नामुराद मुहब्बत…

बार बार वजह न पूछा करो

कभी बेवजह भी चले आया करो

मेरी नामुराद मुहब्बत में अपनी

चाहत के रंग भर जाया करो

तुम्हें कभी पाया तो नहीं फिरभी मैं तुमसे जुदा तो नहीं

चलो बहाने से कभी ख़ैरियत ही पूछ जाया करो

लहू बन के जो तेरे रगे जाँ में रहा है यारब

ख़ामोशियों को उसकी,समझ तो जाया करो

माना कि नज़दीकियों का हुनर नहीं हममें

फ़ासले इस तरह तुम न बढ़ा जाया करो

कभी चाहता हूँ कुछ न कहूँ तुमसे

कभी तुम ही मुझे नाम से बुलाया करो

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इक ख़्याल…

वो मेरा इक ख़्याल है

ख़्यालों में आता जाता है

सोता जागता है

और थोड़ा सा वक़्त गुज़ार कर चल देता है

मैं चाहता हूँ रोक लूँ कुछ देर और उसको

ठहरता नहीं है सुनता नहीं है

बोलता नहीं कुछ कहता भी नहीं

छोड़ जाता है अपने पीछे

बहुत सारे ख़्याल

मैं रहता हूँ उन्हीं ख़्यालों में

सोता हूँ जागता हूँ

ढेरों ख़्वाब बुनता हूँ उसी के ख़्याल में

वो मेरा एक ख़्याल ही तो है ।

कसक…

बार बार इस क़दर ,मेरे ख़्यालों में न आया करो

सिर्फ़ कहने के लिये ,ये रिश्ता न निभाया करो

मेरी नींदों में मेरे सपनों पर हक़ जताते क्यूँ हो

मुहब्बत नहीं है मुझसे ,तो अहसास दिलाते क्यूँ हो

मेरा इन्तज़ार तुम्हें आज भी है

कि मुझसे प्यार तुम्हें आज भी है

तुम्हारी आँखों को मेरा इन्तज़ार आज भी है

मेरे दिल को दर्द देने वाले

कसक तेरे दिल में भी कम न होगी कि,

काश !एक बार तो पुकारा होता

मुड़ जाने से पहले शायद वो पलट आया होता?

खतावार…

ख़ता तो कोई नहीं फिर भी खतावार हूँ मैं

तेरी आँखों में आँसू देख नहीं सकता

उन गुनाहों के इल्ज़ाम मंज़ूर मुझे

जो गुनाह मैं कर नहीं सकता

पुकारती हैं वो राहें फिरभी मुझे

जिन राहों से मैं गुज़र नहीं सकता

आके देख ,कितना तन्हा हूँ मैं

अब एक और इश्क़ मैं कर नहीं सकता ।

ज़िन्दा हूँ मगर फिर भी

तेरे बग़ैर ज़िन्दगी मैं जी नहीं सकता ।

बग़ावत…

अपनी ख़्वाहिशों को पाबन्द कर दो

यहाँ हर ख़्वाहिश पूरी नहीं होती

ख़ुशियों में मिलेंगे सब दोस्त

ग़म में मगर दुनिया शरीक नहीं होती

मैं तो कर देता बग़ावत सबसे

काश ज़िन्दगी इतनी बेतरतीब नहीं होती

कहीं न कहीं कुछ तो कमी सी है

अब किसी से कोई उम्मीद नहीं होती

न कहीं राह है न मंज़िल कोई

इस तरह काश ज़िन्दगी खोई नहीं होती ।

सन्नाटा…

सन्नाटा भी बोलता है कभी

सुनो ,आती है आहटें

बन्द करो ,ज़रा आँख

कितनी यादें करवट लेती हैं दिल में

तुम सुनो तो …।

जागी आँखों के सपने कैसे होते हैं

देखो …।

ज़िन्दगी कैसे पलों में सिमटती है

सन्नाटे में भी कितना शोर होता है

कभी -कभी बेचैन हो जाता है कितना

दिल भी घबराता है इतना

वो यादें ,वो आहटें ,वे बीते हुये पल

घेर लेते हैं मुझे

सन्नाटा बोलने लगता है ,सुनने लगता है,

चीख़ती है आवाज़ें

कभी ,सुनो ,देखो ,किस क़दर बोलता है,

सन्नाटा …।

कहाँ हो तुम..?

बूझती है रात ,कहाँ हो तुम

सोया जागा सा दिल में दर्द है

रात भी कितनी सर्द है

चाँद भी हँसता है तन्हाई पर मेरी

पूछता है कहाँ है , वो

जिसकी बातें हर रात करते थे मुझसे

बरखा की पहली फुहार सा वो प्यार तुम्हारा

क्या रूठा है तुझसे

लम्हा लम्हा तन्हाई का ,रात का जादू शहनाई सा

चाँद सितारे ये नज़ारे

मुन्तज़िर हैं तेरे सारे