दक्षिण भारतीय इतिहास…(४०)

राजेंद्र चोल को 1014 में चोल राज्य का सिहांसन प्राप्त हुआ ,वह अपने पिता की तरह वीर ,महत्वाकांक्षी, कूटनीतिज्ञ था ।सिहांसन पर आरूढ़ होने के पश्चात राजेंद्र चोल ने केरल के विद्रोह को कुचल दिया और उन्हें परास्त कर अपने आधीन कर लिया।
चोल अभिलेख के अनुसार राजेंद्र चोल ने सिंहल राज्य पर आक्रमण कर सिंहल राज्य को अपने चोल साम्राज्य में मिला लिया औरसिंहल के शासक को बंदी बनाकर बारह वर्ष तक बंदीगृह में रखा बंदीगृह मेंही उसकी मृत्यु हो गई ।राजेंद्र चोल ने अपने पुत्र विक्रम चोल को उत्तरी पूर्व राज्यों की विजय अभियान के लिए, उसके नेतृत्व में विशाल सेना को भेजा ,विक्रम चोल ने कलिंग(उड़ीसा)बस्तर इन्द्ररथ तथा दक्षिणी कोसल आदि राज्यों को विजित किया और दंडभुक्ति केशासक धर्म पाल,दक्षिणी राठ के राजा रणसूर,पूर्व बंगाल के राजा गोविंद चन्द्र तथा पाल राज्य के शासक महीपाल के विरुद्ध युद्ध में सफलता प्राप्त की।विजय प्राप्ति के उपरांत विक्रम चोल ने गंगा में स्नान किया।
अपने शासनकाल के प्रारंभ में ही राजेंद्र प्रथम ने अपने पुत्र राजाधिराज को युवराज बना दिया था।
तिरुवालंगाडु ताम्रपत्र के अनुसार राजेंद्र नेअपनी विशाल जल सेना की सहायता से समुद्र पार कर कटाह राज्य को जीत लिया और वहां के राजा को बंदी बनाया, परन्तु कटाह राजा ने अपनी मुक्ति की याचना करते हुयेचोल नरेश की अधीनता स्वीकार कर ली,राजेंद्र चोलप्रथम ने उसकी याचना स्वीकार कर उसे मुक्त कर दियाऔर अपना सामन्त शासक बना दिया।
अपनी विशाल जलसेना के साथ राजेंद्र चोल ने अंडमान निकोबार, वर्मा देश के अराकान तथा पेगूआदि प्रदेशों को भी जीत लिया।
जब राजेंद्र चोल हिन्द सागर के पार युद्धों में व्यस्त था,तभी केरल, पाण्ड्य और सिंहल राज्य के शासकों ने संयुक्त रुप चोल सत्ता के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया,इस युद्ध में सुन्दरपाण्डय नेतृत्व कर रहा था।
राजेन्द्र ने अपने युवराज पुत्र राजाधिराज को इस विद्रोह को दबाने भेजा, राजाधिराज ने इस विद्रोह को कुचल दिया,इस युद्ध में सिंहल राजा मृत्यु को प्राप्त हुआ।
अपने राज्य की सीमाओं पर चोल शासक की पैनी नजर रहतीं थी
सीमांत राजाओं पर चोल शक्ति का दवाब हमेशा ही बना रहता था।उसने शक्तिशाली राज्यों के विद्रोह बलपूर्वक दबा दिया और उन्हें सदा अपने अधीन रहने पर विवश कर दिया था।
उसके शासन काल में चोल राज्य वैभवशाली था।

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हम भारत के लोग…(४)

प्रधानमंत्री

अनुच्छेद 75 के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को राष्ट्रपति प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।
यदि लोकसभा में कोई भी दल स्पष्ट बहुमत में न हो तो राष्ट्रपति स्वविवेक से सबसे बड़े दल अथवा गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री बनाता है,परन्तु उस नेता को एक माह के अंदर अपना बहुमत सिद्ध करना होता है।
संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री संसद के दोनों सदनों में से किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है।
प्रधानमंत्री का कार्य काल निश्चित नहीं है,प्रधानमंत्री को जब तक लोकसभा का बहुमत प्राप्त रहता है तब तक उसे हटाया नहीं जा सकता,लोकसभा में अपना विश्वास मत खो देने पर उसे अपने पद से त्यागपत्र देना होगा अथवा त्यागपत्र न देने पर वह राष्ट्रपति द्वारा बर्खास्त किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री के वेतन और भत्तों का निर्धारण संसद द्वारा समय समय पर किया जाता है ।

कार्य और शक्तियां:

० प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से अपने दल के व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त करने की सिफारिश करता है और राष्ट्रपति उन्हीं व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त करता है जिनकी प्रधानमंत्री द्वारा सिफारिश की गई होती है ।
० प्रधानमंत्री मंत्रियों को मंत्रालय आवंटित करता है, और उनमें फेरबदल भी कर सकता है।
० वह किसी भी मंत्री को त्यागपत्र देने के लिये कह सकता है या राष्ट्रपति से उसे बर्खास्त करने की सिफारिश भी कर सकता है।
० वह मंत्री परिषद की बैठक की अध्यक्षता करता है और उनके निर्णयों को भी प्रभावित कर सकता है।
० मंत्रियों की गतिविधियों को नियंत्रित और निर्देशित कर सकता है।
० वह पद से त्यागपत्र देकर मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर सकता है।
० प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच की मुख्य कड़ी होता है।
० प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति को भारत का महान्यायवादी, भारत का महानियंत्रक, महालेखा परीक्षक, संघ लोकसेवा आयोग का अध्यक्ष एवं उसके सदस्यों का,चुनाव आयुक्त, वित्त आयोग का अध्यक्ष एवं उसके सदस्यों एवं उनकी नियुक्ति के सम्बंध में परामर्श देता है।
० प्रधानमंत्री संसद के सत्र का आरंभ और सत्रावसान सम्बन्धी परामर्श राष्ट्रपति को देता है।
० वह लोकसभा को विघटित करने की राष्ट्रपति से सिफारिश कर सकता है।
० वह सरकार की नीतियों की घोषणा करता है।
० प्रधानमंत्री नीति आयोग , राष्ट्रीय एकता परिषद,अंतर्राज्यीय परिषद और राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद का अध्यक्ष होता है।
० वह केन्द्र सरकार का प्रमुख प्रवक्ता होता है।
० वह सत्ता धारी दल का नेता होता है व सेनाओं का राजनैतिक प्रमुख होता है।
० वह देश का नेता होने के कारण राज्यों के विभिन्न वर्गों के लोगों से उनकी समस्याओं के सम्बंध में ज्ञापन प्राप्त करता है।
० आपातकाल में राजनीतिक स्तर पर आपदा प्रबंधन का प्रमुख होता है।

राष्ट्रपति को सहायता एवं सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगा।

अनुच्छेद 78 के अनुसार प्रधानमंत्री संघ के कार्य में प्रशासन सम्बन्धी विधान विषयक मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राष्ट्रपति को सूचित करे।
संघ के कार्य, प्रशासन सम्बन्धी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं सम्बन्धी जो भी जानकारी राष्ट्रपति मांगे वो उन्हें दे।

प्रधानमंत्री की मृत्यु अथवा त्यागपत्र देने पर मंत्रिपरिषद स्वयं ही विघटित हो जाती है।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३९)

राजराज प्रथम के शासनकाल के एक अभिलेख के अनुसार नोलम्बों और गंगों के विरुद्ध भी उसने विजय प्राप्त की थी ।
चालुक्य शासक सत्याश्रय जो राजराज का समकालीन था,चोलों का प्रबल शत्रु था ।उसकी शह पर वेंगी शासक दार्नाणव की हत्या तेलुगु जटाचोडभीम ,जो दार्नाणव का संबंधी भी था ,ने कर दी और सिहांसन हथिया लिया ।
दार्नाणव के पुत्रों ने राजराज प्रथमसे सहायता की याचना की ,राजराज ने सहायता कावचन दिया और अपनी पुत्री का विवाह छोटे राजकुमार से कर दिया तथा बड़े राजकुमार शक्ति वरमन को सिहांसन पर बैठाने का वचन दिया ।
चोल राजा नेजटाचोडभीम को पराजित किया और वेंगी के सिहांसन पर शक्ति वर्मन को शासक बना दिया ,चोल राज्य के प्रभुत्व में शक्ति वर्मन शासन करने लगा ।चालुक्य नरेश सत्याश्रय को चोलराज्य का विस्तार पसन्द नहीं था ,उसने 1006 में वेंगी पर आक्रमण कर दिया और धान्यकटक तथा वनमंडल के किलों को धूल धूसरित किया ।
तब राजराज प्रथम ने अपने पुत्र राजेन्द्र को एक शक्तिशाली सेना का प्रधान बना कर चालुक्यों पर आक्रमण करने भेजा ।
राजेन्द्र चोल ने सान्तलिगे,वनवासी, कादम्बलिगे,कोगली प्रदेशों को जीतकर बीजापुर जिले के दोनूर में अपना सैन्य शिविर स्थापित किया।
चालुक्य अभिलेख के अनुसार राजेन्द्र चोल ने पूरे देश को बुरी तरह लूटा और स्त्रियों और बच्चों तक को मौत के घाट उतारा, और मान्यखेट में भी लूटपाट की ।
सत्याश्रय को इस कारण अपनी सेना वेंगी से हटानी पड़ी, वह बड़ी कठिनाई से अपने देश को चोल सेना से मुक्त करवा सका और चोल सेना बहुत सारे लूट के माल के साथ तुंगभद्रा नदी के पीछे रह गई।
इसके बाद राजराज प्रथम ने कलिंग राज्य पर आक्रमण उसे भी अपने राज्य में मिला लिया।
राजराज प्रथम ने श्रीलंका पर तो अपना आधिपत्य पहले ही कर लिया था ,अब उसने अपनी शक्तिशाली जहाजी सेना के साथ बंगाल की खाड़ी को पार करके दक्षिणी पूर्व एशिया में श्रीविजय, कटाह तथा मलाया द्बीपों पर भी अपना अधिकार कर लिया और अपने विशाल चोल साम्राज्य में मिला लिया।
इस प्रकार भारत का पूर्व एशिया के अन्य देशों के साथ व्यापार और वाणिज्य सम्पर्क पूरी तरह से विकसित हो गया।
चोल साम्राज्य को राजराज प्रथम ने विस्तृत, वैभवशाली और शक्तिशाली बना दिया ।
राजराज ने तंजौर का वृहदीश्वर मंदिर का निर्माण कराया था ,जो कि विश्व प्रसिद्ध है ।

हम भारत के लोग…(३)

उपराष्ट्रपति

उपराष्ट्रपति का पद देश का दूसरा सर्वोच्च पद होता है ।वह संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के निर्वाचन मंडल द्वारा चुना जाता है ।

इसमें संसद के निर्वाचित और मनोनीत दोनों सदस्य होते हैं । परन्तु राज्य विधानसभाओं के सदस्य सम्मिलित नहीं होते हैं ।

योग्यता

वह भारत का नागरिक हो ।

वह पैंतीस वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो ।

वह राज्यसभा का सदस्य बनने के योग्य हो ।

वह केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार या किसी स्थानीय या सार्वजनिक प्राधिकरण के अन्तर्गत किसी लाभ के पद पर न हो ।

उपराष्ट्रपति पद ग्रहण से पहले शपथ लेनी होगी और हस्ताक्षर करने होगें ।

उपराष्ट्रपति पद की अवधि पद ग्रहण करने से लेकर पाँच वर्ष तक होती है ।

वह अपनी पदावधि में किसी भी समय राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र दे सकता है ।

वह अपने पद की अवधि पूर्ण होने से पहले भी हटाया जा सकता है ।

उसे राज्य सभा द्वारा पूर्ण बहुमत द्वारा हटाया जा सकता है ,परन्तु लोकसभा की सहमति आवश्यक है ।

वह उप राष्ट्र पति पद पर कितनी ही बार निर्वाचित हो सकता है।

उपराष्ट्रपति का पद उसकी पाँच वर्ष की अवधि पूर्ण होने पर समाप्त हो सकता है ।

उसके त्यागपत्र देने पर

उसकी मृत्यु पर,

उसके बर्खास्त होने पर

या निर्वाचन अवैध घोषित होने पर भी

पद से हटाया जा सकता है ।

शक्तियाँ और कार्य –

उपराष्ट्रपति की शक्तियाँ और कार्य लोकसभा अध्यक्ष की भाँति होते हैं ,वह उच्च सदन का सभापति होता है ।

जब राष्ट्रपति का पद रिक्त हो तो वह कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में भी कार्य करता है ।

राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते समय वह राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं करता है ।

उपराष्ट्रपति का वेतन १.२५ लाख रू प्रति माह होता है उसे दैनिक भत्ता ,निःशुल्क पूर्ण सज्जित आवास ,फ़ोन ,कार ,चिकित्सा सुविधा ,यात्रा सुविधा तथा अन्य सुविधायें प्राप्त होती हैं ।

यदि वह राष्ट्रपति के पद पर कार्य कर रहा है तो उसे राष्ट्रपति को प्राप्त होने वाले वेतन और भत्ते प्राप्त होते हैं।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३८)

उत्तराधिकार में अरिमोलवर्मन को छोटा और कमजोर राज्य प्राप्त हुआ, युवराज के रूप में उसने युद्ध अनुभव प्राप्त किये थे और वह एक अच्छा प्रशासक भी था साथ ही कूटनीतिज्ञ भी था ।
उसने उत्तम चोल से आदित्य प्रथम की हत्या का प्रतिशोध लेने के स्थान पर उत्तम चोल से अपने लिये सिहांसन सुरक्षित करवा लिया ,इस प्रकार उत्तम चोल की मृत्यु के बाद उत्तम चोल के पुत्रों के स्थान पर अरिमोलवर्मन राजा बना ।
अब उसने राजराज की उपाधि धारण की ।985में सिहांसन पर आसीन होने के बाद उसने छोटे छोटे राज्यों को जीत कर चोल राज्य में मिला लिया ।उसने अपने राज्य में अनेक प्रशासनिक सुधार किए और अपने शासन काल के प्रारंभिक वषों में उसने चोल राज्य की स्थिति को मजबूत किया।
केरल ,पांड्य और श्रीलंका के शासकों ने सेना एकत्रित कर सम्मिलित रूप से चोल राज्य के विरुद्ध तैयारी की ,परन्तु राजराज प्रथम ने केरल राज्य पर आक्रमण किया और केरल नरेश रविवर्मन को परास्त किया, तत्पश्चात पांड्य राज्य पर आक्रमण कर वहां के राजा को बंदी बनाया ।
अपने अन्य अभियान में राजराज ने कोल्लम तथा कोंडुगोलूर के शासकों को भी पराजित किया ।
राजराज ने अपना तीसरा अभियान जहाजी बेड़ो के साथ किया जिसमें उसने श्री लंका का उत्तरी भाग अधिकृत किया औरवहां की राजधानी अनुराधापुर को रौंद डाला इस युद्ध में श्री लंका नरेश को किसी अज्ञात स्थान में छुपकर अपनी प्राणरक्षा करनी पड़ी।
तिरुवालंगाडु अभिलेख के अनुसार राजराज प्रथम का श्रीलंका पर अधिकार हुआ और उसने राज्य का नाम मामुण्डीचोलमण्डलम रखा और पोलो न्नुरुवा नगर को चोल राज्य की राजधानी बनाया ।

श्री गणेश🏵️🏵️🏵️

भाद्रपक्ष महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी गणपति भगवान का प्रिय दिवस है ,इस दिन गणपति भगवान की मूर्तियां सजाई जाती हैं ।गणपति सभी कार्यों प्रथम पूज्य हैं ,शुभ कामों में प्रथम निमंत्रण गणपति को दिया जाता है।
इनके जन्म से जुड़ी कई कथाएं हैं,ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार पार्वती के पुत्र जन्म के अवसर पर देवताओं के साथ शनि देव भी आये,उनकी दृष्टि जब पार्वती पुत्र पर पड़ी तो पुत्र का मस्तक कट कर धड़ से अलग हो गया ।शनिदेव को शाप था कि उनकी दृष्टि जिस पर भी पड़ेगी उसका मस्तक कट जाये गा ।यह देख कर पार्वती अत्यन्त दुखी हो गई तब भगवान विष्णु ने एक शिशु हाथी का सिर जोड़कर पार्वती पुत्र को जीवित कर दिया ।
मत्स्य पुराण के अनुसार पार्वती ने अपने अंगलेप से एक पुतले का निर्माण किया जिसका सिर गज का जैसा था ,गंगाजल से अभिषेक करते ही वह प्राणवान हो गया । पार्वती और गंगा दोनों ने ही उसे अपना पुत्र माना ।
शिव पुराण के अनुसार पार्वती ने स्नान करते समय उबटन से एक मानवाकृति बनाई और उसे किसी को भी अंदर न आने देने को कहा ,तभी शिव वहाँ आये बालक ने उन्हें न पहचानते हुये अंदर जाने से रोक दिया ।परिणाम स्वरूप दोनों में युद्ध हुआ और शिव ने बालक का सिर काट दिया जब पार्वती जी आयीं तो यह देखकर दुख से भर गयीं। शिव जी को जब पूरी बात का पता चला तो उन्होंने एक हाथी का सिर जोड़कर बालक को जीवन प्रदान किया।
गणपति संभव के अनुसार शिवजी के डमरू की ध्वनि से गणपति ने सम्पूर्ण वेदों को अपनाया, पार्वती के नूपुरों की झंकार से संगीत सीखा और शिव के तांडव दर्शन से नृत्य सीखा ।
माना जाता है जब व्यास ने महाभारत की रचना की तो महाभारत कोगणपति भगवान ने लिखा है,उन्होंने कहा कि लिखना शुरू करने के बाद रुकेगें नहीं ,इसपर व्यासजी ने कहा ,मैं जो भी कहूँगा आप उसका अर्थ समझ कर ही लिखें ।इस प्रकार महाभारत पूरी हुई।
गणपति जी गजबदन,सिन्दूर के समान रक्तवर्ण, त्रिनेत्र ,स्थूलकाय तथा चर्तुभुज हैं चारों हाथों में दंत ,अकुंश, पाश और वरमुद्रा हैं। मूषक उनका वाहन है,वे समस्त कार्यों मे प्रथम पूज्य हैं,विघ्न बाधाओं के विनाशक और मोदक प्रिय हैं ।
इनकी पत्नियों के नाम ऋद्धि और सिद्धि हैं ।ऋद्धि के पुत्र का नाम क्षेम तथा सिद्धि के पुत्र का नाम लाभ है ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३७)

परान्तक प्रथम की मृत्यु के बाद (955-85 )तक चोल राज्य में अस्तव्यस्तता रही।परान्तक प्रथम के बाद उसका पुत्र गंडरादित्य राजसिंहासन पर आसीन हुआ ,जब उसकी मृत्यु हुई चोल राज्य एक छोटा सा प्रदेश मात्र रह गया था ।
कुछ दुर्बल शासकों के पश्चात 956 में सुन्दर चोल परान्तक द्वितीय राजसिंहासन पर बैठा,वह पराक्रमी सिद्ध हुआ ।उसने पांड्य राज्य पर आक्रमण किया ।पांड्य राजा की सहायता श्री लंका नरेश महिन्द्र चतुर्थ ने की परन्तु सुन्दर चोल ने पांड्य राजा को दो युद्धों में पराजित किया।
इस युद्ध में उसके युवराज पुत्र आदित्य द्वितीय ने भी सहयोग किया था ।
सुन्दर चोल के अंतिम वर्षों में गंडरादित्य के पुत्र उत्तम चोल ने षडयंत्र करके युवराज आदित्य द्वितीय की हत्या कर दी और व्यथित सुन्दर चोल को विवश किया कि वह अपना उत्तराधिकारी अपने पुत्र अरिमोलवर्मन के स्थान पर उसे घोषित करे ।
इस प्रकार उत्तम चोल ,चोल सिहांसन पर आसीन हुआ ।
परन्तु चोल राज्य का अच्छा समय तब शुरु हुआ जब चोल सिहांसन पर सुन्दर चोल का छोटा पुत्र अरिमोलवर्मन आसीन हुआ ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३६)

दक्षिण भारत के चोल वंश का नाम मौर्य काल में मिलता है,महाभारत तथा मेगस्थनीज़ की इन्डिकामें भी चोलों का उल्लेख है माना जाता हैकि महाभारत काल मे सहदेव ने चोलों पर विजय प्राप्त की थी।सिंहली महाकाव्य महावंश में भी चोलों का नाम आता है।
प्रारंभ में चोल शासक पल्लवों के अधीन सामन्त थे जो कावेरी के तटवर्ती क्षेत्रों पर शासन कर रहे थे ।
(850-871ई०) चोल शासक विजयालय ने पांड्यों के तंजौर क्षेत्र पर आधिपत्य कर लिया और उरैयुर के स्थान पर तंजौर को अपनी राजधानी बना लिया ।
नवीं शताब्दी में विजयालय के उत्तराधिकारी आदित्य प्रथम ने अपनी शक्ति बढ़ानी शुरू की और छोटे छोटे राज्यों को जीत कर अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली ।तिरूवालंगाडु ताम्रपत्रों के अनुसार आदित्य प्रथम ने पल्लव शासक अपराजित के विरूद्ध विद्रोह करकेउसे हरा कर उसकी हत्या करदी और पल्लव राज्य पर अधिकार कर लिया।
इस विजय के बाद चोल राज्य की सीमा राष्ट्र कूट राज्य की सीमा से मिल गयी ।आदित्य प्रथम ने राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय की पुत्री से विवाह कर उसे प्रधान रानी बना दिया ।
907ई० में आदित्य प्रथम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र परान्तक प्रथम सिहांसन पर बैठा ।राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय इस बात पर क्रोधित हो गया वह चाहता था उसकी पुत्री का पुत्र कन्नरदेव चोल सिहांसन पर आसीन हो,अत:उसने चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया।परन्तु परान्तक प्रथम ने गंगनरेश पृथ्वी पति की सहायता से राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय को पराजित कर दिया औरवीर चोल की उपाधि धारण की ।
परान्तक प्रथम को अपनी शक्ति को पूरी तौर पर पांड्य राजा राजसिंह द्वितीय के विरुद्ध लगाना पड़ा, उसने पांड्य राजा राजसिंह द्वितीय को पराजित कर उसकी राजधानी मदुरा पर अधिकार कर लिया
इसके पश्चात चोल राजाने पांड्य नरेश राजसिंह द्वितीय को दूसरे युद्धों में भी पराजित किया और धीरे धीरे पांड्य राज्य के क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया।परान्तक प्रथम की इन विजयी अभियानों से उसके राज्य की सीमा उत्तर में पेण्णारक्षेत्र से दक्षिण में कन्याकुमारी तक विशाल हो गई।
राष्ट्र कूट राजा कृष्ण तृतीय ने चोलों के शत्रुओं को एकत्र कर एक सम्मिलित सेना के साथ चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया और चोलों को जीत कर उनके तोंडमंडलम क्षेत्र को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया ।
इसके बाद भी राष्ट्र कूट राजा ने गंग राजा की सहायता से परान्तक प्रथम को दुबारा पराजित किया और चोल राज्य के कुछ क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३५)

राजसिंह द्वितीय कुछ समय तक अपने ननिहाल में रहने के बाद अपने राज्य की पुन: प्राप्ति के लिये प्रयासरत हो गया और अपनी शक्ति को एकत्र कर चोलो से मुक़ाबलाकरने को तैयार हो गया ।परन्तु चोल नरेश ने पांड्य शक्ति को पुन: पराजित कर दिया ।

पराजित होने के बाद भी मार वरमन राजसिंह द्वितीय बार -बार अपने राज्य को स्वतन्त्र कराने का प्रयास करता रहा ,उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र वीरपांडय ने भी राज्य की स्वतन्त्रता के लिये प्रयास जारी रखा ,उसके शासनकाल में चोल राज्य का शासन एक दुर्बल शासक गंडरादित्य चोल के पास था जिसे वीरपांडय ने पराजित कर अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली ।

गंडरादित्य की मृत्यु के बाद उसका भतीजा सुंदर चोल परान्तक द्वितीय राजा बना ।उसने वीरपांडय की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिये पांड्य राज्य पर आक्रमण किया ।वीरपांडय की सहायताश्रीलंका नरेश महेन्द्र चतुर्थ ने भी की परन्तु चोल नरेश ने उन्हें दो बार पराजित किया ।

वीरपांडय की मृत्यु ९६६ ई० में हो गयी और लगभग तीन शताब्दी तक पांड्य राज्य चोलो के आधिपत्य में रहा।

१०७०-११२० ई० में कुलोत्तुंग प्रथम के समय में पांड्य राजा जटावरमनश्रीवल्लभ ने पांड्य राज्य को स्वतंत्र रखने में कुछ वर्षों तक सफल रहा परन्तु कुलोत्तुंग ने उसे मार कर पांड्य राज्य पर अधिकार कर लिया ।

उसके पश्चात कुछ समय तक पांड्य राज्य उत्तराधिकार के कारण गृहयुद्ध में फँसा रहा ,कुलोत्तुंग तृतीय ने पांड्य राज्य के दो उत्तराधिकारियों वीरपांडय और विक्रम पांड्य के बीच के झगड़े को ख़त्म कर विक्रम पांड्य को मदुरा का शासक बनाया ।

विक्रम पांड्य के उत्तराधिकारी जटा वरमन कुलशेखर ने चोल सत्ता की अवज्ञा कर ,चोलों के विरूद्ध कुछ सफलतायें प्राप्त की ,उसके पुत्र मारवरमन सुन्दर पांड्य ने उदयपुर और तंजौर पर क़ब्ज़ा कर लिया और चोलो को भी अपने आधीन कर लिया । परन्तु चोलों ने

होयसलों की सहायता से पुन: अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली ।