यादें…

याद आने की कोई वजह नहीं होती

अकसर यों ही चली आती हैं यादें

न खिड़की न दरवाज़ा

रूकती नहीं हैं

किसी के रोके

कभी मुस्कुराहट कभी छलकी हुई आँखें

बता देती हैं

कैसे हैं यादों के मौसम

भीगे हुए हैं या ख़ुशियों से भरे पल है

ये यादें बड़ी बेरहम भी होती हैं

दिल के ज़ख़्मों को

कुरेदती है

जब तक दिल ख़ून ख़ून न हो जाये

ख़ुशियों से भरी हों

दिल ग़म से भरा हो

यादें है बेसाख़्ता चली आती हैं

बिना वजह

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तलाश

तलाश है उन लम्हों की

जहाँ ज़िन्दगी है

तू नहीं है ,तो

कहाँ ज़िन्दगी है

मैं हूँ और तेरा ख्याल है

और क्या

तेरा इन्तज़ार ज़िन्दगी है

गम की फ़िकर किसे है

ख़ुशियाँ कहाँ मयस्सर

साँसों सी आती जाती

इक साँस ज़िन्दगी है

वो डोर जो बाँधी थी

अनजाने से हमने

टूटी जो कहीं डोर तो

वीरान ज़िन्दगी है

सहर हो कि शाम हो

तेरी याद ज़िन्दगी है

अपनी बेटी को जन्मदिन पर

वही दिन है

वो ही वक़्त है

जब मेरी गोद में

नन्हीं सी कली

खिली थी

सितारों सी चमकती आँखें

प्यारी सी मुस्कान

होंठों पे खिली थी

नन्हें हाथों में पकड़ी हुई

मेरी उँगली ,उजली उजली

सोई हुई गोदी में

नन्हीं सी परी मेरी

मेरे दिल की छोटी सी

अरमानों की कली थी

पल पल पलती मेरी

आँखों में

चलती बढ़ती मेरी

हाथों में

साथ रही मेरे

पास रही मेरे

हर मोड़ पे

हर राह में ढाल बनी मेरी

लड़ती झगड़ती

हरेक से मेरी ख़ातिर

कोई कुछ बोले न

कोई कुछ सोचे न

मैं साथ हूँ मैं पास हूँ

ये माँ है मेरी ।

पैरहन…

हल्की सी उनकी हँसी दिल में

उतर गयी

वो गुज़र गये इधर से

लम्हा मगर ठहर गया

यादों के पैरहन थे

महक थी कहीं भीनी सी

झोंका था हवा का

कि तू छूके मुझे किधर गया

हकीकत है कि ख़्वाब है

है किसको ये ख़बर

बेख्याली में शायद

मुझे छूकर तू गुज़र गया

ख़्यालों ने करवट बदली

तू साथ भी है पास भी

मर जाऊँगा क़सम तेरी

जो दिल लेकर मेरा मुकर गया