दक्षिण भारतीय इतिहास…(३७)

परान्तक प्रथम की मृत्यु के बाद (955-85 )तक चोल राज्य में अस्तव्यस्तता रही।परान्तक प्रथम के बाद उसका पुत्र गंडरादित्य राजसिंहासन पर आसीन हुआ ,जब उसकी मृत्यु हुई चोल राज्य एक छोटा सा प्रदेश मात्र रह गया था ।
कुछ दुर्बल शासकों के पश्चात 956 में सुन्दर चोल परान्तक द्वितीय राजसिंहासन पर बैठा,वह पराक्रमी सिद्ध हुआ ।उसने पांड्य राज्य पर आक्रमण किया ।पांड्य राजा की सहायता श्री लंका नरेश महिन्द्र चतुर्थ ने की परन्तु सुन्दर चोल ने पांड्य राजा को दो युद्धों में पराजित किया।
इस युद्ध में उसके युवराज पुत्र आदित्य द्वितीय ने भी सहयोग किया था ।
सुन्दर चोल के अंतिम वर्षों में गंडरादित्य के पुत्र उत्तम चोल ने षडयंत्र करके युवराज आदित्य द्वितीय की हत्या कर दी और व्यथित सुन्दर चोल को विवश किया कि वह अपना उत्तराधिकारी अपने पुत्र अरिमोलवर्मन के स्थान पर उसे घोषित करे ।
इस प्रकार उत्तम चोल ,चोल सिहांसन पर आसीन हुआ ।
परन्तु चोल राज्य का अच्छा समय तब शुरु हुआ जब चोल सिहांसन पर सुन्दर चोल का छोटा पुत्र अरिमोलवर्मन आसीन हुआ ।

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दक्षिण भारतीय इतिहास…(३६)

दक्षिण भारत के चोल वंश का नाम मौर्य काल में मिलता है,महाभारत तथा मेगस्थनीज़ की इन्डिकामें भी चोलों का उल्लेख है माना जाता हैकि महाभारत काल मे सहदेव ने चोलों पर विजय प्राप्त की थी।सिंहली महाकाव्य महावंश में भी चोलों का नाम आता है।
प्रारंभ में चोल शासक पल्लवों के अधीन सामन्त थे जो कावेरी के तटवर्ती क्षेत्रों पर शासन कर रहे थे ।
(850-871ई०) चोल शासक विजयालय ने पांड्यों के तंजौर क्षेत्र पर आधिपत्य कर लिया और उरैयुर के स्थान पर तंजौर को अपनी राजधानी बना लिया ।
नवीं शताब्दी में विजयालय के उत्तराधिकारी आदित्य प्रथम ने अपनी शक्ति बढ़ानी शुरू की और छोटे छोटे राज्यों को जीत कर अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली ।तिरूवालंगाडु ताम्रपत्रों के अनुसार आदित्य प्रथम ने पल्लव शासक अपराजित के विरूद्ध विद्रोह करकेउसे हरा कर उसकी हत्या करदी और पल्लव राज्य पर अधिकार कर लिया।
इस विजय के बाद चोल राज्य की सीमा राष्ट्र कूट राज्य की सीमा से मिल गयी ।आदित्य प्रथम ने राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय की पुत्री से विवाह कर उसे प्रधान रानी बना दिया ।
907ई० में आदित्य प्रथम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र परान्तक प्रथम सिहांसन पर बैठा ।राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय इस बात पर क्रोधित हो गया वह चाहता था उसकी पुत्री का पुत्र कन्नरदेव चोल सिहांसन पर आसीन हो,अत:उसने चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया।परन्तु परान्तक प्रथम ने गंगनरेश पृथ्वी पति की सहायता से राष्ट्र कूट नरेश कृष्ण द्वितीय को पराजित कर दिया औरवीर चोल की उपाधि धारण की ।
परान्तक प्रथम को अपनी शक्ति को पूरी तौर पर पांड्य राजा राजसिंह द्वितीय के विरुद्ध लगाना पड़ा, उसने पांड्य राजा राजसिंह द्वितीय को पराजित कर उसकी राजधानी मदुरा पर अधिकार कर लिया
इसके पश्चात चोल राजाने पांड्य नरेश राजसिंह द्वितीय को दूसरे युद्धों में भी पराजित किया और धीरे धीरे पांड्य राज्य के क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया।परान्तक प्रथम की इन विजयी अभियानों से उसके राज्य की सीमा उत्तर में पेण्णारक्षेत्र से दक्षिण में कन्याकुमारी तक विशाल हो गई।
राष्ट्र कूट राजा कृष्ण तृतीय ने चोलों के शत्रुओं को एकत्र कर एक सम्मिलित सेना के साथ चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया और चोलों को जीत कर उनके तोंडमंडलम क्षेत्र को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया ।
इसके बाद भी राष्ट्र कूट राजा ने गंग राजा की सहायता से परान्तक प्रथम को दुबारा पराजित किया और चोल राज्य के कुछ क्षेत्रों को अपने राज्य में मिला लिया ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३५)

राजसिंह द्वितीय कुछ समय तक अपने ननिहाल में रहने के बाद अपने राज्य की पुन: प्राप्ति के लिये प्रयासरत हो गया और अपनी शक्ति को एकत्र कर चोलो से मुक़ाबलाकरने को तैयार हो गया ।परन्तु चोल नरेश ने पांड्य शक्ति को पुन: पराजित कर दिया ।

पराजित होने के बाद भी मार वरमन राजसिंह द्वितीय बार -बार अपने राज्य को स्वतन्त्र कराने का प्रयास करता रहा ,उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र वीरपांडय ने भी राज्य की स्वतन्त्रता के लिये प्रयास जारी रखा ,उसके शासनकाल में चोल राज्य का शासन एक दुर्बल शासक गंडरादित्य चोल के पास था जिसे वीरपांडय ने पराजित कर अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली ।

गंडरादित्य की मृत्यु के बाद उसका भतीजा सुंदर चोल परान्तक द्वितीय राजा बना ।उसने वीरपांडय की बढ़ती शक्ति को रोकने के लिये पांड्य राज्य पर आक्रमण किया ।वीरपांडय की सहायताश्रीलंका नरेश महेन्द्र चतुर्थ ने भी की परन्तु चोल नरेश ने उन्हें दो बार पराजित किया ।

वीरपांडय की मृत्यु ९६६ ई० में हो गयी और लगभग तीन शताब्दी तक पांड्य राज्य चोलो के आधिपत्य में रहा।

१०७०-११२० ई० में कुलोत्तुंग प्रथम के समय में पांड्य राजा जटावरमनश्रीवल्लभ ने पांड्य राज्य को स्वतंत्र रखने में कुछ वर्षों तक सफल रहा परन्तु कुलोत्तुंग ने उसे मार कर पांड्य राज्य पर अधिकार कर लिया ।

उसके पश्चात कुछ समय तक पांड्य राज्य उत्तराधिकार के कारण गृहयुद्ध में फँसा रहा ,कुलोत्तुंग तृतीय ने पांड्य राज्य के दो उत्तराधिकारियों वीरपांडय और विक्रम पांड्य के बीच के झगड़े को ख़त्म कर विक्रम पांड्य को मदुरा का शासक बनाया ।

विक्रम पांड्य के उत्तराधिकारी जटा वरमन कुलशेखर ने चोल सत्ता की अवज्ञा कर ,चोलों के विरूद्ध कुछ सफलतायें प्राप्त की ,उसके पुत्र मारवरमन सुन्दर पांड्य ने उदयपुर और तंजौर पर क़ब्ज़ा कर लिया और चोलो को भी अपने आधीन कर लिया । परन्तु चोलों ने

होयसलों की सहायता से पुन: अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली ।

हम भारत के लोग…(२)

राष्ट्रपति

राष्ट्र पति के पद की अवधि पाँच वर्ष होती है परन्तु जब तक उसका उत्तराधिकारी पद धारण न कर ले वह तब तक अपने कार्य काल के उपरांत भी अपने पद पर बना रहता है ।

राष्ट्र पति अपने पद से

॰अपना कार्य काल समाप्त होने पर

॰त्यागपत्र देने पर

॰महाअभियोग द्वारा

॰मृत्यु होने पर

॰निर्वाचन अवैध होने पर

पदमुक्त हो सकता है ।

राष्ट्र पति की शक्तियाँ –

(१) कार्य कारी शक्तियाँ –

• भारत सरकार के सभी शासन संबंधी कार्य उसके नाम से किये जाते हैं ।

• वह नियम बना सकता है

• वह प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है ।

• वह महान्यायवादी ,महालेखा परीक्षक ,चुनाव आयुक्त ,संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष ,राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति करता है ।

• वह स्वयं द्वारा नियुक्त प्रशासकों के द्वारा केन्द्र शासित राज्यों का प्रशासन सीधे संभालता है ।

(२) विधायी शक्तियाँ –

• वह संसद की बैठक बुला सकता है अथवा कुछ समय के लिये स्थगित कर सकता है और लोकसभा को विघटित कर सकता है ।

• जब एक विधेयक संसद द्वारा पारित होकर राष्ट्र पति के पास भेजा जाता है तो वहविधेयक को स्वीकृति देता है ,या स्वीकृति सुरक्षित रखता है ,विधेयक को यदि वह धन विधेयक नहीं है तो संसद के पु न:विचार के लिये लौटा देता है ।

• वह अंडमान व निकोबार द्वीप समूह ,लक्ष द्वीप ,दादर एवं नागर हवेली ,दमन व दीव में शांति ,विकास व सुशासन के लिये नियम बना सकता है ।

(३) वित्तीय शक्तियाँ –

• वह राज्य व केन्द्र के मध्य राजस्व के बँटवारे के लिये हर पाँच वर्ष में वित्त आयोग का गठन करता है ।

• धन विधेयक राष्ट्र पति की पूर्व अनुमति से ही संसद मे प्रस्तुत किया जा सकता है ।

(४) न्यायिक शक्तियाँ –

• वह उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है ।

• वह किसी अपराधी के दण्डादेश को निलंबित क्षमा या बदल सकता है ।

(५) कूटनीतिक शक्तियाँ –

• राष्ट्र पति भारत के सैन्य बलों का सर्वोच्च सेनापति होता है ,वह थल सेना ,वायु सेना और जलसेना के प्रमुखों की नियुक्ति करता है ।

• वह अंतराष्ट्रीय मामलों में भारत का प्रतिनिधित्व करता है ।

(६) आपातकालीन शक्तियाँ –

• राष्ट्र पति को तीन परिस्थितियों में आपातकालीन शक्तियाँ प्राप्त हैं

॰ राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद ३५२ )

॰ राष्ट्र पति शासन (अनुच्छेद ३५६व ३६५ )

॰ वित्तीय आपात काल (अनुच्छेद ३६० )

श्री कृष्ण…

द्वापर युग में भगवान विष्णु ने अवतार लिया था,कृष्ण के रूप में ये उनका नवाँ अवतार था । जब पृथ्वी दैत्यों के अत्याचार से पीड़ित हो रही थी तो वो ब्रह्मा जी के पास पहुँची,ब्रह्मा जी,शिव जी अन्य देवताओं के साथ वैकुण्ठ में भगवान विष्णु जी के पास गये और पृथ्वी की रक्षा की प्रार्थना की। विष्णु जी ने पृथ्वी की रक्षा का वचन दिया ।

कंस के कारागार में भाद्र पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में आधीरात को वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया ।

वसुदेव ने कंस से बचाने के लिये कृष्ण को गोकुल यशोदा और नंद के यहाँ पहुँचा दिया जहाँ उनका लालन पालन हुआ ।

बाल्यकाल में ही कंस द्वारा कृष्ण को मारने के लिये भेजे गये राक्षसों तृणावर्त ,बकासुर ,केशी ,कालनेमि ,

व्योमासुर और पूतना का वध कृष्ण द्वारा किया गया ।

कालियानाग के विष के दुष्प्रभाव के कारण यमुना का जल विषैला हो गया था ,कृष्ण ने उसे परास्त कर ,सपरिवार रमणक द्वीप पर भेज दिया और यमुना के जल को स्वच्छ बनाया ,गायों के पालन के कारण उनका एक नाम गोपाल भी था ।

जरासंध,शिशुपाल,शाल्वऔर विदूरथ जैसे दुष्टों काभी वध कृष्ण ने किया ।

कृष्ण जी के स्वर्ग आरोहण के बाद ही कलयुग का आरंभ माना जाता है ,और कृष्ण भगवान के स्वर्ग गमन पश्चात द्वारका नगरी भी सात दिनों के बाद जलमग्न हो गयी ।

चतुर्भुज कृष्ण के हाथों में शंख,चक्र ,गदा और पद्म शोभित है , उनका आयुध सुदर्शन चक्र ,वाहन गरूड़ और ध्वजचिन्ह गरूड़ है ।

उनकी आठ पटरानियां थी -रुक्मणी ,सत्यभामा,जामवंती ,कालिन्दी ,मित्र विंदा,

सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा ।

उनकी पुत्री का नाम चारूमती था ।

कृष्ण महान योगीश्वर ,राजनीतिज्ञ ,कूटनीतिज्ञ और कर्मयोगी थे ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३४)

श्री मारश्रीवल्लभ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र वरगुण द्वितीय राजसिंहासन पर आसीन हुआ ! वरगुण द्वितीय ने पल्लवों के बढते हुए राजनीतिक प्रभाव को रोकने के लिये चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया उसकी सेना तँजोर में कावेरी नदी के तट पर इडवै नाम के गांव तक पहुंच गयी परन्तु उसे वहां एक भयानक गुटबंदी का सामना करना पड़ा।
इस गुट में पल्लव युवराज अपराजित के नेतृत्व में चोल शासक आदित्य प्रथम तथा गंग राजा पृथ्वीपति की सेनाऐं भी पांड्य राजा के विरुद्ध युद्ध में शामिल हुई थी ।
वरगुण द्वितीय ने चोल राज्य के अलवै नाम के दुर्ग को जीतने के बाद पल्लव राज्य की सीमा में प्रवेश किया।यहां अपराजित के नेतृत्व में
गंग और चोल सेनाओं ने कुंभकोणम के निकट पुड्मवियम के मैदान में वरगुण द्वितीय को बुरी तरह पराजित किया।पांड्य शक्ति को इससे बहुत नुकसान हुआ और गंगराज पृथ्वीपति युद्ध में मारा गया।
वरगुण द्वितीय की राज्य की सीमा कावेरी नदी के तट तक ही रह गई ,पाण्ड्य राज्य का वो भाग जो कावेरी नदी के पार था उस पर चोल शासक आदित्य प्रथम का आधिपत्य हो गया ।
वरगुण द्वितीय के भाई परान्तक वीर नारायण पाण्ड्य ने उससे सिहांसन छीन कर अपना अधिकार कर लिया।
कोंगू प्रदेश और कावेरी के दक्षिणी क्षेत्र पर उसनेविजय प्राप्त की और पाण्ड्य राज्य में मिला लिया ।परन्तु चोल शासक आदित्य प्रथम ने कुछही दिनों में आक्रमण करके उससे कोंगू प्रदेश जीत लिया।
परान्तक वीरनारायण के बाद उसका पुत्र मार वर्मन राजसिंह द्वितीय राजा बना ।उसने अपने राज्य को पुनः संगठित किया औरश्रीलंका के शासक कस्सप पंचम से मैत्री संबंध स्थापित किए।
परन्तु चोल राजा परान्तक प्रथम ने 901ई 0में पाण्ड्य राज्य पर आक्रमण कर मदुरै को जीत लिया ।पाण्ड्य राजा ने श्रीलंका नरेश से सहायता की मांग की ,श्रीलंका नरेश ने अपनी सेना मदुरै भेज दी। परन्तु पाण्ड्य औरश्रीलंका की सम्मिलित सेनाओं को भी चोलों ने हरा दिया ।
राजसिंह श्रीलंका भाग गया ,सम्पूर्ण पाण्ड्य राज्य पर चोलों का अधिकार हो गया।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३३)

जटिल परान्तक नेडुंजडैयन (वरगुण प्रथम ) की मृत्यु के बाद उसका पुत्र श्रीमारश्रीवल्लभ राजसिंहासन पर बैठा ।वह अपने पिता की तरह महा पराक्रमी था उसे दक्षिण भारत का प्रजा पालक शासक कहा जाता है श्रीमारवल्लभ ने विलिनन्,कुन्नूर तथा सिंगलम् पर विजय प्राप्त की ।

सिहंली बौद्ध महाकाव्य महावंश के अनुसार श्रीलंका के शासक सेन प्रथम को पांड्य सेना ने पराजित किया और काफ़ी धन प्राप्त किया परन्तु दोनों के बीच सन्धि हो जाने के बाद पांड्य राजा ने सेन प्रथम को उसका राज्य वापस कर दिया ।

पल्लव राज दन्ति वरमन का पुत्र नन्दि वरमन तृतीय शक्तिशाली होने के साथ कूटनीतिज्ञ भी था ।उसने गंग,चोल और राष्ट्र कूट को मिलाकर पांड्य राजा श्रीमारवल्लभ पर आक्रमण कर दिया इस युद्ध में पांड्य पराजित हुये ,पल्लवों ने पांड्य राज्य के वेंगई नदी के तट तक का क्षेत्र जीत लिया ।

परन्तु पांड्य राजा ने पुन: अपनी शक्ति एकत्र की और पल्लव तथा उनके सहयोगी राजाओं को पराजित करअपनी हार का हिसाब बराबर किया ।

श्रीलंका नरेश सेन द्वितीय ने पल्लवों के साथ मिलकर श्रीमारवल्लभ की राजधानी मदुरै को घेर लिया और उनका साथ दिया पांड्य राजकुमार माया पांड्य ने जो स्वयं को राजगद्दी का हक़दार मानता था ।

इस युद्ध में भयंकर विनाश हुआ ,इस आक्रमण के परिणाम स्वरूप पांड्य नरेश श्रीमारवल्लभ युद्ध में बुरी तरह घायल हुआ और उसकी मृत्यु हो गयी ।

तब सिंहली सेनानायक ने उसके पुत्र वरगुण द्वितीय को राजसिंहासन पर बैठाया ।

हम भारत के लोग…(१)

राष्ट्रपति

संविधान के भाग पाँच के अनुच्छेद ५२ से ७८ तक संघ की कार्य पालिका के बारे में बताया गया है ,इसमें राष्ट्रपति ,उप राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री ,मंत्री मंडल तथा महान्यायवादी होते हैं ।

राष्ट्र पति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के चुने सदस्य ,राज्य विधानसभा के चुने सदस्य और केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली , पुडुचेरी के विधानसभा के चुने सदस्य करते हैं ।

संसद के दोनों सदनों के मनोनीत सदस्य, राज्य विधानसभाओं के मनोनीत सदस्य राज्य विधान परिषदों के’ द्विसदनीय विधायिका के मामलों में ‘सदस्य निर्वाचित तथा मनोनीत और दिल्ली तथा पुडुचेरी के मनोनीत सदस्य राष्ट्र पति के चुनाव में भाग नहीं लेते ।

राष्ट्रपति के पद हेतु योग्यता – कोई भी व्यक्ति भारत का नागरिक हो वह ३५ वर्ष का हो वह लोकसभा का सदस्य चुने जाने के योग्य हो वह संघ सरकार में ,राज्य सरकार में किसी स्थानीय या किसी सार्वजनिक स्थान में लाभ के पद पर होना नहीं चाहिये ।

राष्ट्र पति के चुनाव के लिये उम्मीदवार को ५० प्रस्ताव करने वाले और पचास अनुमोदन करने वाले होने चाहिये ।

उम्मीदवार को भारतीय रिज़र्व बैंक में पन्द्रह हज़ार रूपये ज़मानत राशि जमा करनी होगी ।

राष्ट्र पति पद ग्रहण से पूर्व शपथ लेता है । शपथ उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ,उनकी अनुपस्थिति में वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा शपथ दिलाई जाती है ।

राष्ट्र पति को संसद के किसी भी सदन का या राज्य विधायिका का सदस्य नहीं होना चाहिये यदि कोई व्यक्ति ऐसा है तो उसे सदन से पद ग्रहण करने से पूर्व त्यागपत्र देना होगा ।

वह कोई अन्य लाभ का पद नहीं लेगा ।

उसे बिना कोई किराया चुकाये आधिकारिक निवास राष्ट्र पति भवन दिया जायेगा ।

उसे संसद द्वारा निर्धारित उपलब्धियों और भत्ते प्राप्त होंगे ।

दक्षिण भारतीय इतिहास…(३२)

मार वरमन राजसिंह के उपरान्त उसका पुत्र जटिल परान्तक नेडुंजडैयन (वरगुण प्रथम ) पांड्य राजसिंहासन पर आसीन हुआ ।

वह पांड्य राज्य का शक्तिशाली और महान राजा हुआ ।वेलाविक्कुडि अभिलेखानुसार उसने पेण्णागडम्(तंजौर के क़रीब) के युद्ध में पल्लवराज नन्दिवरमन द्वितीय उनका साथ देने वाले नाट्टक्कुरूम्ब के राजा आयवेल की सेनाओं को पराजित किया । तगदूर(धर्मपुरी )के राजा अडिगैमान को युद्ध में पराजित किया तथा उसे बंदी बना कर रखा ।अंतत: तगदूर शासक ने उसकी अधीनता स्वीकार की ।वरगुण का विजयी अभियान जारी रहा ,उसने बेड़ाद राज्य परअधिकार कर लिया और कावेरी नदी के दक्षिण तट पर स्थित पेन्नागडम के युद्ध में उसने पल्लव नरेश नन्दि वरमन को हरा दिया ।उसकी शक्ति को रोकने के लिये पल्लव नरेश ने कोंगू केरल तथा अडिगैमान के साथ मिलकर वरगुण प्रथम पर आक्रमण किया ,पांड्य नृपति वरगुण प्रथम ने इन्हें पराजित किया औरपललव राज्य की सीमा में प्रवेश किया पल्लव शासित तोन्दईनाडु में पेन्नार नदी के अरशूर मैदान में अपना सैन्य शिविर स्थापित किया ।वरगुण प्रथम का शासन तिरुचिरापल्ली के आगे तंजोर ,सलेम, कोयम्बटूर प्रदेशों परऔर इसके संपूर्ण दक्षिणी भाग परहो गया ।

वरगुण प्रथम ने दक्षिण ट्रावणकोर स्थित वेणाड राज्य के सुदृढ़ क़िला बंद बंदरगाह विलिनम पर आक्रमण करके उस राज्य पर अपना शासन स्थापित किया ।

वरगुण प्रथम अपने समय का तमिल देश का प्रभावशाली और पराक्रमी राजा बन गया ।अपने शत्रुओं को पराजित करने के कारण उसने परान्तक उपाधि धारण की । वह विद्वानों कासंरक्षक और विद्यानुरागी था । वह पांड्य वंश का महान शासक था।