Global Day of Parents…

The date 1st of June of every year is honoured by the UN General Assembly proclaimed it as the Global day of parents.
A child needs the parents love and support more than anything else in life. Just like plant’s growth is not possible without soil, light and water, a child’s life is also incomplete without parents.
Emphasizing the critical role of parents in the upbringing of children, the Global Day of Parents emphasize that the family has the primary responsibility for the nurturing and protection of children. For the proper growth and overall development of their personality, children should grow up in a healthy family environment and in an atmosphere of happiness, love and care.
Someone says it so beautifully that
“Behind every child who believe in himself is a parent who believe him first.”
Global Day of Parents provides an opportunity to appreciate all parents all over the world for their “selfless commitment to children and their lifelong sacrifice towards nurturing this relationship.” There is a saying that, “A parent’s love is whole no matter how many times divided.”
Today I request all my friends that please find some time from your busy schedule and appreciate your parents and thank God for such beautiful blessings.

Baital pachisi…

Baital pachisi is the collection of stories written by a great scholar Somdev Bhatt in 11th century. It is found in katha sarit sagar originally written in sanskrit. These stories were narrated by baital (a celestial spirit)to King Vikramaditya.
King Vikram was the great king and he possessed every quality of the great ruler. One day in his court a tantrik(mendicant) came to request his help. Since King Vikram was devoted towards the help for his people , he quickly asked what he can do for him. To which tantrik replies that he wanted the baital for the completion of rituals for the deity.But bringing him to tantrik is not an easy task and only a brave warrior like King Vikram has the ability to do that and thats why he came up with this request in his court.
King Vikram readily accepts his request and reached in the jungle where baital was hanging on the tree upside down.
After the struggle between King Vikram and baital, Vikram put him on his shoulder and started his journey towards tantrik. Baital told Vikram that now finally he is taking him towards tantrik and he can’t do anything so he will told a story during their journey. But it has two conditions , first Vikram will not speak in the entire journey otherwise he will leave and second at the end of the story baital will ask a question and if King knows the answer he has to give it otherwise his head will blown into several pieces.
To which king agrees and baital started the story.
But after every story narrated by baital, king Vikram knows the answer and after hearing the answer , betaal left. This cycle continued for twenty five days and finally seeing the bravery and determination of king vikram, baitaal got impressed. Baitaal got ready to go with king vikram and also told him the true motive of the tantrik and the way also by which he can save himself from the evil plans of tantrik.
These are spellbinding stories of knowledge and wisdom.
I request all my friends that if they are not aware of this source of knowledge, please find time to read such a masterpiece and share it with your family and friends.

मूल कर्त्तव्य 🇮🇳

४२वें संविधान संशोधन अधिनियम (१९७६) द्वारा दस मूल कर्त्तव्यों को जोड़ा गया ।

अनुच्छेद ५१ क के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य होगा कि वह :

1. संविधान का पालन करे और उसके आदर्शो ,संस्थाओं ,राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान काआदर करे ।

2. स्वतंत्रता के लिये हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शो को ह्रदय में संजोये रखे और उनका पालन करे ।

3. भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करेऔर उसे अक्षुण्ण रखे ।

4. देश की रक्षा करे और आह्वान किये जाने पर राष्ट्र की सेवा करे ।

5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करें जो धर्म ,भाषा और प्रदेश या वर्ग आधारित सभी भेदभाव से परे हों,ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरूद्ध हैं ।

6. हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करें।

7. प्राकृतिक पर्यावरण की जिसके अंतर्गत वन,झील ,नदी और वन्य जीव है ,रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा प्राणी मात्र के प्रति दया भाव रखें ।

8. वैज्ञानिक दृष्टि कोण मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें ।

9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें ।

10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुये प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू ले ।

11. 6 से 11 वर्ष तक की उम्र के बीच अपने बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना।

12. यह कर्त्तव्य 86 वें संविधान संशोधन अधिनियम २००२ के द्वारा जोड़ा गया ।

वित्त आयोग…

भारत के संविधान मेंअनुच्छेद २८० के अन्तर्गत अर्द्धन्यायिक निकाय के रूप में वित्तआयोग की व्यवस्था की गयी है ।इसका गठन राष्ट्रपति द्वारा हर पाँचवें वर्ष या आवश्यकतानुसार किया जाता है ।

वित्त आयोग में एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होते हैं ,जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है ।उनका कार्य काल राष्ट्रपति के आदेश से तय होता है।

संविधान ने संसद को इन सदस्यों की योग्यता और चयन विधि का निर्धारण करने का अधिकार दिया है ।

अध्यक्ष सार्वजनिक मामलों का अनुभवी होना चाहिये,अन्य चार सदस्यों को निम्न में से चुना जाना चाहिये –

१ किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या इस पद के योग्य व्यक्ति।

२- ऐसा व्यक्ति जो भारत के लेखाएवं वित्त मामलों में विशेष ज्ञान रखता हो ।

३- जिसे प्रशासन और वित्तीय मामलों का व्यापक अनुभव हो ।

४- जिसे अर्थ शास्त्र का विशेष ज्ञान हो ।

वित्त आयोग,भारत के राष्ट्रपति को निम्नांकित मामलों पर सलाह देता है :

1. संघ और राज्यों के बीच करों के शुद्ध आगमों का वितरण और राज्यों के बीच ऐसे आगमों का आवंटन ।

2. भारत की संचित निधि में राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान को शासित करने वाले सिद्धांत ।

3. राज्य वित्त आयोग द्वारा की गयी सिफ़ारिशों के आधार पर राज्य में नगरपालिकाओंऔर पंचायतों के संसाधनों की अनु पूर्ति के लिये राज्य की संचित निधि के संवर्धन के लिये आवश्यक उपाय ।

4. राष्ट्रपति द्वारा आयोग को सुदृढ़ वित्त के हित में निर्दिष्ट कोई अन्य विषय ।

आयोग अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपता है, जो इसे संसद के दोनों सदनों में रखता है ।

वित्त आयोग की सिफ़ारिशों की प्रकृति सलाहकारी होती है इनको मानने के लिये सरकार बाध्य नहीं होती है ।

International Day Of The Book 📚

Eyes tracing the foxing pages of some old library book, deeply inhaling the fresh scent of a brand new paperback, or fingers virtually flipping the pages of an ebook.. a book in any form never fails to leave the reader spellbound in its magic.

And to celebrate this little wonder called BOOKS, the United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization (UNESCO) decided to celebrate April 23 as World Book Day, also known as World Book and Copyright Day, or International Day of the Book, as an annual event to promote reading, publishing, and copyright.
The first World Book Day was celebrated on 23 April in 1995.

The Spanish writer Vicente Clavel Andrés originally suggested 7 October, the birth date of author Miguel de Cervantes, then on 23 April, his death date to be declared as World Book Day, to honour the author. However in 1995 UNESCO decided that the World Book and Copyright Day would be celebrated on 23 April, as the date is the death anniversary of not only Miguel de Cervantes but also of William Shakespeare and Inca Garcilaso de la Vega, as well as the birth or death anniversaries of several other prominent authors.

Audrey Azoulay, Director General of UNESCO quoted “Books have the unique ability both to entertain and to teach. They are at once a means of exploring realms beyond our personal experience through exposure to different authors, universes and cultures, and a means of accessing the deepest recesses of our inner selves.”

“Reading gives us someplace to go when we have to stay where we are.” – Mason Cooley

Rightly termed as a magical portal, books make our minds to expand and fly to the beautiful worlds created by authors through ages.
More than ever, at a time where most of us around the world are in their homes amid corona crisis, with movement restricted, books are the best tool to combat boredom in this isolation.

So on this International Book Day lets grab a book, dive inside our minds and travel within ourselves while staying at home.

राष्ट्रीय झंडा🇮🇳🇮🇳🇮🇳

राष्ट्रीय झंडा -जब राष्ट्रपति देश में ही रेलगाड़ी से यात्रा करते हैं तो जब गाड़ी स्टेशन पर खड़ी होगी या जहाँ उन्हें पहुँचना हो वहाँ पहुँच गयी हो तो राष्ट्रीय झंडा लगाया जायेगा,ड्राइवर की केबिन की ओर राष्ट्रीय झंडा तब तक लगा रहेगा जब तक गाड़ी स्टेशन पर खड़ी रहेगी ।

राष्ट्रपति ,उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के विदेश यात्रा करते समय विमान पर झंडा लगाया जायेगा जिस विमान में वे यात्रा कर रहे होगें ।जिस देश की यात्रा कर रहे होगें उस देश का भी झंडा राष्ट्रीय झंडे के साथ लगाया जायेगा। मार्ग में आने वाले देशों ,जिन जिन देशों में विमान से उतरें शिष्टाचार और सद्भावना के कारण संबंधित देशों के झंडे लगाये जायें।

जब राष्ट्रपति देश में ही कहीं दौरे पर जायें तो राष्ट्रीय झंडा वायुयान के उस ओर लगाया जायेगा जिस ओर से राष्ट्रपति विमान में चढ़ें या उतरें ।

450×300 mm आकार के झंडे अति गणमान्य व्यक्तियों को ले जाने वाले विमानों के लिये ; 225x 150 mm के आकार के झंडे कारों पर तथा 150×100 mm (मिलीमीटर) आकार के झंडे मेजों के लिये होते हैं ।

मोटरकारों पर झंडा लगाने का अधिकार केवल निम्न गणमान्य व्यक्तियों को है  : 1.राष्ट्रपति

2.उपराष्ट्रपति

3.राज्यपाल, और उपराज्यपाल

4. विदेशों में नियुक्त भारतीय दूतावासों एवं कार्यालयों के अध्यक्ष

5. प्रधानमंत्री एवं उनके कैबिनेट मंत्री, केन्द्र के राज्यमंत्री और उपमंत्री, राज्यों अथवा संघ शासित क्षेत्रों के मुख्यमंत्री और अन्य कैबिनेट मंत्री।राज्यों अथवा संघ शासित क्षेत्रों के मंत्री और उपमंत्री।

6.लोकसभा के अध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति, सभा के लोकसभा के उपाध्यक्ष, राज्य विधान परिषदों केसभापति ,राज्य और संघ शासित क्षेत्रों की विधानसभाओं के अध्यक्ष, राज्य विधान परिषदों के उपसभापति ,राज्यों तथा संघ शासित क्षेत्रों की विधानसभाओं के उपाध्यक्ष।

7.  भारत के मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश
उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश।

  8.जब कोई विदेशी गणमान्य व्यक्ति सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गयी कार में यात्रा करे तो राष्ट्रीय झंडा कार के दाहिनी ओर लगाया जायेगा और संबंधित देश का झंडा कार की बायीं ओर लगाया जायेगा।

Karl Marx

समाजवाद के सबसे बड़े चिंतक Karl Marx का जन्म जर्मनी के राइन प्रदेश के ट्रियर(trier) के एक यहूदी परिवार में हुआ था।धर्म में उनकी बिल्कुल भी आस्था नही थी।उन्होंने बान विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की,वो विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बनना चाहते थे परन्तु असफल रहे।वे दार्शनिक। हीगल से प्रभावित थे,उन्होंने यूनानी दर्शन में डाक्टर की उपाधि प्राप्त की थी । वो राइन प्रदेश में एक अखबार के संपादक बन गये।1843 में एक आस्थावान समाजवादी के रुप में वे पेरिस पहुंचे, वहां उनकी मुलाकात फ्रैड्रिक ऐंगल्स से हुई वे दोनों घनिष्ठ मित्र बन गए।फ्रैड्रिक के पिता की मैन्चैस्टर में सूती कपड़ा बुनने की फैक्ट्री थी,जहाँ कार्ल ने फैक्ट्री के श्रमिकों की स्थिति को करीब से जाना। 1844 में उन्होंने अंग्रेजी श्रमिकों की दशा पर एक पुस्तक लिखी, तथ्यों के साथ उन्होंने अपना विख्यात शोधपत्र तैयार किया जो पूँजीवाद के विरोध में था।1847 में उन्होंने प्रसिद्ध कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो की रचना की,जिसे 1848 की क्रांतियों की पूर्व संध्या पर प्रकाशित किया गया।इस मेनीफेस्टो के अंत में उन्होंने श्रमिकों का आह्वान करते हुये लिखा,श्रमिकों का उनकी बेड़ियों के अलावा कुछ नहीं खोयेगा, उन्हें विश्व पर विजय प्राप्त करनी है,दुनिया के श्रमिक एक हों। कार्ल मार्क्स ने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर सिद्ध करने की कोशिश की ,कि पूँजीवादी समाज का विनाश तथा भविष्य में समाजवादी क्रांति की सफलता अवश्यंभावी है। कार्ल मार्क्स के विचार में ऐतिहासिक प्रक्रिया में प्राचीन समाज का आधार दासता, सामंतवादी समाज का आधार भूमि तथा मध्यवर्गीय समाज का आधार नकद पूँजी है ।यही उनकी इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या है। हीगल के द्बंद्बात्मवाद का प्रयोग कर कार्ल मार्क्स ने समाजवाद की अनिवार्यता प्रदर्शित की,हीगल का द्बंद्बात्मवाद विचार से जुड़ा था,कार्ल मार्क्स ने उसे भौतिक परिस्थितियों से जोड़ा। इस सिध्दांत से कार्ल मार्क्स ने निष्कर्ष निकाला कि सामंती जमींदारों केकृषक समाज का नगरीय मध्यवर्ग ने विनाश किया। कार्ल मार्क्स मौलिक रुप से एक दार्शनिक और अर्थशास्त्री थे,उनकी विश्व विख्यात रचना ,दास कैपीटल है,इसके अलावा उन्होंने कई पत्र और निबंध भी लिखे हैं। उनकी मृत्यु 1883 में हुई, कार्ल मार्क्स के लेख बड़े स्तर पर प्रकाशित हुये जिससे समाज वादी विचारों का विस्तार हुआ। 1864 में लंदन में अंतरराष्ट्रीय श्रमजीवी संघ की स्थापना हुई, यह संघ इतिहास में प्रथम इन्टरनेशनल के नाम से प्रसिद्ध है।

केंद्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission)

केंद्रीय सतर्कता आयोग (central vigilance commission) – केंद्रीय सतर्कता आयोग भारत सरकार के विभिन्न विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार नियंत्रण की सबसे बडी़ संस्था है।इसकी स्थापना1964 में की गई थी।। केंद्रीय सतर्कता आयोग सांविधिक दर्जा प्राप्त एक बहु सदस्यीय संस्था है। यह केंद्रीय सरकारी संगठनों के विभिन्न प्राधिकारियों को उनके सतर्कता कार्यों की योजना बनाने, समीक्षा करने और सुधार करने में सलाह देता है। केंद्रीय सतर्कता आयोग(cvc) विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा वर्ष 2003 में पारित किया गया जिसे राष्ट्रपति ने 11 सितंबर 2003 को स्वीकृति दी। इसमें एक केंद्रीय सतर्कता आयुक्त जो अध्यक्ष होता है,दो अन्य सतर्कता आयुक्त(दो से अधिक सदस्य नही हो सकते) होते हैं।इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक तीन सदस्यीय समिति की सिफारिश पर होती है ,इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता व केंद्रीय गृहमंत्री होते हैं । इनका कार्य काल चार वर्ष अथवा पैंसठ वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) होती है । केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के वेतन भत्ते व अन्य सेवा शर्तें संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के समान होते हैं और सतर्कता आयुक्त के वेतन भत्ते संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों के समान होते हैं। भारत सरकार ने केंद्रीय सतर्कता आयोग को भ्रष्टाचार के किसी भी आरोप को प्रकट करने अथवा कार्या लय का दुरुपयोग करने संबंधित लिखित शिकायतें प्राप्त करने तथा उचित कार्यवाही की सिफारिश करने वाली एक नामित एजेंसी के रूप में अधिकृत किया है। भारत के राष्ट्रपति द्वारा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों को अपने कार्य क्षेत्र के बाहर किसी भी लाभ का पद ग्रहण करने ,मानसिक शारीरिक अक्षमता के कारण कार्य में अक्षम होने पर अथवा कोई अन्य लाभ कापद जो आयोग के अनुसार अनुचित हो ,उन्हें पदमुक्त किया जा सकता है। केंद्रीय सतर्कता आयोग का अपना सचिवालय, मुख्य तकनीकी परीक्षक शाखा(CT E) तथा विभागीय जांचों के आयुक्तों की शाखा होगी। सचिवालय में एक सचिव, सयुंक्त सचिव गण,उपसचिव गण,अवर सचिव गण तथा कार्यालय कर्मचारी होगें। केंद्रीय सतर्कता आयोग की तकनीकी मुख्य तकनीकी परीक्षक संगठन है, जिसमें मुख्य अभियंता उसका पदनाम मुख्य तकनीकी परीक्षण होता है तथा सहायक इंजीनियरी स्टाफ होते हैं । केंद्रीय सतर्कता आयोग(cvc) अपनी कार्यवाही मुख्यालय नयी दिल्ली से संचालित करता है,इसके पास दीवानी न्यायालय जैसी सभी शक्तियां हैं।यह केन्द्र सरकार सेऔर इसके प्राधिकरणों से किसी भी जानकारी या रिपोर्ट की मांग कर सकता है,जिससे भ्रष्टाचार रहित कार्यों पर नजर रख सके। CVC अपने वार्षिक कार्यों की रिपोर्ट राष्ट्रपति को देता है।

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस

महिला दिवस की शुरुआत अमेरिका में महिलाओं ने ही की थी।बाद में इसे सयुंक्त राष्ट्र ने आधिकारिक रुप से मान्यता प्रदान की।
आज के दिन महिलाओं को उनकी उपलब्धि के लिए सम्मानित किया जाता है।
पहली बार महिला दिवस 19 मार्च 1911 में आस्ट्रिया, जर्मनी, डेनमार्क और स्विट्जरलैंड के लाखों लोगों ने मनाया था।
इसके बाद अमेरिका में 1913 से हर वर्ष फरवरी के अंतिम रविवार को राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता था। फरवरी माह के अंतिम रविवार को रूसी महिलाओं द्वारा भी पहली बार महिला दिवस मनाया गया।
परन्तु 1914 से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 8मार्च को रखा गया, तभी से हर जगह महिला दिवस 8 मार्च को मनाया जाने लगा।
1975 में महिला दिवस को आधिकारिक मान्यता दी गई जब सयुंक्त राष्ट्र ने इसे वाषिर्क थीम के साथ मनाना शुरू किया, पहली थीम थी -सेलीब्रेटिंग द पास्ट, प्लानिंग फार द फ्यूचर,।
समाज में महिलाओं के योगदान और उपलब्धियों पर ध्यान केंद्रित करने के लिये पूरे विश्व में 8 मार्च को महिला दिवस मनाया जाता है।
इस बार महिला दिवस की थीम है-each for equal ।

Newspaper Day

२९ जनवरी १७८० को न्यूज़ पेपर डे मनाया जाता है क्योंकि ,भारत का पहला समाचार पत्र बंगाल गजट २९ जनवरी १७८० को James Augustus hicky ने प्रकाशित किया था ।

प्राचीन काल में सर्वप्रथम रोम में acta diurha नाम से घोषणापत्र होते थे जो किसी धातु या पत्थर पर उत्कीर्ण किये जाते थे इन्हें सार्वजनिक स्थल पर पढ़ने के लिये लगा दिया जाता था ।

७१३- ७३४ ए.डी में चीन के तान वंश के काल में सरकारी समाचार हाथ से सिल्क पर लिखा जाता था जो सरकारी कर्मचारियों द्वारा पढ़ कर सुनाया जाता था इसे kaiyuan za bao कहते थे ।

इसी प्रकार १५५६ में वेनिस में सरकार ने मासिक पत्र शुरू किया था जिसका नाम Notizie Scritte था ।इस पत्र द्वारा राजनैतिक, सेना और अर्थ व्यवस्था से सम्बन्धित ख़बरें बाक़ी शहरों में पहुँचाई जाती थी ।

दुनिया का प्रथम समाचार पत्र जर्मनी में जर्मन भाषा में प्रकाशित हुआ ,इस पत्र का नाम Relation aller furnemmen und gedenckwurdigen historian था ।

पहला हिन्दी न्यूज़ पेपर उदन्त मार्तण्ड था ये हर सप्ताह मंगलवार को प्रकाशित किया जाता था ।ये १८२६- १८२७ कलकत्ता से निकलता था इसके प्रकाशक पं० जुगल किशोर शुक्ला थे ।

हिन्दुस्तान का पहला समाचार पत्र १८२२ में बांम्बे समाचार पत्र था जो रोज़ छपता था परन्तु यह गुजराती भाषा का पत्र था ।

आज चौबीस बिलियन समाचार पत्र पूरी दुनिया में प्रकाशित होते हैं ।

अगर हम दुनिया के सभी समाचार पत्र री साइकिल करें तो हर साल २५० मिलियन वृक्ष बचा सकते हैं ।

चीन विश्व में समाचार प्रकाशन में प्रथम स्थान पर है ,यहाँ रोज़ाना ९३.५ मिलियन समाचार पत्र छपते हैं और भारत दूसरे स्थान पर है यहाँ ७८.८ मिलियन समाचार पत्र छपते हैं ।

James .A. hicky -father of Indian press कहे जाते हैं ।

Press trust of India- first news agency of lndia ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४९)

भिल्लम तृतीय के बाद यादुगि और भिल्लम चतुर्थ सिंहासनारूढ़ हुये,परन्तु उनके शासनकाल में कुछ उल्लेखनीय नहीं मिलता।
परन्तु भिल्लम चतुर्थ का पुत्र सेउणचन्द्र जब राजगद्दी पर बैठा तो उसने अपने वंश की प्रतिष्ठा में वृद्धि की,उसने अपनी वीरता के बल पर कलचुरियों और अन्य विरोधी शक्तियों को पराजित कर अपने वंश का गौरव बढ़ाया।उसने महामंडलेश्वर की उपाधि धारण की,अपनी वीरता और सूझबूझ के कारण वह कल्याणी शासक विक्रमादित्य षष्ठ का प्रिय सामन्त बन गया।
उसका पुत्र एरम्मदेव जब राजा बना तो महाराज विक्रमादित्य ने उसे महामंडलेश्वर बना दिया,उसका विवाह एक राजकुमारी के साथ हुआ,उसका शासनकाल 1085-1105 तक रहा।
एरम्मदेव के पश्चात उसके कनिष्ठ भ्राता सिंहराज ने 1120 तक शासन किया। कुछ वर्षों तक यादव वंश के बारे में जानकारी नहीं मिलती परन्तु जब भिल्लम पंचम ने राजगद्दी संभाली तो उसने यादव वंश को नया गौरव प्रदान किया।सबसे पहले उसने अपनी सेना को संगठित किया और फिर यादव राज्य का विस्तार शुरू किया।
महाकवि हेमाद्रि के अनुसार भिल्लम पंचम ने कोंकण नरेश से श्री वद्धर्न बंदरगाह ले लिया और राजा प्रत्यंडकको परास्त किया।शोलापुर के शासक विल्लण को समरभूमि में वीरगति प्रदान की और कल्याण के शक्तिशाली किले पर कब्जा कर लिया।होयसल नरेश को हरा कर मार डाला।अपने राज्य सेउणदेश के राजसिंहासन पर आसीन हुआ तत्पश्चात गुजरात और मालवा के विरुद्ध अभियान शुरू किया।
1189 ई०में मुतुगि अभिलेख के अनुसार भिल्लम पंचम अपनी वीरता के कारण”मालवों के सिर का प्रचंड दर्द, तथा गुर्जर रुपी हंसों के समूह के लिए घनगर्जन बन गया था।
भिल्लम पंचम की सेना में दो लाख पैदल और बारह हजार अश्वारोही सैनिक थे ।उसने मालवा,गुजरात के साथ ही मारवाड़ के क्षेत्र तक को आतंकित कर दिया था।
1189 ई० में भिल्लम पंचम ने कर्नाटक पर भी अधिकार कर लिया और होयसल नरेश बल्लाल को पराजित कर कल्याणी का दुर्ग भी जीत लिया।
कुछ समय बाद बल्लाल के साथ उसे फिर युद्ध करना पड़ा, जो धारवाड़ के निकट सोरतुर के मैदान में हुआ,इस युद्ध में बल्लाल ने भिल्लम पंचम को कृष्णा नदी और मालप्रभा नदी के पार ही रोक दिया, ये नदियां कुछ समय तक दोनों देशों की सीमा बनी रहीं ।
भिल्लम पंचम ने अपने साहस और तलवार के बल पर दक्षिणी महाराष्ट्र तथा उत्तरी कोंकण में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की,उसके राज्य का विस्तार नर्मदा क्षेत्र से लेकर कृष्णा घाटी तक था।उसने परमभट्टारक तथा महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४८)

यादव वंश

चालुक्य साम्राज्य के विघटन के बाद देवगिरि के यादव,द्वारसमुद्र के होयसल, वारंगल के काकतीय, कुन्तल के कदम्ब तथा मैसूर के गंग और विजयनगर राजवंशों ने अपने को स्वतंत्र शासक मान लिया।
यादव वंश की उत्पत्ति के विषय में कुछ धारणाएं हैं, जिनके अनुसार यादववंश को महाभारत में महाराज ययाति के पुत्र यदु के वंशज माना जाता है ,मराठी कवि ज्ञानेश्वर कृत भगवद्गीता में यादव शासकों को चन्द्र वंशी क्षत्रिय बताया गया है।
यादव वंश का संस्थापक दृढ़प्रहार माना जाता है वह एक वीर पुरुष था उसका पुत्र सेउणचन्द्र प्रथम उसका उत्तराधिकारी हुआ ,उसने प्रतिहारों के विरुद्ध राष्ट्र कूटों की सहायता कर उनका सामन्त बना ।
सेउणचन्द्र के उत्तराधिकारी क्रमशः दाढ़ियप्प,भिल्लम प्रथम, तथा राजिरा हुये । राजिरा के बाद बदुगि या बड्डिग ने राज्य किया उसके बाद धाड़ियस तत्पश्चात उसका पुत्र भिल्लम द्वितीय हुआ उसने राष्ट्र कूटों को छोड़कर शक्तिशाली चालुक्यों के साथ अपनी निष्ठा स्थापित कर ली। भिल्लम ने नासिक के सिंदिनगर को अपनी नई राजधानी बनाया।
भिल्लम के बाद उसका पुत्र वेसुगि उत्तराधिकारी हुआ ।भिल्लम तृतीय वेसुगि का उत्तराधिकारी बना ,वह चालुक्य नरेश जयसिंहप्रथम का प्रिय सामंत था जयसिंह प्रथम ने अपनी पुत्री का विवाह भिल्लम तृतीय से करके उसे महासामंत बना दिया।
भिल्लम तृतीय ने जयसिंह प्रथम के साथ परमार नरेश भोज के विरुद्ध अभियानों में सहयोग किया जिसके फलस्वरूप उसका राजकुल और प्रतिष्ठित हो गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४७)

1199 ई० में यादव नरेश जैतुगी ने गणपति को मुक्त कर दिया और वह काकतीय वंश काशासक बना, प्रारंभ में वह यादव वंश के प्रति निष्ठावान रहा।
अपनी वीरता के बल पर उसने बेलनाडु के शासक पृथ्वी सेन को परास्त कर तटीय आंध्रप्रदेश पर काकतीय राजवंश स्थापित किया।
गणपतेश्वर अभिलेख के अनुसार गणपति ने कलिंग, चोलों,यादवों और लाटों को परास्त कर सम्पूर्ण बेलनाडु क्षेत्र को अपने अधिकार में कर लिया था।गणपति का यादवों के साथ का युद्ध अनिर्णयाक रहा ।
गणपति के दो पुत्रियाँ थीं,बड़ी पुत्री रुद्राम्बा को गणपति ने अपना उत्तराधिकारी बनाया।अपने पिता के बाद काकतीय राजवंश की बागडोर रुद्राम्बा ने संभाली, वह पुरुष वेश में सिंहासन पर बैठती थी,युद्धों में भी भाग लेती थी वह रुद्रदेव के नाम से विख्यात थी ।
रुद्राम्बा के सिहांसन पर आसीन होने के बाद उसके सौतेले भाईयों हरिहर और मुरारिदेव ने विद्रोह करके वारंगल पर अधिकार कर लिया।
परन्तु वीर रुद्राम्बा ने अपने भाइयों को परास्त कर पुनः वारंगल पर अधिकार कर लिया।
रुद्राम्बा ने यादव नरेश महादेव के साथ भी युद्ध किया और उसे पराजित किया।
रुद्राम्बा के पश्चात रुद्राम्बा का नाती प्रतापरुद्र ने काकतीय राजसिंहासन पर आसीन हुआ, रुद्राम्बा के शासनकाल में ही प्रतापरुद्र ने कायस्थ प्रमुख अम्बदेव को पराजित किया था। वह वीर राजा था।
1310 में अलाउद्दीन खिलजी ने तेलंगाना पर मलिक काफूर के नेतृत्व में आक्रमण किया, मुस्लिम सेना और काकतीय सेना के बीच लगातार युद्ध चलता रहा प्रताप रुद्र ने जब अपने किले को चारों ओर से घिरा हुआ पाया तो उसने काफी धनराशि देकर दिल्ली के सुल्तान से संधि कर ली।
अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद जब गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली का सुल्तान बना तो अपने पुत्र उलूग खां को तेलंगाना पर आक्रमण करने भेजा, एकबार प्रताप रुद्र ने उसे पीछे हटा दिया ,परन्तु शीघ्र ही उलूग खां ने पुनः आक्रमण किया और प्रतापरुद्र को बंदी बना लिया।
दिल्ली ले जाते समय प्रतापरुद्र की मृत्यु हो गयी,प्रतापरुद्र निसंतान था ।उसकी मृत्यु के पश्चात काकतीय वंश का अंत हो गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४६)

काकतीय राजवंश का प्रथम शासक बेत प्रथम था जो कल्याणी के पश्चिमी चालुक्यों का सामन्त था,उसके बाद प्रोल प्रथम हुआ जिसने चालुक्यों के विरोधी अनेक राजाओं को पराजित किया। प्रसन्न होकर चालुक्य नरेश सोमेश्वर प्रथम ने उसे अनुमकोंड राज्य का शासक बना दिया।
तत्पश्चात बेत द्वितीय, दुर्गनृपति हुये जिन्होंने अपने राजा के प्रति निष्ठा बनाये रखी
प्रोल द्वितीय ने जब शासन संभाला तो उसने तैलप तृतीय जो सोमेश्वर तृतीय का पुत्र था उसे पराजित किया और अपना विजयी ध्वज गोदावरी तथा कृष्णा नदियों के मध्य के भूक्षेत्र पर फहरा दिया।
प्रोल द्वितीय के बाद उसका पुत्र रूद्रदेव सिहांसन पर बैठा।रुद्रदेव ने वेंगी राज्य पर आक्रमण कर उस राज्य के काफी क्षेत्र को अपने राज्य में मिला लिया।1773 तक चोलों की शक्ति का लगभग समाप्त हो चली थी जिसका लाभ उठाकर रुद्रदेव ने उन्हें पराजित कर अपना सामन्त बना लिया। रुद्रदेव ने कृष्णा नदी के उत्तरी एवं दक्षिणी तटों के सामन्त शासकों को भी परास्त कर दिया और अपने राज्य का विस्तार किया।
यादव नरेश जैतुगी के साथ युद्ध में रुद्रदेव मारा गया।
रुद्रदेव के पश्चात महादेव काकतीय राजवंश का उत्तराधिकारी हुआ,परन्तु उसका शासन भी ज्यादा दिनों तक नहीं रहा ,वह भी यादवों के साथ युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ।
महादेव का उत्तराधिकारी गणपति देव युद्ध में बंदी बना लिया गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४५)

राजराज द्वितीय के बाद चोल सिहांसन पर राजाधिराज द्वितीय आसीन हुआ, उसके समय तक कलचुरि नरेश अत्यधिक शक्तिशाली हो गया था।उसने चोलों को पराजित कर चोल अधिकृत आन्ध्रप्रदेश के ज्यादातर भू भाग अपने राज्य में मिला लिया।
1179 में जबकुलोत्तुंग तृतीय सिहांसन पर बैठा तो उसने कोंगू प्रदेश में हुए विद्रोह को खत्म किया ।कुलोतुंग तृतीय ने होयसल ,बाण,चेर गंग आदि राज्यों को जीतकर अपनी अधीनता स्वीकार करवाई, पांड्य देश काराजा विक्रम पांड्य कुलोतुंग की अवज्ञा कर उसका कोपभाजन बना ।कुलोतुंग ने पांड्य राज्य पर आक्रमण कर राजधानी को लूट लिया और राजाओं के राज्याभिषेक भवन को तहसनहस कर दिया।
कुलोतुंग तृतीय चोल राजवंश का अन्तिम महान शासक माना जा सकता है,अपने शासन काल तक उसने चोल राजवंश की गरिमा को सुरक्षित रखा।
कुलोतुंग का उत्तराधिकारी राजराज तृतीय हुआ ।शासक के रूप में वो असफल रहा ,उसके शासन काल में विशाल चोल साम्राज्य एक छोटा सा राज्य मात्र रह गया।पांड्य राजाओं से युद्ध के परिणाम स्वरूप राजराज तृतीय की प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुंची।
राजराज तृतीय के बाद राजेंद्र तृतीय चोल सिहांसन पर बैठा ,युवराज रहते हुए उसने होयसल,पांड्य और काकतीय राजाओं को पराजित किया था ।उसके राजा बनने के बाद होयसल और पांडय राजाओं ने राजेंद्र तृतीय को पराजित किया,फलतः राजेंद्र तृतीय को पांडयों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।
इस प्रकार विशाल चोल साम्राज्य के स्थान पर बचा छोटा सा चोल शासित प्रदेश तमिलनाडु पर भी पांड्य राजाओं का अधिकार हो गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४४)

कुलोत्तुंग प्रथम ने अब चोल साम्राज्य को सुदृढ़ करना शुरु किया। कुलोत्तुंग ने विक्रमादित्य षष्ठ के विरुद्ध दक्षिणी चालुक्य राज्य पर आक्रमण कर दिया और उसे पराजित कर गंगवाड़ी क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।
उसने श्रीलंका के साथ मैत्री संबंध बनाने के लिये अपनी पुत्री का विवाह श्रीलंका के राजकुमार के साथ कर दिया।
कुलोत्तुंग ने अपने पुत्र को वेंगी का शासक बना दिया था ,उसे युवराज बनाने के लिये चोल राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम् बुलाया ।उसके जाते ही वेंगी में गड़बड़ शुरू हो गई, चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ ने आक्रमण कर वेंगी राज्य के अधिकांश हिस्सों पर कब्जा कर लिया।उधर होयसल नरेश विष्णु वरधन ने चोल राज्य पर आक्रमण कर चोल शासित गंगवाड़ी और नोलम्बबाड़ी पर अधिकार कर लिया।काकतीय शासक प्रोल ने भी चोल सत्ता से अपने को मुक्त कर कल्याणी के चालुक्यों की अधीनता स्वीकार कर ली।
1120 में विक्रम चोल चोल सिहासन पर बैठा ,उसने सबसे पहले कल्याणी के शासक सोमेश्वर तृतीय को हटाकर वेंगी राज्य पर पुनः चोल सत्ता के अधीन कर लिया।होयसलों को पराजित कर गंगवाड़ी के कोलार क्षेत्र को चोल साम्राज्य में मिला लिया।
1135 में विक्रम चोल की मृत्यु के बाद कुलोत्तुंग द्वितीय ने राजगद्दी संभाली ,उसका शासन काल शांतिपूर्ण रहा ।
1150 में कुलोतुंग का पुत्र राजराज द्वितीय राजा बना, राजराज के शासनकाल मेंपांडय राजगद्दी के लियेपांड्य राजकुमारों में संघर्ष चल रहा था।
राजकुमार कुलशेखर पांड्य ने अपने प्रतिद्वंद्वी राजकुमार पराक्रम पांड्य की हत्या कर दी। श्रीलंका द्वारा पांड्य राज्य में किए जा रहे हस्तक्षेप के विरुद्ध कुलशेखर पांड्य ने चोलराज राजराज द्वितीय की सहायता मांगी, राजराज द्वितीय ने कुलशेखर की सहायता कीऔर श्री लंका की सेना को हराकर कुलशेखर को मदुरा के पांड्य राजसिंहासन पर आसीन कराया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४३)

चोल राजगद्दी पर आसीन होने के बाद वीरराजेन्द्र ने अपने परम्परागत शत्रु चालुक्यों को तुंगभद्रा नदी के तट पर पराजित कर दिया और तुंगभद्रा के तट पर विजय स्तम्भ स्थापित कराया ।वीरराजेन्द्र नेचालुक्य राजा सोमेश्वर द्बितीय को वेंगी से दूर कर दिया और वेंगी को चोल साम्राज्य में मिला लिया । वीर राजेंद्र ने केरल ,सिंहल और पाण्ड्य राजाओं को भी पराजित कर दिया।
वीर राजेंद्र ने सोमेश्वर द्बितीय के छोटे भाई विक्रमादित्य से अपनी पुत्री का विवाह कर दिया, क्योंकि विक्रमादित्य ने अपने भाई सोमेश्वर के विरुद्ध चोल नरेश वीरराजेन्द्र का साथ दिया था।वीरराजेन्द्र ने विक्रमादित्य को दक्षिणी चालुक्य राज का शासक बना दिया और वेंगी में वीरराजेन्द्र ने वास्तविक उत्तराधिकारी राजेन्द्र द्बितीय के स्थान पर विजयादित्य सप्तम को शासक बना दिया, इससे राजेंद्र द्वितीय क्रोधित हो गया।
1070 में वीरराजेन्द्र की मृत्यु हो गई, वीर राजेन्द्र की मृत्यु के पश्चात वेंगी राजकुमार राजेंद्र द्वितीय ने विद्रोह कर दिया।चोल सिहांसन पर आसीन वीरराजेन्द्र का पुत्र अधिराजेन्द्र अव्यस्क था।विक्रमादित्य ने कांची जाकर प्रारंभ में विद्रोह कुचल दिया और अपने साले अधिराजेन्द्र को चोल राजगद्दी पर प्रतिष्ठित कर वापस तुंगभद्रा तट पर लौट आया।
परन्तु कुछ दिन के पश्चात चोल साम्राज्य में हुये एक जनविद्रोह में अधिराजेन्द्र को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
इस अशांत वातावरण का लाभ उठा कर राजेंद्र द्वितीय ने चोल साम्राज्य और वेंगी पर अधिकार कर लिया और राजेंद्र द्वितीय कुलोत्तुंग प्रथम नाम धारण कर चोल राजगद्दी पर आसीन हो गया।

हम भारत के लोग…(६)

मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री

1- श्री मोरारजी देसाई बम्बई राज्य के 1952-56 तक मुख्यमंत्री थे ।बाद में वे मार्च 1977 में देश के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने ।

2- चौधरी चरण सिंह अविभाजित उत्तर प्रदेश के 1967-68 तक तथा दुबारा 1970 में मुख्यमंत्री रहे ।वे मोरारजी देसाई के बाद प्रधानमंत्री बने ।

3- श्री विश्व नाथ प्रताप सिंह भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वो दिसंबर 1989 से नवम्बर 1990 तक प्रधानमंत्री रहे ।

4- श्री पी.वी नरसिम्हा राव,दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश के 1971-73 तक मुख्यमंत्री रहे। वे दक्षिण भारत से प्रधानमंत्री बनने वाले पहले प्रधानमंत्री थे ।वे 1991-96 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे।।

5- श्री एच. डी. देवगौड़ा कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे,जो जून 1996 में प्रधानमंत्री बने।

6- श्री नरेन्द्र मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री 2001-2014 तक रहे और अब 2014 से भारत के प्रधानमंत्री हैं।

हम भारत के लोग…(५)

मुख्यमंत्री

अनुच्छेद 164 में कहा गया है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा, संसदीय व्यवस्था में राज्यपाल राज्य विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही मुख्यमंत्री नियुक्त करता है।

लेकिन यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत न प्राप्त हो तो राज्यपाल सबसे बड़े दल या दलों के समूह के नेता को मुख्यमंत्री बनाता है ,परंतु उसे एक माह के अन्दर सदन में विश्वास मत हासिल करना होता है।

संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री को विधानमंडल के दो सदनों में से किसी एक का सदस्य होना चाहिए।
एक ऐसे व्यक्ति को जो राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं भी हो,छह महीने के लिये मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है,परन्तु इस समय में उसेविधानमंडल के लिए र्निवाचित होना होगा। ऐसा न होने पर उसका मुख्यमंत्री पद समाप्त हो जायेगा।
पद ग्रहण करने के पूर्व राज्यपाल उसे पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाता है।
वेतन:

मुख्यमंत्री के वेतन एवं भत्तों का र्निधारण राज्य विधानमंडल द्वारा किया जाता है,तथा निशुल्क आवास, यात्रा भत्ता और चिकित्सा सुविधाएं मिलती हैं।

शक्तियां :

° राज्यपाल उन्हीं को मंत्री नियुक्त करता है जिनकी सिफारिश मुख्यमंत्री द्वारा की जाती है ।
° वह मंत्रियों को विभाग वितरण करता है उनके विभागों मेंफेरबदल कर सकता है।
° वह मंत्रिपरिषद की बैठक की अध्यक्षता कर उसके फैसलों को प्रभावित कर सकता है।
° वह सभी मंत्रियों को सहयोग,नियत्रंण और निर्देश दे सकता है।
° वह अपने पद से त्यागपत्र देकर पूरी मंत्रिपरिषद को समाप्त कर सकता है,उसकी मृत्यु अथवा त्याग पत्र से भी मंत्रिपरिषद स्वतः विघटित हो जाती है।
° वह राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच की कड़ी है।
° राज्य के कार्यों के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को सूचित करता है।
° वह महाधिवक्ता, राज्यलोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, सदस्यों और राज्य र्निवाचन आयुक्त आदि की नियुक्ति के संबंध में राज्यपाल को परामर्श देता है।
° वह राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने ,स्थगित करने और विघटित करने की सलाह देता है।
° वह अन्तर्राज्यीय परिषद और राष्ट्रीय विकास परिषद का सदस्य होता है,दोनों परिषदों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करता है ।
° वह राज्य सरकार का प्रमुख वक्ता होता है।

अनुच्छेद 167 के अनुसार मुख्यमंत्री राज्य के कार्यों के प्रशासन सम्बन्धी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को सूचित करे ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४२)

राजेंद्र द्वितीय ने अपने भाई राजाधिराज की मृत्यु का बदला लेने के लिए चालुक्य राज्य पर हमला कर वहां के शासक सोमेश्वर को पराजित कर समर भूमि में ही अपना वीराभिषेक कराया।
परन्तु सोमेश्वर प्रथम ने चोल शासित गंगवाड़ी राज्य पर तथा वेंगी पर अपना आधिपत्य बनाने के लिये सेनापति चामुण्डराज के नेतृत्व में चालुक्य सेना को भेजा, चोलों ने वेंगी राज्य को जीतकर चालुक्य सेनापति चामुण्डराज और वेंगी नरेश शक्तिवर्मन का वध कर दिया।
राजेंद्र द्वितीय ने सिंहल राज्य के चोलों के विरुद्ध विद्रोह का दमन कर सिंहल राज्य के अधिकांश भागों को चोल साम्राज्य में मिला लिया।
गंगवाड़ी से चालुक्य आक्रमणकारियों को खदेड़ दिया गया।
कुछ समय पश्चात संभवतः1063में चोल युवराज महेन्द्र की मृत्यु हो गई ,और कुछ दिन बाद राजेंद्र द्वितीय की भी मृत्यु हो गई।
अब चोल राजगद्दी पर वीर राजेंद्र आसीन हुआ।