हम भारत के लोग…(५)

मुख्यमंत्री

अनुच्छेद 164 में कहा गया है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा, संसदीय व्यवस्था में राज्यपाल राज्य विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही मुख्यमंत्री नियुक्त करता है।

लेकिन यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत न प्राप्त हो तो राज्यपाल सबसे बड़े दल या दलों के समूह के नेता को मुख्यमंत्री बनाता है ,परंतु उसे एक माह के अन्दर सदन में विश्वास मत हासिल करना होता है।

संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री को विधानमंडल के दो सदनों में से किसी एक का सदस्य होना चाहिए।
एक ऐसे व्यक्ति को जो राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं भी हो,छह महीने के लिये मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है,परन्तु इस समय में उसेविधानमंडल के लिए र्निवाचित होना होगा। ऐसा न होने पर उसका मुख्यमंत्री पद समाप्त हो जायेगा।
पद ग्रहण करने के पूर्व राज्यपाल उसे पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाता है।
वेतन:

मुख्यमंत्री के वेतन एवं भत्तों का र्निधारण राज्य विधानमंडल द्वारा किया जाता है,तथा निशुल्क आवास, यात्रा भत्ता और चिकित्सा सुविधाएं मिलती हैं।

शक्तियां :

° राज्यपाल उन्हीं को मंत्री नियुक्त करता है जिनकी सिफारिश मुख्यमंत्री द्वारा की जाती है ।
° वह मंत्रियों को विभाग वितरण करता है उनके विभागों मेंफेरबदल कर सकता है।
° वह मंत्रिपरिषद की बैठक की अध्यक्षता कर उसके फैसलों को प्रभावित कर सकता है।
° वह सभी मंत्रियों को सहयोग,नियत्रंण और निर्देश दे सकता है।
° वह अपने पद से त्यागपत्र देकर पूरी मंत्रिपरिषद को समाप्त कर सकता है,उसकी मृत्यु अथवा त्याग पत्र से भी मंत्रिपरिषद स्वतः विघटित हो जाती है।
° वह राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच की कड़ी है।
° राज्य के कार्यों के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को सूचित करता है।
° वह महाधिवक्ता, राज्यलोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, सदस्यों और राज्य र्निवाचन आयुक्त आदि की नियुक्ति के संबंध में राज्यपाल को परामर्श देता है।
° वह राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने ,स्थगित करने और विघटित करने की सलाह देता है।
° वह अन्तर्राज्यीय परिषद और राष्ट्रीय विकास परिषद का सदस्य होता है,दोनों परिषदों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करता है ।
° वह राज्य सरकार का प्रमुख वक्ता होता है।

अनुच्छेद 167 के अनुसार मुख्यमंत्री राज्य के कार्यों के प्रशासन सम्बन्धी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को सूचित करे ।

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दक्षिण भारतीय इतिहास…(४२)

राजेंद्र द्वितीय ने अपने भाई राजाधिराज की मृत्यु का बदला लेने के लिए चालुक्य राज्य पर हमला कर वहां के शासक सोमेश्वर को पराजित कर समर भूमि में ही अपना वीराभिषेक कराया।
परन्तु सोमेश्वर प्रथम ने चोल शासित गंगवाड़ी राज्य पर तथा वेंगी पर अपना आधिपत्य बनाने के लिये सेनापति चामुण्डराज के नेतृत्व में चालुक्य सेना को भेजा, चोलों ने वेंगी राज्य को जीतकर चालुक्य सेनापति चामुण्डराज और वेंगी नरेश शक्तिवर्मन का वध कर दिया।
राजेंद्र द्वितीय ने सिंहल राज्य के चोलों के विरुद्ध विद्रोह का दमन कर सिंहल राज्य के अधिकांश भागों को चोल साम्राज्य में मिला लिया।
गंगवाड़ी से चालुक्य आक्रमणकारियों को खदेड़ दिया गया।
कुछ समय पश्चात संभवतः1063में चोल युवराज महेन्द्र की मृत्यु हो गई ,और कुछ दिन बाद राजेंद्र द्वितीय की भी मृत्यु हो गई।
अब चोल राजगद्दी पर वीर राजेंद्र आसीन हुआ।

दक्षिण भारत का इतिहास…(४१)

राजेंद्र प्रथम के उपरांत युवराज राजाधिराज चोल 1044 में चोल सिहांसन पर विराजमान हुआ।उसने सिहांसन पर बैठने केबाद चालुक्यों के विरुद्ध अभियान शुरु किया और कृष्णा नदी के किनारे धान्यकटक में चालुक्यों को पराजित किया।
1046 में राजाधिराज ने कल्याणी राज्य पर आक्रमण कर कल्याणी पर अधिकार कर लिया, चोल सेनाओं ने चालुक्यों के सेनापतियों और सरदारों क़ो पकड़ लिया तथा कम्पिलनगर में चालुक्यों के राजमहल को नष्ट कर दिया।राजाधिराज ने शत्रु की राजधानी में अपना वीराभिषेक कराया और विजयराजेन्द्र की उपाधि ग्रहण की।
1050 में चालुक्य नरेश सोमेश्वर अपने राज्य से चोल सेना को हटाने में सफल हुआ ,अब उसने वेंगी राज्य पर आक्रमण कर वेंगी नरेश को विवश किया कि वह सोमेश्वर की अधीनता स्वीकार करे।
राजाधिराज ने अपने छोटे भाई राजेन्द्र द्बितीय को युवराज बना दिया था ।राजाधिराज ने राजेंद्र द्बितीय को सोमेश्वर पर आक्रमण करने भेजा,युवराज राजेंद्र द्बितीय ने चालुक्य शासित रटठमंडलम् प्रदेश को जीतकर अनेक चालुक्य सेनापतियों को मौत के घाट उतारा और उन्हें भागने पर विवश कर दिया।
सोमेश्वर एक बार फिर चोल सेना का सामना करने आगे बढ़ा, कोल्हापुर के पास कोप्पम में दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ,राजाधिराज युद्ध स्थल पर शत्रु सेनाओं से घिर गया और बुरी तरह घायल हुआ तथा मृत्यु को प्राप्त हुआ ,परन्तु इसी बीच राजेंद्र द्वितीय अपनी सेना के साथ युद्ध स्थल पर पहुंच गया और अपने पराक्रम से युद्ध में विजयी हुआ,पराजित चालुक्य सेना समर भूमि से भाग खड़ी हुई।
चोलों के हाथ बहुत सा लूट का माल ,हाथी ,घोड़े, ऊंट तथा कुछ स्त्रियां जो राजपरिवार की थी,लगा ।
राजेंद्र द्बितीय ने युद्ध स्थल में ही अपना राज्याभिषेक करायाऔर विपुल सम्पत्ति के साथ अपनी राजधानी वापस लौट आया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(४०)

राजेंद्र चोल को 1014 में चोल राज्य का सिहांसन प्राप्त हुआ ,वह अपने पिता की तरह वीर ,महत्वाकांक्षी, कूटनीतिज्ञ था ।सिहांसन पर आरूढ़ होने के पश्चात राजेंद्र चोल ने केरल के विद्रोह को कुचल दिया और उन्हें परास्त कर अपने आधीन कर लिया।
चोल अभिलेख के अनुसार राजेंद्र चोल ने सिंहल राज्य पर आक्रमण कर सिंहल राज्य को अपने चोल साम्राज्य में मिला लिया औरसिंहल के शासक को बंदी बनाकर बारह वर्ष तक बंदीगृह में रखा बंदीगृह मेंही उसकी मृत्यु हो गई ।राजेंद्र चोल ने अपने पुत्र विक्रम चोल को उत्तरी पूर्व राज्यों की विजय अभियान के लिए, उसके नेतृत्व में विशाल सेना को भेजा ,विक्रम चोल ने कलिंग(उड़ीसा)बस्तर इन्द्ररथ तथा दक्षिणी कोसल आदि राज्यों को विजित किया और दंडभुक्ति केशासक धर्म पाल,दक्षिणी राठ के राजा रणसूर,पूर्व बंगाल के राजा गोविंद चन्द्र तथा पाल राज्य के शासक महीपाल के विरुद्ध युद्ध में सफलता प्राप्त की।विजय प्राप्ति के उपरांत विक्रम चोल ने गंगा में स्नान किया।
अपने शासनकाल के प्रारंभ में ही राजेंद्र प्रथम ने अपने पुत्र राजाधिराज को युवराज बना दिया था।
तिरुवालंगाडु ताम्रपत्र के अनुसार राजेंद्र नेअपनी विशाल जल सेना की सहायता से समुद्र पार कर कटाह राज्य को जीत लिया और वहां के राजा को बंदी बनाया, परन्तु कटाह राजा ने अपनी मुक्ति की याचना करते हुयेचोल नरेश की अधीनता स्वीकार कर ली,राजेंद्र चोलप्रथम ने उसकी याचना स्वीकार कर उसे मुक्त कर दियाऔर अपना सामन्त शासक बना दिया।
अपनी विशाल जलसेना के साथ राजेंद्र चोल ने अंडमान निकोबार, वर्मा देश के अराकान तथा पेगूआदि प्रदेशों को भी जीत लिया।
जब राजेंद्र चोल हिन्द सागर के पार युद्धों में व्यस्त था,तभी केरल, पाण्ड्य और सिंहल राज्य के शासकों ने संयुक्त रुप चोल सत्ता के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया,इस युद्ध में सुन्दरपाण्डय नेतृत्व कर रहा था।
राजेन्द्र ने अपने युवराज पुत्र राजाधिराज को इस विद्रोह को दबाने भेजा, राजाधिराज ने इस विद्रोह को कुचल दिया,इस युद्ध में सिंहल राजा मृत्यु को प्राप्त हुआ।
अपने राज्य की सीमाओं पर चोल शासक की पैनी नजर रहतीं थी
सीमांत राजाओं पर चोल शक्ति का दवाब हमेशा ही बना रहता था।उसने शक्तिशाली राज्यों के विद्रोह बलपूर्वक दबा दिया और उन्हें सदा अपने अधीन रहने पर विवश कर दिया था।
उसके शासन काल में चोल राज्य वैभवशाली था।

हम भारत के लोग…(४)

प्रधानमंत्री

अनुच्छेद 75 के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को राष्ट्रपति प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।
यदि लोकसभा में कोई भी दल स्पष्ट बहुमत में न हो तो राष्ट्रपति स्वविवेक से सबसे बड़े दल अथवा गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री बनाता है,परन्तु उस नेता को एक माह के अंदर अपना बहुमत सिद्ध करना होता है।
संविधान के अनुसार प्रधानमंत्री संसद के दोनों सदनों में से किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है।
प्रधानमंत्री का कार्य काल निश्चित नहीं है,प्रधानमंत्री को जब तक लोकसभा का बहुमत प्राप्त रहता है तब तक उसे हटाया नहीं जा सकता,लोकसभा में अपना विश्वास मत खो देने पर उसे अपने पद से त्यागपत्र देना होगा अथवा त्यागपत्र न देने पर वह राष्ट्रपति द्वारा बर्खास्त किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री के वेतन और भत्तों का निर्धारण संसद द्वारा समय समय पर किया जाता है ।

कार्य और शक्तियां:

० प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से अपने दल के व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त करने की सिफारिश करता है और राष्ट्रपति उन्हीं व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त करता है जिनकी प्रधानमंत्री द्वारा सिफारिश की गई होती है ।
० प्रधानमंत्री मंत्रियों को मंत्रालय आवंटित करता है, और उनमें फेरबदल भी कर सकता है।
० वह किसी भी मंत्री को त्यागपत्र देने के लिये कह सकता है या राष्ट्रपति से उसे बर्खास्त करने की सिफारिश भी कर सकता है।
० वह मंत्री परिषद की बैठक की अध्यक्षता करता है और उनके निर्णयों को भी प्रभावित कर सकता है।
० मंत्रियों की गतिविधियों को नियंत्रित और निर्देशित कर सकता है।
० वह पद से त्यागपत्र देकर मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर सकता है।
० प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच की मुख्य कड़ी होता है।
० प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति को भारत का महान्यायवादी, भारत का महानियंत्रक, महालेखा परीक्षक, संघ लोकसेवा आयोग का अध्यक्ष एवं उसके सदस्यों का,चुनाव आयुक्त, वित्त आयोग का अध्यक्ष एवं उसके सदस्यों एवं उनकी नियुक्ति के सम्बंध में परामर्श देता है।
० प्रधानमंत्री संसद के सत्र का आरंभ और सत्रावसान सम्बन्धी परामर्श राष्ट्रपति को देता है।
० वह लोकसभा को विघटित करने की राष्ट्रपति से सिफारिश कर सकता है।
० वह सरकार की नीतियों की घोषणा करता है।
० प्रधानमंत्री नीति आयोग , राष्ट्रीय एकता परिषद,अंतर्राज्यीय परिषद और राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद का अध्यक्ष होता है।
० वह केन्द्र सरकार का प्रमुख प्रवक्ता होता है।
० वह सत्ता धारी दल का नेता होता है व सेनाओं का राजनैतिक प्रमुख होता है।
० वह देश का नेता होने के कारण राज्यों के विभिन्न वर्गों के लोगों से उनकी समस्याओं के सम्बंध में ज्ञापन प्राप्त करता है।
० आपातकाल में राजनीतिक स्तर पर आपदा प्रबंधन का प्रमुख होता है।

राष्ट्रपति को सहायता एवं सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगा।

अनुच्छेद 78 के अनुसार प्रधानमंत्री संघ के कार्य में प्रशासन सम्बन्धी विधान विषयक मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राष्ट्रपति को सूचित करे।
संघ के कार्य, प्रशासन सम्बन्धी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं सम्बन्धी जो भी जानकारी राष्ट्रपति मांगे वो उन्हें दे।

प्रधानमंत्री की मृत्यु अथवा त्यागपत्र देने पर मंत्रिपरिषद स्वयं ही विघटित हो जाती है।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३९)

राजराज प्रथम के शासनकाल के एक अभिलेख के अनुसार नोलम्बों और गंगों के विरुद्ध भी उसने विजय प्राप्त की थी ।
चालुक्य शासक सत्याश्रय जो राजराज का समकालीन था,चोलों का प्रबल शत्रु था ।उसकी शह पर वेंगी शासक दार्नाणव की हत्या तेलुगु जटाचोडभीम ,जो दार्नाणव का संबंधी भी था ,ने कर दी और सिहांसन हथिया लिया ।
दार्नाणव के पुत्रों ने राजराज प्रथमसे सहायता की याचना की ,राजराज ने सहायता कावचन दिया और अपनी पुत्री का विवाह छोटे राजकुमार से कर दिया तथा बड़े राजकुमार शक्ति वरमन को सिहांसन पर बैठाने का वचन दिया ।
चोल राजा नेजटाचोडभीम को पराजित किया और वेंगी के सिहांसन पर शक्ति वर्मन को शासक बना दिया ,चोल राज्य के प्रभुत्व में शक्ति वर्मन शासन करने लगा ।चालुक्य नरेश सत्याश्रय को चोलराज्य का विस्तार पसन्द नहीं था ,उसने 1006 में वेंगी पर आक्रमण कर दिया और धान्यकटक तथा वनमंडल के किलों को धूल धूसरित किया ।
तब राजराज प्रथम ने अपने पुत्र राजेन्द्र को एक शक्तिशाली सेना का प्रधान बना कर चालुक्यों पर आक्रमण करने भेजा ।
राजेन्द्र चोल ने सान्तलिगे,वनवासी, कादम्बलिगे,कोगली प्रदेशों को जीतकर बीजापुर जिले के दोनूर में अपना सैन्य शिविर स्थापित किया।
चालुक्य अभिलेख के अनुसार राजेन्द्र चोल ने पूरे देश को बुरी तरह लूटा और स्त्रियों और बच्चों तक को मौत के घाट उतारा, और मान्यखेट में भी लूटपाट की ।
सत्याश्रय को इस कारण अपनी सेना वेंगी से हटानी पड़ी, वह बड़ी कठिनाई से अपने देश को चोल सेना से मुक्त करवा सका और चोल सेना बहुत सारे लूट के माल के साथ तुंगभद्रा नदी के पीछे रह गई।
इसके बाद राजराज प्रथम ने कलिंग राज्य पर आक्रमण उसे भी अपने राज्य में मिला लिया।
राजराज प्रथम ने श्रीलंका पर तो अपना आधिपत्य पहले ही कर लिया था ,अब उसने अपनी शक्तिशाली जहाजी सेना के साथ बंगाल की खाड़ी को पार करके दक्षिणी पूर्व एशिया में श्रीविजय, कटाह तथा मलाया द्बीपों पर भी अपना अधिकार कर लिया और अपने विशाल चोल साम्राज्य में मिला लिया।
इस प्रकार भारत का पूर्व एशिया के अन्य देशों के साथ व्यापार और वाणिज्य सम्पर्क पूरी तरह से विकसित हो गया।
चोल साम्राज्य को राजराज प्रथम ने विस्तृत, वैभवशाली और शक्तिशाली बना दिया ।
राजराज ने तंजौर का वृहदीश्वर मंदिर का निर्माण कराया था ,जो कि विश्व प्रसिद्ध है ।

हम भारत के लोग…(३)

उपराष्ट्रपति

उपराष्ट्रपति का पद देश का दूसरा सर्वोच्च पद होता है ।वह संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के निर्वाचन मंडल द्वारा चुना जाता है ।

इसमें संसद के निर्वाचित और मनोनीत दोनों सदस्य होते हैं । परन्तु राज्य विधानसभाओं के सदस्य सम्मिलित नहीं होते हैं ।

योग्यता

वह भारत का नागरिक हो ।

वह पैंतीस वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो ।

वह राज्यसभा का सदस्य बनने के योग्य हो ।

वह केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार या किसी स्थानीय या सार्वजनिक प्राधिकरण के अन्तर्गत किसी लाभ के पद पर न हो ।

उपराष्ट्रपति पद ग्रहण से पहले शपथ लेनी होगी और हस्ताक्षर करने होगें ।

उपराष्ट्रपति पद की अवधि पद ग्रहण करने से लेकर पाँच वर्ष तक होती है ।

वह अपनी पदावधि में किसी भी समय राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र दे सकता है ।

वह अपने पद की अवधि पूर्ण होने से पहले भी हटाया जा सकता है ।

उसे राज्य सभा द्वारा पूर्ण बहुमत द्वारा हटाया जा सकता है ,परन्तु लोकसभा की सहमति आवश्यक है ।

वह उप राष्ट्र पति पद पर कितनी ही बार निर्वाचित हो सकता है।

उपराष्ट्रपति का पद उसकी पाँच वर्ष की अवधि पूर्ण होने पर समाप्त हो सकता है ।

उसके त्यागपत्र देने पर

उसकी मृत्यु पर,

उसके बर्खास्त होने पर

या निर्वाचन अवैध घोषित होने पर भी

पद से हटाया जा सकता है ।

शक्तियाँ और कार्य –

उपराष्ट्रपति की शक्तियाँ और कार्य लोकसभा अध्यक्ष की भाँति होते हैं ,वह उच्च सदन का सभापति होता है ।

जब राष्ट्रपति का पद रिक्त हो तो वह कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में भी कार्य करता है ।

राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते समय वह राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं करता है ।

उपराष्ट्रपति का वेतन १.२५ लाख रू प्रति माह होता है उसे दैनिक भत्ता ,निःशुल्क पूर्ण सज्जित आवास ,फ़ोन ,कार ,चिकित्सा सुविधा ,यात्रा सुविधा तथा अन्य सुविधायें प्राप्त होती हैं ।

यदि वह राष्ट्रपति के पद पर कार्य कर रहा है तो उसे राष्ट्रपति को प्राप्त होने वाले वेतन और भत्ते प्राप्त होते हैं।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३८)

उत्तराधिकार में अरिमोलवर्मन को छोटा और कमजोर राज्य प्राप्त हुआ, युवराज के रूप में उसने युद्ध अनुभव प्राप्त किये थे और वह एक अच्छा प्रशासक भी था साथ ही कूटनीतिज्ञ भी था ।
उसने उत्तम चोल से आदित्य प्रथम की हत्या का प्रतिशोध लेने के स्थान पर उत्तम चोल से अपने लिये सिहांसन सुरक्षित करवा लिया ,इस प्रकार उत्तम चोल की मृत्यु के बाद उत्तम चोल के पुत्रों के स्थान पर अरिमोलवर्मन राजा बना ।
अब उसने राजराज की उपाधि धारण की ।985में सिहांसन पर आसीन होने के बाद उसने छोटे छोटे राज्यों को जीत कर चोल राज्य में मिला लिया ।उसने अपने राज्य में अनेक प्रशासनिक सुधार किए और अपने शासन काल के प्रारंभिक वषों में उसने चोल राज्य की स्थिति को मजबूत किया।
केरल ,पांड्य और श्रीलंका के शासकों ने सेना एकत्रित कर सम्मिलित रूप से चोल राज्य के विरुद्ध तैयारी की ,परन्तु राजराज प्रथम ने केरल राज्य पर आक्रमण किया और केरल नरेश रविवर्मन को परास्त किया, तत्पश्चात पांड्य राज्य पर आक्रमण कर वहां के राजा को बंदी बनाया ।
अपने अन्य अभियान में राजराज ने कोल्लम तथा कोंडुगोलूर के शासकों को भी पराजित किया ।
राजराज ने अपना तीसरा अभियान जहाजी बेड़ो के साथ किया जिसमें उसने श्री लंका का उत्तरी भाग अधिकृत किया औरवहां की राजधानी अनुराधापुर को रौंद डाला इस युद्ध में श्री लंका नरेश को किसी अज्ञात स्थान में छुपकर अपनी प्राणरक्षा करनी पड़ी।
तिरुवालंगाडु अभिलेख के अनुसार राजराज प्रथम का श्रीलंका पर अधिकार हुआ और उसने राज्य का नाम मामुण्डीचोलमण्डलम रखा और पोलो न्नुरुवा नगर को चोल राज्य की राजधानी बनाया ।

श्री गणेश🏵️🏵️🏵️

भाद्रपक्ष महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी गणपति भगवान का प्रिय दिवस है ,इस दिन गणपति भगवान की मूर्तियां सजाई जाती हैं ।गणपति सभी कार्यों प्रथम पूज्य हैं ,शुभ कामों में प्रथम निमंत्रण गणपति को दिया जाता है।
इनके जन्म से जुड़ी कई कथाएं हैं,ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार पार्वती के पुत्र जन्म के अवसर पर देवताओं के साथ शनि देव भी आये,उनकी दृष्टि जब पार्वती पुत्र पर पड़ी तो पुत्र का मस्तक कट कर धड़ से अलग हो गया ।शनिदेव को शाप था कि उनकी दृष्टि जिस पर भी पड़ेगी उसका मस्तक कट जाये गा ।यह देख कर पार्वती अत्यन्त दुखी हो गई तब भगवान विष्णु ने एक शिशु हाथी का सिर जोड़कर पार्वती पुत्र को जीवित कर दिया ।
मत्स्य पुराण के अनुसार पार्वती ने अपने अंगलेप से एक पुतले का निर्माण किया जिसका सिर गज का जैसा था ,गंगाजल से अभिषेक करते ही वह प्राणवान हो गया । पार्वती और गंगा दोनों ने ही उसे अपना पुत्र माना ।
शिव पुराण के अनुसार पार्वती ने स्नान करते समय उबटन से एक मानवाकृति बनाई और उसे किसी को भी अंदर न आने देने को कहा ,तभी शिव वहाँ आये बालक ने उन्हें न पहचानते हुये अंदर जाने से रोक दिया ।परिणाम स्वरूप दोनों में युद्ध हुआ और शिव ने बालक का सिर काट दिया जब पार्वती जी आयीं तो यह देखकर दुख से भर गयीं। शिव जी को जब पूरी बात का पता चला तो उन्होंने एक हाथी का सिर जोड़कर बालक को जीवन प्रदान किया।
गणपति संभव के अनुसार शिवजी के डमरू की ध्वनि से गणपति ने सम्पूर्ण वेदों को अपनाया, पार्वती के नूपुरों की झंकार से संगीत सीखा और शिव के तांडव दर्शन से नृत्य सीखा ।
माना जाता है जब व्यास ने महाभारत की रचना की तो महाभारत कोगणपति भगवान ने लिखा है,उन्होंने कहा कि लिखना शुरू करने के बाद रुकेगें नहीं ,इसपर व्यासजी ने कहा ,मैं जो भी कहूँगा आप उसका अर्थ समझ कर ही लिखें ।इस प्रकार महाभारत पूरी हुई।
गणपति जी गजबदन,सिन्दूर के समान रक्तवर्ण, त्रिनेत्र ,स्थूलकाय तथा चर्तुभुज हैं चारों हाथों में दंत ,अकुंश, पाश और वरमुद्रा हैं। मूषक उनका वाहन है,वे समस्त कार्यों मे प्रथम पूज्य हैं,विघ्न बाधाओं के विनाशक और मोदक प्रिय हैं ।
इनकी पत्नियों के नाम ऋद्धि और सिद्धि हैं ।ऋद्धि के पुत्र का नाम क्षेम तथा सिद्धि के पुत्र का नाम लाभ है ।