श्री गणेश🏵️🏵️🏵️

भाद्रपक्ष महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी गणपति भगवान का प्रिय दिवस है ,इस दिन गणपति भगवान की मूर्तियां सजाई जाती हैं ।गणपति सभी कार्यों प्रथम पूज्य हैं ,शुभ कामों में प्रथम निमंत्रण गणपति को दिया जाता है।
इनके जन्म से जुड़ी कई कथाएं हैं,ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार पार्वती के पुत्र जन्म के अवसर पर देवताओं के साथ शनि देव भी आये,उनकी दृष्टि जब पार्वती पुत्र पर पड़ी तो पुत्र का मस्तक कट कर धड़ से अलग हो गया ।शनिदेव को शाप था कि उनकी दृष्टि जिस पर भी पड़ेगी उसका मस्तक कट जाये गा ।यह देख कर पार्वती अत्यन्त दुखी हो गई तब भगवान विष्णु ने एक शिशु हाथी का सिर जोड़कर पार्वती पुत्र को जीवित कर दिया ।
मत्स्य पुराण के अनुसार पार्वती ने अपने अंगलेप से एक पुतले का निर्माण किया जिसका सिर गज का जैसा था ,गंगाजल से अभिषेक करते ही वह प्राणवान हो गया । पार्वती और गंगा दोनों ने ही उसे अपना पुत्र माना ।
शिव पुराण के अनुसार पार्वती ने स्नान करते समय उबटन से एक मानवाकृति बनाई और उसे किसी को भी अंदर न आने देने को कहा ,तभी शिव वहाँ आये बालक ने उन्हें न पहचानते हुये अंदर जाने से रोक दिया ।परिणाम स्वरूप दोनों में युद्ध हुआ और शिव ने बालक का सिर काट दिया जब पार्वती जी आयीं तो यह देखकर दुख से भर गयीं। शिव जी को जब पूरी बात का पता चला तो उन्होंने एक हाथी का सिर जोड़कर बालक को जीवन प्रदान किया।
गणपति संभव के अनुसार शिवजी के डमरू की ध्वनि से गणपति ने सम्पूर्ण वेदों को अपनाया, पार्वती के नूपुरों की झंकार से संगीत सीखा और शिव के तांडव दर्शन से नृत्य सीखा ।
माना जाता है जब व्यास ने महाभारत की रचना की तो महाभारत कोगणपति भगवान ने लिखा है,उन्होंने कहा कि लिखना शुरू करने के बाद रुकेगें नहीं ,इसपर व्यासजी ने कहा ,मैं जो भी कहूँगा आप उसका अर्थ समझ कर ही लिखें ।इस प्रकार महाभारत पूरी हुई।
गणपति जी गजबदन,सिन्दूर के समान रक्तवर्ण, त्रिनेत्र ,स्थूलकाय तथा चर्तुभुज हैं चारों हाथों में दंत ,अकुंश, पाश और वरमुद्रा हैं। मूषक उनका वाहन है,वे समस्त कार्यों मे प्रथम पूज्य हैं,विघ्न बाधाओं के विनाशक और मोदक प्रिय हैं ।
इनकी पत्नियों के नाम ऋद्धि और सिद्धि हैं ।ऋद्धि के पुत्र का नाम क्षेम तथा सिद्धि के पुत्र का नाम लाभ है ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३७)

परान्तक प्रथम की मृत्यु के बाद (955-85 )तक चोल राज्य में अस्तव्यस्तता रही।परान्तक प्रथम के बाद उसका पुत्र गंडरादित्य राजसिंहासन पर आसीन हुआ ,जब उसकी मृत्यु हुई चोल राज्य एक छोटा सा प्रदेश मात्र रह गया था ।
कुछ दुर्बल शासकों के पश्चात 956 में सुन्दर चोल परान्तक द्वितीय राजसिंहासन पर बैठा,वह पराक्रमी सिद्ध हुआ ।उसने पांड्य राज्य पर आक्रमण किया ।पांड्य राजा की सहायता श्री लंका नरेश महिन्द्र चतुर्थ ने की परन्तु सुन्दर चोल ने पांड्य राजा को दो युद्धों में पराजित किया।
इस युद्ध में उसके युवराज पुत्र आदित्य द्वितीय ने भी सहयोग किया था ।
सुन्दर चोल के अंतिम वर्षों में गंडरादित्य के पुत्र उत्तम चोल ने षडयंत्र करके युवराज आदित्य द्वितीय की हत्या कर दी और व्यथित सुन्दर चोल को विवश किया कि वह अपना उत्तराधिकारी अपने पुत्र अरिमोलवर्मन के स्थान पर उसे घोषित करे ।
इस प्रकार उत्तम चोल ,चोल सिहांसन पर आसीन हुआ ।
परन्तु चोल राज्य का अच्छा समय तब शुरु हुआ जब चोल सिहांसन पर सुन्दर चोल का छोटा पुत्र अरिमोलवर्मन आसीन हुआ ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३६)

दक्षिण भारत के चोल वंश का नाम मौर्य काल में मिलता है,महाभारत तथा मेगस्थनीज़ की इन्डिकामें भी चोलों का उल्लेख है माना जाता हैकि महाभारत काल मे सहदेव ने चोलों पर विजय प्राप्त की थी।सिंहली महाकाव्य महावंश में भी चोलों का नाम आता है।
प्रारंभ में चोल शासक पल्लवों के अधीन सामन्त थे जो कावेरी के तटवर्ती क्षेत्रों पर शासन कर रहे थे ।
(850-871ई०) चोल शासक विजयालय ने पांड्यों के तंजौर क्षेत्र पर आधिपत्य कर लिया और उरैयुर के स्थान पर तंजौर को अपनी राजधानी बना लिया ।
नवीं शताब्दी में विजयालय के उत्तराधिकारी आदित्य प्रथम ने अपनी शक्ति बढ़ानी शुरू की और छोटे छोटे राज्यों को जीत कर अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली ।तिरूवालंगाडु ताम्रपत्रों के अनुसार आदित्य प्रथम ने पल्लव शासक अपराजित के विरूद्ध विद्रोह करकेउसे हरा कर उसकी हत्या करदी और पल्लव राज्य पर अधिकार कर लिया।
इस विजय के बाद चोल राज्य की सीमा राष्ट्र कूट राज्य की सीमा से मिल गयी ।आदित्य प्रथम ने राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय की पुत्री से विवाह कर उसे प्रधान रानी बना दिया ।
907ई० में आदित्य प्रथम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र परान्तक प्रथम सिहांसन पर बैठा ।राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय इस बात पर क्रोधित हो गया वह चाहता था उसकी पुत्री का पुत्र कन्नरदेव चोल सिहांसन पर आसीन हो,अत:उसने चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया।परन्तु परान्तक प्रथम ने गंगनरेश पृथ्वी पति की सहायता से राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय को पराजित कर दिया औरवीर चोल की उपाधि धारण की ।
परान्तक प्रथम को अपनी शक्ति को पूरी तौर पर पांड्य राजा राजसिंह द्वितीय के विरुद्ध लगाना पड़ा, उसने पांड्य राजा राजसिंह द्वितीय को पराजित कर उसकी राजधानी मदुरा पर अधिकार कर लिया
इसके पश्चात चोल राजाने पांड्य नरेश राजसिंह द्वितीय को दूसरे युद्धों में भी पराजित किया और धीरे धीरे पांड्य राज्य के क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया।परान्तक प्रथम की इन विजयी अभियानों से उसके राज्य की सीमा उत्तर में पेण्णारक्षेत्र से दक्षिण में कन्याकुमारी तक विशाल हो गई।
राष्ट्र कूट राजा कृष्ण तृतीय ने चोलों के शत्रुओं को एकत्र कर एक सम्मिलित सेना के साथ चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया और चोलों को जीत कर उनके तोंडमंडलम क्षेत्र को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया ।
इसके बाद भी राष्ट्र कूट राजा ने गंग राजा की सहायता से परान्तक प्रथम को दुबारा पराजित किया और चोल राज्य के कुछ क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३५)

राजसिंह द्वितीय कुछ समय तक अपने ननिहाल में रहने के बाद अपने राज्य की पुन: प्राप्ति के लिये प्रयासरत हो गया और अपनी शक्ति को एकत्र कर चोलो से मुक़ाबलाकरने को तैयार हो गया ।परन्तु चोल नरेश ने पांड्य शक्ति को पुन: पराजित कर दिया ।

पराजित होने के बाद भी मार वरमन राजसिंह द्वितीय बार -बार अपने राज्य को स्वतन्त्र कराने का प्रयास करता रहा ,उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र वीरपांडय ने भी राज्य की स्वतन्त्रता के लिये प्रयास जारी रखा ,उसके शासनकाल में चोल राज्य का शासन एक दुर्बल शासक गंडरादित्य चोल के पास था जिसे वीरपांडय ने पराजित कर अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली ।

गंडरादित्य की मृत्यु के बाद उसका भतीजा सुंदर चोल परान्तक द्वितीय राजा बना ।उसने वीरपांडय की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिये पांड्य राज्य पर आक्रमण किया ।वीरपांडय की सहायताश्रीलंका नरेश महेन्द्र चतुर्थ ने भी की परन्तु चोल नरेश ने उन्हें दो बार पराजित किया ।

वीरपांडय की मृत्यु ९६६ ई० में हो गयी और लगभग तीन शताब्दी तक पांड्य राज्य चोलो के आधिपत्य में रहा।

१०७०-११२० ई० में कुलोत्तुंग प्रथम के समय में पांड्य राजा जटावरमनश्रीवल्लभ ने पांड्य राज्य को स्वतंत्र रखने में कुछ वर्षों तक सफल रहा परन्तु कुलोत्तुंग ने उसे मार कर पांड्य राज्य पर अधिकार कर लिया ।

उसके पश्चात कुछ समय तक पांड्य राज्य उत्तराधिकार के कारण गृहयुद्ध में फँसा रहा ,कुलोत्तुंग तृतीय ने पांड्य राज्य के दो उत्तराधिकारियों वीरपांडय और विक्रम पांड्य के बीच के झगड़े को ख़त्म कर विक्रम पांड्य को मदुरा का शासक बनाया ।

विक्रम पांड्य के उत्तराधिकारी जटा वरमन कुलशेखर ने चोल सत्ता की अवज्ञा कर ,चोलों के विरूद्ध कुछ सफलतायें प्राप्त की ,उसके पुत्र मारवरमन सुन्दर पांड्य ने उदयपुर और तंजौर पर क़ब्ज़ा कर लिया और चोलो को भी अपने आधीन कर लिया । परन्तु चोलों ने

होयसलों की सहायता से पुन: अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली ।

हम भारत के लोग…(२)

राष्ट्रपति

राष्ट्र पति के पद की अवधि पाँच वर्ष होती है परन्तु जब तक उसका उत्तराधिकारी पद धारण न कर ले वह तब तक अपने कार्य काल के उपरांत भी अपने पद पर बना रहता है ।

राष्ट्र पति अपने पद से

॰अपना कार्य काल समाप्त होने पर

॰त्यागपत्र देने पर

॰महाअभियोग द्वारा

॰मृत्यु होने पर

॰निर्वाचन अवैध होने पर

पदमुक्त हो सकता है ।

राष्ट्र पति की शक्तियाँ –

(१) कार्य कारी शक्तियाँ –

• भारत सरकार के सभी शासन संबंधी कार्य उसके नाम से किये जाते हैं ।

• वह नियम बना सकता है

• वह प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है ।

• वह महान्यायवादी ,महालेखा परीक्षक ,चुनाव आयुक्त ,संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष ,राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति करता है ।

• वह स्वयं द्वारा नियुक्त प्रशासकों के द्वारा केन्द्र शासित राज्यों का प्रशासन सीधे संभालता है ।

(२) विधायी शक्तियाँ –

• वह संसद की बैठक बुला सकता है अथवा कुछ समय के लिये स्थगित कर सकता है और लोकसभा को विघटित कर सकता है ।

• जब एक विधेयक संसद द्वारा पारित होकर राष्ट्र पति के पास भेजा जाता है तो वहविधेयक को स्वीकृति देता है ,या स्वीकृति सुरक्षित रखता है ,विधेयक को यदि वह धन विधेयक नहीं है तो संसद के पु न:विचार के लिये लौटा देता है ।

• वह अंडमान व निकोबार द्वीप समूह ,लक्ष द्वीप ,दादर एवं नागर हवेली ,दमन व दीव में शांति ,विकास व सुशासन के लिये नियम बना सकता है ।

(३) वित्तीय शक्तियाँ –

• वह राज्य व केन्द्र के मध्य राजस्व के बँटवारे के लिये हर पाँच वर्ष में वित्त आयोग का गठन करता है ।

• धन विधेयक राष्ट्र पति की पूर्व अनुमति से ही संसद मे प्रस्तुत किया जा सकता है ।

(४) न्यायिक शक्तियाँ –

• वह उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है ।

• वह किसी अपराधी के दण्डादेश को निलंबित क्षमा या बदल सकता है ।

(५) कूटनीतिक शक्तियाँ –

• राष्ट्र पति भारत के सैन्य बलों का सर्वोच्च सेनापति होता है ,वह थल सेना ,वायु सेना और जलसेना के प्रमुखों की नियुक्ति करता है ।

• वह अंतराष्ट्रीय मामलों में भारत का प्रतिनिधित्व करता है ।

(६) आपातकालीन शक्तियाँ –

• राष्ट्र पति को तीन परिस्थितियों में आपातकालीन शक्तियाँ प्राप्त हैं

॰ राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद ३५२ )

॰ राष्ट्र पति शासन (अनुच्छेद ३५६व ३६५ )

॰ वित्तीय आपात काल (अनुच्छेद ३६० )

श्री कृष्ण…

द्वापर युग में भगवान विष्णु ने अवतार लिया था,कृष्ण के रूप में ये उनका नवाँ अवतार था । जब पृथ्वी दैत्यों के अत्याचार से पीड़ित हो रही थी तो वो ब्रह्मा जी के पास पहुँची,ब्रह्मा जी,शिव जी अन्य देवताओं के साथ वैकुण्ठ में भगवान विष्णु जी के पास गये और पृथ्वी की रक्षा की प्रार्थना की। विष्णु जी ने पृथ्वी की रक्षा का वचन दिया ।

कंस के कारागार में भाद्र पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में आधीरात को वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया ।

वसुदेव ने कंस से बचाने के लिये कृष्ण को गोकुल यशोदा और नंद के यहाँ पहुँचा दिया जहाँ उनका लालन पालन हुआ ।

बाल्यकाल में ही कंस द्वारा कृष्ण को मारने के लिये भेजे गये राक्षसों तृणावर्त ,बकासुर ,केशी ,कालनेमि ,

व्योमासुर और पूतना का वध कृष्ण द्वारा किया गया ।

कालियानाग के विष के दुष्प्रभाव के कारण यमुना का जल विषैला हो गया था ,कृष्ण ने उसे परास्त कर ,सपरिवार रमणक द्वीप पर भेज दिया और यमुना के जल को स्वच्छ बनाया ,गायों के पालन के कारण उनका एक नाम गोपाल भी था ।

जरासंध,शिशुपाल,शाल्वऔर विदूरथ जैसे दुष्टों काभी वध कृष्ण ने किया ।

कृष्ण जी के स्वर्ग आरोहण के बाद ही कलयुग का आरंभ माना जाता है ,और कृष्ण भगवान के स्वर्ग गमन पश्चात द्वारका नगरी भी सात दिनों के बाद जलमग्न हो गयी ।

चतुर्भुज कृष्ण के हाथों में शंख,चक्र ,गदा और पद्म शोभित है , उनका आयुध सुदर्शन चक्र ,वाहन गरूड़ और ध्वजचिन्ह गरूड़ है ।

उनकी आठ पटरानियां थी -रुक्मणी ,सत्यभामा,जामवंती ,कालिन्दी ,मित्र विंदा,

सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा ।

उनकी पुत्री का नाम चारूमती था ।

कृष्ण महान योगीश्वर ,राजनीतिज्ञ ,कूटनीतिज्ञ और कर्मयोगी थे ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३४)

श्री मारश्रीवल्लभ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र वरगुण द्वितीय राजसिंहासन पर आसीन हुआ ! वरगुण द्वितीय ने पल्लवों के बढते हुए राजनीतिक प्रभाव को रोकने के लिये चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया उसकी सेना तँजोर में कावेरी नदी के तट पर इडवै नाम के गांव तक पहुंच गयी परन्तु उसे वहां एक भयानक गुटबंदी का सामना करना पड़ा।
इस गुट में पल्लव युवराज अपराजित के नेतृत्व में चोल शासक आदित्य प्रथम तथा गंग राजा पृथ्वीपति की सेनाऐं भी पांड्य राजा के विरुद्ध युद्ध में शामिल हुई थी ।
वरगुण द्वितीय ने चोल राज्य के अलवै नाम के दुर्ग को जीतने के बाद पल्लव राज्य की सीमा में प्रवेश किया।यहां अपराजित के नेतृत्व में
गंग और चोल सेनाओं ने कुंभकोणम के निकट पुड्मवियम के मैदान में वरगुण द्वितीय को बुरी तरह पराजित किया।पांड्य शक्ति को इससे बहुत नुकसान हुआ और गंगराज पृथ्वीपति युद्ध में मारा गया।
वरगुण द्वितीय की राज्य की सीमा कावेरी नदी के तट तक ही रह गई ,पाण्ड्य राज्य का वो भाग जो कावेरी नदी के पार था उस पर चोल शासक आदित्य प्रथम का आधिपत्य हो गया ।
वरगुण द्वितीय के भाई परान्तक वीर नारायण पाण्ड्य ने उससे सिहांसन छीन कर अपना अधिकार कर लिया।
कोंगू प्रदेश और कावेरी के दक्षिणी क्षेत्र पर उसनेविजय प्राप्त की और पाण्ड्य राज्य में मिला लिया ।परन्तु चोल शासक आदित्य प्रथम ने कुछही दिनों में आक्रमण करके उससे कोंगू प्रदेश जीत लिया।
परान्तक वीरनारायण के बाद उसका पुत्र मार वर्मन राजसिंह द्वितीय राजा बना ।उसने अपने राज्य को पुनः संगठित किया औरश्रीलंका के शासक कस्सप पंचम से मैत्री संबंध स्थापित किए।
परन्तु चोल राजा परान्तक प्रथम ने 901ई 0में पाण्ड्य राज्य पर आक्रमण कर मदुरै को जीत लिया ।पाण्ड्य राजा ने श्रीलंका नरेश से सहायता की मांग की ,श्रीलंका नरेश ने अपनी सेना मदुरै भेज दी। परन्तु पाण्ड्य औरश्रीलंका की सम्मिलित सेनाओं को भी चोलों ने हरा दिया ।
राजसिंह श्रीलंका भाग गया ,सम्पूर्ण पाण्ड्य राज्य पर चोलों का अधिकार हो गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३३)

जटिल परान्तक नेडुंजडैयन (वरगुण प्रथम ) की मृत्यु के बाद उसका पुत्र श्रीमारश्रीवल्लभ राजसिंहासन पर बैठा ।वह अपने पिता की तरह महा पराक्रमी था उसे दक्षिण भारत का प्रजा पालक शासक कहा जाता है श्रीमारवल्लभ ने विलिनन्,कुन्नूर तथा सिंगलम् पर विजय प्राप्त की ।

सिहंली बौद्ध महाकाव्य महावंश के अनुसार श्रीलंका के शासक सेन प्रथम को पांड्य सेना ने पराजित किया और काफ़ी धन प्राप्त किया परन्तु दोनों के बीच सन्धि हो जाने के बाद पांड्य राजा ने सेन प्रथम को उसका राज्य वापस कर दिया ।

पल्लव राज दन्ति वरमन का पुत्र नन्दि वरमन तृतीय शक्तिशाली होने के साथ कूटनीतिज्ञ भी था ।उसने गंग,चोल और राष्ट्र कूट को मिलाकर पांड्य राजा श्रीमारवल्लभ पर आक्रमण कर दिया इस युद्ध में पांड्य पराजित हुये ,पल्लवों ने पांड्य राज्य के वेंगई नदी के तट तक का क्षेत्र जीत लिया ।

परन्तु पांड्य राजा ने पुन: अपनी शक्ति एकत्र की और पल्लव तथा उनके सहयोगी राजाओं को पराजित करअपनी हार का हिसाब बराबर किया ।

श्रीलंका नरेश सेन द्वितीय ने पल्लवों के साथ मिलकर श्रीमारवल्लभ की राजधानी मदुरै को घेर लिया और उनका साथ दिया पांड्य राजकुमार माया पांड्य ने जो स्वयं को राजगद्दी का हक़दार मानता था ।

इस युद्ध में भयंकर विनाश हुआ ,इस आक्रमण के परिणाम स्वरूप पांड्य नरेश श्रीमारवल्लभ युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ और उसकी मृत्यु हो गयी ।

तब सिंहली सेनानायक ने उसके पुत्र वरगुण द्वितीय को राजसिंहासन पर बैठाया ।

हम भारत के लोग…(१)

राष्ट्रपति

संविधान के भाग पाँच के अनुच्छेद ५२ से ७८ तक संघ की कार्य पालिका के बारे में बताया गया है ,इसमें राष्ट्रपति ,उप राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री ,मंत्री मंडल तथा महान्यायवादी होते हैं ।

राष्ट्र पति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के चुने सदस्य ,राज्य विधानसभा के चुने सदस्य और केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली , पुडुचेरी के विधानसभा के चुने सदस्य करते हैं ।

संसद के दोनों सदनों के मनोनीत सदस्य, राज्य विधानसभाओं के मनोनीत सदस्य राज्य विधान परिषदों के’ द्विसदनीय विधायिका के मामलों में ‘सदस्य निर्वाचित तथा मनोनीत और दिल्ली तथा पुडुचेरी के मनोनीत सदस्य राष्ट्र पति के चुनाव में भाग नहीं लेते ।

राष्ट्रपति के पद हेतु योग्यता – कोई भी व्यक्ति भारत का नागरिक हो वह ३५ वर्ष का हो वह लोकसभा का सदस्य चुने जाने के योग्य हो वह संघ सरकार में ,राज्य सरकार में किसी स्थानीय या किसी सार्वजनिक स्थान में लाभ के पद पर होना नहीं चाहिये ।

राष्ट्र पति के चुनाव के लिये उम्मीदवार को ५० प्रस्ताव करने वाले और पचास अनुमोदन करने वाले होने चाहिये ।

उम्मीदवार को भारतीय रिज़र्व बैंक में पन्द्रह हज़ार रूपये ज़मानत राशि जमा करनी होगी ।

राष्ट्र पति पद ग्रहण से पूर्व शपथ लेता है । शपथ उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ,उनकी अनुपस्थिति में वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा शपथ दिलाई जाती है ।

राष्ट्र पति को संसद के किसी भी सदन का या राज्य विधायिका का सदस्य नहीं होना चाहिये यदि कोई व्यक्ति ऐसा है तो उसे सदन से पद ग्रहण करने से पूर्व त्यागपत्र देना होगा ।

वह कोई अन्य लाभ का पद नहीं लेगा ।

उसे बिना कोई किराया चुकाये आधिकारिक निवास राष्ट्र पति भवन दिया जायेगा ।

उसे संसद द्वारा निर्धारित उपलब्धियों और भत्ते प्राप्त होंगे ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३२)

मार वरमन राजसिंह के उपरान्त उसका पुत्र जटिल परान्तक नेडुंजडैयन (वरगुण प्रथम ) पांड्य राजसिंहासन पर आसीन हुआ ।

वह पांड्य राज्य का शक्तिशाली और महान राजा हुआ ।वेलाविक्कुडि अभिलेखानुसार उसने पेण्णागडम्(तंजौर के क़रीब) के युद्ध में पल्लवराज नन्दिवरमन द्वितीय उनका साथ देने वाले नाट्टक्कुरूम्ब के राजा आयवेल की सेनाओं को पराजित किया । तगदूर(धर्मपुरी )के राजा अडिगैमान को युद्ध में पराजित किया तथा उसे बंदी बना कर रखा ।अंतत: तगदूर शासक ने उसकी अधीनता स्वीकार की ।वरगुण का विजयी अभियान जारी रहा ,उसने बेड़ाद राज्य परअधिकार कर लिया और कावेरी नदी के दक्षिण तट पर स्थित पेन्नागडम के युद्ध में उसने पल्लव नरेश नन्दि वरमन को हरा दिया ।उसकी शक्ति को रोकने के लिये पल्लव नरेश ने कोंगू केरल तथा अडिगैमान के साथ मिलकर वरगुण प्रथम पर आक्रमण किया ,पांड्य नृपति वरगुण प्रथम ने इन्हें पराजित किया औरपललव राज्य की सीमा में प्रवेश किया पल्लव शासित तोन्दईनाडु में पेन्नार नदी के अरशूर मैदान में अपना सैन्य शिविर स्थापित किया ।वरगुण प्रथम का शासन तिरुचिरापल्ली के आगे तंजोर ,सलेम, कोयम्बटूर प्रदेशों परऔर इसके संपूर्ण दक्षिणी भाग परहो गया ।

वरगुण प्रथम ने दक्षिण ट्रावणकोर स्थित वेणाड राज्य के सुदृढ़ क़िला बंद बंदरगाह विलिनम पर आक्रमण करके उस राज्य पर अपना शासन स्थापित किया ।

वरगुण प्रथम अपने समय का तमिल देश का प्रभावशाली और पराक्रमी राजा बन गया ।अपने शत्रुओं को पराजित करने के कारण उसने परान्तक उपाधि धारण की । वह विद्वानों कासंरक्षक और विद्यानुरागी था । वह पांड्य वंश का महान शासक था।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३१)

कोच्चाडैयन के बाद उसका पुत्र मारवरमन राजसिंह प्रथम राजा बना ,वो काफ़ी महत्तवाकांक्षी नरेश था ।उसने पल्लव राजगद्दी के लिये हो रहे संघर्ष में नन्दि वरमन के विरूद्ध उसके चचेरे भाई चित्रमाय का साथ दिया और नन्दि वरमन द्वितीय को नेडुवयल ,कुरूमडै ,कोडम्बलूर ,मण्णिकुरूच्चि तथा तिरूमंगई के युद्ध में हराया तथा नन्दि वरमन को बन्दी बना लिया ।

पल्लव नरेश के अति विश्वासपात्र सेनापति उदयचन्द्र की सेना ने मारवरमन राजसिंह प्रथम तथा पल्लव राजकुमार चित्रमाय की सेना को घेर लिया तथा राजकुमार चित्रमाय की हत्या कर के पल्लव नरेश के सिंहासन को सुरक्षित कर दिया और नन्दिवरमनको मुक्त करा कर राजसिंहासन पर आसीन कराया ।

परन्तु मारवरमन राजसिंह ने अपनी शक्ति एकत्र कर कावेरी नदी पार करके मलकोंगम’( तिरूचरापल्ली और तंजौर ‘ )क्षेत्र को जीत लिया, वहाँ के शासक मालवाराज ने पराजित हो जाने के बाद अपनी पुत्री का विवाह मारवरमन राजसिंह से करके मित्रता का सम्बन्ध स्थापित कर लिया ।

मारवरमनराजसिह ने गंग नरेश और चालुक्य नरेश पर भी विजय प्राप्त की ।

इस प्रकार उसने पांड्य राज्य की सीमा कावेरी नदी के दक्षिण में स्थित पांडिक्कौडमुडि क्षेत्र तक पहुँचा दी ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३०)

दक्षिण भारत के पांड्य राजवंश का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है ,सम्राट अशोक के अभिलेखों में पांड्य राजवंश का नाम है ।ईसा की छठी शती में पांड्यो को काफ़ी क्षति हुई थी परन्तु ५९० ई० में पांड्यों का नेतृत्व कुडुगौन नामक राजा ने किया था उसने पांड्य राजवंश को पुन: एक शक्तिशाली राज्य के रूप में स्थापित किया उसकी राजधानी मदुरै थी ।

कुंडुगौन को पांड्य राजवंश का महान राजा माना जाता है उसने पांड्यशक्ति को एकत्र कर अपने शत्रुओं को पराजित किया और तमिल देश में अपने राज्य की नींव रखी वह एक महान विजेता था ।

उसके बाद मार वरमन अवनिशूलमणि तथा शेन्दन (जयन्त वरमन ) राजा हुये ।उनके बारे अधिक जानकारी नहीं मिलती ।

६७० ई० में अरिकेशरि मार वरमन पांड्य राजाओं में महान योद्धा तथा सामर्थ्यवान शासक सिद्ध हुआ ।उसका विवाह एक चोल राजकुमारी से हुआ जो शिवभक्त थी ।राजकुमारी के आग्रह पर शैव सन्त सम्बन्दर मदुरै आये ,उनके प्रभाव से अरिकेशरि मारवरमन जो पहले जैन धर्म को मानने वाला था उसने प्रभावित होकर शैव धर्म को अपना लिया ।

अरिकेशरि मारवरमन ने केरल और अन्य पड़ोसी राज्यों को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया और अपने पड़ोसी राज्य पल्लवों के शत्रु वातापि के चालुक्यों के साथ मित्रता कर ली ।

अरिकेशरि के उपरान्त उसका पुत्र कौच्चाडैयन(रणधीर) ने राजसिंहासन प्राप्त किया वह भी अपने पिता की भाँति महान और शूरवीर था .उसने कोंगू प्रदेश जीतकर अपने राज्य में मिला लिया और चेरों और चोलो पर भी आधिपत्य जमा लिया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२९)

विक्रमादित्य षष्ठ के बाद उसका पुत्र सोमेश्वर तृतीय राजगद्दी पर बैठा ,वह कोमल स्वभाव का शान्तिप्रिय शासक था ।

सोमेश्वर तृतीय के शासन काल में होयसल नरेश विष्णु वर्धन ने बल पूर्वक चालुक्य राज्य के नोलम्बवाडी ,वनवासी तथा हंगल क्षेत्रों में अपनी सत्ता का विस्तार शुरू कर दिया ।

सोमेश्वर से चोल नरेश कुलोतुंग ने आन्ध्र प्रदेश को जीत लिया परन्तु चालुक्यो ने उसे पुन:प्राप्त कर लिया ।

सोमेश्वर विद्वान था तथाउसे शिल्प शास्रज्ञ भी कहा जाता है।

सोमेश्वर तृतीय के बाद उसका पुत्र जगदेवमल्ल राजा बना ,उसके शासन काल में भी कुछ सामन्तों ने विद्रोह किया और अपने को स्वतन्त्र मानने लगे परन्तु जगदेव मल्ल ने उनके विद्रोह का दमन किया । होयसल राजा विष्णु वर्धन ने राज्य विस्तार का कार्य जगदेव मल्ल के शासन में भी जारी रखा ।

जगदेव मल्ल का शासन काल ११३८ से११५१ ई० तक रहा ।

जगदेव मल्ल के बाद उसका छोटा भाई तैलप तृतीय राजा बना उसके समय में होयसल ,काकतीय ,कलचुरि तथा यादव वंशीय सामन्त काफ़ी शक्ति शाली हो गये थे ,उन्हें क़ाबू में रखना तैलप के लिये बहुत कठिन था । कलचुरि के सामन्त ने ११५७ ई० में चालुक्य राज्य पर अधिकार कर लिया । उसने और उसके वंशजों ने ११८१ तक राज्य किया । परन्तु तैलप तृतीय के पुत्र सोमेश्वर चतुर्थ ने तत्कालीन कलचुरि शासक आहवमल्ल को परास्त कर कल्याणी पर अधिकार कर लिया ।

उसने कुछ दिनों तक ही शासन किया तभी ११८९ ई० में यादव वंशी भिल्लम ने सोमेश्वर से उत्तरी चालुक्य प्रदेशों को जीत लिया ।उधर होयसल नरेश बल्लाल द्वितीय ने तथा काकतीय राजा रुद्र ने भी विद्रोहों और आक्रमण के फलस्वरूप ११८९ ई० में चालुक्य प्रदेशों को अपने अपने राज्य में मिला लिया ।

सोमेश्वर तथा उसके सेनापति ब्रह्म को बल्लाल द्वितीय ने कई लड़ाइयों में हराया ,अन्तिम लड़ाई ११९० ई० में हुई सोमेश्वर की हार के साथ चालुक्य राजवंश का अंत हो गया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२८)

जिस समय विक्रमादित्य षष्ठ चालुक्य राजगद्दी पर विराजमान हुआ उस समय उसका साला अधि राजेन्द्र चोल सिंहासन पर आसीन था ।

परन्तु चोलों ने विद्रोह करके अधि राजेन्द्र को राजगद्दी से उतार दिया और उसकी हत्या भी कर दी ।इस विद्रोह का मुख्य सरदार कुलोत्तुंग प्रथम था ,उसने राजगद्दी पर अधिकार कर लिया ।

कुलोत्तुंग ने अपने शासन काल के अंतिम वर्षों में विक्रम चोल को युवराज घोषित करने के लिये वेंगी राज्य से चोल राज्य बुलाया ,जिसका लाभ उठा कर विक्रमादित्य षष्ठ ने वेंगी राज्य पर क़ब्ज़ा कर लिया और अपने सेनानायक अनंतपाल को वहाँ का शासक नियुक्त किया उसने गंगवाडी और कोलार क्षेत्र को भी जीतकर अपने राज्य में मिला लिया ।

गंगवाडी पर उस समय होयसल नरेश विष्णु वर्धन का अधिकार था ,विक्रमादित्य षष्ठ ने विष्णु वर्धन को हराया और कदम्बों तथा पाण्ड्यों को भी पराजित किया । विक्रमादित्य ने लंका में भी अपने दूत भेजकर मैत्री सम्बन्ध स्थापित किये ।

उसका शासन लंबी अवधि तक रहा ।उसने अपने राज्य में विद्या और धर्म के प्रसार के लिये पाँच सौ तमिल ब्राह्मणों को बसाया और उनके भरण पोषण की भी व्यवस्था की ।

विल्हण कृत ‘विक्रमांक देव चरितम’ विक्रमादित्य के चरित्र पर लिखी गयी है ,इसमें १८ सर्ग हैं।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२७)

सोमेश्वर प्रथम की मृत्यु के उपरान्त उसका बड़ा पुत्र सोमेश्वर द्वितीय राजगद्दी पर बैठा ,उसने अपने छोटे भाई विक्रमादित्य षष्ठ को गंगवाडी प्रदेश का शासक बना दिया ।परन्तु विक्रमादित्य स्वयं राजगद्दी पाना चाहता था अत:उसने राजगद्दी पाने के लिये चोल नरेश वीर राजेन्द्र की पुत्री से विवाह किया ,वीर राजेन्द्र ने अपनी पुत्री के पति विक्रमादित्य षष्ठ को राजगद्दी दिलाने हेतु सोमेश्वर द्वितीय पर आक्रमण कर दिया और चालुक्य राज्य की गुटटी को घेरकर कम्पिलनगर को नष्ट कर दिया ।

परन्तु कुछ समय पश्चात सोमेश्वर द्वितीय ने वीर राजेन्द्र को दक्षिणी कर्नाटक के बाहर निकाल दिया ।

पर थोड़े समय बाद वीर राजेन्द्र की मृत्यु हो गयी जिससे विक्रमादित्य संकटों से घिर गया ,एक तरफ़ उस पर अपने भाई सोमेश्वर द्वितीय का दवाब और दूसरी ओर अपने साले अधि राजेन्द्र की राजगद्दी को सुरक्षित रखने का दवाब ।

वेंगी नरेश कुलोतुंग की सहायता लेकर सोमेश्वर द्वितीय ने विक्रमादित्य और उसके समर्थकों पर आक्रमण कर दिया दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ ।इस युद्ध में विक्रमादित्य की सेना ने सोमेश्वर द्वितीय को बंदी बना लिया । इस तरह विक्रमादित्य षष्ठ ने कल्याणी का राजसिंहासन प्राप्त किया अपने राज्याभिषेक के समय उसने चालुक्य विक्रम संवत नाम का नया संवत चलाया ।अपने भाई सोमेश्वर को उसने आजीवन बंदीगृह में ही रखा ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२६)

चोलराजा राजाधिराज ने चालुक्यों को दबाने का काम अपने युवराज पुत्र राजेन्द्र द्वितीय को दिया । राजेन्द्र द्वितीय ने विक्रमादित्य षष्ठ के कई पराक्रमी सेनापतियों की हत्यायें की और चालुक्य सेना से उनके हाथी ,घोड़े और शस्त्र लूट लिये तथा भव्य भवनों को नष्ट कर दिया

सोमेश्वर प्रथम के संधि प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया । चोलों ने चालुक्यों की राजधानी कल्याणी परभी विजय प्राप्त की ।तंजोर के दारासुरम् मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थापित द्वार पाल की मूर्ति को राजेन्द्र द्वितीय ने अपनी राजधानी में लाकर स्थापित किया ।

चालुक्य नरेश सोमेश्वर प्रथम ने अपने पुत्र विक्रमादित्य और परमार राजा जयसिंह को चोलों के अधिकृत प्रदेश गंगवाडी पर आक्रमण करने भेजा परन्तु चोल नरेश राजेन्द्र द्वितीय ने अपने पुत्र वीर राजेन्द्र को विशाल सेना के साथ भेजा उसने वीरता पूर्वक सबको हरा कर भगा दिया ।

वेंगनाडु युद्ध में पराजित सेनानायकों के साथ किये गये अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से सोमेश्वर ने कुंडलसंगम के मैदान में पु न: चोलों को चुनौती दी ।चोल राजा तुरन्त आ गया ,चालुक्य सेनायें भी आ गयी परन्तु सोमेश्वर प्रथम जो संभवत बीमार था युद्ध क्षेत्र में नहीं पहुँचा । चोल राजा ने चालुक्यों को पराजित कर तुंग भद्रा नदी के किनारे विजय स्तंभ स्थापित कराया ।

कुछ समय बाद अपनी बीमारी से त्रस्त होकर और अपनी पराजय से व्यथित सोमेश्वर ने १०६८ में तुंग भद्रा नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२५)

भोज के शासन के शासन काल के अंतिम वर्षों में कल्याणी के सोमेश्वर प्रथम गुजरात के चालुक्य नरेश भीम प्रथम तथा चेदिवंश के कलचुरि शासक लक्ष्मी करण ने सम्मिलित रूप से मालवा पर आक्रमण किया । इसी बीच राजा भोज अस्वस्थ होकर मृत्यु को प्राप्त हुये ।कलचुरि नरेश लक्ष्मी करण ने मालवा की राजधानी धारानगरी पर अधिकार कर लिया ,तब राजा भोज के पुत्र जयसिंह ने सोमेश्वर प्रथम से सहायता माँगी ।अत: सोमेश्वर प्रथम ने अपने पुत्र विक्रमादित्य षष्ठ को धारा नगरी को मुक्त कराने और राजकुमार जयसिंह को राजसिंहासन दिलाने का कार्य सौंपा ।

विक्रमादित्य षष्ठ ने निष्ठा पूर्वक अपना कार्य पूरा किया लक्ष्मीकरण को पराजित कर जयसिंह को राजसिंहासन पर आसीन कराया ।

अब सोमेश्वर प्रथम ने वेंगी राज्य पर हमला कर चोल सत्ता को चुनौती दी । वेंगी के राजा राजराज को उसके सौतेले भाई विजयादित्य ने अपदस्थ कर स्वयं को राजा घोषित किया परन्तु राजराज ने पुन:अपना राज्य वापस ले लिया ।

विजयादित्य ने अब सोमेश्वर प्रथम के यहाँ शरण ली जहाँ उसका राजोचित स्वागत हुआ ,विजयादित्य के समर्थन मे सोमेश्वर प्रथम ने वेंगी पर हमला कर दिया ।

परन्तु राजराज को चोल नरेश का समर्थन प्राप्त था ,शीघ्र ही चोल नरेश राजेन्द्र प्रथम को चालुक्य नरेश सोमेश्वर के आक्रमण की सूचना मिल गयी ,उसने एक ब्राह्मण सेनापति के साथ तीन अन्य योग्य सेनापतियो के नेतृत्व में सेना भेजी ।परन्तु युद्ध में कोई निर्णय न हो सका ।इसी बीच राजेन्द्र प्रथम की मृत्यु हो गई ।

चोल राजगद्दी पर राजेन्द्र प्रथम का योग्य पुत्र राजाधिराज आसीन हुआ उसने पुन: सोमेश्वर प्रथम पर आक्रमण किया ,कृष्णा नदी के किनारे धान्य कटक में दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ ,चालुक्य नरेश बुरी तरह पराजित हुआ चालुक्य युवराज और वेंगी नरेश विजयादित्य युद्ध क्षेत्र छोड़कर भाग गये।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२४)

सत्याश्रय के बाद उसके अनुज दश वरमन का पुत्र विक्रमादित्य पंचम १००८ में राजगद्दी पर बैठा ,परन्तु वह सिर्फ़ १०१५ तक ही सिंहासन पर रहा ।

१०१५ में जयसिंह द्वितीय राजगद्दी पर आसीन हुआ उसे कई युद्ध करने पड़े ।मालवा के परमार शासक भोज ने मुंज का बदला लेने के लिये चालुक्य राज्य पर आक्रमण किया और कोंकण के कुछ हिस्सों को अपने अधिकार मे कर लिया ,परन्तु जयसिंह द्वितीय ने अपने आधीन राजाओं की सहायता से भोज द्वारा अधिकृत क्षेत्रों को मुक्त करा लिया ।

राजेन्द्र चोल ने चालुक्य शासित मुशंग क्षेत्र के युद्ध में जयसिंह को परास्त कर रट्टपाडि प्रदेश पर अधिकार कर लिया ।

परन्तु चालुक्य अभिलेखों के अनुसार जयसिंह द्वितीय ने राजेन्द्र चोल को तुंगभदरा के आगे गंगवाडी तक पीछे हटा दिया ।

राजेन्द्र चोल ने अपने दूसरे अभियान में जयसिंह को मस्की के युद्ध में पराजित किया परन्तु उसने अपना आक्रमण आगे न बढ़ा कर तुंग भद्रा नदी को ही दोनों राज्यों की सीमारेखा मान लिया गया ।

जयसिंह द्वितीय के पश्चात उसका पुत्र सोमेश्वर प्रथम राजगद्दी पर आसीन हुआ ,उसने अपनी राजधानी मान्यखेट से हटाकर कल्याणी नगर को बनाया ।कल्याणी को हर तरह से सुविधा सम्पन्न बना कर भव्य भवनों और मंदिरों से सजाया ।

अपने पिता की तरह उसने भी मालवा के भोज के विरुद्ध युद्ध जारी रखा और उसकी राजधानी धारा नगरी पर अधिकार कर लिया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२३)

तैलप द्वितीय के दो पुत्र थे ,उसने अपने बड़े पुत्र सत्याश्रय

को अपने जीवन काल में ही युवराज बना दिया था और छोटे पुत्र दशवरमन को किसी प्रान्त का प्रान्त पति नियुक्त कर दिया था ।

अपने युवराज बनने के बाद सत्याश्रय ने अपने पिता के साथ कई युद्धों में भाग लिया था ,वह एक कुशल योद्धा था ।तैलप द्वितीय के बाद सत्याश्रय ने सिंहासन प्राप्त किया ,उसने कुछ दिनों बाद ही कोंकण राज्य पर आक्रमण किया और वहाँ के राजा अपराजित को हरा कर अधीन बनाया तत्पश्चात गुर्जर राज्य परभी आक्रमण किया और गुर्जर राजा चामुण्ड राय को भी जीत लिया ।

जब सत्याश्रय युद्ध में व्यस्त था तो परमार शासक सिन्धुराज जो मुंज का छोटा भाई था उसने तैलप द्वितीय द्वारा जीते गये सभी परमार क्षेत्र पुन: वापस जीत लिये ।

चोल शासक राजराज चोल ने वेंगी के राजा दानारणव की हत्या करने वाले तेलुगु जटाचोड को वेंगी सिंहासन से हटा कर दानारणव के पुत्र शक्ति वरमन प्रथम को वेंगी का राजा बनाया और अपना सैन्य शिविर भी वेंगी में स्थापित किया ।

इस पर अप्रसन्न होकर सत्याश्रय ने वेंगी राज्य पर आक्रमण कर वहाँ के कुछ इलाक़ों को जीत लिया ।इस पर चोल नरेश राजराज चोल ने अपने पुत्र राजेन्द्र चोल को सीधे सत्याश्रय की राजधानी पर आक्रमण करने का आदेश दिया ।राजेन्द्र चोल ने सत्याश्रय की राजधानी पर आक्रमण कर उसे जीत लिया तथा लूटमार की और निर्दोष जनता की हत्यायें भी की ।

परन्तु सत्याश्रय ने अपनी शक्ति पुन: इकट्ठा की और अपने प्रदेशों को पुन: चोलों के अधिकार से वापस जीत लिये उसने चोल सैनिकों को तुंग भद्रा के दक्षिणी क्षेत्र तक पीछे हटा दिया ।

उसका शासनकाल लगभग ग्यारह वर्षों तक रहा ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२२)

कर्क द्वितीय अपने क्रूर स्वभाव और अक्षमता के कारण स्वयं अपने विनाश का कारण बना ।तैलप द्वितीय ने कर्क को पराजित कर संपूर्ण राज्य पर अधिकार कर लिया ,वह एक दक्ष सेनापति और राजकाज में अत्यन्त कुशल था ।उसने कल्याणी में एक नये चालुक्य वंश की नींव डाली ।

चालुक्य शासकों के अभिलेख मे वातापि के विक्रमादित्य द्वितीय के भाई भीम को कल्याणी के चालुक्य वंश का संस्थापक कहा गया है ।कल्याणी के विक्रमादित्य चतुर्थ (जो भीम का वंशज था ) के पुत्र तैलप द्वितीय को मान्यखेट के राष्ट्र कूट राजवंश को पराजित कर कल्याणी में चालुक्य राजवंश को स्थापित करने वाला माना जाता है ।

सिंहासन प्राप्त करने के बाद तैलप द्वितीय ने साम्राज्य विस्तार शुरू किया ,उसका मुख्य विरोधी गंगनरेश पाँचाल देव था जिसने अपनेराज्य की सीमा कृष्णा नदी तक फैला रखी थी ।तैलप ने उस पर कई बार आक्रमण किया परन्तु सफल न हो सका ।तब वेल्लारी के शासक गंग भूतिदेव ने तैलप की सहायता की ,गंगनरेश युद्ध मे मारा गया और तैलप विजयी हुआ ।गंगराज्य पर विजय के बाद तैलप द्वितीय के राज्य की सीमा कर्नाटक तर विस्तृत हो गयी ।

९७७ई० में तैलप द्वितीय ने कर्क द्वितीय के सहायता करने वाले रणस्तम्भ पर विजय प्राप्त की और ९८० में उत्तम चोल को पराजित किया ।लाट राज्य को जीतकर अपने सेनापति को वहाँ का सामन्त बनाया ।

मालवा के परमार शासक मुंज पर तैलप द्वितीय ने कई आक्रमण किये पर सफल न हो सका ।परन्तु मुंज नेअपने महामंत्री की सलाह न मान कर गोदावरी नदी पार कर तैलप द्वितीय पर आक्रमण किया और पराजित होकर तैलप द्वितीय का बन्दी बना ।

तैलप ने उसे तरह-तरह से अपमानित कर अन्त में मृत्यु के घाट उतार दिया ।

तैलप द्वितीय ने चालुक्य वंश को पुन: प्रतिष्ठित किया ।उसने लगभग पच्चीस वर्षों तक शासन किया , दक्षिण की कुछ कहानियों मे उसे भगवान कृष्ण का अवतार भी माना जाता है ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२१)

कृष्ण तृतीय के बाद उसके अनुज खोट्टिग को राष्ट्र कूट का सिंहासन मिला ।परन्तु कृष्ण तृतीय की मृत्यु के बाद उसकी अधीनता स्वीकार करने वाले राज्य सिर उठाने लगे , मालवा का परमार शासक सीयक द्वितीय ने नर्मदा को पार कर राष्ट्र कूट राज्य पर हमला कर दिया ,राष्ट्र कूट सैनिकों ने न सिर्फ़ परमारों को पराजित किया उनके सेनापति की हत्या भी कर दी ।

परन्तु कुछ समय पश्चात परमार नरेश ने एक बड़ी सेना के साथ राष्ट्र कूट की राजधानी मान्यखेट पर आक्रमण किया और राज्य में भारी लूट पाट भी की ।

राष्ट्र कूट के शक्तिशाली सामन्त गंग शासक मारसिह ने परमारों को पराजित किया और अपने राजा के राज्य को सुरक्षित किया लेकिन खोट्टिग अपनी पराजय और राजधानी की हालात से बहुत व्यथित था । कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई ।

खोट्टिग की मृत्यु के पश्चात कर्क द्वितीय सिंहासन पर आसीन हुआ । परन्तु अपने क्रूर स्वभाव के कारण वह अपने ही लोगों के बीच ही अप्रिय होता गया इसका लाभ उसकेसामन्त तैलप द्वितीय ने उठाया वह एक कुशल सेनानायक था और प्रशासन में भी निपुण था। कर्क द्वितीय का सामन्त तैलप द्वितीय एक सामन्त होते हुये भी राष्ट्र कूट मन्त्रियों और सेनानायकों के बीच लोकप्रिय होता गया ।वह एक कुशल प्रशासक था अपनी महत्त्वकांक्षा के चलते उसने मौक़ा पाकर कर्क द्वितीय पर आक्रमण कर दिया और उसे पराजित कर राष्ट्र कूट राज्य पर अधिकार कर लिया , अपनी कूटनीतिज्ञ दक्षता से वह राष्ट्र कूट राज्य का राजा बन गया । इस प्रकार राष्ट्र कूट साम्राज्य का अंत हो गया ।