तपिश है तेरे प्यार की…

कुछ सुलग रहा है दोनों तरफ़

अलाव जल रहा है जैसे

आँच सी दहकती है

तपिश है तेरे प्यार की ऐसे

नज़रों का मिलना तौबा तौबा

दिल निकल कर तेरे क़दमों में बिछा जाता है

पहलू में जो तीर सा गड़ा है

वो तेरी नज़र से कुछ तिरछा लगा है

पहले कभी ये हालत तो न थी

जैसी अब है वैसी तबियत भी न थी

Advertisements

जागा हूँ रात भर…

तेरे वादे पे एतबार करके

तेरे आने का इन्तज़ार करके

जागा हूँ रात भर मैं

तन्हाई के आलम में ,चाँद की किरणों में

जो चेहरा नज़र आया

कभी धुँधला कभी उजला

वो नक़्श भी तेरा था ,ख्याल भी तेरा था

सहर तक तेरा इन्तज़ार करके

जागा हूँ रात भर मैं

मेरा इम्तिहान ले ले या मुझ पे रहम कर दे

ज़रा मेहरबाँ तो हो कुछ वादे का भरम रख ले

ख़ातिर तेरी नज़रें करम के

जागा हूँ रात भर मैं

जो दिल के क़रीब होते हैं

मिलते हैं नसीब से वो

रूह में बस के न दूर जा नज़र से

फ़क़त तेरी इक झलक के

जागा हूँ रात भर मैं ..,, ।

काग़ज़ की किश्ती…

कभी कभी सवालों के जवाब सवाल ही होते

सारे ख़्वाब हक़ीक़त में तब्दील नहीं होते

दूर आपसे देखिये कहाँ ले जाती है ज़िन्दगी

किसी किसी की क़िस्मत में पल सुकून के नहीं होते

ज़ब्त करें कितना ख़ुद को भला हम भी

काग़ज़ की किश्तीके लिये दरिया नहीं होते

मुरादों की रात थी आरज़ू से भरा दिल

मगर ज़ख़्मों को सीने के धागे नहीं होते

रस्में उल्फत…

अपनी कहानी भी कुछ अलग है यारब

मुहब्बत की भी तो रस्में उल्फत निभाई न गई

जो अज़ीज़ थे हमें जान से भी ज़्यादा

उन्होंने की दुश्मनी इस तरह ,दोस्ती हमसे निभाई न गई

जिनके लिये हम मज़हब औ ईमान थे

उसी ने किया दर ब दर इस तरह , कोई बस्ती हमसे बसाई न गई

दरमियाँ थे फ़ासले बहुत मगर

जो आग लगाई ग़ैरों ने हमसे वोबुझाई न गई

कोई रियायत न की आपने और ज़माने ने

इश्क़ ने जो क़ीमत माँगी हमसे चुकाई न गई ।

तू जाने या रब जाने…

अपना सब कुछ यारा मैंने तुझ पर वार दिया

तेरे दिल में क्या है ,ये तू जाने या रब जाने

अपना दिल औरअपनी जान सब तुझपे निसार किया

तेरे दिल में क्या है यारा तू जाने या रब जाने

तेरे ग़म पे मेरी ख़ुशी तेरे दर्द पे मेरी हँसी

सब ये तेरे नाम किया ,तू जाने या रब जाने

तेरी गलियाँ मेरी जन्नत तेरी ख़्वाहिश मेरी मन्नत

सजदा तेरे नाम किया, तू जाने या रब जाने

अब सब कुछ तेरे नाम किया तू जाने या रब जाने ।

मेहमां…

मेरे सपनों में कोई जागता है रात भर,

कहता हूँ उसको ,न आया करो इस तरह

शोख़ नज़रों से देखता है मुझे ,कहता है

ख़्वाब तो तुम्हारे हैं क्यूँ देखते हो मुझे

नींद तो मेरी उड़ी है तुमको क्या?

लाजवाब हो जाता हूँ इस तरह,

इश्क़ की यही तो ख़ूबियाँ हैं

ज़ुल्म सहो कुछ कह भी न सको

कोई दिल में रहे और दिल से ही खेला करे

लिल्लाह कोई दिल में किसी को मेहमां न करे ।

इक आग…

मेरी ख़्वाहिशों को मेरी आरजुओं को

लफ़्ज़ों में समेटने की कोशिश न करो

मैं कोई ग़ज़ल नहीं हूँ तुम्हारी

जो वर्को में लपेटोगे मुझे

इक धधकती हुई आग है

जो सुलगती जाती है जितना

बुझाना चाहूँ इसको

सौग़ात है मेरी ज़िन्दगी की…

कुछ लम्हे जो मैंने तुम्हारे साथ गुज़ारे हैं

ख़ूबसूरत सौग़ात है मेरी ज़िन्दगी की

मेरे सीने में सुलगती हैं वो यादें

धड़कती हैं साथ साथ मेरे दिल के

मेरे जीने की वजह हैं

रातों को धुआँ धुआँ होता है मेरा मन

उन्हीं यादों के गलियारे में भटकता हूँ मैं

ढूँढता हूँ वहीं सुकून के पल

जो कहीं खो गये हैं

पर अब भी बहते हैं लहू बनकर

मेरी नस नस में ।