ख़्वाहिशें…

अहसास जागते गये

पलकें नम होती रहीं

बोझ दिल का

और आँखें बरसती रहीं

मुद्दतों राह देखा किये हम

ज़िन्दगी ख़्वाबों को राख करती रही

ख़्वाहिशों का बोझ दिल पर लिये हुये

तमन्नायें आँसुओं में ढलती रहीं

हाथों की लकीरों में बसा कर मुझको

क़िस्मत रोज़ नये दाँव चलती रही

वो मिला था मुझको नसीब से

बदनसीबी मगर साथ साथ चलती रही

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अंजामे मुहब्बत…

मैं अगर इक ग़ज़ल भेजूँ तुम्हें

तो तोहमत है मुझ पर इश्क की

जो किताब दूँ ग़ज़लों की

तो बुरा मानते नहीं लोग

गुज़रूँ तेरी गली से

तो तोहमत है मुझ पर बदकारी की

और गुज़रे मेरा जनाजा

तो फूल फेंकते है लोग

तेरे दीदार की हसरत रखूँ

तो बेअदब मानते है लोग

नज़रें झुका के निकलूँ

तो सही मानते हैं लोग

मुश्किल है तेरी गलियाँ

है इश्क कहाँ आसान

पैग़ाम ए मुहब्बत को

कहाँ मानते हैं लोग

बाज आये मेरे दिल की हसरतें

तो इश्क भी क्या है

अंजामे मुहब्बत को

कहाँ जानते है लोग ।

पहला अहसास…

मैं तो नाम हूँ तेरे इश्क़ का

जुनूँ हूँ तेरे ख्याल सा

मुकम्मल हो वो इश्क, क्या

भूल जाऊँ वो ख्याल ,क्या

तू सुकून है मैं बेताब हूँ

मेरे सामने है सवाल सा

बेचैनियों में शामिल रहा

किसी भूले हुये जवाब सा

मैं शाम सा तू रात सा

निकली है सहर कहीं

कहाँ से मेरी ज़िन्दगी में

चमका कोई आफ़ताब सा

तन्हाइयों की रात में

वस्ल का पैग़ाम है

अंधेरी रात में

तू मेरा माहताब सा

मुहब्बत के सफ़र में

मेरा पहला अहसास सा ।

एक दिन…

ख़ामोशियों में कभी यूँ ही

साथ साथ चले

न तुम कुछ कहो न हम कहें

पतझड़ हो या बहार हो

दिल में हमारे

सारे मौसम बसते हो

एक पूरा दिन

साथ गुज़ारूँ

तुम हो मैं हूँ

तन्हाई हो

फिर ज़िन्दगी

चाहे एक दिन की हो

मुन्तज़िर…

मैं भी सँवरूँ किसी के लिये

किसी की आँखों में

मुझको भी प्यार दिखे

कोई मेरा मुन्तज़िर हो

किसी के दिल में

मेरा इन्तज़ार दिखे

शामों में दिये जले

रातों में चाँद तारे खिले

सुबह में आँख मले

सूरज का इन्तज़ार करें

ख़ुशियों का आलम हो

दिल की राहों से बहार गुज़रे

इश्क़ में डूबे हुये दिलों की क़सम

एक बार फिर हम भी प्यार करें ।

तेरा अक्स…

तेरा ख़्याल कुछ इस तरह सुलग उठा

मुद्दतों से दबी राख में चिंगारी भड़क उठे

तेरा नाम भी लूँ जो मैं कभी

सासों में मेरे मोगरे कितने महक उठे

कहाँ कहाँ से गुज़रा हूँ मैं तेरी यादों के दरमियाँ

तेरा अक्स दिल में मेरे साथ साथ चला करे

तनहा चलूँ कि भीड़ हो

तेरा नाम ही मैं लिखा करूँ

सजदे करूँ जो कभी भी मैं

तेरे लिये ही दुआ करूँ

ज़ख़्म…

ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ यूँ न कुरेद मुझे

लहू है मेरे दिल का

ज़ख़्मों से बह रहा है

वो ज़ख़्म जो तेरी ख़ातिर मैंने है उठाये

क़तरा क़तरा है

मेरी पाक मुहब्बत का

इतना तो असर हो

मेरी वफाओं में

कभी याद आऊँ तो

शरम से झुक जाये

सर तेरा

मेरी बरबादियों का ग़म

नहीं है मुझे

ग़म तो इस बात का है

तू भी शामिल था

मुझे बरबाद करने वालों में

हर लम्हा…

अपनी हदें जानता हूँ लेकिन

जब तुम सामने आते हो

दिल सारी हदें भूल जाने लगता है

बहुत सारी उम्मीद नहीं करता

चाहता हूँ तुम बैठे रहो

मैं यूँ ही तुम्हें देखता रहूँ

तुम मेरे न हो न सही

मैं तो तुम्हारा ही हूँ

आज भी कल भी

हमेशा ही

मेरा हर लम्हा तुम्हारे लिये है

मेरे हर लम्हे में

तुम हो सिर्फ़ तुम

छोटी सी इल्तजा …

ख़ुद मुख़्तार हूँ मैं अपनी बर्बादी का

महज़ तुमने तो मुस्करा के बात की थी

खामखां तुम उठ के चल दिये

हमने तो महज़ अर्ज़ ए तमन्ना की थी

बेकसों की आरजुओं का ज़िक्र भी क्या

कब किसने इस बात की फिकर की थी

इस दिल पे बस किसका चला है

मैंने तो बस इक छोटी सी इल्तजा की थी

मुहब्बत में दिलों का क्या फ़र्क़

न समझने की भूल हमने कर ली थी

चेहरे…

मैं चीख़ता हूँ कभी कभी

अपनी पूरी ताक़त के साथ

बावजूद इसके कि ऊपर से मैं

शांत और संयत दिखता हूँ

मैं बहुत रोता भी हूँ

बिलख बिलख कर

पर मेरा रोना किसी को पता नहीं चलता

कई बार मैं रो रहा होता हूँ

जार जार

पर मेरे होंठों पर मुस्कराहट होती है

दिल दुख से भरा होता है

फिर भी ख़ुश लगता हूँ

सब के सामने मैं

कई चेहरे रखता हूँ मैं

ज़रूरत के साथ

बदल लेता हूँ चेहरा

कभी ख़ुशी के साथ कभी मुस्कराहट से

कई चेहरे हैं मेरे पास

जिन्हें बदलता रहता हूँ

मैं बार बार ।