी प्राप्ति होने पर अधर्म हो ही नहीं सकता।

पाश्चात्य दर्शन 6

सोफिस्ट सम्प्रदाय- जिन्होंने विचार स्वातंत्र्य को लाने में कार्य किया वे सोफिस्ट कहलाए। वे अपने समय के राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के दौर में आये।
      ग्रीक प्रजातंत्र में जो व्यक्ति राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में
उच्च पदों को प्राप्त करना चाहते थे, न्यायालय में वकील बनना चाहते थे
उन्हें तर्कपटु औरकुशल वक्ता होना आवश्यक था।उस समय आधुनिक विद्यालय नहीं थे अतः सोफिस्ट नगर नगर घूम कर सम्पन्न परिवारों के
युवाओं को शुल्क लेकर वक्तृत्व कला,साहित्य,दर्शन, राजनीति,तर्कशास्त्र आदि की शिक्षा देते थे । परन्तु बाद में  सोफिस्ट धन के लोभी हो गये, पर्याप्त धन मिलने पर वो कुछ भी कार्य करते थे, अतः वे हीन नजरों से देखे जाने लगे और सोफिस्ट शब्द व्यर्थ का तर्क करने वाले के संदर्भ में रह गया।


प्रोटेगोरस- प्रोटेगोरस का सिध्दांत है कि’मानव सब पदार्थों का मानदंड है(Homomensura). प्रोटेगोरस प्रथम सोफिस्ट थे, ये दर्शन,राजनीति, गणित, शिक्षाशास्त्र आदि विषयों के ज्ञाता थे। प्रोटेगोरस को उपयोगिता वाद का जन्मदाता कहा जा सकता है। उपयोगितावादी शिलर भी अपने को प्रोटेगोरस का शिष्य कहते हैं।
      प्लेटो ने अपनी एक कृति इनके नाम पर लिखी है।

  जार्जियसक् (Gorgias) – द्वितीय सोफिस्ट जार्जियस थे, इनके अनुसार
सत्य सापेक्ष है। निरपेक्ष सत्य असंभव है। उनका मत है, प्रथम तो कोई सत्य ही नहीं है, दूसरे यदि हो भी तो उसे हम नहीं जान सकते तीसरे यदि जान भी लें तो किसी को समझा नही सकते।

     प्रारंभ के सोफिस्ट दर्शन और ज्ञान में सच्चा प्रेम रखते थे परन्तु बाद के सोफिस्ट वृत्ति प्रेमी और धन के लोभी बन गये।









पाश्चात्य दर्शन 5

एम्पेडोक्लीज  (  Empedocles)-495ई.पू.-435ई.पू.

        एम्पेडोक्लीज दार्शनिक होने के साथ राजनीतिज्ञ भी थेऔर समाज में बहुत प्रतिष्ठित थे।एक बार इन्हें राजसिंहासन भी भेंट में दिया गया था
परन्तु इन्होंने अस्वीकार कर दिया।
      एम्पेडोक्लीज के अनुसार पृथ्वी, जल,वायु और अग्नि सभी मौलिक तत्व हैं अपने मौलिक रुप में ये अविकारी हैं।इनकी न उत्पत्ति होती है न ही विनाश होता है, इनका केवल संयोग और वियोग होता है। प्रेम संयोग
का जनक है और विरोध का जनक वियोग है।
         सृष्टि के आरंभ में सभी तत्व प्रेम के कारण इकाई की अवस्था में थे,कालान्तर में विरोध की अधिकता के कारण भेद उत्पन्न हुआ और परस्पर इनका वियोग हो गया तब से ही सृष्टि की प्रक्रिया आरंभ हुई।
सबसे पहले वायु पृथक  हुआ, फिर अग्नि, फिर जल औरफिर पृथ्वी।
जब प्रेम पुनः प्राधान्य  होगा तब ये महाभूत फिर दिव्यलोक में संयुक्त हो जायेंगे, यह प्रलय की अवस्था होगी।
          इसी प्रकार सृष्टि और प्रलय का क्रम चलता रहेगा। 

एनेक्जेगोरस(Enaxagoras) (500ई.पू.-428ई.पू.)

        एनेक्जेगोरस के अनुसार मौलिक परम तत्व अनेक हैं, इन तत्वों को वे बीज कहते हैं येबीज अनन्त हैं तथा इनके गुण भी अनन्त हैं।इन बीजों में गति उत्पन्न हुई और इस गति के कारण समान बीज आपस में  आर्कषित होकर मिल गये और सृष्टि का निर्माण  हुआ।
      प्रथम अवस्था को प्राकृत अवस्था कहते हैं, जिसमें सभी बीज मिश्रित हुये ये बीज भौतिक हैं अतः गति का कारण चेतन तत्व ही हो सकता है जो शक्ति मान है।इस चित् शक्ति युक्त तत्व को एनेक्जेगोरस
ने परम विज्ञान का नाम दिया। यह परम विज्ञान समस्त विश्व का
अधिष्ठाता है और बीजों में गति उत्पन्न करने का कारण है।


ल्यूसिपस व डिमाक्रिटस- (Leusipus-Democritus)-440ई.पू.-370ई.पू.

     ये दोनों परमाणु वादी दार्शनिक हैं।ल्यूसिपस का जन्म माइलेटस नगर में 440ई.पू. हुआ था,डिमाक्रिटस इनके शिष्य थे।
       
     ल्यूसिपस और डिमाक्रिटस के परमाणु मौलिक अविभाज्य, अतीन्द्रिय ,नित्य उत्पत्ति विनाश रहित जड़ तत्व हैं।गति उनका धर्म है।
उनमें केवल संख्या, परिमाण और आकार का भेद है, अन्य गुणों का भेद
उनमें नहीं है। वे आकाश में स्थित हैं और एक दूसरे से अलग हैं।
         सृष्टि की उत्पत्ति का अर्थ है उनका परस्पर संयोग और विनाश का
अर्थ है उनका परस्पर वियोग।
      ग्रीक परमाणुवादियों के अनुसार गति परमाणुओं का अपना धर्म है।


पाश्चात्य दर्शन 4

हेरेक्लाइटस( Hereclitus)-ये ई.पू.छठी शताब्दी के अंत और पांचवीं शताब्दी के आरंभ में हुए थे,इनका जन्म राजपरिवार में हुआ था।इन्होंने अपने छोटेभाई को उतराधिकारी घोषित कर दिया।रहस्यवाद की ओर इनकी स्वाभाविक रुचि थी,इनकी सूक्तियां अत्यन्त प्रसिद्ध हैं इन्होंने कहा है कि मेरा दर्शन सुयोग्य और विशिष्ट व्यक्तियों के लिए है,क्योंकि गधों को घास चाहिए स्वर्ण नहीं।
हेरेक्लाइटस ने संघर्ष, विरोध, निषेध और अभाव को महत्व दिया है।विरोध या निषेध के बिना विकास संभव नहीं है, विरोध का अर्थ है परिवर्तन। पक्ष का विपक्ष में परिवर्तन होता है और फिर समन्वय की आवश्यकता होती है, विरोध साधन मात्र है, साध्य समन्वय है।पक्ष और विपक्ष का विरोध समन्वय को उत्पन्न करता है।
वीणा के तार भिन्न भिन्न रीति से खींचे जाते है और तब भी विभिन्न स्वर एक ही राग को उत्पन्न करते हैं अतः विरोध समन्वय का जनक है। इनके विचारों में सापेक्षवाद(Relativism) और बुद्धि वाद( Rationalism) दोनों मिलते हैं।प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है, अतः प्रत्येक वस्तु सापेक्ष है। जो क्षणिक है उसका सापेक्ष होना अनिवार्य

है। समुद्र का पानी मछली के लिए मीठा और मनुष्य के लिये खारा होता है।
प्लेटो ने इन्द्रिय जगत के लिए हेरेक्लाइटस का क्षणिकवाद और
सापेक्षवाद स्वीकार किया है।उनके संघर्ष के सिद्धांत की छाप नीत्शे पर भी पड़ी। ह्यूम, विलियम जेम्स और वर्गसां पर क्षणिकवाद का प्रभाव पड़ा।विरोध या निषेध और समन्वय संबंधी विचार हीगल ने भी स्वीकार किए हैं। मेलिसस ( Melissus)- इन्होंने सत्ता शून्य आकाश का खण्डन करके सत् को अनन्त विज्ञान के रुप में प्रतिष्ठित किया। शून्य प्रतीत होने वाला आकाश भी अनन्त सत् से पूर्ण है और ये तभी हो सकता है जब

सत् भौतिक न होकर विज्ञान रुप हो।

पाश्चात्य दार्शनिक 3

इलियाई सम्प्रदाय-( eleatie school) – दक्षिणी इटली के इलिया नामक नगर के दार्शनिक इलियाई सम्प्रदाय के नाम से जाने जाते हैं।
ज़ेनोफेनीज(zenophanes) – ये इलियाई सम्प्रदाय के संस्थापक माने जाते हैं, ज़ेनोफेनीज एकेश्वरवादी थे,वे ईश्वर को निराकार और अंर्तयामी मानते थे।
वे मानव कल्पित ईश्वर के विरोधी थे।
मानव कल्पित देवताओं के सम्बंध में उनकी उक्ति प्रसिद्ध है-(मनुष्य सोचते हैं ईश्वर उनकी तरह उत्पन्न होता है,उसका स्वरूप मनुष्य के समान ही है यदि बैलों ,घोड़ों और शेरों के हाथ मनुष्य के समान होते और उन हाथों से वे चित्र बना सकते तो वे ईश्वर को क्रमशः
बैल ,घोड़े और शेर के रुप में चित्रित करते।)
ज़ेनोफेनीज के अनुसार ईश्वर नित्य, निराकार और अपरिणामी है। पार्मेनाइडीज-(parmenides)- पार्मेनाइडीज दक्षिणी इटली के इलिया नगर के निवासी थे,वे पाइथागोरस के अनुयायी थे परन्तु बाद में

जेनोफेनीज के विचारों से प्रभावित हो गये। पार्मेनाइडीज ने अपने दार्शनिक सिद्धांतों की व्याख्या छन्दों में की है।
पार्मेनाइडीज हेरेक्लाइटस के विरोधी थे,हेरेक्लाइटस ने क्षणिकवाद की
स्थापना की है और पार्मेनाइडीज ने शाश्वतवाद की।पार्मेनाइडीज के अनुसार तत्व शुद्ध सत् है,यह सत् मूलभूत, नित्य, शाश्वत, अविभाज्य तथा अपरिणामी है। इन्होंने तर्क दिया-सत् की उत्पत्ति या तो सत् से हुई है या असत् से।सत् की सत् से उत्पत्ति संभव नहीं, क्योंकि सत् पूर्व में ही
विद्दमान था,सत् की उत्पत्ति असत् से भी नहीं हो सकती क्योंकि शून्य से
किसी वस्तु का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता।
ज़ेनो (zeno)-इलियाई परम्परा के ज़ेनो अन्तिम दार्शनिक थे। ये
पार्मेनाइडीज के अनुयायी थे और निषेधात्मक तर्क के लिये विख्यात थे।
इन्हें द्वंद्वात्मक तर्क का जन्मदाता भी मानते हैं। ज़ेनो की कृतियों में
एम्पेडोक्लीज की व्याख्या, विवाद ,तथा प्रकृति पर निबंध आदि प्रसिद्ध हैं।

पाश्चात्य दार्शनिक …२

माइलेशियन मत के बाद पाइथेगोरियन मत का उद्भव हुआ , इसके संस्थापक पाइथागोरस थे। पाइथागोरस का जन्म सेमास(samos) में हुआ था।वे ५२५ई.पू.दक्षिणी इटली के उपनिवेश क्रटोना में जाकर बस गये। पाइथागोरस गणितज्ञ दार्शनिक थे,वे रेखागणित के संस्थापक माने जाते हैं।

उन्होंने पाइथागोरस समाज की स्थापना की ये समाज अपने समय का सबसे महत्वपूर्ण नैतिक तथा धार्मिक समाज माना जाता था। यह समाज आर्फिक धर्म से प्रभावित था ,इस धर्म की मान्यता के अनुसार, आत्मा समाधि के द्वारा मुक्त हो जाता है तथा आवागमन के चक्र से छूट जाता है।दर्शन बौद्धिक विलास नहीं, जीवन यापन की पद्धति है।

पाइथागोरस के अनुसार परम द्रव्य संख्या है,सभी संख्याओं की उत्पत्ति इकाई (unit) से होती है।अन्य सभी संख्याएँ इकाई के योग से बनती हैं।संख्या सम और विषम दो प्रकार की होती हैं। इसी प्रकार संसार भी पक्ष विपक्ष के द्बंदों से भरा हुआ है। सम संख्यायें सीमित होती हैं, क्योंकि इनका विभाजन हो सकता है परन्तु विषम संख्याएँ असीमित होती हैं क्योंकि ये अविभाज्य हैं।

सृष्टि उत्पत्ति के बाद संसार की सभी वस्तुओं को पाइथागोरस ने दस भागों में विभक्त किया है –

1- सीमित और असीमित(limited and unlimited)

2- विषम और सम( odd and even)

3- एक और अनेक ( one and many)

4- दक्षिण और वाम (right and left)

5- पुल्लिंग और स्त्रीलिंग(masculine and Feminine)

6- स्थिरता और गति ( rest and motion)

7- ऋजु और वक्र (straight and crooked)

8- प्रकाश और अंधकार (light and darkness )

9- शुभ और अशुभ (good and evil)

10- वर्ग और आयत (square and oblong)

माइलेशियन दार्शनिकों ने द्रव्य का विवेचन किया पाइथागोरस ने स्वरूप की प्रतिष्ठा की,स्वरूप अतीन्द्रिय, सामान्य और विज्ञान रुप है। इन्द्रियों द्वारा अनुभूत जगत में जितने भी विभिन्न पदार्थ हैं,वे सब विज्ञान की क्षीण प्रतिकृति हैं।

पाश्चात्य दार्शनिक

जिस प्रकार भारतीय दर्शन में वेदों का महत्व है, उसी प्रकार पाश्चात्य दर्शन में ग्रीक दर्शन का महत्व है ग्रीक दर्शन पाश्चात्य दर्शन का जनक माना गया है ।
           ग्रीक दर्शन का प्राचीन तम मत माइलेशियन मत(milesian school) कहलाता है। इस मत की स्थापना ६२४ ई.पू. ग्रीस उपनिवेश
माइलेटश में हुई थी, इसका अन्य नाम ionic school भी है ।
          इस मत में तीन दार्शनिक हुये, थेलीज(Thles), एनेक्जिमेण्डर
Anaximander, एनेक्जिमेनीज (Anaximanies)।
   थेलीज- इनका जन्म ग्रीस उपनिवेश माइलेटश में ६२४ ई.पू. हुआ था।
  वे दार्शनिक, गणितज्ञ, राजनीतिज्ञ और ज्योतिषी भी थे। उनकी गणना
ग्रीस के सात बुद्धि मान व्यक्तियों में की जाती है। कहा जाता है कि थेलीज ने २८ may ५८५ ई.पू. में होने वाले सूर्य ग्रहण की भविष्यवाणी की थी।
     थेलीज के अनुसार विश्व का परम द्रव्य जल है जिससे सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होता है, जल ही वाष्प तथा बूंद रूप होकर सबको जीवन रुप प्रदान करता है। जल ही विश्व का उपादान कारण है।

      एनेक्जिमेण्डर- एनेक्जिमेण्डर का जन्म६११ ई.पू. माइलेटश में हुआ था।वे थेलीज के मित्र तथा शिष्य भी थे।वे दार्शनिक, ज्योतिषी और 
भूगोल वेत्ता भी थे,इनका प्रकृति पर निबंध (on nature) यूरोपीय
दार्शनिक साहित्य की प्रथम कृति मानी जाती है।
         एनेक्जिमेण्डर किसी भौतिक तत्व को परम तत्व नहीं मानते, उनके अनुसार परम तत्व अनन्त या असीम  होना चाहिए, असीम या अनन्त के भीतर असंख्य संसार हैं, पृथ्वी पहले तरल थी,धीरे धीरे भाप द्वारा तरलता सूख गई और नमी उत्पन्न  हुई ।इसके बाद निम्न तथा बाद में उच्च प्राणियों की उत्पत्ति हुई, उनके अनुसार प्रारंभ में मनुष्य मछली के समान था और जल में रहता था ।
      एनेक्जिमेनीज- एनेक्जिमेनीज का जन्म माइलेटश में ५८८ ई.पू. हुआ था। ये एनेक्जिमेण्डर के सहयोगी तथा शिष्य थे। इन्होंने वायु को
विश्व का मूल द्रव्य स्वीकार किया है,वायु शरीरधारी मनुष्य का प्राण है,
वायु अग्नि का रूप ले लेता है, तरल होकर जल बन जाता है और जम कर पृथ्वी का रूप ले लेता है।सभी लोक वायु के आधार पर टिके हैं।



















ख़्वाब…

बहुत दिनों से मैंने कोई ख़्वाब नहीं देखा

ऐसा कोई तस्सवुर में नहीं है

जो मेरे ख़्वाबों की ताबीर बन सके

बिखरे हैं रंग मेरे ज़ेहन में मगर

कोई रंग ऐसा नहीं है कि

मुकम्मल कोई तस्वीर बन सके

Fables That Are as Old as Time…🍂🍃

When we think of our childhood, several beautiful images emerge in our minds. It is the most innocent and careless part of our lives, etched with numerous irreplaceable memories.. and one such memory is bedtime stories.
No matter in what part of this world we live, bedtime stories are an essential part of our earliest memories.
The magical stories, fables & folktales which delighted us to no end, that our parents and grandparents weaved for us, were the same stories they heard from their elders years ago, and their elders from theirs ..So on

But where these stories come from?
Unbeknown to us, several such stories specially those magical anthropomorphic animal tales come from Sanskrit literary creation ‘The Panchatantra’

The Panchatantra is an ancient Indian collection of intertwined animal fables and folktales originally in Sanskrit.
Its exact period is unknown but is believed to be written somewhere around 200 BC, based on even older times with many stories considered ancient by then, and passed down through oral storytelling traditions. 

Although Panchatantra’s author is unknown, but its composition is widely attributed to Aacharya Vishnusharma or Vishnusarman, who was a great scholar in Varanasi in 3rd century BC. Also its authorship was accredited to Bidpai or Pilpay in several other countries, which refers to indian sage or vidyapati.

The main story of Panchatantra is about the three dull & dimwitted sons of King Amarasakti of Mahilaropya. After several teachers fail in educating the princes, Acharya Vishnusharma is called upon for this purpose on advice of the king’s minister. He took up this challenge and taught the three princes the central Hindu principles of Niti, the practical and political wisdom to lead life through various tales and stories, which transformed them within six months.
The compilation of these stories came to be known as ‘Panchatantra’, because it consists of five ‘Tantra’ or parts. Each part contains a main story, which in turn contains several stories within it, where one character narrates a story to another. Often these stories contain further more stories.
You must have heard many like the Monkey and the Crocodile, the Stork and the Crab, the Elephants and the Mice, tale of Three Fish, the Foolish Lion and the Clever rabbit etc etc.

It is the most frequently translated literature of India, and these stories are also among the most widely known & translated in the world. It is known by many names in different countries & cultures. There is a version of Panchatantra in nearly every major language of India, and in addition there are 200 versions of the text in more than 50 languages around the world.

These fables are found in numerous world languages.
One version reached Europe in the 11th century, and before 1600 it existed in Greek, Latin, Spanish, Italian, German, English, Old Slavonic, Czech, and perhaps other Slavonic languages. 

It is also considered partly the origin of European works, such as folktale motifs found in Boccaccio, La Fontaine and the works of Grimm Brothers. Many believe that the popular worldwide animal-based fables has had origins in India and the Middle East.

Even many post-medieval era authors explicitly credit their inspirations to texts such as “Bidpai” and “Pilpay, the Indian sage” that are known to be based on the Panchatantra.

The French fabulist Jean de La Fontaine acknowledged this in his book –
“This is a second book of fables that I present to the public… I have to acknowledge that the greatest part is inspired from Pilpay, an Indian Sage”.

The Panchatantra is said to be the origin of several stories in Arabian Nights, and of many Western nursery rhymes and ballads as well.

And so these stories passed down through years and years.. centuries and millenniums. Something added something missed, but these stories travelled through us and continued to do so even today.
Lets maintain the magical spread of these tales, and the next time you hear one or narrate one, don’t forget to share their source – Panchatantra.

International Picnic Day😀😀😀

The word ‘picnic’ comes from the French Language and it describes a type of informal outdoor meal which was a popular pastime in France after the Revolution. It is celebrated in many countries but the origin of this day is not known. 

International Picnic Day is observed on June 18, every year. It is a day to encourage people to relax for a while and enjoy a little time in the lap of nature, with friends and family. In the early days, people love to spend hours on a picnic with their loved ones.
People all around the world love to go on picnics. It also give us a little break from our monotonous lives. Families used to carry food, outdoor games, soft drinks, juices and other essentials to share it with their friends. According to the Guinness Book of World records, the largest Picnic took place in Portugal.

Due to the lockdown, there are restrictions for people to conduct social gathering. But someone said so truly that,
 ‘A picnic is a state of mind and can be made anywhere.’

On this Picnic Day, let us all celebrate with our loved ones at home.
● Spend some quality time with your family either in the balcony or in the lawn.
● Prepare some delicious dishes and eat it together.
● Play some games like a business, ludo, carrom or other board games.
● Spend the day without your phone and dedicate your day just for your family.
● Play your favorite musical instruments (if any) for your family.
● Listen some soothing songs along with your loved ones.

World Oceans Day 🌊🌊🌊

Oceans, the little word but contains enormous water, so deep so vivid and so blue. In literature, the beauty of ocean has been defined in different ways. In science, it has been a subject of exploration.I believe ocean has great impact on human lives all along weather they are inspiration, discoveries or source of livelihood.

To raise awareness of the vital importance of our oceans, World Oceans Day is held every year on 8th June and the role they play in sustaining a healthy planet. The oceans provide food, generate oxygen, regulate our climate and so much more. This global celebration recognises the importance of preserving healthy oceans. It is also a day to remind the mankind about the major role of the oceans in everyday life.They are the lungs of the earth, providing 70% of the oxygen.The purpose of the Day is to aware the people of the impact of human actions on the ocean, develop a worldwide movement of citizens for the ocean, and mobilize and unite the world’s population on a project for the sustainable management of the world’s oceans. They are a major source of food and medicine and a critical part of the biosphere. In the end, it is a day to celebrate together the beauty, the wealth and the promise of the ocean.

The theme of UN World Oceans Day 2020 is “Innovation for a Sustainable Ocean.”
This year’s theme is relevant for the coming decade.The Decade will strengthen international cooperation to develop the scientific research and innovative technologies that can connect ocean science with the needs of society.

Important facts:

Oceans serve as the world’s largest source of protein, with more than 3 billion people depending on the oceans as their primary source of protein

Over three billion people depend on marine and coastal biodiversity for their livelihoods.

Oceans absorb about 30% of carbon dioxide produced by humans, buffering the impacts of global warming.

Global Day of Parents…

The date 1st of June of every year is honoured by the UN General Assembly proclaimed it as the Global day of parents.
A child needs the parents love and support more than anything else in life. Just like plant’s growth is not possible without soil, light and water, a child’s life is also incomplete without parents.
Emphasizing the critical role of parents in the upbringing of children, the Global Day of Parents emphasize that the family has the primary responsibility for the nurturing and protection of children. For the proper growth and overall development of their personality, children should grow up in a healthy family environment and in an atmosphere of happiness, love and care.
Someone says it so beautifully that
“Behind every child who believe in himself is a parent who believe him first.”
Global Day of Parents provides an opportunity to appreciate all parents all over the world for their “selfless commitment to children and their lifelong sacrifice towards nurturing this relationship.” There is a saying that, “A parent’s love is whole no matter how many times divided.”
Today I request all my friends that please find some time from your busy schedule and appreciate your parents and thank God for such beautiful blessings.

Baital pachisi…

Baital pachisi is the collection of stories written by a great scholar Somdev Bhatt in 11th century. It is found in katha sarit sagar originally written in sanskrit. These stories were narrated by baital (a celestial spirit)to King Vikramaditya.
King Vikram was the great king and he possessed every quality of the great ruler. One day in his court a tantrik(mendicant) came to request his help. Since King Vikram was devoted towards the help for his people , he quickly asked what he can do for him. To which tantrik replies that he wanted the baital for the completion of rituals for the deity.But bringing him to tantrik is not an easy task and only a brave warrior like King Vikram has the ability to do that and thats why he came up with this request in his court.
King Vikram readily accepts his request and reached in the jungle where baital was hanging on the tree upside down.
After the struggle between King Vikram and baital, Vikram put him on his shoulder and started his journey towards tantrik. Baital told Vikram that now finally he is taking him towards tantrik and he can’t do anything so he will told a story during their journey. But it has two conditions , first Vikram will not speak in the entire journey otherwise he will leave and second at the end of the story baital will ask a question and if King knows the answer he has to give it otherwise his head will blown into several pieces.
To which king agrees and baital started the story.
But after every story narrated by baital, king Vikram knows the answer and after hearing the answer , betaal left. This cycle continued for twenty five days and finally seeing the bravery and determination of king vikram, baitaal got impressed. Baitaal got ready to go with king vikram and also told him the true motive of the tantrik and the way also by which he can save himself from the evil plans of tantrik.
These are spellbinding stories of knowledge and wisdom.
I request all my friends that if they are not aware of this source of knowledge, please find time to read such a masterpiece and share it with your family and friends.

मूल कर्त्तव्य 🇮🇳

४२वें संविधान संशोधन अधिनियम (१९७६) द्वारा दस मूल कर्त्तव्यों को जोड़ा गया ।

अनुच्छेद ५१ क के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य होगा कि वह :

1. संविधान का पालन करे और उसके आदर्शो ,संस्थाओं ,राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान काआदर करे ।

2. स्वतंत्रता के लिये हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शो को ह्रदय में संजोये रखे और उनका पालन करे ।

3. भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करेऔर उसे अक्षुण्ण रखे ।

4. देश की रक्षा करे और आह्वान किये जाने पर राष्ट्र की सेवा करे ।

5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करें जो धर्म ,भाषा और प्रदेश या वर्ग आधारित सभी भेदभाव से परे हों,ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरूद्ध हैं ।

6. हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करें।

7. प्राकृतिक पर्यावरण की जिसके अंतर्गत वन,झील ,नदी और वन्य जीव है ,रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा प्राणी मात्र के प्रति दया भाव रखें ।

8. वैज्ञानिक दृष्टि कोण मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें ।

9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें ।

10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुये प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू ले ।

11. 6 से 11 वर्ष तक की उम्र के बीच अपने बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना।

12. यह कर्त्तव्य 86 वें संविधान संशोधन अधिनियम २००२ के द्वारा जोड़ा गया ।

वित्त आयोग…

भारत के संविधान मेंअनुच्छेद २८० के अन्तर्गत अर्द्धन्यायिक निकाय के रूप में वित्तआयोग की व्यवस्था की गयी है ।इसका गठन राष्ट्रपति द्वारा हर पाँचवें वर्ष या आवश्यकतानुसार किया जाता है ।

वित्त आयोग में एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होते हैं ,जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है ।उनका कार्य काल राष्ट्रपति के आदेश से तय होता है।

संविधान ने संसद को इन सदस्यों की योग्यता और चयन विधि का निर्धारण करने का अधिकार दिया है ।

अध्यक्ष सार्वजनिक मामलों का अनुभवी होना चाहिये,अन्य चार सदस्यों को निम्न में से चुना जाना चाहिये –

१ किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या इस पद के योग्य व्यक्ति।

२- ऐसा व्यक्ति जो भारत के लेखाएवं वित्त मामलों में विशेष ज्ञान रखता हो ।

३- जिसे प्रशासन और वित्तीय मामलों का व्यापक अनुभव हो ।

४- जिसे अर्थ शास्त्र का विशेष ज्ञान हो ।

वित्त आयोग,भारत के राष्ट्रपति को निम्नांकित मामलों पर सलाह देता है :

1. संघ और राज्यों के बीच करों के शुद्ध आगमों का वितरण और राज्यों के बीच ऐसे आगमों का आवंटन ।

2. भारत की संचित निधि में राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान को शासित करने वाले सिद्धांत ।

3. राज्य वित्त आयोग द्वारा की गयी सिफ़ारिशों के आधार पर राज्य में नगरपालिकाओंऔर पंचायतों के संसाधनों की अनु पूर्ति के लिये राज्य की संचित निधि के संवर्धन के लिये आवश्यक उपाय ।

4. राष्ट्रपति द्वारा आयोग को सुदृढ़ वित्त के हित में निर्दिष्ट कोई अन्य विषय ।

आयोग अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपता है, जो इसे संसद के दोनों सदनों में रखता है ।

वित्त आयोग की सिफ़ारिशों की प्रकृति सलाहकारी होती है इनको मानने के लिये सरकार बाध्य नहीं होती है ।

International Day Of The Book 📚

Eyes tracing the foxing pages of some old library book, deeply inhaling the fresh scent of a brand new paperback, or fingers virtually flipping the pages of an ebook.. a book in any form never fails to leave the reader spellbound in its magic.

And to celebrate this little wonder called BOOKS, the United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization (UNESCO) decided to celebrate April 23 as World Book Day, also known as World Book and Copyright Day, or International Day of the Book, as an annual event to promote reading, publishing, and copyright.
The first World Book Day was celebrated on 23 April in 1995.

The Spanish writer Vicente Clavel Andrés originally suggested 7 October, the birth date of author Miguel de Cervantes, then on 23 April, his death date to be declared as World Book Day, to honour the author. However in 1995 UNESCO decided that the World Book and Copyright Day would be celebrated on 23 April, as the date is the death anniversary of not only Miguel de Cervantes but also of William Shakespeare and Inca Garcilaso de la Vega, as well as the birth or death anniversaries of several other prominent authors.

Audrey Azoulay, Director General of UNESCO quoted “Books have the unique ability both to entertain and to teach. They are at once a means of exploring realms beyond our personal experience through exposure to different authors, universes and cultures, and a means of accessing the deepest recesses of our inner selves.”

“Reading gives us someplace to go when we have to stay where we are.” – Mason Cooley

Rightly termed as a magical portal, books make our minds to expand and fly to the beautiful worlds created by authors through ages.
More than ever, at a time where most of us around the world are in their homes amid corona crisis, with movement restricted, books are the best tool to combat boredom in this isolation.

So on this International Book Day lets grab a book, dive inside our minds and travel within ourselves while staying at home.

राष्ट्रीय झंडा🇮🇳🇮🇳🇮🇳

राष्ट्रीय झंडा -जब राष्ट्रपति देश में ही रेलगाड़ी से यात्रा करते हैं तो जब गाड़ी स्टेशन पर खड़ी होगी या जहाँ उन्हें पहुँचना हो वहाँ पहुँच गयी हो तो राष्ट्रीय झंडा लगाया जायेगा,ड्राइवर की केबिन की ओर राष्ट्रीय झंडा तब तक लगा रहेगा जब तक गाड़ी स्टेशन पर खड़ी रहेगी ।

राष्ट्रपति ,उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के विदेश यात्रा करते समय विमान पर झंडा लगाया जायेगा जिस विमान में वे यात्रा कर रहे होगें ।जिस देश की यात्रा कर रहे होगें उस देश का भी झंडा राष्ट्रीय झंडे के साथ लगाया जायेगा। मार्ग में आने वाले देशों ,जिन जिन देशों में विमान से उतरें शिष्टाचार और सद्भावना के कारण संबंधित देशों के झंडे लगाये जायें।

जब राष्ट्रपति देश में ही कहीं दौरे पर जायें तो राष्ट्रीय झंडा वायुयान के उस ओर लगाया जायेगा जिस ओर से राष्ट्रपति विमान में चढ़ें या उतरें ।

450×300 mm आकार के झंडे अति गणमान्य व्यक्तियों को ले जाने वाले विमानों के लिये ; 225x 150 mm के आकार के झंडे कारों पर तथा 150×100 mm (मिलीमीटर) आकार के झंडे मेजों के लिये होते हैं ।

मोटरकारों पर झंडा लगाने का अधिकार केवल निम्न गणमान्य व्यक्तियों को है  : 1.राष्ट्रपति

2.उपराष्ट्रपति

3.राज्यपाल, और उपराज्यपाल

4. विदेशों में नियुक्त भारतीय दूतावासों एवं कार्यालयों के अध्यक्ष

5. प्रधानमंत्री एवं उनके कैबिनेट मंत्री, केन्द्र के राज्यमंत्री और उपमंत्री, राज्यों अथवा संघ शासित क्षेत्रों के मुख्यमंत्री और अन्य कैबिनेट मंत्री।राज्यों अथवा संघ शासित क्षेत्रों के मंत्री और उपमंत्री।

6.लोकसभा के अध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति, सभा के लोकसभा के उपाध्यक्ष, राज्य विधान परिषदों केसभापति ,राज्य और संघ शासित क्षेत्रों की विधानसभाओं के अध्यक्ष, राज्य विधान परिषदों के उपसभापति ,राज्यों तथा संघ शासित क्षेत्रों की विधानसभाओं के उपाध्यक्ष।

7.  भारत के मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश
उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश।

  8.जब कोई विदेशी गणमान्य व्यक्ति सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गयी कार में यात्रा करे तो राष्ट्रीय झंडा कार के दाहिनी ओर लगाया जायेगा और संबंधित देश का झंडा कार की बायीं ओर लगाया जायेगा।