दक्षिण भारत का इतिहास…(४१)

राजेंद्र प्रथम के उपरांत युवराज राजाधिराज चोल 1044 में चोल सिहांसन पर विराजमान हुआ।उसने सिहांसन पर बैठने केबाद चालुक्यों के विरुद्ध अभियान शुरु किया और कृष्णा नदी के किनारे धान्यकटक में चालुक्यों को पराजित किया।
1046 में राजाधिराज ने कल्याणी राज्य पर आक्रमण कर कल्याणी पर अधिकार कर लिया, चोल सेनाओं ने चालुक्यों के सेनापतियों और सरदारों क़ो पकड़ लिया तथा कम्पिलनगर में चालुक्यों के राजमहल को नष्ट कर दिया।राजाधिराज ने शत्रु की राजधानी में अपना वीराभिषेक कराया और विजयराजेन्द्र की उपाधि ग्रहण की।
1050 में चालुक्य नरेश सोमेश्वर अपने राज्य से चोल सेना को हटाने में सफल हुआ ,अब उसने वेंगी राज्य पर आक्रमण कर वेंगी नरेश को विवश किया कि वह सोमेश्वर की अधीनता स्वीकार करे।
राजाधिराज ने अपने छोटे भाई राजेन्द्र द्बितीय को युवराज बना दिया था ।राजाधिराज ने राजेंद्र द्बितीय को सोमेश्वर पर आक्रमण करने भेजा,युवराज राजेंद्र द्बितीय ने चालुक्य शासित रटठमंडलम् प्रदेश को जीतकर अनेक चालुक्य सेनापतियों को मौत के घाट उतारा और उन्हें भागने पर विवश कर दिया।
सोमेश्वर एक बार फिर चोल सेना का सामना करने आगे बढ़ा, कोल्हापुर के पास कोप्पम में दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ,राजाधिराज युद्ध स्थल पर शत्रु सेनाओं से घिर गया और बुरी तरह घायल हुआ तथा मृत्यु को प्राप्त हुआ ,परन्तु इसी बीच राजेंद्र द्वितीय अपनी सेना के साथ युद्ध स्थल पर पहुंच गया और अपने पराक्रम से युद्ध में विजयी हुआ,पराजित चालुक्य सेना समर भूमि से भाग खड़ी हुई।
चोलों के हाथ बहुत सा लूट का माल ,हाथी ,घोड़े, ऊंट तथा कुछ स्त्रियां जो राजपरिवार की थी,लगा ।
राजेंद्र द्बितीय ने युद्ध स्थल में ही अपना राज्याभिषेक करायाऔर विपुल सम्पत्ति के साथ अपनी राजधानी वापस लौट आया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४०)

राजेंद्र चोल को 1014 में चोल राज्य का सिहांसन प्राप्त हुआ ,वह अपने पिता की तरह वीर ,महत्वाकांक्षी, कूटनीतिज्ञ था ।सिहांसन पर आरूढ़ होने के पश्चात राजेंद्र चोल ने केरल के विद्रोह को कुचल दिया और उन्हें परास्त कर अपने आधीन कर लिया।
चोल अभिलेख के अनुसार राजेंद्र चोल ने सिंहल राज्य पर आक्रमण कर सिंहल राज्य को अपने चोल साम्राज्य में मिला लिया औरसिंहल के शासक को बंदी बनाकर बारह वर्ष तक बंदीगृह में रखा बंदीगृह मेंही उसकी मृत्यु हो गई ।राजेंद्र चोल ने अपने पुत्र विक्रम चोल को उत्तरी पूर्व राज्यों की विजय अभियान के लिए, उसके नेतृत्व में विशाल सेना को भेजा ,विक्रम चोल ने कलिंग(उड़ीसा)बस्तर इन्द्ररथ तथा दक्षिणी कोसल आदि राज्यों को विजित किया और दंडभुक्ति केशासक धर्म पाल,दक्षिणी राठ के राजा रणसूर,पूर्व बंगाल के राजा गोविंद चन्द्र तथा पाल राज्य के शासक महीपाल के विरुद्ध युद्ध में सफलता प्राप्त की।विजय प्राप्ति के उपरांत विक्रम चोल ने गंगा में स्नान किया।
अपने शासनकाल के प्रारंभ में ही राजेंद्र प्रथम ने अपने पुत्र राजाधिराज को युवराज बना दिया था।
तिरुवालंगाडु ताम्रपत्र के अनुसार राजेंद्र नेअपनी विशाल जल सेना की सहायता से समुद्र पार कर कटाह राज्य को जीत लिया और वहां के राजा को बंदी बनाया, परन्तु कटाह राजा ने अपनी मुक्ति की याचना करते हुयेचोल नरेश की अधीनता स्वीकार कर ली,राजेंद्र चोलप्रथम ने उसकी याचना स्वीकार कर उसे मुक्त कर दियाऔर अपना सामन्त शासक बना दिया।
अपनी विशाल जलसेना के साथ राजेंद्र चोल ने अंडमान निकोबार, वर्मा देश के अराकान तथा पेगूआदि प्रदेशों को भी जीत लिया।
जब राजेंद्र चोल हिन्द सागर के पार युद्धों में व्यस्त था,तभी केरल, पाण्ड्य और सिंहल राज्य के शासकों ने संयुक्त रुप चोल सत्ता के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया,इस युद्ध में सुन्दरपाण्डय नेतृत्व कर रहा था।
राजेन्द्र ने अपने युवराज पुत्र राजाधिराज को इस विद्रोह को दबाने भेजा, राजाधिराज ने इस विद्रोह को कुचल दिया,इस युद्ध में सिंहल राजा मृत्यु को प्राप्त हुआ।
अपने राज्य की सीमाओं पर चोल शासक की पैनी नजर रहतीं थी
सीमांत राजाओं पर चोल शक्ति का दवाब हमेशा ही बना रहता था।उसने शक्तिशाली राज्यों के विद्रोह बलपूर्वक दबा दिया और उन्हें सदा अपने अधीन रहने पर विवश कर दिया था।
उसके शासन काल में चोल राज्य वैभवशाली था।

हम भारत के लोग…(४)

प्रधानमंत्री

अनुच्छेद 75 के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को राष्ट्रपति प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।
यदि लोकसभा में कोई भी दल स्पष्ट बहुमत में न हो तो राष्ट्रपति स्वविवेक से सबसे बड़े दल अथवा गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री बनाता है,परन्तु उस नेता को एक माह के अंदर अपना बहुमत सिद्ध करना होता है।
संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री संसद के दोनों सदनों में से किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है।
प्रधानमंत्री का कार्य काल निश्चित नहीं है,प्रधानमंत्री को जब तक लोकसभा का बहुमत प्राप्त रहता है तब तक उसे हटाया नहीं जा सकता,लोकसभा में अपना विश्वास मत खो देने पर उसे अपने पद से त्यागपत्र देना होगा अथवा त्यागपत्र न देने पर वह राष्ट्रपति द्वारा बर्खास्त किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री के वेतन और भत्तों का निर्धारण संसद द्वारा समय समय पर किया जाता है ।

कार्य और शक्तियां:

० प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से अपने दल के व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त करने की सिफारिश करता है और राष्ट्रपति उन्हीं व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त करता है जिनकी प्रधानमंत्री द्वारा सिफारिश की गई होती है ।
० प्रधानमंत्री मंत्रियों को मंत्रालय आवंटित करता है, और उनमें फेरबदल भी कर सकता है।
० वह किसी भी मंत्री को त्यागपत्र देने के लिये कह सकता है या राष्ट्रपति से उसे बर्खास्त करने की सिफारिश भी कर सकता है।
० वह मंत्री परिषद की बैठक की अध्यक्षता करता है और उनके निर्णयों को भी प्रभावित कर सकता है।
० मंत्रियों की गतिविधियों को नियंत्रित और निर्देशित कर सकता है।
० वह पद से त्यागपत्र देकर मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर सकता है।
० प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच की मुख्य कड़ी होता है।
० प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति को भारत का महान्यायवादी, भारत का महानियंत्रक, महालेखा परीक्षक, संघ लोकसेवा आयोग का अध्यक्ष एवं उसके सदस्यों का,चुनाव आयुक्त, वित्त आयोग का अध्यक्ष एवं उसके सदस्यों एवं उनकी नियुक्ति के सम्बंध में परामर्श देता है।
० प्रधानमंत्री संसद के सत्र का आरंभ और सत्रावसान सम्बन्धी परामर्श राष्ट्रपति को देता है।
० वह लोकसभा को विघटित करने की राष्ट्रपति से सिफारिश कर सकता है।
० वह सरकार की नीतियों की घोषणा करता है।
० प्रधानमंत्री नीति आयोग , राष्ट्रीय एकता परिषद,अंतर्राज्यीय परिषद और राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद का अध्यक्ष होता है।
० वह केन्द्र सरकार का प्रमुख प्रवक्ता होता है।
० वह सत्ता धारी दल का नेता होता है व सेनाओं का राजनैतिक प्रमुख होता है।
० वह देश का नेता होने के कारण राज्यों के विभिन्न वर्गों के लोगों से उनकी समस्याओं के सम्बंध में ज्ञापन प्राप्त करता है।
० आपातकाल में राजनीतिक स्तर पर आपदा प्रबंधन का प्रमुख होता है।

राष्ट्रपति को सहायता एवं सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगा।

अनुच्छेद 78 के अनुसार प्रधानमंत्री संघ के कार्य में प्रशासन सम्बन्धी विधान विषयक मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राष्ट्रपति को सूचित करे।
संघ के कार्य, प्रशासन सम्बन्धी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं सम्बन्धी जो भी जानकारी राष्ट्रपति मांगे वो उन्हें दे।

प्रधानमंत्री की मृत्यु अथवा त्यागपत्र देने पर मंत्रिपरिषद स्वयं ही विघटित हो जाती है।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३९)

राजराज प्रथम के शासनकाल के एक अभिलेख के अनुसार नोलम्बों और गंगों के विरुद्ध भी उसने विजय प्राप्त की थी ।
चालुक्य शासक सत्याश्रय जो राजराज का समकालीन था,चोलों का प्रबल शत्रु था ।उसकी शह पर वेंगी शासक दार्नाणव की हत्या तेलुगु जटाचोडभीम ,जो दार्नाणव का संबंधी भी था ,ने कर दी और सिहांसन हथिया लिया ।
दार्नाणव के पुत्रों ने राजराज प्रथमसे सहायता की याचना की ,राजराज ने सहायता कावचन दिया और अपनी पुत्री का विवाह छोटे राजकुमार से कर दिया तथा बड़े राजकुमार शक्ति वरमन को सिहांसन पर बैठाने का वचन दिया ।
चोल राजा नेजटाचोडभीम को पराजित किया और वेंगी के सिहांसन पर शक्ति वर्मन को शासक बना दिया ,चोल राज्य के प्रभुत्व में शक्ति वर्मन शासन करने लगा ।चालुक्य नरेश सत्याश्रय को चोलराज्य का विस्तार पसन्द नहीं था ,उसने 1006 में वेंगी पर आक्रमण कर दिया और धान्यकटक तथा वनमंडल के किलों को धूल धूसरित किया ।
तब राजराज प्रथम ने अपने पुत्र राजेन्द्र को एक शक्तिशाली सेना का प्रधान बना कर चालुक्यों पर आक्रमण करने भेजा ।
राजेन्द्र चोल ने सान्तलिगे,वनवासी, कादम्बलिगे,कोगली प्रदेशों को जीतकर बीजापुर जिले के दोनूर में अपना सैन्य शिविर स्थापित किया।
चालुक्य अभिलेख के अनुसार राजेन्द्र चोल ने पूरे देश को बुरी तरह लूटा और स्त्रियों और बच्चों तक को मौत के घाट उतारा, और मान्यखेट में भी लूटपाट की ।
सत्याश्रय को इस कारण अपनी सेना वेंगी से हटानी पड़ी, वह बड़ी कठिनाई से अपने देश को चोल सेना से मुक्त करवा सका और चोल सेना बहुत सारे लूट के माल के साथ तुंगभद्रा नदी के पीछे रह गई।
इसके बाद राजराज प्रथम ने कलिंग राज्य पर आक्रमण उसे भी अपने राज्य में मिला लिया।
राजराज प्रथम ने श्रीलंका पर तो अपना आधिपत्य पहले ही कर लिया था ,अब उसने अपनी शक्तिशाली जहाजी सेना के साथ बंगाल की खाड़ी को पार करके दक्षिणी पूर्व एशिया में श्रीविजय, कटाह तथा मलाया द्बीपों पर भी अपना अधिकार कर लिया और अपने विशाल चोल साम्राज्य में मिला लिया।
इस प्रकार भारत का पूर्व एशिया के अन्य देशों के साथ व्यापार और वाणिज्य सम्पर्क पूरी तरह से विकसित हो गया।
चोल साम्राज्य को राजराज प्रथम ने विस्तृत, वैभवशाली और शक्तिशाली बना दिया ।
राजराज ने तंजौर का वृहदीश्वर मंदिर का निर्माण कराया था ,जो कि विश्व प्रसिद्ध है ।

हम भारत के लोग…(३)

उपराष्ट्रपति

उपराष्ट्रपति का पद देश का दूसरा सर्वोच्च पद होता है ।वह संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के निर्वाचन मंडल द्वारा चुना जाता है ।

इसमें संसद के निर्वाचित और मनोनीत दोनों सदस्य होते हैं । परन्तु राज्य विधानसभाओं के सदस्य सम्मिलित नहीं होते हैं ।

योग्यता

वह भारत का नागरिक हो ।

वह पैंतीस वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो ।

वह राज्यसभा का सदस्य बनने के योग्य हो ।

वह केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार या किसी स्थानीय या सार्वजनिक प्राधिकरण के अन्तर्गत किसी लाभ के पद पर न हो ।

उपराष्ट्रपति पद ग्रहण से पहले शपथ लेनी होगी और हस्ताक्षर करने होगें ।

उपराष्ट्रपति पद की अवधि पद ग्रहण करने से लेकर पाँच वर्ष तक होती है ।

वह अपनी पदावधि में किसी भी समय राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र दे सकता है ।

वह अपने पद की अवधि पूर्ण होने से पहले भी हटाया जा सकता है ।

उसे राज्य सभा द्वारा पूर्ण बहुमत द्वारा हटाया जा सकता है ,परन्तु लोकसभा की सहमति आवश्यक है ।

वह उप राष्ट्र पति पद पर कितनी ही बार निर्वाचित हो सकता है।

उपराष्ट्रपति का पद उसकी पाँच वर्ष की अवधि पूर्ण होने पर समाप्त हो सकता है ।

उसके त्यागपत्र देने पर

उसकी मृत्यु पर,

उसके बर्खास्त होने पर

या निर्वाचन अवैध घोषित होने पर भी

पद से हटाया जा सकता है ।

शक्तियाँ और कार्य –

उपराष्ट्रपति की शक्तियाँ और कार्य लोकसभा अध्यक्ष की भाँति होते हैं ,वह उच्च सदन का सभापति होता है ।

जब राष्ट्रपति का पद रिक्त हो तो वह कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में भी कार्य करता है ।

राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते समय वह राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं करता है ।

उपराष्ट्रपति का वेतन १.२५ लाख रू प्रति माह होता है उसे दैनिक भत्ता ,निःशुल्क पूर्ण सज्जित आवास ,फ़ोन ,कार ,चिकित्सा सुविधा ,यात्रा सुविधा तथा अन्य सुविधायें प्राप्त होती हैं ।

यदि वह राष्ट्रपति के पद पर कार्य कर रहा है तो उसे राष्ट्रपति को प्राप्त होने वाले वेतन और भत्ते प्राप्त होते हैं।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३८)

उत्तराधिकार में अरिमोलवर्मन को छोटा और कमजोर राज्य प्राप्त हुआ, युवराज के रूप में उसने युद्ध अनुभव प्राप्त किये थे और वह एक अच्छा प्रशासक भी था साथ ही कूटनीतिज्ञ भी था ।
उसने उत्तम चोल से आदित्य प्रथम की हत्या का प्रतिशोध लेने के स्थान पर उत्तम चोल से अपने लिये सिहांसन सुरक्षित करवा लिया ,इस प्रकार उत्तम चोल की मृत्यु के बाद उत्तम चोल के पुत्रों के स्थान पर अरिमोलवर्मन राजा बना ।
अब उसने राजराज की उपाधि धारण की ।985में सिहांसन पर आसीन होने के बाद उसने छोटे छोटे राज्यों को जीत कर चोल राज्य में मिला लिया ।उसने अपने राज्य में अनेक प्रशासनिक सुधार किए और अपने शासन काल के प्रारंभिक वषों में उसने चोल राज्य की स्थिति को मजबूत किया।
केरल ,पांड्य और श्रीलंका के शासकों ने सेना एकत्रित कर सम्मिलित रूप से चोल राज्य के विरुद्ध तैयारी की ,परन्तु राजराज प्रथम ने केरल राज्य पर आक्रमण किया और केरल नरेश रविवर्मन को परास्त किया, तत्पश्चात पांड्य राज्य पर आक्रमण कर वहां के राजा को बंदी बनाया ।
अपने अन्य अभियान में राजराज ने कोल्लम तथा कोंडुगोलूर के शासकों को भी पराजित किया ।
राजराज ने अपना तीसरा अभियान जहाजी बेड़ो के साथ किया जिसमें उसने श्री लंका का उत्तरी भाग अधिकृत किया औरवहां की राजधानी अनुराधापुर को रौंद डाला इस युद्ध में श्री लंका नरेश को किसी अज्ञात स्थान में छुपकर अपनी प्राणरक्षा करनी पड़ी।
तिरुवालंगाडु अभिलेख के अनुसार राजराज प्रथम का श्रीलंका पर अधिकार हुआ और उसने राज्य का नाम मामुण्डीचोलमण्डलम रखा और पोलो न्नुरुवा नगर को चोल राज्य की राजधानी बनाया ।

श्री गणेश🏵️🏵️🏵️

भाद्रपक्ष महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी गणपति भगवान का प्रिय दिवस है ,इस दिन गणपति भगवान की मूर्तियां सजाई जाती हैं ।गणपति सभी कार्यों प्रथम पूज्य हैं ,शुभ कामों में प्रथम निमंत्रण गणपति को दिया जाता है।
इनके जन्म से जुड़ी कई कथाएं हैं,ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार पार्वती के पुत्र जन्म के अवसर पर देवताओं के साथ शनि देव भी आये,उनकी दृष्टि जब पार्वती पुत्र पर पड़ी तो पुत्र का मस्तक कट कर धड़ से अलग हो गया ।शनिदेव को शाप था कि उनकी दृष्टि जिस पर भी पड़ेगी उसका मस्तक कट जाये गा ।यह देख कर पार्वती अत्यन्त दुखी हो गई तब भगवान विष्णु ने एक शिशु हाथी का सिर जोड़कर पार्वती पुत्र को जीवित कर दिया ।
मत्स्य पुराण के अनुसार पार्वती ने अपने अंगलेप से एक पुतले का निर्माण किया जिसका सिर गज का जैसा था ,गंगाजल से अभिषेक करते ही वह प्राणवान हो गया । पार्वती और गंगा दोनों ने ही उसे अपना पुत्र माना ।
शिव पुराण के अनुसार पार्वती ने स्नान करते समय उबटन से एक मानवाकृति बनाई और उसे किसी को भी अंदर न आने देने को कहा ,तभी शिव वहाँ आये बालक ने उन्हें न पहचानते हुये अंदर जाने से रोक दिया ।परिणाम स्वरूप दोनों में युद्ध हुआ और शिव ने बालक का सिर काट दिया जब पार्वती जी आयीं तो यह देखकर दुख से भर गयीं। शिव जी को जब पूरी बात का पता चला तो उन्होंने एक हाथी का सिर जोड़कर बालक को जीवन प्रदान किया।
गणपति संभव के अनुसार शिवजी के डमरू की ध्वनि से गणपति ने सम्पूर्ण वेदों को अपनाया, पार्वती के नूपुरों की झंकार से संगीत सीखा और शिव के तांडव दर्शन से नृत्य सीखा ।
माना जाता है जब व्यास ने महाभारत की रचना की तो महाभारत कोगणपति भगवान ने लिखा है,उन्होंने कहा कि लिखना शुरू करने के बाद रुकेगें नहीं ,इसपर व्यासजी ने कहा ,मैं जो भी कहूँगा आप उसका अर्थ समझ कर ही लिखें ।इस प्रकार महाभारत पूरी हुई।
गणपति जी गजबदन,सिन्दूर के समान रक्तवर्ण, त्रिनेत्र ,स्थूलकाय तथा चर्तुभुज हैं चारों हाथों में दंत ,अकुंश, पाश और वरमुद्रा हैं। मूषक उनका वाहन है,वे समस्त कार्यों मे प्रथम पूज्य हैं,विघ्न बाधाओं के विनाशक और मोदक प्रिय हैं ।
इनकी पत्नियों के नाम ऋद्धि और सिद्धि हैं ।ऋद्धि के पुत्र का नाम क्षेम तथा सिद्धि के पुत्र का नाम लाभ है ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३७)

परान्तक प्रथम की मृत्यु के बाद (955-85 )तक चोल राज्य में अस्तव्यस्तता रही।परान्तक प्रथम के बाद उसका पुत्र गंडरादित्य राजसिंहासन पर आसीन हुआ ,जब उसकी मृत्यु हुई चोल राज्य एक छोटा सा प्रदेश मात्र रह गया था ।
कुछ दुर्बल शासकों के पश्चात 956 में सुन्दर चोल परान्तक द्वितीय राजसिंहासन पर बैठा,वह पराक्रमी सिद्ध हुआ ।उसने पांड्य राज्य पर आक्रमण किया ।पांड्य राजा की सहायता श्री लंका नरेश महिन्द्र चतुर्थ ने की परन्तु सुन्दर चोल ने पांड्य राजा को दो युद्धों में पराजित किया।
इस युद्ध में उसके युवराज पुत्र आदित्य द्वितीय ने भी सहयोग किया था ।
सुन्दर चोल के अंतिम वर्षों में गंडरादित्य के पुत्र उत्तम चोल ने षडयंत्र करके युवराज आदित्य द्वितीय की हत्या कर दी और व्यथित सुन्दर चोल को विवश किया कि वह अपना उत्तराधिकारी अपने पुत्र अरिमोलवर्मन के स्थान पर उसे घोषित करे ।
इस प्रकार उत्तम चोल ,चोल सिहांसन पर आसीन हुआ ।
परन्तु चोल राज्य का अच्छा समय तब शुरु हुआ जब चोल सिहांसन पर सुन्दर चोल का छोटा पुत्र अरिमोलवर्मन आसीन हुआ ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३६)

दक्षिण भारत के चोल वंश का नाम मौर्य काल में मिलता है,महाभारत तथा मेगस्थनीज़ की इन्डिकामें भी चोलों का उल्लेख है माना जाता हैकि महाभारत काल मे सहदेव ने चोलों पर विजय प्राप्त की थी।सिंहली महाकाव्य महावंश में भी चोलों का नाम आता है।
प्रारंभ में चोल शासक पल्लवों के अधीन सामन्त थे जो कावेरी के तटवर्ती क्षेत्रों पर शासन कर रहे थे ।
(850-871ई०) चोल शासक विजयालय ने पांड्यों के तंजौर क्षेत्र पर आधिपत्य कर लिया और उरैयुर के स्थान पर तंजौर को अपनी राजधानी बना लिया ।
नवीं शताब्दी में विजयालय के उत्तराधिकारी आदित्य प्रथम ने अपनी शक्ति बढ़ानी शुरू की और छोटे छोटे राज्यों को जीत कर अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली ।तिरूवालंगाडु ताम्रपत्रों के अनुसार आदित्य प्रथम ने पल्लव शासक अपराजित के विरूद्ध विद्रोह करकेउसे हरा कर उसकी हत्या करदी और पल्लव राज्य पर अधिकार कर लिया।
इस विजय के बाद चोल राज्य की सीमा राष्ट्र कूट राज्य की सीमा से मिल गयी ।आदित्य प्रथम ने राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय की पुत्री से विवाह कर उसे प्रधान रानी बना दिया ।
907ई० में आदित्य प्रथम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र परान्तक प्रथम सिहांसन पर बैठा ।राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय इस बात पर क्रोधित हो गया वह चाहता था उसकी पुत्री का पुत्र कन्नरदेव चोल सिहांसन पर आसीन हो,अत:उसने चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया।परन्तु परान्तक प्रथम ने गंगनरेश पृथ्वी पति की सहायता से राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय को पराजित कर दिया औरवीर चोल की उपाधि धारण की ।
परान्तक प्रथम को अपनी शक्ति को पूरी तौर पर पांड्य राजा राजसिंह द्वितीय के विरुद्ध लगाना पड़ा, उसने पांड्य राजा राजसिंह द्वितीय को पराजित कर उसकी राजधानी मदुरा पर अधिकार कर लिया
इसके पश्चात चोल राजाने पांड्य नरेश राजसिंह द्वितीय को दूसरे युद्धों में भी पराजित किया और धीरे धीरे पांड्य राज्य के क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया।परान्तक प्रथम की इन विजयी अभियानों से उसके राज्य की सीमा उत्तर में पेण्णारक्षेत्र से दक्षिण में कन्याकुमारी तक विशाल हो गई।
राष्ट्र कूट राजा कृष्ण तृतीय ने चोलों के शत्रुओं को एकत्र कर एक सम्मिलित सेना के साथ चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया और चोलों को जीत कर उनके तोंडमंडलम क्षेत्र को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया ।
इसके बाद भी राष्ट्र कूट राजा ने गंग राजा की सहायता से परान्तक प्रथम को दुबारा पराजित किया और चोल राज्य के कुछ क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३५)

राजसिंह द्वितीय कुछ समय तक अपने ननिहाल में रहने के बाद अपने राज्य की पुन: प्राप्ति के लिये प्रयासरत हो गया और अपनी शक्ति को एकत्र कर चोलो से मुक़ाबलाकरने को तैयार हो गया ।परन्तु चोल नरेश ने पांड्य शक्ति को पुन: पराजित कर दिया ।

पराजित होने के बाद भी मार वरमन राजसिंह द्वितीय बार -बार अपने राज्य को स्वतन्त्र कराने का प्रयास करता रहा ,उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र वीरपांडय ने भी राज्य की स्वतन्त्रता के लिये प्रयास जारी रखा ,उसके शासनकाल में चोल राज्य का शासन एक दुर्बल शासक गंडरादित्य चोल के पास था जिसे वीरपांडय ने पराजित कर अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली ।

गंडरादित्य की मृत्यु के बाद उसका भतीजा सुंदर चोल परान्तक द्वितीय राजा बना ।उसने वीरपांडय की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिये पांड्य राज्य पर आक्रमण किया ।वीरपांडय की सहायताश्रीलंका नरेश महेन्द्र चतुर्थ ने भी की परन्तु चोल नरेश ने उन्हें दो बार पराजित किया ।

वीरपांडय की मृत्यु ९६६ ई० में हो गयी और लगभग तीन शताब्दी तक पांड्य राज्य चोलो के आधिपत्य में रहा।

१०७०-११२० ई० में कुलोत्तुंग प्रथम के समय में पांड्य राजा जटावरमनश्रीवल्लभ ने पांड्य राज्य को स्वतंत्र रखने में कुछ वर्षों तक सफल रहा परन्तु कुलोत्तुंग ने उसे मार कर पांड्य राज्य पर अधिकार कर लिया ।

उसके पश्चात कुछ समय तक पांड्य राज्य उत्तराधिकार के कारण गृहयुद्ध में फँसा रहा ,कुलोत्तुंग तृतीय ने पांड्य राज्य के दो उत्तराधिकारियों वीरपांडय और विक्रम पांड्य के बीच के झगड़े को ख़त्म कर विक्रम पांड्य को मदुरा का शासक बनाया ।

विक्रम पांड्य के उत्तराधिकारी जटा वरमन कुलशेखर ने चोल सत्ता की अवज्ञा कर ,चोलों के विरूद्ध कुछ सफलतायें प्राप्त की ,उसके पुत्र मारवरमन सुन्दर पांड्य ने उदयपुर और तंजौर पर क़ब्ज़ा कर लिया और चोलो को भी अपने आधीन कर लिया । परन्तु चोलों ने

होयसलों की सहायता से पुन: अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली ।

हम भारत के लोग…(२)

राष्ट्रपति

राष्ट्र पति के पद की अवधि पाँच वर्ष होती है परन्तु जब तक उसका उत्तराधिकारी पद धारण न कर ले वह तब तक अपने कार्य काल के उपरांत भी अपने पद पर बना रहता है ।

राष्ट्र पति अपने पद से

॰अपना कार्य काल समाप्त होने पर

॰त्यागपत्र देने पर

॰महाअभियोग द्वारा

॰मृत्यु होने पर

॰निर्वाचन अवैध होने पर

पदमुक्त हो सकता है ।

राष्ट्र पति की शक्तियाँ –

(१) कार्य कारी शक्तियाँ –

• भारत सरकार के सभी शासन संबंधी कार्य उसके नाम से किये जाते हैं ।

• वह नियम बना सकता है

• वह प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है ।

• वह महान्यायवादी ,महालेखा परीक्षक ,चुनाव आयुक्त ,संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष ,राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति करता है ।

• वह स्वयं द्वारा नियुक्त प्रशासकों के द्वारा केन्द्र शासित राज्यों का प्रशासन सीधे संभालता है ।

(२) विधायी शक्तियाँ –

• वह संसद की बैठक बुला सकता है अथवा कुछ समय के लिये स्थगित कर सकता है और लोकसभा को विघटित कर सकता है ।

• जब एक विधेयक संसद द्वारा पारित होकर राष्ट्र पति के पास भेजा जाता है तो वहविधेयक को स्वीकृति देता है ,या स्वीकृति सुरक्षित रखता है ,विधेयक को यदि वह धन विधेयक नहीं है तो संसद के पु न:विचार के लिये लौटा देता है ।

• वह अंडमान व निकोबार द्वीप समूह ,लक्ष द्वीप ,दादर एवं नागर हवेली ,दमन व दीव में शांति ,विकास व सुशासन के लिये नियम बना सकता है ।

(३) वित्तीय शक्तियाँ –

• वह राज्य व केन्द्र के मध्य राजस्व के बँटवारे के लिये हर पाँच वर्ष में वित्त आयोग का गठन करता है ।

• धन विधेयक राष्ट्र पति की पूर्व अनुमति से ही संसद मे प्रस्तुत किया जा सकता है ।

(४) न्यायिक शक्तियाँ –

• वह उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है ।

• वह किसी अपराधी के दण्डादेश को निलंबित क्षमा या बदल सकता है ।

(५) कूटनीतिक शक्तियाँ –

• राष्ट्र पति भारत के सैन्य बलों का सर्वोच्च सेनापति होता है ,वह थल सेना ,वायु सेना और जलसेना के प्रमुखों की नियुक्ति करता है ।

• वह अंतराष्ट्रीय मामलों में भारत का प्रतिनिधित्व करता है ।

(६) आपातकालीन शक्तियाँ –

• राष्ट्र पति को तीन परिस्थितियों में आपातकालीन शक्तियाँ प्राप्त हैं

॰ राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद ३५२ )

॰ राष्ट्र पति शासन (अनुच्छेद ३५६व ३६५ )

॰ वित्तीय आपात काल (अनुच्छेद ३६० )

श्री कृष्ण…

द्वापर युग में भगवान विष्णु ने अवतार लिया था,कृष्ण के रूप में ये उनका नवाँ अवतार था । जब पृथ्वी दैत्यों के अत्याचार से पीड़ित हो रही थी तो वो ब्रह्मा जी के पास पहुँची,ब्रह्मा जी,शिव जी अन्य देवताओं के साथ वैकुण्ठ में भगवान विष्णु जी के पास गये और पृथ्वी की रक्षा की प्रार्थना की। विष्णु जी ने पृथ्वी की रक्षा का वचन दिया ।

कंस के कारागार में भाद्र पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में आधीरात को वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया ।

वसुदेव ने कंस से बचाने के लिये कृष्ण को गोकुल यशोदा और नंद के यहाँ पहुँचा दिया जहाँ उनका लालन पालन हुआ ।

बाल्यकाल में ही कंस द्वारा कृष्ण को मारने के लिये भेजे गये राक्षसों तृणावर्त ,बकासुर ,केशी ,कालनेमि ,

व्योमासुर और पूतना का वध कृष्ण द्वारा किया गया ।

कालियानाग के विष के दुष्प्रभाव के कारण यमुना का जल विषैला हो गया था ,कृष्ण ने उसे परास्त कर ,सपरिवार रमणक द्वीप पर भेज दिया और यमुना के जल को स्वच्छ बनाया ,गायों के पालन के कारण उनका एक नाम गोपाल भी था ।

जरासंध,शिशुपाल,शाल्वऔर विदूरथ जैसे दुष्टों काभी वध कृष्ण ने किया ।

कृष्ण जी के स्वर्ग आरोहण के बाद ही कलयुग का आरंभ माना जाता है ,और कृष्ण भगवान के स्वर्ग गमन पश्चात द्वारका नगरी भी सात दिनों के बाद जलमग्न हो गयी ।

चतुर्भुज कृष्ण के हाथों में शंख,चक्र ,गदा और पद्म शोभित है , उनका आयुध सुदर्शन चक्र ,वाहन गरूड़ और ध्वजचिन्ह गरूड़ है ।

उनकी आठ पटरानियां थी -रुक्मणी ,सत्यभामा,जामवंती ,कालिन्दी ,मित्र विंदा,

सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा ।

उनकी पुत्री का नाम चारूमती था ।

कृष्ण महान योगीश्वर ,राजनीतिज्ञ ,कूटनीतिज्ञ और कर्मयोगी थे ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३४)

श्री मारश्रीवल्लभ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र वरगुण द्वितीय राजसिंहासन पर आसीन हुआ ! वरगुण द्वितीय ने पल्लवों के बढते हुए राजनीतिक प्रभाव को रोकने के लिये चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया उसकी सेना तँजोर में कावेरी नदी के तट पर इडवै नाम के गांव तक पहुंच गयी परन्तु उसे वहां एक भयानक गुटबंदी का सामना करना पड़ा।
इस गुट में पल्लव युवराज अपराजित के नेतृत्व में चोल शासक आदित्य प्रथम तथा गंग राजा पृथ्वीपति की सेनाऐं भी पांड्य राजा के विरुद्ध युद्ध में शामिल हुई थी ।
वरगुण द्वितीय ने चोल राज्य के अलवै नाम के दुर्ग को जीतने के बाद पल्लव राज्य की सीमा में प्रवेश किया।यहां अपराजित के नेतृत्व में
गंग और चोल सेनाओं ने कुंभकोणम के निकट पुड्मवियम के मैदान में वरगुण द्वितीय को बुरी तरह पराजित किया।पांड्य शक्ति को इससे बहुत नुकसान हुआ और गंगराज पृथ्वीपति युद्ध में मारा गया।
वरगुण द्वितीय की राज्य की सीमा कावेरी नदी के तट तक ही रह गई ,पाण्ड्य राज्य का वो भाग जो कावेरी नदी के पार था उस पर चोल शासक आदित्य प्रथम का आधिपत्य हो गया ।
वरगुण द्वितीय के भाई परान्तक वीर नारायण पाण्ड्य ने उससे सिहांसन छीन कर अपना अधिकार कर लिया।
कोंगू प्रदेश और कावेरी के दक्षिणी क्षेत्र पर उसनेविजय प्राप्त की और पाण्ड्य राज्य में मिला लिया ।परन्तु चोल शासक आदित्य प्रथम ने कुछही दिनों में आक्रमण करके उससे कोंगू प्रदेश जीत लिया।
परान्तक वीरनारायण के बाद उसका पुत्र मार वर्मन राजसिंह द्वितीय राजा बना ।उसने अपने राज्य को पुनः संगठित किया औरश्रीलंका के शासक कस्सप पंचम से मैत्री संबंध स्थापित किए।
परन्तु चोल राजा परान्तक प्रथम ने 901ई 0में पाण्ड्य राज्य पर आक्रमण कर मदुरै को जीत लिया ।पाण्ड्य राजा ने श्रीलंका नरेश से सहायता की मांग की ,श्रीलंका नरेश ने अपनी सेना मदुरै भेज दी। परन्तु पाण्ड्य औरश्रीलंका की सम्मिलित सेनाओं को भी चोलों ने हरा दिया ।
राजसिंह श्रीलंका भाग गया ,सम्पूर्ण पाण्ड्य राज्य पर चोलों का अधिकार हो गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३३)

जटिल परान्तक नेडुंजडैयन (वरगुण प्रथम ) की मृत्यु के बाद उसका पुत्र श्रीमारश्रीवल्लभ राजसिंहासन पर बैठा ।वह अपने पिता की तरह महा पराक्रमी था उसे दक्षिण भारत का प्रजा पालक शासक कहा जाता है श्रीमारवल्लभ ने विलिनन्,कुन्नूर तथा सिंगलम् पर विजय प्राप्त की ।

सिहंली बौद्ध महाकाव्य महावंश के अनुसार श्रीलंका के शासक सेन प्रथम को पांड्य सेना ने पराजित किया और काफ़ी धन प्राप्त किया परन्तु दोनों के बीच सन्धि हो जाने के बाद पांड्य राजा ने सेन प्रथम को उसका राज्य वापस कर दिया ।

पल्लव राज दन्ति वरमन का पुत्र नन्दि वरमन तृतीय शक्तिशाली होने के साथ कूटनीतिज्ञ भी था ।उसने गंग,चोल और राष्ट्र कूट को मिलाकर पांड्य राजा श्रीमारवल्लभ पर आक्रमण कर दिया इस युद्ध में पांड्य पराजित हुये ,पल्लवों ने पांड्य राज्य के वेंगई नदी के तट तक का क्षेत्र जीत लिया ।

परन्तु पांड्य राजा ने पुन: अपनी शक्ति एकत्र की और पल्लव तथा उनके सहयोगी राजाओं को पराजित करअपनी हार का हिसाब बराबर किया ।

श्रीलंका नरेश सेन द्वितीय ने पल्लवों के साथ मिलकर श्रीमारवल्लभ की राजधानी मदुरै को घेर लिया और उनका साथ दिया पांड्य राजकुमार माया पांड्य ने जो स्वयं को राजगद्दी का हक़दार मानता था ।

इस युद्ध में भयंकर विनाश हुआ ,इस आक्रमण के परिणाम स्वरूप पांड्य नरेश श्रीमारवल्लभ युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ और उसकी मृत्यु हो गयी ।

तब सिंहली सेनानायक ने उसके पुत्र वरगुण द्वितीय को राजसिंहासन पर बैठाया ।

हम भारत के लोग…(१)

राष्ट्रपति

संविधान के भाग पाँच के अनुच्छेद ५२ से ७८ तक संघ की कार्य पालिका के बारे में बताया गया है ,इसमें राष्ट्रपति ,उप राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री ,मंत्री मंडल तथा महान्यायवादी होते हैं ।

राष्ट्र पति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के चुने सदस्य ,राज्य विधानसभा के चुने सदस्य और केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली , पुडुचेरी के विधानसभा के चुने सदस्य करते हैं ।

संसद के दोनों सदनों के मनोनीत सदस्य, राज्य विधानसभाओं के मनोनीत सदस्य राज्य विधान परिषदों के’ द्विसदनीय विधायिका के मामलों में ‘सदस्य निर्वाचित तथा मनोनीत और दिल्ली तथा पुडुचेरी के मनोनीत सदस्य राष्ट्र पति के चुनाव में भाग नहीं लेते ।

राष्ट्रपति के पद हेतु योग्यता – कोई भी व्यक्ति भारत का नागरिक हो वह ३५ वर्ष का हो वह लोकसभा का सदस्य चुने जाने के योग्य हो वह संघ सरकार में ,राज्य सरकार में किसी स्थानीय या किसी सार्वजनिक स्थान में लाभ के पद पर होना नहीं चाहिये ।

राष्ट्र पति के चुनाव के लिये उम्मीदवार को ५० प्रस्ताव करने वाले और पचास अनुमोदन करने वाले होने चाहिये ।

उम्मीदवार को भारतीय रिज़र्व बैंक में पन्द्रह हज़ार रूपये ज़मानत राशि जमा करनी होगी ।

राष्ट्र पति पद ग्रहण से पूर्व शपथ लेता है । शपथ उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ,उनकी अनुपस्थिति में वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा शपथ दिलाई जाती है ।

राष्ट्र पति को संसद के किसी भी सदन का या राज्य विधायिका का सदस्य नहीं होना चाहिये यदि कोई व्यक्ति ऐसा है तो उसे सदन से पद ग्रहण करने से पूर्व त्यागपत्र देना होगा ।

वह कोई अन्य लाभ का पद नहीं लेगा ।

उसे बिना कोई किराया चुकाये आधिकारिक निवास राष्ट्र पति भवन दिया जायेगा ।

उसे संसद द्वारा निर्धारित उपलब्धियों और भत्ते प्राप्त होंगे ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३२)

मार वरमन राजसिंह के उपरान्त उसका पुत्र जटिल परान्तक नेडुंजडैयन (वरगुण प्रथम ) पांड्य राजसिंहासन पर आसीन हुआ ।

वह पांड्य राज्य का शक्तिशाली और महान राजा हुआ ।वेलाविक्कुडि अभिलेखानुसार उसने पेण्णागडम्(तंजौर के क़रीब) के युद्ध में पल्लवराज नन्दिवरमन द्वितीय उनका साथ देने वाले नाट्टक्कुरूम्ब के राजा आयवेल की सेनाओं को पराजित किया । तगदूर(धर्मपुरी )के राजा अडिगैमान को युद्ध में पराजित किया तथा उसे बंदी बना कर रखा ।अंतत: तगदूर शासक ने उसकी अधीनता स्वीकार की ।वरगुण का विजयी अभियान जारी रहा ,उसने बेड़ाद राज्य परअधिकार कर लिया और कावेरी नदी के दक्षिण तट पर स्थित पेन्नागडम के युद्ध में उसने पल्लव नरेश नन्दि वरमन को हरा दिया ।उसकी शक्ति को रोकने के लिये पल्लव नरेश ने कोंगू केरल तथा अडिगैमान के साथ मिलकर वरगुण प्रथम पर आक्रमण किया ,पांड्य नृपति वरगुण प्रथम ने इन्हें पराजित किया औरपललव राज्य की सीमा में प्रवेश किया पल्लव शासित तोन्दईनाडु में पेन्नार नदी के अरशूर मैदान में अपना सैन्य शिविर स्थापित किया ।वरगुण प्रथम का शासन तिरुचिरापल्ली के आगे तंजोर ,सलेम, कोयम्बटूर प्रदेशों परऔर इसके संपूर्ण दक्षिणी भाग परहो गया ।

वरगुण प्रथम ने दक्षिण ट्रावणकोर स्थित वेणाड राज्य के सुदृढ़ क़िला बंद बंदरगाह विलिनम पर आक्रमण करके उस राज्य पर अपना शासन स्थापित किया ।

वरगुण प्रथम अपने समय का तमिल देश का प्रभावशाली और पराक्रमी राजा बन गया ।अपने शत्रुओं को पराजित करने के कारण उसने परान्तक उपाधि धारण की । वह विद्वानों कासंरक्षक और विद्यानुरागी था । वह पांड्य वंश का महान शासक था।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३१)

कोच्चाडैयन के बाद उसका पुत्र मारवरमन राजसिंह प्रथम राजा बना ,वो काफ़ी महत्तवाकांक्षी नरेश था ।उसने पल्लव राजगद्दी के लिये हो रहे संघर्ष में नन्दि वरमन के विरूद्ध उसके चचेरे भाई चित्रमाय का साथ दिया और नन्दि वरमन द्वितीय को नेडुवयल ,कुरूमडै ,कोडम्बलूर ,मण्णिकुरूच्चि तथा तिरूमंगई के युद्ध में हराया तथा नन्दि वरमन को बन्दी बना लिया ।

पल्लव नरेश के अति विश्वासपात्र सेनापति उदयचन्द्र की सेना ने मारवरमन राजसिंह प्रथम तथा पल्लव राजकुमार चित्रमाय की सेना को घेर लिया तथा राजकुमार चित्रमाय की हत्या कर के पल्लव नरेश के सिंहासन को सुरक्षित कर दिया और नन्दिवरमनको मुक्त करा कर राजसिंहासन पर आसीन कराया ।

परन्तु मारवरमन राजसिंह ने अपनी शक्ति एकत्र कर कावेरी नदी पार करके मलकोंगम’( तिरूचरापल्ली और तंजौर ‘ )क्षेत्र को जीत लिया, वहाँ के शासक मालवाराज ने पराजित हो जाने के बाद अपनी पुत्री का विवाह मारवरमन राजसिंह से करके मित्रता का सम्बन्ध स्थापित कर लिया ।

मारवरमनराजसिह ने गंग नरेश और चालुक्य नरेश पर भी विजय प्राप्त की ।

इस प्रकार उसने पांड्य राज्य की सीमा कावेरी नदी के दक्षिण में स्थित पांडिक्कौडमुडि क्षेत्र तक पहुँचा दी ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३०)

दक्षिण भारत के पांड्य राजवंश का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है ,सम्राट अशोक के अभिलेखों में पांड्य राजवंश का नाम है ।ईसा की छठी शती में पांड्यो को काफ़ी क्षति हुई थी परन्तु ५९० ई० में पांड्यों का नेतृत्व कुडुगौन नामक राजा ने किया था उसने पांड्य राजवंश को पुन: एक शक्तिशाली राज्य के रूप में स्थापित किया उसकी राजधानी मदुरै थी ।

कुंडुगौन को पांड्य राजवंश का महान राजा माना जाता है उसने पांड्यशक्ति को एकत्र कर अपने शत्रुओं को पराजित किया और तमिल देश में अपने राज्य की नींव रखी वह एक महान विजेता था ।

उसके बाद मार वरमन अवनिशूलमणि तथा शेन्दन (जयन्त वरमन ) राजा हुये ।उनके बारे अधिक जानकारी नहीं मिलती ।

६७० ई० में अरिकेशरि मार वरमन पांड्य राजाओं में महान योद्धा तथा सामर्थ्यवान शासक सिद्ध हुआ ।उसका विवाह एक चोल राजकुमारी से हुआ जो शिवभक्त थी ।राजकुमारी के आग्रह पर शैव सन्त सम्बन्दर मदुरै आये ,उनके प्रभाव से अरिकेशरि मारवरमन जो पहले जैन धर्म को मानने वाला था उसने प्रभावित होकर शैव धर्म को अपना लिया ।

अरिकेशरि मारवरमन ने केरल और अन्य पड़ोसी राज्यों को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया और अपने पड़ोसी राज्य पल्लवों के शत्रु वातापि के चालुक्यों के साथ मित्रता कर ली ।

अरिकेशरि के उपरान्त उसका पुत्र कौच्चाडैयन(रणधीर) ने राजसिंहासन प्राप्त किया वह भी अपने पिता की भाँति महान और शूरवीर था .उसने कोंगू प्रदेश जीतकर अपने राज्य में मिला लिया और चेरों और चोलो पर भी आधिपत्य जमा लिया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२९)

विक्रमादित्य षष्ठ के बाद उसका पुत्र सोमेश्वर तृतीय राजगद्दी पर बैठा ,वह कोमल स्वभाव का शान्तिप्रिय शासक था ।

सोमेश्वर तृतीय के शासन काल में होयसल नरेश विष्णु वर्धन ने बल पूर्वक चालुक्य राज्य के नोलम्बवाडी ,वनवासी तथा हंगल क्षेत्रों में अपनी सत्ता का विस्तार शुरू कर दिया ।

सोमेश्वर से चोल नरेश कुलोतुंग ने आन्ध्र प्रदेश को जीत लिया परन्तु चालुक्यो ने उसे पुन:प्राप्त कर लिया ।

सोमेश्वर विद्वान था तथाउसे शिल्प शास्रज्ञ भी कहा जाता है।

सोमेश्वर तृतीय के बाद उसका पुत्र जगदेवमल्ल राजा बना ,उसके शासन काल में भी कुछ सामन्तों ने विद्रोह किया और अपने को स्वतन्त्र मानने लगे परन्तु जगदेव मल्ल ने उनके विद्रोह का दमन किया । होयसल राजा विष्णु वर्धन ने राज्य विस्तार का कार्य जगदेव मल्ल के शासन में भी जारी रखा ।

जगदेव मल्ल का शासन काल ११३८ से११५१ ई० तक रहा ।

जगदेव मल्ल के बाद उसका छोटा भाई तैलप तृतीय राजा बना उसके समय में होयसल ,काकतीय ,कलचुरि तथा यादव वंशीय सामन्त काफ़ी शक्ति शाली हो गये थे ,उन्हें क़ाबू में रखना तैलप के लिये बहुत कठिन था । कलचुरि के सामन्त ने ११५७ ई० में चालुक्य राज्य पर अधिकार कर लिया । उसने और उसके वंशजों ने ११८१ तक राज्य किया । परन्तु तैलप तृतीय के पुत्र सोमेश्वर चतुर्थ ने तत्कालीन कलचुरि शासक आहवमल्ल को परास्त कर कल्याणी पर अधिकार कर लिया ।

उसने कुछ दिनों तक ही शासन किया तभी ११८९ ई० में यादव वंशी भिल्लम ने सोमेश्वर से उत्तरी चालुक्य प्रदेशों को जीत लिया ।उधर होयसल नरेश बल्लाल द्वितीय ने तथा काकतीय राजा रुद्र ने भी विद्रोहों और आक्रमण के फलस्वरूप ११८९ ई० में चालुक्य प्रदेशों को अपने अपने राज्य में मिला लिया ।

सोमेश्वर तथा उसके सेनापति ब्रह्म को बल्लाल द्वितीय ने कई लड़ाइयों में हराया ,अन्तिम लड़ाई ११९० ई० में हुई सोमेश्वर की हार के साथ चालुक्य राजवंश का अंत हो गया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२८)

जिस समय विक्रमादित्य षष्ठ चालुक्य राजगद्दी पर विराजमान हुआ उस समय उसका साला अधि राजेन्द्र चोल सिंहासन पर आसीन था ।

परन्तु चोलों ने विद्रोह करके अधि राजेन्द्र को राजगद्दी से उतार दिया और उसकी हत्या भी कर दी ।इस विद्रोह का मुख्य सरदार कुलोत्तुंग प्रथम था ,उसने राजगद्दी पर अधिकार कर लिया ।

कुलोत्तुंग ने अपने शासन काल के अंतिम वर्षों में विक्रम चोल को युवराज घोषित करने के लिये वेंगी राज्य से चोल राज्य बुलाया ,जिसका लाभ उठा कर विक्रमादित्य षष्ठ ने वेंगी राज्य पर क़ब्ज़ा कर लिया और अपने सेनानायक अनंतपाल को वहाँ का शासक नियुक्त किया उसने गंगवाडी और कोलार क्षेत्र को भी जीतकर अपने राज्य में मिला लिया ।

गंगवाडी पर उस समय होयसल नरेश विष्णु वर्धन का अधिकार था ,विक्रमादित्य षष्ठ ने विष्णु वर्धन को हराया और कदम्बों तथा पाण्ड्यों को भी पराजित किया । विक्रमादित्य ने लंका में भी अपने दूत भेजकर मैत्री सम्बन्ध स्थापित किये ।

उसका शासन लंबी अवधि तक रहा ।उसने अपने राज्य में विद्या और धर्म के प्रसार के लिये पाँच सौ तमिल ब्राह्मणों को बसाया और उनके भरण पोषण की भी व्यवस्था की ।

विल्हण कृत ‘विक्रमांक देव चरितम’ विक्रमादित्य के चरित्र पर लिखी गयी है ,इसमें १८ सर्ग हैं।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२७)

सोमेश्वर प्रथम की मृत्यु के उपरान्त उसका बड़ा पुत्र सोमेश्वर द्वितीय राजगद्दी पर बैठा ,उसने अपने छोटे भाई विक्रमादित्य षष्ठ को गंगवाडी प्रदेश का शासक बना दिया ।परन्तु विक्रमादित्य स्वयं राजगद्दी पाना चाहता था अत:उसने राजगद्दी पाने के लिये चोल नरेश वीर राजेन्द्र की पुत्री से विवाह किया ,वीर राजेन्द्र ने अपनी पुत्री के पति विक्रमादित्य षष्ठ को राजगद्दी दिलाने हेतु सोमेश्वर द्वितीय पर आक्रमण कर दिया और चालुक्य राज्य की गुटटी को घेरकर कम्पिलनगर को नष्ट कर दिया ।

परन्तु कुछ समय पश्चात सोमेश्वर द्वितीय ने वीर राजेन्द्र को दक्षिणी कर्नाटक के बाहर निकाल दिया ।

पर थोड़े समय बाद वीर राजेन्द्र की मृत्यु हो गयी जिससे विक्रमादित्य संकटों से घिर गया ,एक तरफ़ उस पर अपने भाई सोमेश्वर द्वितीय का दवाब और दूसरी ओर अपने साले अधि राजेन्द्र की राजगद्दी को सुरक्षित रखने का दवाब ।

वेंगी नरेश कुलोतुंग की सहायता लेकर सोमेश्वर द्वितीय ने विक्रमादित्य और उसके समर्थकों पर आक्रमण कर दिया दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ ।इस युद्ध में विक्रमादित्य की सेना ने सोमेश्वर द्वितीय को बंदी बना लिया । इस तरह विक्रमादित्य षष्ठ ने कल्याणी का राजसिंहासन प्राप्त किया अपने राज्याभिषेक के समय उसने चालुक्य विक्रम संवत नाम का नया संवत चलाया ।अपने भाई सोमेश्वर को उसने आजीवन बंदीगृह में ही रखा ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२६)

चोलराजा राजाधिराज ने चालुक्यों को दबाने का काम अपने युवराज पुत्र राजेन्द्र द्वितीय को दिया । राजेन्द्र द्वितीय ने विक्रमादित्य षष्ठ के कई पराक्रमी सेनापतियों की हत्यायें की और चालुक्य सेना से उनके हाथी ,घोड़े और शस्त्र लूट लिये तथा भव्य भवनों को नष्ट कर दिया

सोमेश्वर प्रथम के संधि प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया । चोलों ने चालुक्यों की राजधानी कल्याणी परभी विजय प्राप्त की ।तंजोर के दारासुरम् मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थापित द्वार पाल की मूर्ति को राजेन्द्र द्वितीय ने अपनी राजधानी में लाकर स्थापित किया ।

चालुक्य नरेश सोमेश्वर प्रथम ने अपने पुत्र विक्रमादित्य और परमार राजा जयसिंह को चोलों के अधिकृत प्रदेश गंगवाडी पर आक्रमण करने भेजा परन्तु चोल नरेश राजेन्द्र द्वितीय ने अपने पुत्र वीर राजेन्द्र को विशाल सेना के साथ भेजा उसने वीरता पूर्वक सबको हरा कर भगा दिया ।

वेंगनाडु युद्ध में पराजित सेनानायकों के साथ किये गये अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से सोमेश्वर ने कुंडलसंगम के मैदान में पु न: चोलों को चुनौती दी ।चोल राजा तुरन्त आ गया ,चालुक्य सेनायें भी आ गयी परन्तु सोमेश्वर प्रथम जो संभवत बीमार था युद्ध क्षेत्र में नहीं पहुँचा । चोल राजा ने चालुक्यों को पराजित कर तुंग भद्रा नदी के किनारे विजय स्तंभ स्थापित कराया ।

कुछ समय बाद अपनी बीमारी से त्रस्त होकर और अपनी पराजय से व्यथित सोमेश्वर ने १०६८ में तुंग भद्रा नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली ।