इतिहास के दस्तावेज़…(2)

हिन्दुस्तान के उद्योग धन्धे नष्ट करने और उसे अपने कारख़ानों के तैयार माल का बाज़ार बनाने के लिये अंग्रेज़ पूँजीपतियों ने मशीनों और राजसत्ता दोनों का इस्तेमाल किया ।

उन्होंने भारत के तैयार माल पर शुल्क लगाया और लगभग २३५ प्रकार के माल पर बड़ी बेइन्साफी के साथ भारी शुल्क लगाया गया ,जिस से भारतीय माल विलायती माल से टक्कर न लेसके ,यह शुल्क प्रति वर्ष बढ़ा कर भारतीय उद्योग धन्धे नष्ट किये जा रहे थे ।

३,३०,४२६ औरतें सिर्फ़ सूत कात कर जीविका चलाती थी ,दिन में कुछ घंटे काम करके वे साल में १०,८१ ,००५ रुपये का लाभ कर लेती थी ।अंग्रेज़ों की वजह से उनकी कमाई का साधन ख़त्म हो गया ।

फ़तुहा नवादा,गया टसर उद्योग के लिये प्रसिद्ध थे और काग़ज़ इत्र तेल नमक के उद्योग भी मुनाफ़ा करते थे ।

भागलपुर में बारह हज़ार बीघे में कपास की खेती होती थी दीनाजपुर में ३९,००० हज़ार बीघे में पटसन ,

२४,००० बीघे में कपास ,२४,००० बीघे में ईख ,१,५०० बीघे में तम्बाकू ,१५,००० बीघे में नील की खेती होती थी।

रेशम का व्यवसाय करने वाले पाँच सौ घर साल में १,२०,००० मुनाफ़ा लेते थे बुनकर साल में १६,७४,००० का कपड़ा तैयार करते थे ।पूर्णियाँ जिले की औरतें हर साल लगभग तीन लाख रूपये कपास ख़रीद कर सूत तैयार करती थी और बाजार में तेरह लाख रूपये का बेचती थी ।

इन तथ्यों से पता चलता है भारतीय उद्योग धन्धे कितना आगे थे ।

परन्तु अंग्रेज़ों को हिन्दुस्तानी जहाज़ों का माल लेकर दूसरे देशों में जाना रास न आया ,इसलिये नेविगेशन एक्ट बनाया गया जिसके अनुसार हिन्दुस्तान का किसी भी देश के साथ सीधा व्यापार करने का अधिकार ख़त्म कर दिया गया ।

इस प्रकार भारतीय उद्योग नष्ट होने लगा और ब्रिटेन के उद्योग फलने फूलने लगे ।

अठारहवीं सदी के आख़री सालों में और उन्नीसवीं सदी के शुरू में नील की खेती अंग्रेज़ों की लूट का मुख्य साधन थी ।हिन्दुस्तान से नील फ़्रान्स इटली अमेरिका मिस्र फ़ारस आदि देशों में जाता था नील के व्यापार ढेरों मुनाफ़ा देखकर कंपनी ने निलहे साहबों का उदय हुआ जो शोषण और अत्याचार के लिये इतिहास प्रसिद्ध हैं, निलहे साहबों ने किसानों को ग़ुलाम बना दिया और उनकी मेहनत की कमाई से वे मालामाल होने लगे।

ब्रिटिश पूँजीपतियों के शोषण से हिन्दुस्तान में बारबार अकाल पड़ने लगे ,उन्नीसवीं सदी में सात बार अकाल पड़ा इस अकाल में माना जाता १५ लाख आदमी मरे ।

भूखों मरते हिन्दुस्तान से अनाज ज़्यादा से ज़्यादा बाहर भेजा जाने लगा ,१८४५ में ८ लाख५८ हज़ार पौंड का १८५८ में ३८ लाख पौंड का ,१८७७ में ७९ लाख का १९०१ में ९३ लाख ,और१९१४ में १ करोड़ ९३ लाख पौंड का अनाज जिसमें गेंहू और चावल था बाहर भेजा गया ।

लूट का ये आलम था कि १९३१-३५ के समय में ३२० लाख औंस से ज़्यादा सोना ब्रिटेन ले जाया गया जिसकी क़ीमत २० करोड़ ३० लाख पौंड थी ,१९३१ से १९३७ के मध्य लगभग २४ करोड़ १० लाख पौंड का सोना ब्रिटिश साम्राज्य वादी भारत से ले गये ।

इन तथ्यों से पता चलता है ,कि ब्रिटेन ने भारत को औद्योगिक देश न बनाकर खेतिहर उपनिवेश बनाना चाहा ।इन लोगों ने भारत पर अधिकार जमा कर उसे हर तरह से लूटकर बरबाद किया ।तो क्या हिन्दुस्तानी जनता ने सब कुछ चुपचाप सह लिया ,नहीं ,समय समय पर जनता ने विरोध किया ।

जिससे अनेक विद्रोह का जन्म हुआ ,इतिहास प्रसिद्ध पहला विद्रोह ,सन्यासी विद्रोह के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

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इतिहास के दस्तावेज़…(1)

पिछले दिनों ख़बर आई थी कि इंग्लैंड की प्रधानमंत्री ने जलियाँवाला वाले हादसे पर अफ़सोस जताया है पर उस दर्दनाक घटना की माफ़ी नहीं माँगी ।ये घटना अंग्रेज़ों के लिये बदनुमा दाग है जो माफ़ी माँगने से भी धुलने वाला नहीं है ।

जिस तरह से उन्होंने भारत को न सिर्फ़ बुरी तरह लूटा बल्कि यहाँ के लोगों पर तरह तरह से ज़ुल्म भी किये |

पर आरम्भ में ऐसा करने की उनकी हिम्मत नहीं थी जब मुग़ल राज था और काफ़ी ताक़तवर था फिरभी ये लोग अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आते थे ,समुद्र डकैती करते थे ,और मुग़ल सरकार के हाथों दंड के भागी बनते थे शाहजहाँ के समय में भारतीय समुद्र में डकैती के कारण सूरत के सारे अंग्रेज़ गिरफ़्तार कर लिये गये थे और उन्हें काफ़ी हर्ज़ाना देने पर मुक्त किया गया था ।

इसी प्रकार १६८६ में जाब चारनाक के नेतृत्व में इन अंग्रेज़ों ने हुगली बंदरगाह पर लूट की थी तब औरंगज़ेब ने इन सब को गिरफ़्तार कर लिया था और भारी जुर्माना लेकर छोड़ा ।

१६९५ में मक्का से वापस आने वाले गंजेसवाई नामक जहाज़ को अंग्रेज़ों ने लूटा और स्त्रियों से दुर्व्यवहार किया ।इस पर औरंगज़ेब बेहद नाराज़ हुआ उसने सारे अंग्रेज़ों को गिरफ़्तार कर लिया ।उनका व्यापार बंद कर दिया ,और उनके सब हथियार छीन लिये गये ,उनकी तोपों के चबूतरे तोड दिये गये ,गिरजाघरों में घण्टों का बजना बंद करवा दिया गया ।

अगले साल जब अंग्रेज़ों ने हज के लिये जाने वाले जहाज़ों की रक्षा का क़रार किया ,वो भी लिखित में तभी उन्हें मुक्त किया गया ।

उस समय तक अंग्रेज़ों की इतनी सामर्थ्य नहीं थी कि वे भारत के माल के बराबर की क़ीमत का माल दे सकें इसलिये उन्हें अपने पास से सोना चाँदी देना पड़ता था,पर उन्हें इस तरह व्यापार पसन्द नहीं आता था पर उस वक़्त तक लूटमार करने की हिम्मत नहीं कर सकते थे |

पलासी के युद्ध (१७५७)की विजय के बाद अंग्रेज़ों के लिये लूट का रास्ता खुल गया ,इन लोगों ने

यहाँ के राजाओं और नवाबों की आपसी फूट का फ़ायदा

उठाया ,उन्हें आपस में लड़ाया और अपना मतलब निकाला ।

इस तरह यहाँ इन अंग्रेज़ों ने यहाँ अपने पैर ज़माने शुरू कर दिये और यहां के शासक बन बैठे ।

इसका परिणाम ये हुआ कि विदेश में भारतीय माल का निर्यात कम होने लगा। १८०१ में भारत से अमेरिका

१३,६३३ गाँठ कपड़ा जाता था ।१८२९ में कम होकर २५८ गाँठ रह गया ।१८०० तक भारत से प्रति वर्ष लगभग १४५०गांठ कपड़ा डेनमार्क जाता था ।१८२० में १२० गाँठ रह गया ।पुर्तगाल अरब फ़ारस और खाड़ी के आसपास के देशों में भी भारतीय कपड़ा जाता था ।पर धीरे धीरे ये कम बहुत कम हो गया और १८२५ के बाद २००० गाँठ से ज़्यादा कपड़ा नहीं भेजा गया ।

इस तरह इनकी लूट का सिलसिला बढ़ता ही गया और अंग्रेज़ सौदागर हिन्दुस्तान का माल ख़रीदने के बजाय हिन्दुस्तान से ही रूपया लूटने लगे ।

वैष्णव जन तो तेने रे कहिये जो पीर पराई जाने रे…

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की १५०वीं वर्ष गाँठ के अवसर पर एक सौ चौबीस देशों के कलाकारों ने गांधी जी के पसन्दीदा भजन “वैष्णव जन तो तेने रे कहिये जो पीर पराई जाने रे” ,गा कर उन्हें श्रध्दांजलि अर्पित की।

यह भजन गांधीजी की प्रार्थना सभा में गाया जाने वाला भजन था ।

महात्मा गांधी इन्टरनेशनल सेनीटेशन कॉन्फ़्रेंस के

दौरान युनाइटेड नेशन के जनरल सेक्रेटरी श्री एन्टोनियो

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ,विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज और श्रीमती उमा भारती जी की उपस्थिति में एक सौ चौबीस देशों के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया गया ।

लगभग पाँच मिनट का एक फ़्यूज़न वीडियो बनाया गया है ।

विशेषता इसकी ये है कि इस वीडियो में नाउरो के राष्ट्रपति श्री वारोन दिनावेसी वाका ने स्वंय की आवाज़ में इस भजन को गा कर गांधी जी को श्रध्दाजंलि दी है साथ ही प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को व्यक्तिगत रूप से उपहार दिया है ।

इश्क…

इश्क वो शै है जहाँ हौसले कम नहीं होते और भड़कते है शोले गर मुख़ालफ़त कम नहीं होते मुस्कुराते जाते हैं फिर भी ग़म के सिलसिले कम नहीं होते परेशां है कब से ये सोच के हम , क्यूँ उनकी यादों में हम नहीं होते