दक्षिण भारतीय इतिहास…(२६)

चोलराजा राजाधिराज ने चालुक्यों को दबाने का काम अपने युवराज पुत्र राजेन्द्र द्वितीय को दिया । राजेन्द्र द्वितीय ने विक्रमादित्य षष्ठ के कई पराक्रमी सेनापतियों की हत्यायें की और चालुक्य सेना से उनके हाथी ,घोड़े और शस्त्र लूट लिये तथा भव्य भवनों को नष्ट कर दिया

सोमेश्वर प्रथम के संधि प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया । चोलों ने चालुक्यों की राजधानी कल्याणी परभी विजय प्राप्त की ।तंजोर के दारासुरम् मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थापित द्वार पाल की मूर्ति को राजेन्द्र द्वितीय ने अपनी राजधानी में लाकर स्थापित किया ।

चालुक्य नरेश सोमेश्वर प्रथम ने अपने पुत्र विक्रमादित्य और परमार राजा जयसिंह को चोलों के अधिकृत प्रदेश गंगवाडी पर आक्रमण करने भेजा परन्तु चोल नरेश राजेन्द्र द्वितीय ने अपने पुत्र वीर राजेन्द्र को विशाल सेना के साथ भेजा उसने वीरता पूर्वक सबको हरा कर भगा दिया ।

वेंगनाडु युद्ध में पराजित सेनानायकों के साथ किये गये अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से सोमेश्वर ने कुंडलसंगम के मैदान में पु न: चोलों को चुनौती दी ।चोल राजा तुरन्त आ गया ,चालुक्य सेनायें भी आ गयी परन्तु सोमेश्वर प्रथम जो संभवत बीमार था युद्ध क्षेत्र में नहीं पहुँचा । चोल राजा ने चालुक्यों को पराजित कर तुंग भद्रा नदी के किनारे विजय स्तंभ स्थापित कराया ।

कुछ समय बाद अपनी बीमारी से त्रस्त होकर और अपनी पराजय से व्यथित सोमेश्वर ने १०६८ में तुंग भद्रा नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली ।

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दक्षिण भारतीय इतिहास…(२५)

भोज के शासन के शासन काल के अंतिम वर्षों में कल्याणी के सोमेश्वर प्रथम गुजरात के चालुक्य नरेश भीम प्रथम तथा चेदिवंश के कलचुरि शासक लक्ष्मी करण ने सम्मिलित रूप से मालवा पर आक्रमण किया । इसी बीच राजा भोज अस्वस्थ होकर मृत्यु को प्राप्त हुये ।कलचुरि नरेश लक्ष्मी करण ने मालवा की राजधानी धारानगरी पर अधिकार कर लिया ,तब राजा भोज के पुत्र जयसिंह ने सोमेश्वर प्रथम से सहायता माँगी ।अत: सोमेश्वर प्रथम ने अपने पुत्र विक्रमादित्य षष्ठ को धारा नगरी को मुक्त कराने और राजकुमार जयसिंह को राजसिंहासन दिलाने का कार्य सौंपा ।

विक्रमादित्य षष्ठ ने निष्ठा पूर्वक अपना कार्य पूरा किया लक्ष्मीकरण को पराजित कर जयसिंह को राजसिंहासन पर आसीन कराया ।

अब सोमेश्वर प्रथम ने वेंगी राज्य पर हमला कर चोल सत्ता को चुनौती दी । वेंगी के राजा राजराज को उसके सौतेले भाई विजयादित्य ने अपदस्थ कर स्वयं को राजा घोषित किया परन्तु राजराज ने पुन:अपना राज्य वापस ले लिया ।

विजयादित्य ने अब सोमेश्वर प्रथम के यहाँ शरण ली जहाँ उसका राजोचित स्वागत हुआ ,विजयादित्य के समर्थन मे सोमेश्वर प्रथम ने वेंगी पर हमला कर दिया ।

परन्तु राजराज को चोल नरेश का समर्थन प्राप्त था ,शीघ्र ही चोल नरेश राजेन्द्र प्रथम को चालुक्य नरेश सोमेश्वर के आक्रमण की सूचना मिल गयी ,उसने एक ब्राह्मण सेनापति के साथ तीन अन्य योग्य सेनापतियो के नेतृत्व में सेना भेजी ।परन्तु युद्ध में कोई निर्णय न हो सका ।इसी बीच राजेन्द्र प्रथम की मृत्यु हो गई ।

चोल राजगद्दी पर राजेन्द्र प्रथम का योग्य पुत्र राजाधिराज आसीन हुआ उसने पुन: सोमेश्वर प्रथम पर आक्रमण किया ,कृष्णा नदी के किनारे धान्य कटक में दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ ,चालुक्य नरेश बुरी तरह पराजित हुआ चालुक्य युवराज और वेंगी नरेश विजयादित्य युद्ध क्षेत्र छोड़कर भाग गये।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२४)

सत्याश्रय के बाद उसके अनुज दश वरमन का पुत्र विक्रमादित्य पंचम १००८ में राजगद्दी पर बैठा ,परन्तु वह सिर्फ़ १०१५ तक ही सिंहासन पर रहा ।

१०१५ में जयसिंह द्वितीय राजगद्दी पर आसीन हुआ उसे कई युद्ध करने पड़े ।मालवा के परमार शासक भोज ने मुंज का बदला लेने के लिये चालुक्य राज्य पर आक्रमण किया और कोंकण के कुछ हिस्सों को अपने अधिकार मे कर लिया ,परन्तु जयसिंह द्वितीय ने अपने आधीन राजाओं की सहायता से भोज द्वारा अधिकृत क्षेत्रों को मुक्त करा लिया ।

राजेन्द्र चोल ने चालुक्य शासित मुशंग क्षेत्र के युद्ध में जयसिंह को परास्त कर रट्टपाडि प्रदेश पर अधिकार कर लिया ।

परन्तु चालुक्य अभिलेखों के अनुसार जयसिंह द्वितीय ने राजेन्द्र चोल को तुंगभदरा के आगे गंगवाडी तक पीछे हटा दिया ।

राजेन्द्र चोल ने अपने दूसरे अभियान में जयसिंह को मस्की के युद्ध में पराजित किया परन्तु उसने अपना आक्रमण आगे न बढ़ा कर तुंग भद्रा नदी को ही दोनों राज्यों की सीमारेखा मान लिया गया ।

जयसिंह द्वितीय के पश्चात उसका पुत्र सोमेश्वर प्रथम राजगद्दी पर आसीन हुआ ,उसने अपनी राजधानी मान्यखेट से हटाकर कल्याणी नगर को बनाया ।कल्याणी को हर तरह से सुविधा सम्पन्न बना कर भव्य भवनों और मंदिरों से सजाया ।

अपने पिता की तरह उसने भी मालवा के भोज के विरुद्ध युद्ध जारी रखा और उसकी राजधानी धारा नगरी पर अधिकार कर लिया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२३)

तैलप द्वितीय के दो पुत्र थे ,उसने अपने बड़े पुत्र सत्याश्रय

को अपने जीवन काल में ही युवराज बना दिया था और छोटे पुत्र दशवरमन को किसी प्रान्त का प्रान्त पति नियुक्त कर दिया था ।

अपने युवराज बनने के बाद सत्याश्रय ने अपने पिता के साथ कई युद्धों में भाग लिया था ,वह एक कुशल योद्धा था ।तैलप द्वितीय के बाद सत्याश्रय ने सिंहासन प्राप्त किया ,उसने कुछ दिनों बाद ही कोंकण राज्य पर आक्रमण किया और वहाँ के राजा अपराजित को हरा कर अधीन बनाया तत्पश्चात गुर्जर राज्य परभी आक्रमण किया और गुर्जर राजा चामुण्ड राय को भी जीत लिया ।

जब सत्याश्रय युद्ध में व्यस्त था तो परमार शासक सिन्धुराज जो मुंज का छोटा भाई था उसने तैलप द्वितीय द्वारा जीते गये सभी परमार क्षेत्र पुन: वापस जीत लिये ।

चोल शासक राजराज चोल ने वेंगी के राजा दानारणव की हत्या करने वाले तेलुगु जटाचोड को वेंगी सिंहासन से हटा कर दानारणव के पुत्र शक्ति वरमन प्रथम को वेंगी का राजा बनाया और अपना सैन्य शिविर भी वेंगी में स्थापित किया ।

इस पर अप्रसन्न होकर सत्याश्रय ने वेंगी राज्य पर आक्रमण कर वहाँ के कुछ इलाक़ों को जीत लिया ।इस पर चोल नरेश राजराज चोल ने अपने पुत्र राजेन्द्र चोल को सीधे सत्याश्रय की राजधानी पर आक्रमण करने का आदेश दिया ।राजेन्द्र चोल ने सत्याश्रय की राजधानी पर आक्रमण कर उसे जीत लिया तथा लूटमार की और निर्दोष जनता की हत्यायें भी की ।

परन्तु सत्याश्रय ने अपनी शक्ति पुन: इकट्ठा की और अपने प्रदेशों को पुन: चोलों के अधिकार से वापस जीत लिये उसने चोल सैनिकों को तुंग भद्रा के दक्षिणी क्षेत्र तक पीछे हटा दिया ।

उसका शासनकाल लगभग ग्यारह वर्षों तक रहा ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२२)

कर्क द्वितीय अपने क्रूर स्वभाव और अक्षमता के कारण स्वयं अपने विनाश का कारण बना ।तैलप द्वितीय ने कर्क को पराजित कर संपूर्ण राज्य पर अधिकार कर लिया ,वह एक दक्ष सेनापति और राजकाज में अत्यन्त कुशल था ।उसने कल्याणी में एक नये चालुक्य वंश की नींव डाली ।

चालुक्य शासकों के अभिलेख मे वातापि के विक्रमादित्य द्वितीय के भाई भीम को कल्याणी के चालुक्य वंश का संस्थापक कहा गया है ।कल्याणी के विक्रमादित्य चतुर्थ (जो भीम का वंशज था ) के पुत्र तैलप द्वितीय को मान्यखेट के राष्ट्र कूट राजवंश को पराजित कर कल्याणी में चालुक्य राजवंश को स्थापित करने वाला माना जाता है ।

सिंहासन प्राप्त करने के बाद तैलप द्वितीय ने साम्राज्य विस्तार शुरू किया ,उसका मुख्य विरोधी गंगनरेश पाँचाल देव था जिसने अपनेराज्य की सीमा कृष्णा नदी तक फैला रखी थी ।तैलप ने उस पर कई बार आक्रमण किया परन्तु सफल न हो सका ।तब वेल्लारी के शासक गंग भूतिदेव ने तैलप की सहायता की ,गंगनरेश युद्ध मे मारा गया और तैलप विजयी हुआ ।गंगराज्य पर विजय के बाद तैलप द्वितीय के राज्य की सीमा कर्नाटक तर विस्तृत हो गयी ।

९७७ई० में तैलप द्वितीय ने कर्क द्वितीय के सहायता करने वाले रणस्तम्भ पर विजय प्राप्त की और ९८० में उत्तम चोल को पराजित किया ।लाट राज्य को जीतकर अपने सेनापति को वहाँ का सामन्त बनाया ।

मालवा के परमार शासक मुंज पर तैलप द्वितीय ने कई आक्रमण किये पर सफल न हो सका ।परन्तु मुंज नेअपने महामंत्री की सलाह न मान कर गोदावरी नदी पार कर तैलप द्वितीय पर आक्रमण किया और पराजित होकर तैलप द्वितीय का बन्दी बना ।

तैलप ने उसे तरह-तरह से अपमानित कर अन्त में मृत्यु के घाट उतार दिया ।

तैलप द्वितीय ने चालुक्य वंश को पुन: प्रतिष्ठित किया ।उसने लगभग पच्चीस वर्षों तक शासन किया , दक्षिण की कुछ कहानियों मे उसे भगवान कृष्ण का अवतार भी माना जाता है ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२१)

कृष्ण तृतीय के बाद उसके अनुज खोट्टिग को राष्ट्र कूट का सिंहासन मिला ।परन्तु कृष्ण तृतीय की मृत्यु के बाद उसकी अधीनता स्वीकार करने वाले राज्य सिर उठाने लगे , मालवा का परमार शासक सीयक द्वितीय ने नर्मदा को पार कर राष्ट्र कूट राज्य पर हमला कर दिया ,राष्ट्र कूट सैनिकों ने न सिर्फ़ परमारों को पराजित किया उनके सेनापति की हत्या भी कर दी ।

परन्तु कुछ समय पश्चात परमार नरेश ने एक बड़ी सेना के साथ राष्ट्र कूट की राजधानी मान्यखेट पर आक्रमण किया और राज्य में भारी लूट पाट भी की ।

राष्ट्र कूट के शक्तिशाली सामन्त गंग शासक मारसिह ने परमारों को पराजित किया और अपने राजा के राज्य को सुरक्षित किया लेकिन खोट्टिग अपनी पराजय और राजधानी की हालात से बहुत व्यथित था । कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई ।

खोट्टिग की मृत्यु के पश्चात कर्क द्वितीय सिंहासन पर आसीन हुआ । परन्तु अपने क्रूर स्वभाव के कारण वह अपने ही लोगों के बीच ही अप्रिय होता गया इसका लाभ उसकेसामन्त तैलप द्वितीय ने उठाया वह एक कुशल सेनानायक था और प्रशासन में भी निपुण था। कर्क द्वितीय का सामन्त तैलप द्वितीय एक सामन्त होते हुये भी राष्ट्र कूट मन्त्रियों और सेनानायकों के बीच लोकप्रिय होता गया ।वह एक कुशल प्रशासक था अपनी महत्त्वकांक्षा के चलते उसने मौक़ा पाकर कर्क द्वितीय पर आक्रमण कर दिया और उसे पराजित कर राष्ट्र कूट राज्य पर अधिकार कर लिया , अपनी कूटनीतिज्ञ दक्षता से वह राष्ट्र कूट राज्य का राजा बन गया । इस प्रकार राष्ट्र कूट साम्राज्य का अंत हो गया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(२०)

इन्द्र तृतीय के पश्चात उसका पुत्र अमोघ वर्ष द्वितीय ने राजसिंहासन प्राप्त किया ,परन्तु अपने अनुज की महत्वाकांक्षा ने उसे अधिक समय तक राज्य नहीं करने दिया ।कम उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गयी तत्पश्चात गोविन्द चतुर्थ ने राजगद्दी सँभाली ।

परन्तु गोविन्द निरंकुश और विलास प्रिय था अत:वह भी अधिक समय तक सिंहासन पर बना नहीं रह सका शासन पर उसकी पकड़ ढीली पड़ने लगी जिसका लाभ प्रतिहार राजा महीपाल ने उठाया और कान्यकुब्ज (कन्नौज ) परअधिकार कर लिया तथा वेंगी के शासक को जिसे इन्द्र तृतीय ने गद्दी पर बैठाया था को हटा कर भीम तृतीय ने राजगद्दी छीन ली ।

गोविंद चतुर्थ केसमय में शासन व्यवस्था बिगड़ने लगी उसके अधीन कई राजा स्वतंत्र हो गये । उसके अधीनस्थ राजाओं ने मिल कर उसे राजगद्दी से उतारकर उसके चाचा इन्द्र तृतीय के सौतेले भाई अमोघ वर्ष तृतीय को राजगद्दी पर बैठा दिया ।

अमोघ वर्ष तृतीय उदार तथा सुशील राजा था उसने अपने पुत्र कृष्ण तृतीय को युवराज बना कर शासन का अधिकांश भार उसे सौंप दिया ।

अमोघ वर्ष ने अपनी पुत्री का विवाह गंगनरेश बूतुग द्वितीय से कर दिया ।बूतुग को गंगवाडी का सिंहासन युवराज कृष्ण तृतीय की सहायता से प्राप्त हुआ .युवराज ने गंगो पर आक्रमण कर वहाँ के राजा राज मल्ल तृतीय को मार कर अपने बहनोई को सिहासन दिलाया ।

अपने पिता की मृत्यु के बाद कृष्ण तृतीय राजा बना

प्रारंभिक वर्षों में उसने अपने राज्य की आन्तरिक स्थिति को सुदृढ़ किया तत्पश्चात अपने बहनोई बूतुग द्वितीय के साथ मिलकर उसने चोल राज्य पर आक्रमण किया ,तक्कोलम में उनका निर्णायक युद्ध हुआ बूतुग ने हाथी पर बैठे चोल युवराज राजादित्य की तीर चला कर जान ले ली , चोंलों से काँची और तंजौर ले लिया ,चोल इस युद्ध में बुरी तरह पराजित हुये ।

दक्षिणी समुद्र तट पर उसने विजय स्तम्भ का निर्माण कराया तथा काल प्रिय गंड मारत्तण्ड तथा कृष्णेश्वर के मन्दिरों का भी निर्माण करवाया जिनके व्यय हेतु कई ग्रामों का दान भी किया ।

कृष्ण तृतीय ने वेंगी के वैध उत्तराधिकारी अम्म द्वितीय को हटाकर वाडप को सिंहासन पर बैठाया ।

९६०ई० के आसपास वह दक्षिण भारतीय विजय अभियान के बाद अपने राज्य वापस लौट आया , परन्तु इसी बीच दुर्भाग्य वश उसके बहनोई बूतुग द्वितीय की मृत्यु हो गई , अब बूतुग के पुत्र मारसिंह सिंहासन पर बैठा वह अपने मामा कृष्ण तृतीय के प्रति पूर्ण समर्पित था । उसने अपने पिता की भाँति कृष्ण तृतीय को उत्तर भारत के विजयी अभियान में भाग लिया ।

कृष्ण तृतीय ने अपने शासन काल में राष्ट्र कूटों संगठित किया ।उसे कई अभिलेखों में संपूर्ण भारत काविजेता कहा गया है ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(१९)

कृष्ण द्वितीय के जीवनकाल में ही उसके पुत्र जगतुंग की मृत्यु हो गयी थी इसलिये कृष्ण द्वितीय के बाद उसका पौत्र इन्द्र तृतीय सिंहासन का उत्तराधिकारी बना ।

इन्द्र को राजा बने कुछ समय ही हुआ था कि परमार शासक उपेन्द्र ने राष्ट्र कूट के गोवर्धन दुर्ग पर अधिकार कर लिया । परन्तु इन्द्र तृतीय ने उपेन्द्र को पराजित कर दुर्ग पर पुन: अधिकार कर लिया ।

प्रतिहार नरेश महेन्द्र पाल की मृत्यु के बाद उनके पुत्रों में भोज द्वितीय और महीपाल के बीच उत्तराधिकार के लिये युद्ध छिड़ गया ,जिसमें भोज विजयी होकर राजगद्दी पर आसीन हुआ । परन्तु महीपाल ने चन्देल नरेश हर्ष की सहायता से भोज को हटा कर राजगद्दी हथिया ली और राजा बन बैठा ।

प्रतिहार नरेश की शह पर परमार शासक उपेन्द्र द्वारा गोवर्धन पर किये आक्रमण से इन्द्र तृतीय बेहद नाराज़ था ,अत:उसने महीपाल के विरूद्ध युद्ध का निर्णय किया ।

युद्ध की घोषणा सुनकर महीपाल भयभीत होकर बिना युद्ध किये ही चन्देल राजा हर्ष की शरण में चला गया ,इन्द्र तृतीय ने उसके राज्य कन्नौज पर अधिकार कर लिया ।

तत्पश्चात उसने वेंगी राज्य पर आक्रमण किया जिसमें वेंगी राजा मारा गया और वेंगी राज्य के कुछ क्षेत्रों पर इन्द्र तृतीय का अधिकार हो गया ।

जिससमय इन्द्र तृतीय उत्तरी भारत के युद्ध में लगा था तब उसके सेनानायक श्रीविजय ने राष्ट्र कूट विरोधी राज्यों पर विजयी हुआ ।

इन्द्र तृतीय ने लगभग चौदह वर्ष तक शासन किया और उसने राष्ट्र कूट राजवंश को फिर सम्मान जनक स्थान दिया । उसने महाराजाधिराज ,नित्य वर्ष ,परमेश्वर आदि उपाधियों को धारण किया ।